हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर विशेष ।
मनुष्य के पास अपने भीतर के संसार को बाहर की दुनिया तक पहुंचाने का सबसे सुंदर माध्यम भाषा है। हम बोलते हैं तो केवल शब्द बाहर नहीं आते, उनके साथ हमारी स्मृतियां, संवेदनाएं, संस्कार और अनुभव भी बाहर आते हैं। एक ही बात अलग-अलग भाषाओं में कही जाए तो उसका अर्थ भले ही लगभग वही रहे, लेकिन उसका भाव बदल जाता है। यही भाषा की सबसे बड़ी शक्ति है- वह केवल अर्थ नहीं देती, वह अनुभूति रचती है।
भाषा को हम अक्सर संप्रेषण का माध्यम मानते हैं, लेकिन भाषा इससे कहीं अधिक है। वह मनुष्य के भीतर बसे भावलोक का दर्पण है। किसी को ‘मां’ कहने और ‘मम्मी’ कहने में अर्थ का अंतर शायद बहुत बड़ा न हो, लेकिन दोनों शब्दों के साथ मन में उठने वाली तरंगें अलग हो सकती हैं। ‘मां’ में एक पूरा सांस्कृतिक संसार है- ममता, वात्सल्य, त्याग, करुणा और वह आत्मीयता, जिसे शब्दों में पूरी तरह बांधना संभव नहीं। इसी तरह ‘पिता’ और ‘बाबूजी’, ‘भोजन’ और ‘खाना’, ‘घर’ और ‘गृह’ का उदाहरण भी है। शब्द बदलते ही भाव की छाया बदल जाती है।
हिन्दी की सुंदरता भी इसी भाव-संपन्नता में है। यह केवल एक भाषा नहीं, अनेक बोलियों, लोक-स्मृतियों और सांस्कृतिक अनुभवों से बनी एक विराट नदी है। इसके प्रवाह में संस्कृत की गंभीरता है, प्राकृत और अपभ्रंश की सहजता है, लोकभाषाओं की माटी की गंध है, उर्दू की नज़ाकत है और आधुनिक जीवन के अनेक अनुभवों से आए शब्दों की नई चमक-दमक भी। इसलिए हिन्दी में भावों को व्यक्त करने की असाधारण क्षमता दिखाई देती है।
किसी भाषा की वास्तविक शक्ति उसके शब्दकोश में नहीं, उसके भावकोश में होती है। शब्द तो सीमित होते हैं, लेकिन उनके भीतर छिपी अर्थ-छवियां अनंत होती हैं। ‘बारिश’ एक शब्द है, लेकिन किसी के लिए वह बचपन की कागज की नाव है, किसी के लिए मिट्टी की सोंधी गंध, किसी के लिए खिड़की पर बैठकर चाय पीने की स्मृति और किसी के लिए किसी प्रिय व्यक्ति की याद। शब्द एक ही है, भाव अलग-अलग। भाषा इन अलग-अलग भावों को आकार देती है।
हमारे जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब शब्दों से अधिक उनके कहने का ढंग महत्त्वपूर्ण हो जाता है। ‘तुम आ गए’ और ‘तुम आ गए!’ शब्द वही हैं, लेकिन विस्मय, प्रसन्नता, शिकायत या राहत-भाव के अनुसार अर्थ बदल जाता है। कभी किसी का केवल ‘अच्छा’ कहना भी बहुत कुछ कह जाता है और कभी हजार शब्द भी मन की बात नहीं कह पाते। इससे पता चलता है कि भाषा केवल शब्दों से नहीं बनती; वह स्वर, विराम, लय और मौन से भी बनती है।
हिन्दी की एक बड़ी विशेषता उसकी आत्मीयता है। इसमें संबोधन के अनेक रूप हैं और हर संबोधन सम्बंध की एक अलग ऊष्मा लेकर आता है। ‘आप’, ‘तुम’ और ‘तू’ केवल सर्वनाम नहीं हैं; वे सम्बंधों की दूरी और निकटता का पूरा भाव रचते हैं। ‘आइए’ में सम्मान है, ‘आओ’ में अपनापन और ‘आ’ में आत्मीय अधिकार। इसीलिए भाषा रिश्तों को केवल व्यक्त नहीं करती, उन्हें बनाती और संवारती भी है।
हम जिस भाषा में सोचते हैं, धीरे-धीरे हमारा भाव-संसार भी उसी भाषा की संरचना ग्रहण करता है। भाषा हमारी दृष्टि को प्रभावित करती है। वह हमें चीजों को देखने, महसूस करने और उनके बीच संबंध खोजने का तरीका देती है। लोकगीतों की भाषा इसलिए मन को इतनी जल्दी छू लेती है कि उसमें जीवन का अनुभव सीधे बोलता है। कबीर की सादगी, तुलसी की लोक-आत्मीयता, सूर की वात्सल्य-भावना, जायसी की प्रेम-दृष्टि और प्रेमचंद की सामाजिक संवेदना – इन सबके पीछे भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, भाव की निर्मात्री भी है।
हिन्दी दिवस इसलिए केवल हिन्दी बोलने या लिखने का अवसर नहीं है। यह उस संवेदनशील संसार को याद करने का दिन भी है, जिसे हिन्दी ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोया है। भाषा का सम्मान केवल उसके व्याकरण की शुद्धता से नहीं होता; उसका सम्मान तब होता है, जब हम उसमें छिपी संवेदनाओं का सम्मान करें। जब हम अपनी भाषा में सोचने, महसूस करने और संवाद करने में संकोच न करें।
आज की दुनिया में भाषाएं एक-दूसरे के निकट आ रही हैं। हिन्दी भी लगातार नए शब्दों और नए अनुभवों को आत्मसात कर रही है। यह उसकी कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण है। नदी में नए जल का आना उसे समाप्त नहीं करता; उसका प्रवाह और विस्तृत करता है। हिन्दी भी समय के साथ बदलते हुए अपने मूल भाव-संसार को समृद्ध कर रही है।
अंततः भाषा वही है, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ सके। शब्द तभी सार्थक हैं, जब उनके भीतर संवेदना हो। भाषा में यदि प्रेम है तो साधारण शब्द भी कविता बन जाते हैं; करुणा है तो मौन भी बोल उठता है; आत्मीयता है तो दूरियां मिटने लगती हैं। इसलिए भाषा केवल कही हुई बात नहीं है। भाषा वह भाव है, जो बात के कहे जा चुकने के बाद भी मन में बना रहता है।
भाषा से शब्द बनते हैं, लेकिन शब्दों से आगे जाकर भाषा ही भाव बनाती है।










