काशी, मथुरा, संभल मामलों में सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थता प्रयास किसी पक्ष को स्वीकार नहीं ।
प्रदीप सिंह।सुप्रीम कोर्ट या अदालतों को समय-समय पर न जाने क्यों मध्यस्थता का कीड़ा काटता है और यह मध्यस्थता की बात उनको तभी याद आती है जब हिंदुओं के अधिकार का मामला हो। अब सुप्रीम कोर्ट ने एक नया शिगूफा छोड़ा है कि 21, 22, 23 अगस्त को विशेष लोक अदालत लगेगी। उसमें हिंदू और मुस्लिम पक्ष आएं और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि, काशी में ज्ञानवापी मंदिर यानी काशी विश्वनाथ मंदिर और संभल में शाही जामा मस्जिद को लेकर जो विवाद है, उसके हल के लिए बातचीत करें। दोनों पक्षों ने इसके लिए मना कर दिया। मुस्लिम पक्ष ने लिखकर दे दिया कि हम मध्यस्थता के लिए तैयार नहीं हैं जबकि हिंदू पक्ष ने कहा- हम चाहते हैं कि अदालत से फैसला हो।
अदालतें इस तरह का काम पहले भी कर चुकी हैं। जस्टिस केहर जब चीफ जस्टिस थे तो उन्होंने अयोध्या मामले में एक मीडिएशन कमेटी बना दी थी। रिटायर्ड जस्टिस कलीफुल्लाह को उसका चेयरमैन और श्री श्री रविशंकर एवं एडवोकेट श्रीराम पांचू को कमेटी का सदस्य बनाया गया। इनसे कहा गया कि आप फैजाबाद जाइए वहां स्टेक होल्डर्स से बात कीजिए। कमेटी ने सबसे बातचीत के बाद सील्ड कवर में रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी। उसमें पता चला कि कोई भी पक्ष समझौते के लिए तैयार नहीं था। उसके बाद अयोध्या प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि यह हिंदुओं के आराध्य भगवान राम का जन्म स्थान है और यहां पर राम मंदिर ही बनना चाहिए। दरअसल यह जो प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट बना है, उसका एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं को अपने धर्मस्थलों का अधिकार पाने का जो कानूनी रास्ता है,उसे बंद करना है। इस एक्ट में कह दिया गया कि 1947 में जो स्थिति थी, उसको बदला नहीं जा सकता। यानी किसी धार्मिक स्थल का स्वरूप नहीं बदल सकते। इसको स्वीकार भी कर लिया। लेकिन उसी एक्ट में सेक्शन थ्री और फोर है, जिसके आधार पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने ज्ञानवापी के मामले में फैसला देते हुए कहा था कि स्वरूप नहीं बदला जा सकता,लेकिन स्वरूप का निर्धारण तो किया जा सकता है। स्वरूप बदलने या न बदलने की बात तो तब आएगी जब उसका निर्धारण होगा कि स्वरूप था क्या? इसलिए उन्होंने सर्वे की इजाजत दे दी। अब मुस्लिम पक्ष और दूसरे सनातन विरोधी लोग कह रहे हैं कि इस एक्ट का फायदा क्या हुआ? इसके रहते मामले अदालतों में जा रहे हैं और सुनवाई हो रही है। सवाल है कि सुनवाई क्यों नहीं होगी? भोजशाला के मामले में हाल ही में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था।
अब विचित्र बात देखिए। सुप्रीम कोर्ट खाप पंचायत जैसा फैसला करता है। अयोध्या के मामले में यह साबित हो गया कि वहां पर मंदिर था। उसको तोड़कर मस्जिद बनाई गई। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? कहा, ठीक है यह स्थान हिंदुओं को मिलेगा। यहां राम मंदिर बनेगा, लेकिन वहां से थोड़ी दूर पांच एकड़ जमीन मस्जिद के लिए मुसलमानों को दे दीजिए। क्यों दे दीजिए? कोई उपहार है? यह एक नया विवाद का केंद्र बनाने का आधार तैयार किया गया। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि जिसने आपके मकान पर कब्जा किया हो, वह कब्जा छोड़े तो उसके बदले में उसको कुछ मिल जाए। इसी तरह भोजशाला के मामले में मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ठीक है मुसलमानों को शुक्रवार को एक से तीन बजे के बीच में नमाज पढ़ने के लिए मंदिर परिसर के पास जगह दे दी जाए। आखिर ऐसा क्यों? देश की शीर्ष अदालत ऐसा कंसेशन देने के लिए क्यों तैयार है? क्या यह विवाद के नए केंद्र तैयार करने की कोशिश नहीं हो रही है। क्या कोई अदालत यह कहेगी कि यह मस्जिद है। इसको लेकर विवाद है। यहां पर हर मंगलवार को कीर्तन या हनुमान चालीसा का पाठ होना चाहिए। लेकिन ऐसा हो रहा है और अदालतें इसको बढ़ावा दे रही हैं। इसका सिर्फ एक कारण है कि वे अपने को सेकुलर दिखाना चाहती हैं। हमारे राजनेता और राजनीतिक दल भी ऐसे ही हैं। खुद को सेकुलर दिखाने का मतलब है हिंदुओं के अधिकार को छीनना। उनको दबाना और मुसलमानों को फायदा पहुंचाना, जो उनका अधिकार नहीं है, वह भी दे देना। वे मानते हैं कि हिंदुओं का अधिकार छीनकर मुसलमानों को दे दो तो देश में सेकुलरिज्म की स्थापना हो जाएगी। इस तरह से तो विवाद के नए-नए केंद्र पैदा होंगे। इस तरह से मुसलमानों के मन में आएगा कि सड़क पर उतरो,अदालत में जाओ और जो हमारा नहीं है वह भी ले लो और यही हो रहा है। सवाल यह है कि ऐसा कब तक होता रहेगा और क्यों होता रहेगा?
