मयंक चतुर्वेदी ।
केरल में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण गायन को लेकर जिस तरह की आपत्ति सामने आई है, उसने एक साधारण प्रशासनिक निर्देश को गंभीर राष्ट्रीय विमर्श में बदल दिया है। सवाल यह है कि क्या भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय स्मृति को भी राज्यों, दलों और राजनीतिक सुविधा की सीमाओं में बांटा जा सकता है? केरल सरकार की ओर से यह कहा गया कि सरकारी कार्यक्रमों में पहले की परंपरा के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे।
कांग्रेस सांसद राजमोहन उन्नीथन ने इससे भी आगे जाकर पूरे गीत के गायन का तीखा विरोध किया। दूसरी ओर केंद्र सरकार 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देशभर में इसके सामूहिक गायन पर जोर दे रही है। इसी बीच तमिलनाडु विधानसभा ने राज्य के सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘तमिल थाई वाझ्थु’ को आरंभ में गाने का प्रस्ताव पारित किया है।
यहां एक बात बहुत साफ समझने की जरूरत है। किसी राज्य को अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा पर गर्व करने का पूरा अधिकार है। तमिल को सम्मान मिलना चाहिए, मलयालम को सम्मान मिलना चाहिए, कन्नड़, तेलुगु, कोंकणी और हर भारतीय भाषा को सम्मान मिलना चाहिए, किंतु अपनी क्षेत्रीय अस्मिता का सम्मान करने के लिए राष्ट्रीय स्मृति से दूरी बनाना आवश्यक नहीं है। भारत की सुन्‍दरता ही यही है कि तमिल अपनी जगह तमिल है, मलयालम अपनी जगह मलयालम है, पर स्वतंत्रता का इतिहास सबका संयुक्‍त है। इसमें सभी का सर्वस्‍व त्‍याग एवं समर्पण समाहित है। वस्‍तुत: ‘वंदे मातरम्’ इसी साझा स्‍वरूप का ही प्रकटीकरण है।
यदि ‘वंदे मातरम्’ को उत्तर भारतीय या किसी एक राजनीतिक विचारधारा का प्रतीक बताने की कोशिश की जाए तो तमिलनाडु का इतिहास इस तर्क को सीधे चुनौती देता है। महाकवि सुब्रमण्यम भारती (1882–1921) तमिलनाडु के एक महान कवि, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक रहे। उन्होंने बंकिम चंद्र चटर्जी के अमर गीत ‘वंदे मातरम्’ का तमिल भाषा में अनुवाद और रूपांतरण किया था, जिसने दक्षिण भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जन-जन में देशभक्ति की प्रखर भावना जगाई। “कन्नन पट्टू” “नीलवुम वनमिनम कात्रुम” “पांचाली सबातम” “कुयिल पट्टू” भारती के महान काव्य उत्पादन के उदाहरण हैं।
भारती को देशभक्ति से भरपूर उनकी अनेक कविताओं के कारण राष्ट्रीय कवि माना जाता है, जिनके माध्यम से उन्होंने लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने और देश की मुक्ति के लिए सक्रिय रूप से काम करने के लिए प्रेरित किया। अपने देश पर गर्व करने के अलावा, उन्होंने एक स्वतंत्र भारत के अपने दृष्टिकोण को भी स्पष्ट किया। उन्होंने 1908 में सनसनीखेज रचना “सुदेशा गीतंगल” प्रकाशित की।
भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल भी दर्ज करता है कि भारती के कार्यों ने मद्रास क्षेत्र में स्वदेशी आंदोलन की जनमत-निर्माण प्रक्रिया में भूमिका निभाई और उनके एक कार्टून में ‘वंदे मातरम्’ ध्वज का चित्रण भी था, और बात यहीं खत्म नहीं होती। सुब्रमणिय भारती के प्रकाशित काव्य-संकलनों में ‘वन्‍देमातरम्’ स्वतंत्र रचना के रूप में दर्ज है। 1977 में साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित Poems of Subramania Bharati में ‘वन्‍देमातरम्’ शामिल है; 1984 के Subramania Bharati: Chosen Poems and Prose में भी इसकी स्पष्ट उपस्थिति है। यानी जिस दक्षिण भारत को आज ‘वंदे मातरम्’ के संदर्भ में राजनीतिक दूरी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उसी दक्षिण भारत का एक महानतम राष्ट्रवादी कवि इसे अपने साहित्य और स्वतंत्रता चेतना का हिस्सा बना चुका था।
तमिलनाडु के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ा एक सरकारी दस्तावेज इससे भी अधिक स्पष्ट है। उसमें दर्ज है कि भारती के Swadesha Geethangal में ‘वन्‍देमातरम्’ पहला राष्ट्रीय गीत था और इसे स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित करने वाला महान उद्घोष बताया गया है। दस्तावेज में यह भी उल्लेख है कि भारती के गीत अशिक्षित जनता तक राष्ट्रीय भावना पहुंचाने का माध्यम बने और लोग उन्हें गाकर सुनाते थे। तो फिर आज सवाल यह है कि ‘वंदे मातरम्’ दक्षिण भारत का कैसे नहीं हुआ? क्या तमिलनाडु के महाकवि भारती को यह इतिहास पता नहीं था? क्या स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मद्रास की धरती पर उठी ‘वंदे मातरम्’ की आवाज को आज भुला दिया जाए? क्या किसी राष्ट्रीय गीत की स्वीकार्यता इस बात से तय होगी कि आज कौन-सी राजनीतिक पार्टी उसे अपने कार्यक्रम में गा रही है?
