“खेलों में क्रिकेट भारत का धर्म है!”, यह एक ऐसा वाक्य है जिसे हमने दशकों से सुना और जिया है। जब भारतीय क्रिकेट टीम मैदान पर हारती, तो पूरे देश में एक सन्नाटा पसर जाता था, लेकिन अब ये बीते दिनों की बात हो गई है। यदि आज आप अपनी आँखें क्रिकेट के मैदान से हटाकर भारत के अन्य खेल परिसरों, एथलेटिक्स ट्रैक, तलवारबाजी के स्ट्रिप, रोइंग के जलाशयों और जिम्नास्टिक के फ्लोर की तरफ घुमाएंगे, तो आपको एक अलग ही नजारा दिखेगा। एक ऐसा नजारा जो आपको अपनी आँखों पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर देगा कि क्रिकेट से अलग भारत में एक नया भारत अपनी विशालता के साथ मौजूद है।
दरअसल, देश के उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने हाल ही में सोशल मीडिया पर इसी बदली हुई तस्वीर की ओर ध्यान आकर्षित किया। उनका संदेश उस मानसिक परिवर्तन की ओर संकेत है, जोकि आज भारतीय खेलों की सबसे बड़ी पूंजी बन चुका है। सच भी है, भारत की गूंज अब ओलंपिक, विश्व चैंपियनशिप और अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों तक सुनाई देती है।
आज भारत उन खेलों में भी दुनिया के दिग्गजों को चुनौती दे रहा है, जहाँ कभी हमारा अस्तित्व तक नहीं माना जाता था। वॉलीबॉल के कोर्ट पर गगनचुंबी स्पाइक्स हों, तलवारबाजी में पलक झपकते ही विरोधी को पस्त करना हो, या ट्रैक एंड फील्ड में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धावकों और थ्रोअर्स से लोहा लेना हो, भारत अब एक दावेदार के रूप में उभर रहा है। कुछ साल पहले तक, यदि कोई कहता कि भारत ओलंपिक में तलवारबाजी या जिम्नास्टिक में दुनिया के शीर्ष एथलीटों को टक्कर देगा, तो इसे एक मज़ाक माना जाता, लेकिन आज यह हकीकत है।
Fencing जैसे पारंपरिक रूप से यूरोपीय देशों के दबदबे वाले इस खेल में चेन्नई की एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की, सी.ए. भवानी देवी ने न सिर्फ ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि भारतीय एथलीट किसी भी खेल की तकनीकी बारीकियों को मास्टर कर सकते हैं। त्रिपुरा के एक छोटे से जिम से निकलकर दीपा कर्माकर ने जब रियो ओलंपिक 2016 में खतरनाक ‘प्रोडुनोवा वॉल्ट’ लगाया, तो पूरी दुनिया ने दांतों तले उंगली दबा ली थी। वह भले ही चौथे स्थान पर रहीं, लेकिन उन्होंने भारत में जिम्नास्टिक की एक नई पौध तैयार कर दी, जो अब विश्व कप और एशियाई स्तर पर पदक जीत रही है।इसी तरह से नीरज चोपड़ा का टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत लेने से भारतीय एथलेटिक्स के आत्म-विश्वास को हमेशा के लिए बदल दिया।
इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी और प्रमाणित (BWF लेवल 1) कोच प्रज्ञा राय कहती हैं, “आज भारत के पास एक नीरज नहीं है; Javelin Throw, Long Jump, ट्रिपल जंप और रिले रेस (4x400m) में भारतीय खिलाड़ी विश्व स्तर पर फाइनल में जगह बना रहे हैं और पोडियम को छू रहे हैं। सेना के जवानों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के दम पर रोइंग (नौकायन) में भारत एशियाई स्तर पर दबदबा बना चुका है और ओलंपिक के कठिन क्वालिफिकेशन को पार कर रहा है। ‘प्राइम वॉलीबॉल लीग’ जैसे घरेलू आयोजनों ने भारतीय वॉलीबॉल को एक नया जीवन दिया है, जहाँ हमारे खिलाड़ी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ क्लबों के खिलाफ मुकाबला कर रहे हैं। फिर बैडमिंटन में तो हमारा प्रदर्शन विश्व भर में देखने लायक है।”
