डॉ. मयंक चतुर्वेदी ।
बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं ने एक बार फिर दुनिया के सामने वह सवाल खड़ा कर दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय लंबे समय से आंखें चुराता रहा है, जिसमें कि भातर सरकार भी बहुत हद तक चुप है। क्या किसी समुदाय की सुरक्षा इसलिए कमजोर होनी चाहिए क्योंकि वह संख्या में अल्पसंख्यक है? रंगपुर में एक सेवानिवृत्त हिंदू शिक्षक और उनके परिवार की हत्या की घटना ने इस सवाल को और अधिक गंभीर बना दिया है। घटना आत्मा को विचलित करती है, रूह को कंपा देती है और आधुनिक विश्व के मानवाधिकारों के दावों को पूरी तरह नग्न कर देती है।
दासपाड़ा क्षेत्र में सामने आई इस घटना में अब 65 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक गणपति चक्रवर्ती, उनकी पत्नी प्रीतिलता चक्रवर्ती, 23 वर्षीय बेटी आगामी चक्रवर्ती प्रार्थी और 12 वर्षीय बेटे प्रियम चक्रवर्ती की हत्या कर दी गई। स्थानीय हिंदू संगठनों ने इसे सामान्य लूटपाट की घटना के बजाय लक्षित हत्या बताया है।
दरअसल, बांग्लादेश में हिंदुओं की जनसंख्या में लंबे समय से आई गिरावट, विस्थापन, संपत्तियों पर कब्जे, सांप्रदायिक हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता की घटनाओं के संदर्भ में इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।

जब बंद दरवाजे के पीछे एक परिवार उजड़ गया

रंगपुर शहर के दासपाड़ा यानी माछुआपाड़ा इलाके से सामने आई इस घटना ने बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समाज को एक बार फिर झकझोर दिया है। गणपति चक्रवर्ती ने अपना जीवन शिक्षक के रूप में बच्चों को शिक्षित करने में बिताया था। सेवानिवृत्ति के बाद वह अपने परिवार के साथ जीवन का शांत समय बिताने की उम्मीद कर रहे थे, पुलिस और अपराध जांच विभाग की फॉरेंसिक जांच से संबंधित उपलब्ध विवरण में मौत का कारण गला दबाना या दम घोंटना बताया गया है।

बांग्‍लोदश : 1947 से बदलती जनसांख्यिकी

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के पीछे उपमहाद्वीप के विभाजन, पूर्वी पाकिस्तान के दौर, विस्थापन, दंगों और संपत्ति संबंधी विवादों का एक लंबा इतिहास मौजूद है। 1946-47 के दौर में नोआखली और पूर्वी बंगाल के अन्य हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया। विभाजन के बाद भी पूर्वी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक बड़ा प्रश्न बनी रही। 1950 और 1964 में हुए सांप्रदायिक तनाव और दंगों के दौरान भी बड़ी संख्या में हिंदू प्रभावित हुए। लाखों हिन्‍दुओं को मार दिया गया और कई लाख पलायन को मजबूर हुए।
संपत्तियों के अधिकार का प्रश्न भी इस पूरी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। ‘Enemy Property Act’ और बाद में ‘Vested Property Act’ से जुड़े प्रावधानों के तहत हिंदू परिवारों की संपत्तियों का अधिग्रहण लंबे समय से हो रहा है। इससे विस्थापन और जनसांख्यिकीय बदलाव की प्रक्रिया को और गति मिलने की बात विभिन्न अध्ययनों में कही गई है।

1971 का मुक्ति संग्राम और हिंदू समाज

1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना और उसके स्थानीय सहयोगियों द्वारा बड़े पैमाने पर हिंसा की गई। ऑपरेशन सर्चलाइट और उसके बाद की घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों की हत्या, विस्थापन और यौन हिंसा हुई। सामने आए उपलब्ध आंकड़ों में इस अवधि में मारे गए लोगों की संख्या 30 लाख से अधिक और पीड़ितों में हिंदुओं की हिस्सेदारी 98 प्रतिशत से अधिक बताई गई है।
साथ ही दो से चार लाख महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार और एक करोड़ से अधिक लोगों के भारत शरण लेने का उल्लेख है। इन आंकड़ों के अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग अनुमान मिलते हैं। जिसके आधार पर यह निर्विवाद है कि 1971 का युद्ध व्यापक जनसंहार, विस्थापन और मानवीय त्रासदी का दौर था और हिंदू समुदाय भी उसका गंभीर शिकार हुआ।

1990, 1992 और 2001 की हिंसा

1990 और 1992 के दौर में क्षेत्रीय राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रभाव के बीच बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों और संपत्तियों पर हमलों की घटनाएं सामने आईं। 2001 के चुनाव के बाद भी हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, लूटपाट, आगजनी और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आरोप सामने आए। 2001 की हिंसा के दौरान 500 से अधिक हिंदुओं की हत्या और 18 हजार से अधिक महिलाओं के साथ सामूहिक हिंसा का होना पाया गया।

आबादी के सफाये का सवाल?