तो सुप्रीम कोर्ट ने अब कृष्ण जन्मभूमि, ज्ञानवापी मंदिर और संभल शाही जामा मस्जिद विवाद में लोक अदालत की बात की है। पहले कहा था कि जिन जिलों में ये विवाद हैं,वहां की लोक अदालत में यह फैसला हो। 4 जुलाई को मथुरा में लोक अदालत बैठी। वहां कोई फैसला नहीं हुआ। बाकी जगह दोनों पक्षों ने जाने से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 21,22 और 23 अगस्त को राष्ट्रीय स्तर पर लोक अदालत का जो फरमान जारी किया है, उसको दोनों पक्षों ने मानने से मना कर दिया। सवाल यह है कि अदालत का काम है कानून और संविधान के आधार पर फैसला सुनाना। आपके सामने मामला है। आप उस पर विचार कीजिए कि तथ्य क्या है? सत्य क्या है? किसके पक्ष में साक्ष्य है उसके आधार पर फैसला सुनाइए। यह क्या है कि खाप पंचायत की तरह कि दोनों पक्षों को बुलाकर सुनो और एक को सजा सुना दो और एक को कुछ कंसेशन दे दो। सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट खाप पंचायत नहीं है। वह संविधान से मिली हुई ताकत के आधार पर काम करते हैं। उनको बताना है कि अगर सरकार ने कोई फैसला लिया है या कोई कानून बनाया है तो वह संविधान सम्मत है या नहीं। कानून बनाना उनका काम नहीं है। यह पंचायत करना उनका काम नहीं है कि दो लोगों में झगड़ा है तो सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता करवाएगा। और सबसे बड़ी बात है दोनों पक्षों में से कोई पक्ष अगर सुप्रीम कोर्ट गया होता कि मध्यस्थता करवाइए। हम चाहते हैं कि बातचीत से मामला हल हो जाए। तब भी बात समझ में आती है। दोनों पक्ष मध्यस्थता से इनकार कर रहे हैं और चाहते हैं कि कानून के आधार पर फैसला हो,ऐसे में सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि नहीं, बातचीत से फैसला हो जाए। किसी ने हमारे घर पर कब्जा कर लिया है और उस कब्जे को छुड़ाना है तो उसमें बातचीत क्या होगी? वह कब्जा छोड़ दे, विवाद खत्म हो गया। दूसरा कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है तो हम उससे क्या बातचीत करें।
सुप्रीम कोर्ट असल में देश और समाज को कहां ले जाना चाहता है? यह जो खाप पंचायत जैसी मानसिकता है, उससे बचना चाहिए। यह मध्यस्थता कॉर्पोरेट मामलों में काम आती है। समझना पड़ेगा कि ये मुद्दे विवाद बने क्यों हैं? वह इसलिए कि इस देश में आक्रांता आए। उन्होंने मंदिरों को तोड़ा और मंदिरों पर कब्जा किया। वहां मस्जिद बनाई। अब हिंदू चाहता है कि हमारे जो मंदिर तोड़े गए हैं, वे वापस मिलें। इसमें मध्यस्थता की बात कहां से आती है? सबसे पहली बात तो यह है कि क्या मुस्लिम पक्ष उन आक्रांताओं को आक्रांता मानने को तैयार है? वह तो उन आक्रांताओं को अपना नायक मानता है। उनकी प्रशंसा करता है। उनकी मजार पर चादर चढ़ाने जाता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि बीच का रास्ता निकाल लो। सवाल है कि क्यों निकालें बीच का रास्ता? अगर हमारी संपत्ति है तो उस पर हम अपना दावा क्यों छोड़ दें? सिर्फ इसलिए कि कोई जबरन उस पर कब्जा करना चाहता है या कर चुका है। ऐसे तो जितनी सरकारी जमीनों पर कब्जा हुआ है, उन सब मामलों में मध्यस्थता करानी चाहिए कि सरकार उनको इतना हिस्सा दे दे और इतना हिस्सा वे सरकार के लिए छोड़ दें। इस तरह से देश चलेगा क्या? अदालत का काम कानून के मुताबिक फैसला करना है। आप देखिए कानून के मुताबिक किसका पक्ष मजबूत है। उसके अनुसार फैसला कीजिए। बात खत्म और उसको लागू कराने का का जिम्मा सरकार का है। इसलिए इस तरह की कोशिशें जब तक सुप्रीम कोर्ट करता रहेगा, विवाद खत्म होने के बजाय नए विवाद जन्म लेंगे और यही हो रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