वे कहती हैं, “अंतरराष्ट्रीय पदक लाकर भारत का नाम रोशन करने वाले प्रमुख खिलाड़ियों में पीवी सिंधु (ओलंपिक और विश्व चैंपियन), साइना नेहवाल (ओलंपिक पदक विजेता), प्रकाश पादुकोण, लक्ष्य सेन तथा सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की युगल जोड़ी शामिल है। पैरा-बैडमिंटन में प्रमोद भगत ने भी देश के लिए स्वर्ण पदक जीते हैं। हम खेल के हर मैदान में आज विजय प्राप्त कर रहे हैं।”
Lakshmibai National Institute of Physical Education (LNIPE) में Head (Department of Health Sciences), Professor Deepak Sharma का कहना है, “यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। यह दशकों की उपेक्षा, प्रशासनिक उदासीनता और बुनियादी ढांचे की कमी से लड़कर उपजी एक ‘मौन क्रांति’ है। यह कहानी है नीतियों के बदलने की, कॉपोरेट जगत के आगे आने की और सबसे बढ़कर, भारत के छोटे-छोटे गांवों और कस्बों से निकले उन युवाओं की, जिनकी आँखों में अब हार का डर नहीं, बल्कि वैश्विक विजय का सपना है।”
शर्मा कहते हैं, “हम अभी भी कई खेलों में पोडियम (शीर्ष तीन स्थानों) से कुछ कदम दूर हैं, लेकिन चौथे या पांचवें स्थान पर आना और दुनिया के शीर्ष 8 एथलीटों में शामिल होना इस बात का सबूत है कि फासला अब मीलों का नहीं रहा है, कुछ सेंटीमीटर और कुछ सेकंड का रह गया है।” उन्होंने कहा, “भारत को प्रत्येक खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिए क्रमबद्ध रूप में आगे बढ़ना चाहिए। जैसा कि हम चीन, जापान, यूएस समेत अनेक देशों में होता हुआ देख रहे हैं।”
क्रीड़ा भारती के अखिल भारतीय संगठन महामंत्री प्रसाद महानकर का कहना है, “खेल सृष्टि में भारतीय दृष्टि होना जरूरी है, इसी प्रकार से खेल का प्रदर्शन नहीं, दर्शन होना जरूरी है। जब कोई खिलाड़ी इस बात को गहराई से समझ जाता है तो परिणाम उसे पूर्ण सफलता की ओर ले जाते हैं, ऐसे में क्रीड़ा भारती इसी दिशा में युवाओं को खेलों में प्रति उत्साह जगाने, उन्हें भारतीय खेलों, जिसमें परंपरागत खेल, खो-खो, कबड्डी से लेकर अन्य खेल शामिल हैं के प्रति लगातार प्रोत्साहित कर रही है।”
भारत के खिलाड़ी मनवा रहे दुनिया भर में अपना लोहा
प्रसाद महानकर कहते हैं, “आज भारत के खिलाड़ी प्रत्येक खेल में दुनिया भर में अपना लोहा मनवा रहे हैं। क्रीड़ा भारती की देशभर में प्रदेश स्तर से लेकर जिला केंद्रों तक 550 से अधिक खेल इकाइयां सक्रिय हैं। जो लगातार युवाओं को खेलों के प्रति प्रोत्साहित करने का कार्य कर रही हैं। निश्चित ही खेलों के लिए समर्पित अनेक संगठनों के प्रयासों के साथ ही हमारे इस दिशा में किए जा रहे सकारात्मक प्रयासों का आज प्रभाव सर्वत्र दिख रहा है।”
क्रीड़ा भारती के राष्ट्रीय महामंत्री राज चौधरी का मानना है कि इस अभूतपूर्व बदलाव के पीछे एक मजबूत प्रशासनिक और ढांचागत तंत्र काम कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों ने यह समझ लिया है कि खेल मनोरंजन होने तक सीमित न होकर राष्ट्र की Soft Power का प्रदर्शन है। केंद्र सरकार का शुरू किया गया Fit India Movement हमारे सामने एक बड़ा उदाहरण है, जिसमें कि भारत सरकार अपने इस राष्ट्रव्यापी अभियान के माध्यम से देशवासियों को शारीरिक गतिविधियों और खेलों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। क्रीड़ा भारती भी अपने निर्माण के पहले दिन से इसी कार्य को परंपरागत खेलों के माध्यम से कर रही है। अब स्वभाविक है कि देशभर से उसके सकारात्मक उत्साहवर्धक परिणाम भी सामने आ रहे हैं।
ओडिशा मॉडल: खेल पुनरुत्थान का एक उत्कृष्ट उदाहरण