बांग्लादेश में हिंदू आबादी के अनुपात में लंबे समय से गिरावट दर्ज की गई है। अर्थशास्त्री प्रोफेसर अबुल बरकत के अध्ययन ने अपने जनसांख्‍यिकी शोध के हवाले से बताया है कि 1947 में हिंदुओं की आबादी लगभग 31 प्रतिशत थी, जो 1974 में 13.5 प्रतिशत और 2011 में 8.9 प्रतिशत रह गई। स्रोत सामग्री में 2026 में यह अनुपात 7.95 प्रतिशत से कम होने का अनुमान भी दिया गया है।
प्रोफेसर बरकत के अध्ययन से जुड़े आंकड़ों में 1964 से 2013 के बीच 1.13 करोड़ हिंदुओं के बांग्लादेश से भारत जाने का अनुमान भी दिया गया है। इसे प्रतिदिन औसतन 632 लोगों के पलायन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन आंकड़ों का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जनसंख्या में गिरावट को जन्म-मृत्यु दर के साथ ही प्रवासन, आर्थिक अवसर, राजनीतिक असुरक्षा, संपत्ति संबंधी विवाद और सांप्रदायिक हिंसा जैसे कारकों से भी समझा जा सकता है।

2024 से 2026 : राजनीतिक अस्थिरता के बीच अल्पसंख्यकों की सुरक्षा

अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक और प्रशासनिक अस्थिरता बढ़ी। अंतरिम सरकार के दौर में अल्पसंख्यकों पर हमलों की अनेक खबरें सामने आईं। भारत के विदेश मंत्रालय और विभिन्न बांग्लादेशी अल्पसंख्यक संगठनों से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए स्रोत सामग्री में 2023 में 302 घटनाओं और 2024 में 3,200 घटनाओं का उल्लेख किया गया है। बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के आंकड़ों के अनुसार, 4 से 20 अगस्त 2024 के बीच 2,010 हमले हुए। इनमें 69 मंदिरों को नुकसान पहुंचने और 157 परिवारों के घरों तथा दुकानों में लूटपाट का उल्लेख है।
इसी संगठन के अनुसार, 2025 में 522 बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं हुईं, जिनमें कम से कम 184 लोगों की मौत और 95 धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की जानकारी दी गई है। वर्ष 2026 के जनवरी से जून के बीच 257 घटनाओं और 44 मौतों का भी उल्लेख किया गया है। एक अन्य संगठन, ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज, के आंकड़ों के अनुसार जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और प्रताड़ना के 505 मामले सामने आए। जून 2025 से जनवरी 2026 के बीच 116 लक्षित हत्याओं का दावा भी किया गया है।

हिंसा के पीछे कट्टरपंथी संगठनों की भूमिका

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के संदर्भ में विभिन्न कट्टरपंथी और इस्लामी संगठनों का नाम समय-समय पर सामने आता रहा है। जिसमें कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की सबसे अहम भूमिका है। ये राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखने वाला इस्लामी राजनीतिक संगठन है। 1971 के दौरान इसकी भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप रहे हैं। राजनीतिक बदलाव के बाद इसके प्रभाव में वृद्धि हुई और इसके कैडरों तथा छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिबिर की भूमिका पर सवाल उठे। ये लगातार यहां हिन्‍दू एवं अन्‍य अल्‍पसंख्‍यकों को निशाना बना रहा है।

हिफाजत-ए-इस्लाम

हिफाजत-ए-इस्लाम बांग्लादेश धार्मिक नेतृत्व और मदरसा नेटवर्क से जुड़ा एक प्रभावशाली संगठन है। संगठन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को लेकर बांग्लादेश में लंबे समय से बहस होती रही है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ भीड़ जुटाने के बाद यह उन पर खुले तौर पर हिंसा करता रहा है।

हिज्ब उत-तहरीर

हिज्ब उत-तहरीर एक अंतरराष्ट्रीय पैन-इस्लामिक संगठन है, जो खिलाफत की स्थापना की विचारधारा से जुड़ा है और बांग्लादेश में प्रतिबंधित है। पर जानकारी के अनुसार ये प्रतिबंध सिर्फ नाम का है। राजनीतिक अस्थिरता के दौरान इसके प्रभाव में वृद्धि हुई है और ये लगातार हिन्‍दुओं पर लक्षित हिंसा कर रहा है।

