कॉमन सिविल कोड की जगह हिंदू कोड बिल लाना इसी रणनीति का हिस्सा था ।
एक कानून ने इस देश की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था बदल दी। देश की डेमोग्राफी बदलने में भी उसकी बहुत बड़ी भूमिका है। वह कानून था हिंदू कोड बिल,जिसे जवाहरलाल नेहरू लेकर आए थे।
हिंदू कोड बिल को नेहरू यह कहकर लाए थे कि हिंदू महिलाओं को इससे रूढ़िवादी परंपराओं से मुक्ति मिलेगी, लेकिन उनको यह ध्यान नहीं आया कि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति तो हिंदू महिलाओं से बहुत ज्यादा बदतर है। यह भी याद रखिए कि हिंदू पर्सनल लॉ में सुधार के लिए यह विधेयक जवाहरलाल नेहरू तब लेकर आए जब वह प्रधाानमंत्री नहीं थे। वह केवल एक मंत्री थे। 1947 में उन्होंने जो शपथ ली थी, वह मंत्री की शपथ थी। यह कोई कही—सुनी बात नहीं है। इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग है। 1952 में पहले लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। लेकिन यह बिल वह 1951 में ही ले आना चाहते थे और उसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण था। उस समय देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यह बिल लाए जाने पर कड़ा एतराज जताया था। राष्ट्रपति का कहना था कि इस मुद्दे को लेकर आप जनता के बीच में जाइए क्योंकि चुनाव सामने है। पहले इस पर जनादेश लेकर आइए और फिर कानून बनाइए। दूसरी बात उन्होंने कही कि यह बिल लाने की इतनी जल्दबाजी क्या है? डॉ. राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि हिंदू कोड बिल के जरिए हम एक बहुत बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं। क्या यह ठीक नहीं होगा कि हम जनता की राय जानने के बाद यह कदम उठाएं। वह इसे भेदभावपूर्ण भी मानते थे क्योंकि यह अल्पसंख्यकों पर लागू नहीं होता, लेकिन नेहरू इससे सहमत नहीं थे। वह तो उस समय कॉमन सिविल कोड पर विचार करने को भी तैयार नहीं थे जबकि संविधान के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में साफ—साफ लिखा हुआ था कि सरकार को कॉमन सिविल कोड लाने पर विचार करना चाहिए और इस बारे में कानून बनाना चाहिए। इसके बारे में अभी दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से कहा था हम सेकुलर कोड बिल लाएंगे। तो राष्ट्रपति के एतराज के बाद नेहरू ने एक अलग ही चाल चली। उन्होंने इसे प्रोग्रेसिव और रिएक्शनरी ताकतों के बीच संघर्ष का मुद्दा बता दिया। मतलब जो कॉमन सिविल कोड की बात कर रहे हैं वे रिएक्शनरी हैं और जो हिंदू कोड बिल की बात कर रहे हैं यानी जवाहरलाल नेहरू जैसे लोग, वह प्रोग्रेसिव हैं।
नेहरू से जब पूछा गया कि हिंदू कोड बिल लाकर आप हिंदू महिलाओं को पुरानी परंपराओं से छुटकारा दिलाने की बात कह रहे हैं,लेकिन इस्लाम में जो परंपराएं और बंधन हैं, उनसे मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति के बारे में क्यों नहीं सोच रहे, इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था। दरअसल नेहरू मुस्लिम उलेमाओं के प्रभाव में थे और इन मुस्लिम उलेमाओं का कहना था कि संसद को मुसलमानों के पर्सनल लॉ पर कानून बनाने या उसमें संशोधन करने का कोई अधिकार ही नहीं है। अब सबसे बड़ा झूठ यहीं से शुरू होता है, जो आज तक चल रहा है। भारत में जब ये बहस चल रही थी तभी ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान ने अपने देशों में मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन किया। भारत में उलेमाओं ने नेहरू से कहा कि मजहब ही मुस्लिम सिविल कानून का आधार है। जबकि सुप्रीम कोर्ट में बार-बार यह प्रश्न आ चुका है कि सिविल लॉ और इस्लाम या किसी मजहब का आपस में कोई संबंध नहीं है। नेहरू यह भी सुनने को तैयार नहीं थे। अब सवाल आता है कि नेहरू हिंदू कोड बिल के लिए चुनाव तक भी इंतजार करने को क्यों तैयार नहीं थे? वह इसलिए क्योंकि नेहरू को लग रहा था कि अगर यह कानून नहीं बनाया तो भारत के विभाजन के समय आबादी की अदला—बदली के प्रस्ताव को ठुकराने और मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोकने का जो उद्देश्य था, वह सब विफल हो जाएगा। उनके दिमाग में उस समय से मुस्लिम वोट बैंक की बात बैठी हुई थी। उनको मालूम था कि अगर इन मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोका गया तो ये कांग्रेस का ही साथ देंगे। किसी और पार्टी को वोट नहीं देंगे। वह एक मुस्लिम वोट बैंक बनाने की कोशिश कर रहे थे और बता रहे थे कि देखो हम हिंदू पर्सनल लॉ में तो चेंज कर रहे हैं लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ को हाथ नहीं लगा रहे। जैसे ही मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की बात हुई तो नेहरू ने कहा कि खबरदार, इसके बारे में कोई सोचेगा भी नहीं। उनसे पूछा गया कि ऐसा क्यों? उन्होंने कहा कि पार्लियामेंट में हिंदुओं की मेजरिटी है तो हिंदू लोग मुस्लिम पर्सनल लॉ में परिवर्तन नहीं कर सकते। यानी नेहरू संसद को हिंदू और मुसलमान के रूप में देख रहे थे। उनको लग रहा था कि 1952 का पहला चुनाव अगर जीतना है मुस्लिम वोट बैंक तैयार करना जरूरी है क्योंकि पहला लोकसभा चुनाव नजदीक आते—आते नेहरू और कांग्रेस अलोकप्रिय होने लगे थे। भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा था। नेहरू भ्रष्टाचार के बारे में सुनने को तैयार नहीं थे। गांधी जी की हत्या हो चुकी थी। वैसे भी गांधी जिस तरह से सरकार काम कर रही थी, उससे बहुत नाराज थे, लेकिन नेहरू और उनके साथियों ने गांधी को एक तरह से दरकिनार कर दिया था। नेहरू सत्ता का केंद्रीयकरण कर रहे थे और उसके लिए उनको लगता था कि 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में उनको भारी बहुमत मिले। चूंकि दिसंबर 1950 में सरदार पटेल का निधन हो गया था तो नेहरू को रोकने वाला कोई नहीं रह गया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे, लेकिन वह संवैधानिक पद पर थे और उनकी एक सीमा थी। राष्ट्रपति के रूप में मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिए वह बाध्य थे। तो नेहरू ने साफ तौर पर कह दिया कि वह नहीं चाहते कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को हिंदू बदलें। यह वह उस समय बोल रहे थे जब 1947 में देश का बंटवारा ही धर्म के आधार पर हुआ। जब मुसलमानों ने कहा कि हम हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते।
तो ये जो आज आप हिंदू मुस्लिम की विभाजन रेखा देखते हैं, उसके मूल में नेहरू की नीतियां हैं। पाकिस्तान बनने के बाद सरदार पटेल और डॉ. अंबेडकर दोनों ने ही कहा था कि अगर आबादी की अदला—बदली नहीं हुई तो भारत में हिंदू—मुस्लिम की समस्या कभी खत्म नहीं होगी। नेहरू पर जब कॉमन सिविल कोड लाने का दबाव पड़ने लगा तो उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में तब तक कोई परिवर्तन नहीं होगा, जब तक मुसलमान खुद इसके लिए तैयार नहीं होंगे। तो उनसे पूछा गया कि आपको पता कैसे चलेगा कि मुसलमान इसके लिए तैयार हैं और यही बात हिंदुओं पर क्यों नहीं लागू होगी। चुनाव में इस मुद्दे को लेकर जाइए, जनता बता देगी कि वह इस कानून से सहमत है या असहमत। लेकिन नेहरू के सामने तो चुनाव जीतने का लक्ष्य था। लोगों की राय जानने का नहीं। तो नेहरू ने उस समय जो किया, उसे आज तक देश भुगत रहा है। नेहरू केवल यहीं नहीं रुके। उन्होंने 1951 में ही संविधान के तहत मिले अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार में भी कटौती कर दी और पहला संविधान संशोधन विधेयक लेकर आ गए। उनके इरादे शुरू से बिल्कुल स्पष्ट थे। मुस्लिम वोट बैंक बनाना, सत्ता का केंद्रीयकरण करना,ये दोनों काम करने के बाद उन्होंने तीसरा काम वंशवाद को बढ़ावा देने का किया। अपने उत्तराधिकारी के रूप में अपनी बेटी को तैयार किया। अपने रहते ही उन्होंने कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष इंदिरा गांधी को बना दिया था और इंदिरा गांधी के रास्ते के जितने रोड़े थे सबको एक-एक करके निपटा रहे थे। तो ये सारी बीमारियां नेहरू की देन हैं, जिसका खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