जब भारत में खेल विकास की बात होती है, तो ओडिशा का नाम सबसे ऊपर आता है। ओडिशा सरकार ने जो कर दिखाया, वह दुनिया के लिए एक केस स्टडी है। ओडिशा ने खेलों को ‘गोद’ दिया।भुवनेश्वर और राउरकेला में विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा (जैसे कलिंगा स्टेडियम और बिरसा मुंडा हॉकी स्टेडियम) तैयार किया। परिणाम स्वरूप, भारत ने टोक्यो में 41 साल बाद हॉकी में ओलंपिक पदक जीता।
ओडिशा ने हॉकी तक खुद को सीमित नहीं रखा। वहां के प्रशासन ने कॉर्पोरेट दिग्गजों और प्रसिद्ध अकादमियों के साथ साझेदारी करके एथलेटिक्स, फुटबॉल, जिम्नास्टिक, तैराकी और निशानेबाजी के लिए ‘हाई-परफॉर्मेंस सेंटर्स’ स्थापित किए। यहाँ खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, खेल पोषण और मानसिक स्वास्थ्य सहायता मिलती है। इसी प्रकार से देश के कई राज्यों में खेलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। क्रीड़ा भारती के मध्य भारत प्रांत संगठन मंत्री गिरीश सिंह जायसवाल मध्य प्रदेश को लेकर कहते हैं कि आज फिर एक बार खेलों को प्रोत्साहित करने के लिए भामाशाह आगे आ रहे हैं।
उन्होंने सीहोर के कपिल परमार का उदाहरण देकर बताया कि पेरिस 2024 में पुरुषों के -60 किग्रा J1 जूडो वर्ग में कांस्य पदक जीतनेवाले वे भारत के पहले पैरालंपिक पदक विजेता हैं, उन्हें सीहोर के लोगों ने रुपए एकत्र कर पैरालंपिक के लिए भेजा था। भावना डेहरिया भी ऐसा ही एक नाम है, मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के एक छोटे से गाँव तामिया में उनका जन्म हुआ, सीमित संसाधनों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली भावना ने अपने दृढ़ संकल्प और साहस से असंभव को संभव कर दिखाया। विश्व की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर देश का नाम रोशन किया। गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी उनका नाम दर्ज किया गया है।
केंद्र सरकार की योजनाएं: ‘खेलो इंडिया’ और TOPS
बैडमिंटन की राष्ट्रीय कोच प्रज्ञा राय कहती हैं, “Khelo India योजना ने जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को खोजने (Talent Scouting) का काम किया है। स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर के खेलों का राष्ट्रीय प्रसारण होने से युवा खिलाड़ियों को पहचान मिली है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके तहत चुने गए प्रतिभावान खिलाड़ियों को दीर्घकालिक छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) दी जाती है, जिससे उनका वित्तीय बोझ कम हुआ है।”
दूसरी ओर भारत में अन्य खेलों को बढ़ावा देने में टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) का आज महत्वपूर्ण योजना है, इसने एथलीटों की सबसे बड़ी समस्या अंतिम समय पर मिलने वाली प्रशासनिक मंजूरी को दूर किया है।’टॉप्स’ के तहत शीर्ष खिलाड़ियों को सीधे धन मुहैया कराया जाता है ताकि वे अपनी पसंद के विदेशी कोच रख सकें, विदेशों में प्रशिक्षण ले सकें और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग ले सकें। अब एक भारतीय एथलीट को विदेश जाने के लिए सरकारी फाइलों के चक्कर नहीं काटने पड़ते।
कॉर्पोरेट जगत और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) का योगदान
इसके साथ ही सरकार के प्रयासों को गति देने का काम निजी क्षेत्र और गैर-लाभकारी संगठन भी कर रहे हैं। इन्होंने भारतीय खेलों में Professionalism और Sports Science को शामिल किया। आज JSW स्पोर्ट्स और इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (IIS): विजयनगर (कर्नाटक) में स्थित IIS भारत का पहला निजी तौर पर वित्त पोषित अत्याधुनिक खेल संस्थान है। यहाँ मुक्केबाजी, कुश्ती, एथलेटिक्स और जूडो के खिलाड़ियों को वह तकनीक और वैज्ञानिक वातावरण मिलता है जो पहले केवल अमेरिका या यूरोप में ही उपलब्ध था।