अंसार अल-इस्लाम/अंसारुल्लाह बांग्ला टीम

अंसार अल-इस्लाम को अल-कायदा की विचारधारा से संबद्ध संगठन के रूप में जाना जाता है। बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष लेखकों और बुद्धिजीवियों पर हमलों से इसका नाम जोड़ा गया है। हालांकि रंगपुर के शिक्षक परिवार की हत्या में इसके स्लीपर सेल की भूमिका का दावा अभी जांच से पुष्ट होना बाकी है। यानी यह भी गैर मुसलमानों को नफरत भरी नजरों से देखता ही नहीं, उनके सफाए के लिए यहां सक्रिय है।

हुजी-बी और अन्य नेटवर्क

हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी बांग्लादेश सहित अन्य कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियों को लेकर भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। ‘इंकलाब मंच’ सहित कुछ नेटवर्क पर भारत-विरोधी और अल्पसंख्यक-विरोधी भावनाएं भड़काने के आरोप लगाए गए हैं। वहीं पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई अथवा विदेशी फंडर्स से वित्तीय सहायता के दावों का भी उल्लेख किया गया है।

अपराधियों को सजा क्यों नहीं?

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यक नागरिकों की सुरक्षा के लिए निष्पक्ष जांच, अभियोजन, न्यायिक प्रक्रिया और दोषियों को सजा मिलना आवश्यक है। अंतरिम सरकार और प्रशासन ने कई घटनाओं को सांप्रदायिक हिंसा के बजाय व्यक्तिगत दुश्मनी, जमीन विवाद, व्यापारिक रंजिश या सामान्य आपराधिक घटनाओं के रूप में प्रस्तुत किया।यह अंतर महत्वपूर्ण है। यदि किसी घटना के पीछे धार्मिक पहचान को लक्ष्य बनाने का प्रमाण मौजूद हो और उसे केवल सामान्य अपराध मान लिया जाए, तो अपराध की वास्तविक प्रकृति सामने नहीं आ पाएगी। मगर यहां यही हो रहा है। अंतरिम के बाद स्‍थायी सरकार भी यहां यही कर रही है।

वैश्विक संस्थाओं का मौन : सबसे बड़ा सवाल ?

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति का प्रश्न कहना चाहिए कि भारत और बांग्लादेश के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा न होकर मानवीयता का, भावनात्‍मक एवं मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक सुरक्षा से जुड़ा अंतरराष्ट्रीय प्रश्न भी है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे किसी भी देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ गंभीर हिंसा की स्वतंत्र निगरानी करें। मानवाधिकार की कसौटी किसी देश, धर्म या राजनीतिक व्यवस्था के आधार पर अलग नहीं होनी चाहिए।
यहां यदि देखें तो संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाएं जो भारत में अल्‍पसंख्‍यकों के नाम पर हल्‍ला मचाती रहती हैं, यहां हिन्‍दू हिंसा, अत्‍याचार और मौतों पर चुप हैं। सवाल यह है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एजेंडे में कितनी प्राथमिकता मिल रही है? और नहीं मिल रही तो इसलिए क्‍योंकि वहां हिन्‍दू एवं गैर मुसलमान मारे जा रहे हैं!

भारत की रणनीतिक सीमाएं और जिम्मेदारी

भारत के सामने बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील है। एक ओर पड़ोसी देश में भारतीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों से जुड़े समुदाय की सुरक्षा की चिंता है, दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता की वास्तविकताएं हैं। हालांकि यह सच है कि किसी संप्रभु देश के भीतर सैन्य हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय कानून के गंभीर प्रश्न खड़े करता है। ऐसा कदम क्षेत्रीय युद्ध, मानवीय संकट और भारत की अपनी सुरक्षा के लिए नए खतरे पैदा कर सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि बांग्लादेश में व्यापक अस्थिरता पैदा होती है तो कट्टरपंथी संगठनों को अधिक अवसर मिल सकता है। भारत के किसी सैन्य कदम से वहां मौजूद अल्पसंख्यक समुदाय तत्काल बदले की हिंसा का शिकार हो सकता है।
चीन और पाकिस्तान की संभावित रणनीतिक भूमिका को लेकर भी भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान के सामने व्यापक भू-राजनीतिक चिंताएं हैं। तो क्‍या वहां हिन्‍दुओं को शनै-शनै मरने के लिए छोड़ दें? क्‍या भारत के लिए सैन्य हस्तक्षेप की तुलना में कूटनीतिक, आर्थिक, मानवीय और सुरक्षा संबंधी विकल्प अधिक व्यवहारिक नहीं हैं, और यदि वह इन सब पर काम कर रहा है तो उसका परिणाम क्‍यों नहीं दिखता? फिर भी हिन्‍दू क्‍यों मारे जा रहे हैं?

भारत के अब तक के कदम

1950 का लियाकत-नेहरू समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से संबंधित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज रहा है। पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की स्थिति को इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में भी देखा जाता है। नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA को भारत सरकार ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए कुछ गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के उद्देश्य से लागू किया। धार्मिक उत्पीड़न से प्रभावित लोगों के संदर्भ में यह कानून भारतीय राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण विषय रहा है। पर इससे समस्‍या का समाधान तो नहीं हुआ।

अब क्या होना चाहिए ?

