समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने दो विकट समस्याएं हैं और इन दोनों समस्याओं का हल उन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले खोजना है।
पहली समस्या यह है कि उनकी पूरी राजनीति यादव और मुस्लिम वोट पर टिकी हुई है। उत्तर प्रदेश में यादवों की आबादी जितनी है उसकी लगभग दुगनी आबादी मुसलमानों की है। यह सबको मालूम है कि अखिलेश मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं, लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है कि मुसलमान कह रहा है-वोट हमारा मुख्यमंत्री तुम्हारा कब तक चलेगा? वह कह रहा है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में समाजवादी पार्टी किसी मुस्लिम चेहरे को आगे करे। कब तक मुख्यमंत्री का पद यादव परिवार को ही मिलेगा। इस समस्या का अखिलेश यादव के पास कोई जवाब नहीं है। वह अपने परिवार से बाहर या अपने अलावा किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर ही नहीं सकते। इस मुद्दे को असदुद्दीन ओवैसी और बढ़ा-चढ़ा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की 145 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता प्रभावी हैं। उन्होंने उन सब सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। वह मुसलमानों से कह रहे हैं कि तुम वोट समाजवादी पार्टी को देते हो,लेकिन तुम्हें मिलता क्या है? वे तुम्हारे वोट से राज करते हैं, यह कब तक चलेगा? कम से कम अपने लोगों को वोट दो जिससे विधानसभा और लोकसभा में तुम्हारा प्रतिनिधित्व बढ़े। अब यह बात धीरे-धीरे मुसलमानों के गले के नीचे उतर रही है। दूसरी समस्या यह है कि मुसलमान देख रहे हैं कि समाजवादी पार्टी और अपने को सेकुलर कहने वाले अन्य दलों को एकमुश्त वोट देने से भी भाजपा को हराया नहीं जा पा रहा। भाजपा फिर भी जीत जाती है। वह नए-नए राज्यों में सत्ता में आ रही है। भाजपा के विरोध में मुस्लिमों के एकजुट पड़ने से भी भाजपा की सीटें बढ़ रही हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ ही उड़ीसा में विधानसभा चुनाव हुआ तो वहां उसका मुख्यमंत्री बन गया। इसके बाद बिहार में उसका मुख्यमंत्री बन गया। उसके अलावा पश्चिम बंगाल जहां असंभव माना जाता था,वहां पर भी भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री बन गया। असम में तीसरी बार भाजपा की सरकार और उसका मुख्यमंत्री बन गया। तो मुसलमान भाजपा को कहां रोक पा रहा है ? ऐसे में वह भाजपा विरोधी दलों को ही वोट क्यों दे?
दूसरा देश में राजनीतिक परिदृश्य को बदलते देखकर तमाम सेकुलर पार्टियां,जिनमें समाजवादी पार्टी भी शामिल है,हिंदुत्व के रास्ते पर जाने की कोशिश कर रही हैं। उनको मालूम नहीं है कि वहां कोई जगह ही नहीं है। सनातन पर भाजपा और संघ परिवार की बेहद मजबूत पकड़ है। अखिलेश यादव को लगा कि अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की बात सामने आने से उनके हाथ बहुत बड़ा मुद्दा लग गया है। यह ठीक है कि इस बात से हिंदू समाज में बहुत रोष है,लेकिन इसके कारण ये लोग भाजपा को छोड़कर उस समाजवादी पार्टी को वोट देने लगेंगे जो पहले दिन से मस्जिद की समर्थक रही है तो ऐसा नहीं होने वाला। अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के लिए एक मुश्किल यह भी है कि अब भारतीय जनता पार्टी और सपा के विरोधी याद दिला रहे हैं कि आप रोज डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम की माला जपते हैं। डॉक्टर लोहिया तो रामायण मेला कराते थे। आप तो इन सबसे कोसों दूर हैं। दूसरा इस कोढ़ में खाज यह कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव को न्योता दे दिया कि अगर सनातन धर्म की इतनी ही चिंता है तो मथुरा चलिए, भगवान