इसी तरह से ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट (OGQ), गीत सेठी और प्रकाश पादुकोण जैसे खेल दिग्गजों द्वारा स्थापित संस्था ने महसूस किया कि एक एथलीट को पदक जीतने के लिए केवल सरकारी मदद काफी नहीं है, उसे Micro-management की जरूरत होती है। OGQ खिलाड़ियों को विश्व स्तरीय फिजियोथेरेपिस्ट, Mental Trainers और व्यक्तिगत किट प्रदान करता है। इन संस्थाओं ने खेल प्रशासन से ‘रेड टेपिज्म’ को खत्म कर दिया। यदि किसी खिलाड़ी को चोट लगती है, तो उसकी सर्जरी और Rehabilitation का फैसला घंटों में होता है, महीनों में नहीं। इसी व्यावसायिकता का नतीजा है कि आज हमारे खिलाड़ी चोट के बाद तेजी से और अधिक मजबूत होकर मैदान पर वापसी कर रहे हैं।
असली नायक: नई पीढ़ी का धैर्य और समर्पण
सरकारों की नीतियां बेहतरीन हो सकती हैं, कॉर्पोरेट के पास अरबों रुपये हो सकते हैं, और अकादमियों में दुनिया की सबसे आधुनिक मशीनें हो सकती हैं, लेकिन अंततः मैदान पर उतरकर पसीना बहाने वाला, दर्द सहने वाला और तिरंगे को ऊपर उठाने वाला एक इंसान ही होता है। ऐसे में भारत में खेल के बदलते परिदृष्य के असली कर्णधार हमारे इस नई पीढ़ी के खिलाड़ी हैं। यह पीढ़ी पुरानी पीढ़ियों से बिल्कुल अलग है। इनमें एक नया Mindset है। जब नीरज चोपड़ा या अविनाश साबले ट्रैक पर उतरते हैं, तो वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की आँखों में आँखें डालकर मुकाबला करते हैं।
अकल्पनीय लचीलापन (Resilience) और जुझारूपन
अविनाश साबले (3000m स्टीपलचेज़): महाराष्ट्र के शुष्क इलाके के एक किसान परिवार से निकलकर, भारतीय सेना में देश की सीमाओं पर सेवा करते हुए आगे बढ़े हैं। साबले ने स्टीपलचेज़ में केन्याई धावकों के एकाधिकार को तोड़ा है। असम के एक सुदूर गांव से, जहाँ कभी बुनियादी सड़कें भी नहीं थीं, निकलकर लवलीना बोरगोहेन का मुक्केबाजी में ओलंपिक पदक जीतना यह दिखाता है कि इस पीढ़ी का जुझारूपन किस स्तर का है।
भारत के ग्रामीण इलाकों से निकली लड़कियां मुक्केबाजी के ग्लव्स पहन रही हैं, कुश्ती के अखाड़ों में लड़कों को पटखनी दे रही हैं और देश का नाम रोशन कर रही हैं। मैरी कॉम, पी.वी. सिंधु, मीराबाई चानू और विनेश फोगट जैसी महिला चैंपियंस ने देश की करोड़ों बेटियों को यह विश्वास दिलाया है कि उनकी उड़ान की कोई सीमा नहीं है।
ऐसे में प्रोफेसर दीपक शर्मा का कहना यही है, “हमारा खेल क्षितिज अब बहुत बड़ा और विविधतापूर्ण हो चुका है। क्रिकेट का अपना एक खास स्थान देश में होगा, लेकिन भारत के खेल इतिहास का अगला अध्याय एथलेटिक्स ट्रैक्स, तलवारबाजी के बोर्ड, और जिम्नास्टिक के मैट्स पर लिखा जा रहा है। अब हमारी उम्मीदें केवल एक पिच तक सीमित नहीं हैं।पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर टोक्यो ओलंपिक के बाद से, भारतीय खेल प्रेमियों को एक सुखद आश्चर्य का अनुभव हो रहा है। खेल की हर विधा में आज हम कहीं न कहीं कुछ कर रहे हैं।”
भले ही हम अभी पदक तालिका के शीर्ष पर न हों, लेकिन यह सच है कि अब हम दौड़ से बाहर भी नहीं हैं। पोडियम (शीर्ष तीन स्थानों) और हमारे बीच का फासला अब किलोमीटर का नहीं, बल्कि कुछ सेकंड और कुछ सेंटीमीटर का रह गया है। यही आज के भारत की खेलों के क्षेत्र में सबसे बड़ी सफलता है!