तो सुप्रीम कोर्ट ने अब कृष्ण जन्मभूमि, ज्ञानवापी मंदिर और संभल शाही जामा मस्जिद विवाद में लोक अदालत की बात की है। पहले कहा था कि जिन जिलों में ये विवाद हैं,वहां की लोक अदालत में यह फैसला हो। 4 जुलाई को मथुरा में लोक अदालत बैठी। वहां कोई फैसला नहीं हुआ। बाकी जगह दोनों पक्षों ने जाने से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 21,22 और 23 अगस्त को राष्ट्रीय स्तर पर लोक अदालत का जो फरमान जारी किया है, उसको दोनों पक्षों ने मानने से मना कर दिया। सवाल यह है कि अदालत का काम है कानून और संविधान के आधार पर फैसला सुनाना। आपके सामने मामला है। आप उस पर विचार कीजिए कि तथ्य क्या है? सत्य क्या है? किसके पक्ष में साक्ष्य है उसके आधार पर फैसला सुनाइए। यह क्या है कि खाप पंचायत की तरह कि दोनों पक्षों को बुलाकर सुनो और एक को सजा सुना दो और एक को कुछ कंसेशन दे दो। सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट खाप पंचायत नहीं है। वह संविधान से मिली हुई ताकत के आधार पर काम करते हैं। उनको बताना है कि अगर सरकार ने कोई फैसला लिया है या कोई कानून बनाया है तो वह संविधान सम्मत है या नहीं। कानून बनाना उनका काम नहीं है। यह पंचायत करना उनका काम नहीं है कि दो लोगों में झगड़ा है तो सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता करवाएगा। और सबसे बड़ी बात है दोनों पक्षों में से कोई पक्ष अगर सुप्रीम कोर्ट गया होता कि मध्यस्थता करवाइए। हम चाहते हैं कि बातचीत से मामला हल हो जाए। तब भी बात समझ में आती है। दोनों पक्ष मध्यस्थता से इनकार कर रहे हैं और चाहते हैं कि कानून के आधार पर फैसला हो,ऐसे में सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि नहीं, बातचीत से फैसला हो जाए। किसी ने हमारे घर पर कब्जा कर लिया है और उस कब्जे को छुड़ाना है तो उसमें बातचीत क्या होगी? वह कब्जा छोड़ दे, विवाद खत्म हो गया। दूसरा कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है तो हम उससे क्या बातचीत करें।
सुप्रीम कोर्ट असल में देश और समाज को कहां ले जाना चाहता है? यह जो खाप पंचायत जैसी मानसिकता है, उससे बचना चाहिए। यह मध्यस्थता कॉर्पोरेट मामलों में काम आती है। समझना पड़ेगा कि ये मुद्दे विवाद बने क्यों हैं? वह इसलिए कि इस देश में आक्रांता आए। उन्होंने मंदिरों को तोड़ा और मंदिरों पर कब्जा किया। वहां मस्जिद बनाई। अब हिंदू चाहता है कि हमारे जो मंदिर तोड़े गए हैं, वे वापस मिलें। इसमें मध्यस्थता की बात कहां से आती है? सबसे पहली बात तो यह है कि क्या मुस्लिम पक्ष उन आक्रांताओं को आक्रांता मानने को तैयार है? वह तो उन आक्रांताओं को अपना नायक मानता है। उनकी प्रशंसा करता है। उनकी मजार पर चादर चढ़ाने जाता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि बीच का रास्ता निकाल लो। सवाल है कि क्यों निकालें बीच का रास्ता? अगर हमारी संपत्ति है तो उस पर हम अपना दावा क्यों छोड़ दें? सिर्फ इसलिए कि कोई जबरन उस पर कब्जा करना चाहता है या कर चुका है। ऐसे तो जितनी सरकारी जमीनों पर कब्जा हुआ है, उन सब मामलों में मध्यस्थता करानी चाहिए कि सरकार उनको इतना हिस्सा दे दे और इतना हिस्सा वे सरकार के लिए छोड़ दें। इस तरह से देश चलेगा क्या? अदालत का काम कानून के मुताबिक फैसला करना है। आप देखिए कानून के मुताबिक किसका पक्ष मजबूत है। उसके अनुसार फैसला कीजिए। बात खत्म और उसको लागू कराने का का जिम्मा सरकार का है। इसलिए इस तरह की कोशिशें जब तक सुप्रीम कोर्ट करता रहेगा, विवाद खत्म होने के बजाय नए विवाद जन्म लेंगे और यही हो रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