कृष्ण के जन्म स्थान के लिए मिलकर आंदोलन करते हैं। तो अखिलेश यादव के लिए दोनों तरफ से मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। मुस्लिम मतदाता अपना हक मांग रहा है और हिंदू कह रहा है कि साबित करके दिखाओ कि हमारे साथ हो। ऐसे में अखिलेश न तो हिंदुओं के साथ होने को साबित कर पा रहे हैं और न मुसलमानों को संतुष्ट कर पा रहे हैं कि हम आपको सत्ता में उचित हिस्सेदारी देंगे। अब तो उनसे कांग्रेस के नेता तक पूछ रहे हैं कि आप किस मुसलमान के पक्ष में खड़े हुए? तो समाजवादी पार्टी पर चौतरफा हमला हो रहा है। हालांकि अभी यादवों ने हमला नहीं शुरू किया है, लेकिन जो परिस्थिति बन रही है उसमें यादव कब तक चुप रहेंगे, यह कहना मुश्किल है। समाजवादी पार्टी अगर 2027 का चुनाव हार जाती है जो कि अभी से लग रहा है तो उसके बाद यादव समाज में भी रीथिंकिंग का सिलसिला शुरू होगा। आखिर वे कब तक एक परिवार का साथ दें। अखिलेश यादव और उससे पहले उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने अपने परिवार के लिए सबसे ज्यादा चिंता की। वे पूरे यादव समाज की चिंता नहीं करते। सत्ता मिलेगी तो उसमें पहला हिस्सा यादव परिवार का होगा। उसके बाद यादव समाज के जो लोग उनके बेहद करीबी हैं उनका नंबर आएगा। आम यादव का तो कोई फायदा हो नहीं रहा। तो उत्तर प्रदेश की राजनीति की एक नई पुनर्रचना हो रही है। सामाजिक समीकरण बदल रहे हैं। पार्टियों के जनाधार में परिवर्तन आ रहा है। जो कोर वोट है, उसमें रीथिंकिंग हो रही है।
उत्तर प्रदेश में इस समय भाजपा और समाजवादी पार्टी ही मुख्य मुकाबले में हैं। बहुजन समाज पार्टी अपने बॉटम पर पहुंच गई है। अब मायावती के साथ सिर्फ जाटव वोट हैं। उसके अलावा दलित समाज का कोई और वर्ग उनके साथ जुड़ने को तैयार हो ऐसा कम से कम अभी तो दिखाई नहीं देता। लेकिन बहुजन समाज पार्टी के लिए उम्मीद की एक किरण है और वह है मुसलमानों का समाजवादी पार्टी के प्रति बढ़ता असंतोष। मायावती के पास 12-13% सॉलिड वोट है। अखिलेश यादव के पास करीब 11% सॉलिड यादव वोट है लेकिन वह मायावती से कम ही है। इस दृष्टि से भी देखें तो बहुजन समाज पार्टी समाजवादी पार्टी से आगे है। अब उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को सोचना है कि क्या वे किसी विकल्प की तलाश में हैं? उनके सामने दो विकल्प हैं। एक असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी और दूसरा बहुजन समाज पार्टी। मायावती को मुसलमानों ने इसलिए रिजेक्ट किया था कि वह कभी भी भारतीय जनता पार्टी के साथ जा सकती हैं। मायावती चार बार मुख्यमंत्री बनीं, उनमें से तीन बार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से बनीं। लेकिन अब जो राजनीतिक परिस्थिति है उसमें भाजपा को मायावती के समर्थन की जरूरत नहीं पड़ने वाली है। तो मुसलमानों के लिए एक संभावना का द्वार बहुजन समाज पार्टी की ओर भी खुल रहा है। क्या वह उस पर विचार करेगा? यह इस पर निर्भर करेगा कि अखिलेश यादव का अगला कदम क्या होता है। क्या वह यह आश्वासन देंगे कि सरकार आने पर मुख्यमंत्री नहीं तो कम से कम डिप्टी सीएम किसी मुसलमान को बनाएंगे? क्या अखिलेश यादव यह साहस जुटा सकते हैं कि वह मथुरा में भगवान कृष्ण की जन्मभूमि के आंदोलन में शामिल हों या उसका समर्थन करें? अगर वह यह दोनों नहीं कर सकते तो सोच लें कि 2027 के चुनाव में उनकी पार्टी का क्या हाल होने वाला है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे व शरद पवार और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का उदाहरण उनके सामने है। अगर उससे सीख सकें तो ठीक है, नहीं तो फिर अपने अनुभव से सीखेंगे।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









