इतिहास के 360 डिग्री चक्र में सिर्फ तारीख का ही नहीं बल्कि स्थानों का भी अपना महत्व होता है… आज, शनिवार 9 मई 2026 को, कोलकाता के जिस ‘ब्रिगेड परेड मैदान’ में शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है… आज से 80 साल पहले इसी स्थान से बंगाल के हिंदुओं का ‘ग्रहण काल’ आरंभ हुआ था…
वो तारीख थी 16 अगस्त 1946। इसी परेड मैदान पर बंगाल के कसाई और तत्कालीन मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा की थी। परेड मैदान में उस दिन लाखों मुसलमानों की भीड़ थी, जो सभा के बाद दंगाईयों की भीड़ में बदल गई और उसने हजारों हज़ार हिंदुओं के खून से कोलकाता की सड़कों को लाल कर दिया। वो ऐसा झटका था, जिससे बंगाल के हिंदू पूरे 80 साल तक उबर नहीं पाए।

उस दिन परेड ग्राउंड पर क्या हुआ था। ये भी आपको पता होना चाहिए। दोपहर तीन बजे तक ‘मैदान’ में करीब 2 लाख मुसलमानों की भीड़ जमा हो चुकी थी। सबसे पहले भाषण मुस्लिम लीग के नेता ख्वाजा नज़ीमुद्दीन ने दिया, उन्होंने कहा कि – ‘मुसलमानों की लड़ाई अंग्रेजों से नहीं, बल्कि हिंदुओं से है’।
इसके बाद बारी थी बंगाल के कसाई सुहरावर्दी की… उसने उस दिन जो कहा वो किसी भी समझदार के लिए साफ इशारा था, उसने कहा – “जाइए, आपके इफ्तार का वक्त हो रहा है… मैं ब्रिटिश फौज और पुलिस पर लगाम लगाने की हैसियत रखता हूं। पाकिस्तान बनाने के लिए आपके पास अगले 24 घंटे हैं। इस दौरान जो चाहो वो कर लो”।

इस भाषण के चश्मदीद गवाह सैयद नज़ीमुद्दीन हाशिम, जो बाद में बांग्लादेश के सूचना मंत्री बने, उन्होंने कहा था कि – “भीड़ जैसे किसी नशे में थी… वो जंगलियों की तरह चिल्ला रही थी… मैंने उनका पहला शिकार देखा, वह रेहड़ी लगाने वाला गरीब हिंदू उड़िया था… लुंगी पहने एक मुसलमान ने लोहे की छड़ से उसके सर पर वार किया और फिर बाकी लोग भी उस पर टूट पड़े”।
उस दिन ‘परेड मैदान’ से निकली मुस्लिम भीड़ कलकत्ता की जिस भी सड़क से गुज़री वहां मौत की निशानियां छोड़ती गई… ऐसा लग रहा था कि जैसे ‘तैमूर लंग’ और ‘नादिर शाह’ की क्रूर फौज पूरे कलकत्ता में खून का दरिया बहाने निकली हो… भीड़ ने सबसे पहले लिचुबगान में उड़िया बस्ती पर हमला किया… सिर्फ 15 मिनट में 300 हिंदू मार दिए गए।
बच्चों, औरतों और बुजुर्गों पर भी कोई तरस नहीं दिखाया गया… ब्रिटिश पत्रकार लियोनार्ड मोसले ने एक ऐसी ही क्रूर घटना का वर्णन करते हुए लिखा है, – “छोटी लड़कियों और बूढ़ों को रेंगकर ऐसी जगह चलने पर मजबूर किया गया जहां पहले से ही गाय तैयार रखी थी… उनके हाथ में छुरी पकड़ा दी गई और फिर उनसे जबरदस्ती गाय का गला कटवाया गया… वहीं एक बूढ़ी औरत को सड़क पर रोका गया… पहले तो भीड़ ने उसे चिढ़ाया और फिर उसके साथ धक्का-मुक्की करने लगे… फिर ‘खटाक’ की आवाज के साथ बुढ़िया के सर पर लाठी का वार हुआ”।
अगले सात दिन तक कोलकाता की सड़कों पर यही सब होता रहा… परेड मैदान से शुरु हुआ ये कत्लेआम 7 दिन बाद बंद तो हो गया लेकिन अगले 80 साल तक बंगाल का हिंदू इस ‘ग्रहण काल’ से बाहर नहीं निकल पाया है… लेकिन अब नई सुबह का सूरज निकला है… कमल खिला है… ये हिंदुओं के लिए ‘ग्रहण काल’ का अंत और ‘स्वर्णिम युग’ की शुरुआत है।
(सोशल मीडिया से साभार/ लेखक डीडी न्यूज़ के वरिष्ठ सलाहकार संपादक हैं)