भारती का स्‍पष्‍ट मत था जोकि उनके साहित्‍य लेखन में कई स्‍थानों पर प्रकट भी हुआ है, “जब तक भारतीय भारत माता की संतान के रूप में एकजुट नहीं होंगे, तब तक उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।” आज यह देश का दुर्भाग्‍य ही कहा जाएगा कि हम सभी अपने राष्‍ट्र एवं मां भारत माता की वन्‍दना “वन्‍देमातरम्” के लिए एक मत और एक स्‍वर नहीं हो पा रहे हैं। हमारे क्षेत्रीय एवं वोट के स्‍वार्थ इतने बड़े हैं कि हम उसी मां की आराधना करने से पीछे हट रहे हैं, जिससे जीवन पाकर अंत में उसी में विलय हो जाना है!
‘वंदे मातरम्’ बंगाल में जन्मा, लेकिन उसकी यात्रा बंगाल तक नहीं रुकी। यह तमिल में पहुंचा, तेलुगु में पहुंचा, कन्नड़ में पहुंचा, मलयालम में पहुंचा, हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में पहुंचा। इसके अनुवाद और रूपांतरणों ने इसे भारतीय भाषाओं की साझा राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बनाया। इसका अर्थ ही यही है कि ‘वंदे मातरम्’ किसी भौगोलिक प्रदेश की सीमा में कैद अथवा सीमित गीत कभी नहीं रहा। वह भारतीय राष्ट्रवाद के विस्तार के साथ पूरे देश में यात्रा करता रहा है।
यही बात उन लोगों को समझनी चाहिए जो आज इसे किसी एक राजनीतिक दल का प्रतीक बताकर उससे दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ‘वंदे मातरम्’ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पैदा होने से दशकों पहले से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का उद्घोष रहता आया है। कांग्रेस के अधिवेशनों में इसे स्थान मिला। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह राजनीतिक उद्घोष बन चुका था। 1950 में संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ के साथ समान सम्मान के साथ राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया।
वस्‍तुत: ऐसे में आज यदि कोई कांग्रेस नेता यह कहता है कि पूरा गीत गाने में तीन मिनट दस सेकंड लगते हैं और इतने समय तक खड़ा रहना व्यावहारिक कठिनाई हो सकती है, तो उस तर्क पर चर्चा हो सकती है। सम्मान कानून से पैदा नहीं होता, यह बात सही है। किसी नागरिक के मन में देशभक्ति आदेश से नहीं भरी जा सकती, यह भी सही है, किंतु क्या किसी राष्ट्रीय गीत के सम्मान को उसकी अवधि से तौलना उचित है? क्या तीन मिनट दस सेकंड किसी राष्ट्र की स्मृति के सामने इतना बड़ा समय है कि उसे लेकर असहजता पैदा हो जाए? क्‍या हम अपनी भारत माता एवं राष्‍ट्र भारत के आराधन के लिए तीन मिनट 10 सेकेंड भी नहीं खड़े होकर उसे सम्‍मान नहीं दे सकते?