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए तत्काल प्रतिक्रिया और दीर्घकालिक संस्थागत सुधार दोनों जरूरी हैं। किसी भी कार्रवाई का उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा, कानून का शासन और हिंसा की रोकथाम होना चाहिए। ऐसे में भारत सरकार को चाहिए कि वह बांग्‍लादेश सरकार पर दबाव बनाए कि वह संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाए। जहां हिन्‍दू एवं अन्‍य अल्पसंख्यक बस्तियां हैं, वहां एवं अन्‍य मंदिरों अथवा धार्मिक स्थलों पर हमले की आशंका हो, वहां पर्याप्त पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती की जानी चाहिए। हिंसक भीड़ के खिलाफ कानून के अनुसार तत्काल कार्रवाई हो। वहीं, रंगपुर, चटगांव, खुलना और ढाका सहित संवेदनशील इलाकों में आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जा सकती है।
भारत सरकार को बांग्‍लादेश पर दबाव बनाना चाहिए कि सोशल मीडिया के जरिए धार्मिक उन्माद और झूठी खबरें फैलाकर भीड़ जुटाने की कोशिशों पर तत्काल कार्रवाई हो। इंटरनेट बंद करने जैसे कठोर कदम अंतिम विकल्प के रूप में ही अपनाए जाने चाहिए और उन्हें कानून तथा मानवाधिकार मानकों के अनुरूप होना चाहिए। साथ ही किसी संगठन या समुदाय के सभी लोगों को सामूहिक रूप से दोषी ठहराने के बजाय उन विशिष्ट व्यक्तियों की पहचान की जानी चाहिए जिनके खिलाफ हिंसा भड़काने, हत्या, आगजनी या संपत्ति नष्ट करने के प्रमाण मौजूद हों।
हिन्‍दू समेत अन्‍य अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षित मानवीय सहायता सुनिश्चित हो। भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संकट की स्थिति में प्रभावित नागरिकों के लिए मानवीय सहायता, चिकित्सा सुविधा और सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका

संयुक्त राष्ट्र को बांग्लादेश में हिन्‍दू एवं अन्‍य अल्पसंख्यकों की स्थिति की स्वतंत्र निगरानी और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग को मजबूत करना होगा। किसी भी आरोप की जांच स्वतंत्र पर्यवेक्षकों और विश्वसनीय मानवाधिकार तंत्र के माध्यम से होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा आर्थिक सहायता को मानवाधिकार मानकों से जोड़ने की मांग पर भी चर्चा हो सकती है। अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित अन्य देशों के लिए भी यह जरूरी है कि वे अल्पसंख्यक सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता को बांग्लादेश के साथ अपने कूटनीतिक संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएं।

इतिहास के चौराहे पर खड़ा हिंदू समाज

अब इस विषय का समापन करने के पूर्व कहना यही है कि रंगपुर के गणपति चक्रवर्ती और उनके परिवार की हत्या का मामला आज उस भय का प्रतीक बन सकता है, जिसमें किसी अल्पसंख्यक नागरिक को अपने घर, संपत्ति, पहचान और भविष्य की सुरक्षा को लेकर लगातार आशंका बनी रहे। बांग्लादेश के हिंदू समाज की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए 1947 के विभाजन से लेकर 1971 के मुक्ति संग्राम, 1990 और 1992 की हिंसा, 2001 के बाद के हमलों और 2024 के राजनीतिक परिवर्तन तक की पूरी ऐतिहासिक श्रृंखला को देखा जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी लोकतांत्रिक और संप्रभु राष्ट्र में अल्पसंख्यक नागरिकों की सुरक्षा को केवल राजनीतिक आश्वासनों के भरोसे छोड़ा जा सकता है? भारत के लिए यह प्रश्न और भी गंभीर है, क्योंकि बांग्लादेश के हिंदुओं से भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध जुड़े हैं, किंु इस दिशा में कोई समाधान नहीं दिख रहा है।
बांग्लादेश के हिंदुओं की सुरक्षा का प्रश्न आज इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है, क्‍योंकि देश का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था। जो तत्‍कालीन समय में दोनों देशों (भारत-पाकिस्‍तान) के बीच आश्‍वासन दिया गया, उसमें साफ था कि दोनों ओर ही अपने अल्‍पसंख्‍यकों का ध्‍यान रखा जाएगा। भारत आज भी अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है, दूसरी ओर पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश हैं जहां लगातार हिन्‍दू हिंसा जारी है। जिस पर कि दुखद यह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बाद भी बहुत हद तक चुप ही नजर आता है!