सच तो यह है कि जिस भारत के स्वतंत्रता सेनानी वर्षों जेल में रहे, जिन्होंने अपनी संपत्ति गंवाई, जिनकी नौकरियां गईं, जिन्होंने परिवारों से दूरी सही और जिन्होंने अपने जीवन तक को राष्ट्र के नाम कर दिया, उनके सामने तीन मिनट दस सेकंड का तर्क बहुत छोटा दिखाई देता है और यहां ‘वंदे मातरम्’ की असली शक्ति समझने की जरूरत है।
यह गीत उस समय लिखा गया जब भारत स्वतंत्र नहीं था। उस समय किसी भारतीय के पास यह सुविधा नहीं थी कि वह राष्ट्रीय सम्मान, राष्ट्रीय पहचान और देशभक्ति पर आराम से बैठकर बहस करे। औपनिवेशिक शासन की कठोरता के बीच राष्ट्रीय चेतना को जगाना ही अपने आप में प्रतिरोध था। ‘वंदे मातरम्’ इसी प्रतिरोध की भाषा बना।
केरल की राजनीति में ‘वंदे मातरम्’ का विरोध करने वालों से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि क्या राज्य की क्षेत्रीय अस्मिता और भारत की राष्ट्रीय अस्मिता एक-दूसरे की विरोधी हैं? यदि उत्तर नहीं है, तो फिर समस्या कहां है? केरल अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करे, किंतु केरल के उन स्वतंत्रता सेनानियों को भी याद करे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। तमिलनाडु अपनी तमिल पहचान पर गर्व करे, लेकिन सी. सुब्रमण्यम भरथियार को भी याद करे, जिन्होंने तमिल भाषा में “भारत माता” की स्वतंत्रता का गीत गाया। यही तो भारतीयता है।
वस्‍तुत: ‘वंदे मातरम्’ की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह क्षेत्रीय सीमाओं को पार करता है। बंगाल के बंकिमचंद्र की रचना तमिलनाडु के भारती की आवाज बनती है। उत्तर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में गूंजती है। दक्षिण के आंदोलनों में पहुंचती है। कांग्रेस के मंच पर सुनाई देती है। क्रांतिकारियों के बीच उद्घोष बनती है और अंततः स्वतंत्र भारत की संविधान सभा इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान देती है।
2026 में इसके 150 वर्ष पूरे होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें अपने इतिहास को फिर से पढ़ने का अवसर देता है। 7 नवंबर 1875 को इसकी रचना पहली बार ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह बंकिमचंद्र के ‘आनन्‍द मठ’ में आया और 1896 के कांग्रेस अधिवेशन से लेकर स्वदेशी आंदोलन तक इसकी यात्रा ने इसे राष्ट्रीय चेतना का शक्तिशाली प्रतीक बना दिया।अब सवाल यह नहीं कि पूरा गीत कितने मिनट का है।सवाल यह है कि क्या 150 वर्ष की इस यात्रा को हम तीन मिनट दस सेकंड की घड़ी में समेट सकते हैं?
जिस गीत ने अनेकों स्‍थान पर परतंत्र भारत में लोगों को यह कहने का साहस दिया कि मातृभूमि हमारी सर्वोच्च पहचान है, उसके सामने स्‍वाधीन भारत में तीन मिनट खड़ा होना यदि किसी को बहुत लंबा लगता है, तो समस्या शायद गीत की अवधि में नहीं है। समस्या उस सोच में है, जोकि एक नागरिक के रूप में भारत के लिए पूर्ण समर्पण से रोकती है।
गहनता से विचार करें, जिस तमिल कवि ने ‘वंदे मातरम्’ को अपने राष्ट्रवादी साहित्य में जगह दी, क्या वह आज के इस विमर्श में हमारे सामने खड़े होकर यह नहीं पूछेगा कि जिस गीत को हमने स्वतंत्रता के संघर्ष में गाया था, आज उसे राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बनाया जा रहा है? जिस भारत के दक्षिणी छोर पर भारती ने इसकी आवाज को तमिल जनमानस तक पहुंचाया, उसी भारत के एक राज्य में आज इसके पूर्ण गायन पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए?
कहना होगा कि ‘वंदे मातरम्’ को मानना किसी पार्टी को मानना नहीं है। इसे सम्मान देना किसी सरकार की प्रशंसा करना नहीं है। इसके इतिहास को स्वीकार करना किसी धर्म के पक्ष में खड़ा होना नहीं है। यह उस स्वतंत्रता आंदोलन को स्वीकार करना है जिसमें भारत के अलग-अलग प्रदेशों, भाषाओं और समुदायों के लोगों ने अपनी-अपनी आवाज जोड़कर एक राष्ट्रीय स्वर बनाया। आज जब भारत विकसित भारत 2047 की बात करता है, जब उसकी युवा पीढ़ी अंतरिक्ष, विज्ञान, रक्षा, प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था में नई ऊंचाइयां छूने का सपना देख रही है, तब उसे यह भी जानना चाहिए कि स्वतंत्रता की नींव किन आवाजों ने मजबूत की थी। ध्‍यान रहे! ‘वंदे मातरम्’ उन आवाजों में एक प्रमुख आवाज है।