दोगला विपक्ष गाजा में तो शांति चाहता है पर भारत में अराजकता।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
अमेरिका का डीप स्टेट इस समय दुनिया के उन देशों में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है,जिन्होंने ईरान से युद्ध में उसका साथ नहीं दिया। फ्रांस में स्कूल ठीक करने के नाम पर आंदोलन शुरू हुआ और आज पूरा फ्रांस जल रहा है। ये आंदोलन ऐसे मुद्दों पर शुरू किए जा रहे हैं, जो जनता से जुड़े हुए हों। फ्रांस ने ईरान पर अमेरिकी हमले का विरोध किया था। इटली, स्पेन, चिली और बेल्जियम ने भी समर्थन नहीं किया था इसीलिए ये सब देश भी जल रहे हैं। यहां एक और बात ध्यान देने वाली है कि ज्यादातर देशों में हिंसा और आगजनी करने वाले सेकंड या थर्ड जनरेशन के इमीग्रेंट हैं। यानी यूरोप ने कभी जो दरियादिली दिखाई थी, आज वह उसका नतीजा भुगत रहा है। ये देश मानते थे कि इस्लामोफोबिया जैसी कोई चीज नहीं है। ये कंपोजिट कल्चर की बात करते थे,लेकिन अब वह सब बातें हवा में उड़ गईं हैं। हिंसा और आगजनी करने वाले जिहादियों का साथ हमेशा एक और बड़ी ताकत देती है। वे हैं—कम्युनिस्ट। आप फ्रांस और दूसरे देशों की तस्वीरें देखिए, वहां आगजनी करने वालों के साथ कम्युनिस्ट ही डांस करते नजर आएंगे। जो अपने जलते हुए देश को देखकर डांस करें, उससे आप समझ जाइये कि इन कम्युनिस्टों को देश से कितना प्रेम है।
अब तस्वीर को जरा भारत में ले आइए। भारत में भी यही सब करने की कोशिश हुई। रातोंरात खड़ा किया गया कॉकरोच जनता पार्टी नाम का संगठन इसी कोशिश का नतीजा है। नीट पेपर लीक के मुद्दे पर इसे बड़ा समर्थन मिला और सरकार ने भी इनकी सुनी। इस मुद्दे से इस देश के हर उस परिवार के लोग जुड़े हुए थे, जिनका बच्चा नौकरी या पढ़ाई के लिए इम्तहान दे रहा है। इसीलिए कॉकरोच जनता पार्टी रातोंरात एक बहुत बड़ा संगठन दिखाई देने लगा और इस देश की सारी विपक्षी पार्टियां उसके सामने बौनी नजर आने लगीं। सरकार को उनकी सारी मांगें माननी पड़ीं और उनके दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करवाया। उसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने प्रोजेक्ट का दूसरा हिस्सा शुरू किया— स्कूल ठीक करो। लेकिन वे यह भूल गए कि यह फ्रांस और यूरोप नहीं,भारत है। भारत का आम आदमी राजनीति को जितनी बारीकी से समझता है,उतनी बारीकी से राजनीतिक विश्लेषक और पार्टियों के बड़े-बड़े नेता व रणनीतिकार भी नहीं समझते। भारत के इस आम आदमी को यह समझने में पल भर नहीं लगता कि फलां व्यक्ति अगर कोई मुद्दा उठा रहा है तो इसके पीछे उसकी नीयत क्या है? इसीलिए कॉकरोच जनता पार्टी के स्कूल ठीक करो अभियान का क्या हश्र हुआ आपने देख लिया। इसके चक्कर में कॉकरोच जनता पार्टी के तथाकथित नेता कई जगहों पर पिट भी गए। उनको इस देश के लोगों ने बता दिया कि यह हमारी समस्या है और हम जानते हैं कि इसे ठीक कौन करेगा और इसे ठीक कैसे कराना है। इसके लिए हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने पहले आंदोलन के दौरान 20 जुलाई को दिल्ली में जमकर हिंसा की थी फिर भी सरकार उनके सामने झुकी और सुप्रीम कोर्ट ने भी उनको अभयदान दे दिया। इससे उनका मन और बढ़ गया। लेकिन दूसरी बार सरकार ने क्या किया? उसने सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों और गृह मंत्रालय की कमेटी की सिफारिशों को निकाला और उसके अनुरूप जंतरमंतर को डेजिग्नेटेड प्रोटेस्ट साइट के रूप में डीनोटिफाई कर दिया। इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी जिद पर उतर आई कि हम तो जंतरमंतर पर ही प्रदर्शन करेंगे। सवाल है कि यह जिद क्यों? इसके स्थान पर जो बाकी प्रदर्शनस्थल सुझाए गए हैं,वे काफी बड़े हैं। जंतरमंतर तो सबसे छोटी जगह है। यहां पर मुश्किल से 5—7 हजार लोग ही आ सकते हैं। लेकिन यहां से संसद, सारे मंत्रालय और सारी संवैधानिक संस्थाओं के दफ्तर नजदीक हैं। कनाट प्लेस,जो एक कमर्शियल हब है,वह भी यहीं पर है। फ्रांस, इटली और दूसरे जलते हुए देशों को देख लीजिए। किस तरह से दुकानों से सामान लूटा जा रहा है और आग लगाई जा रही है। ऐसे में कनाट प्लेस से बढ़िया उनके लिए और क्या जगह हो सकती थी? आप कल्पना कीजिए कि अगर कनाट प्लेस में लूटपाट और आगजनी होती और उसकी तस्वीरें दुनिया में जातीं तो उसका क्या असर होता? मंशा वही है।
इस बार सरकार ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिए कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जो भी जरूरी हो कीजिए। इसका नतीजा यह हुआ कि कॉकरोच जनता पार्टी के दो लोग आशुतोष रांका और सौरव दास जेल में हैं। तीसरे अभिजीत दीपके ने दूसरी बार बांड भरा है। वह क्रांति की बात करता था, वीर सावरकर को माफीवीर बताकर गाली देता था। अब उससे पूछना चाहिए कि तुम माफीवीर क्यों बन गए? दो—दो बार माफी मांगी है। बांड भरकर कहा है कि हम कोई आंदोलन नहीं करेंगे। पुलिस की तमाम शर्तें मान लीं। छोटे-छोटे आंदोलन करने वाले तक ऐसी शर्तें नहीं मानते। कहते हैं कि हमको जेल भेजना है तो भेज दो। लेकिन इस डरपोक दीपके और उसके साथियों की हालत इतने में ही खराब हो गई। तो जब कानून का डर कानून तोड़ने वाले के मन में आ जाए तो आप समझिए कि सब ठीक चल रहा है। भारत इसीलिए बचा हुआ है कि यहां के लोगों की जो सहज राजनीतिक बुद्धि है, वह दुनिया के किसी देश में नहीं पायी जाती। लोग यहां नेता व पार्टी सबको हर समय तौलते रहते हैं और उसके आधार पर जब वोट देने का समय आता है तो फैसला करते हैं। भारत में विपक्षी पार्टियों ने मान लिया है कि चुनाव जीत कर सत्ता में नहीं आ सकते तो खून खराबा व हिंसा से रिजीम चेंज की बात कर रहे हैं। भारत को बांग्लादेश और नेपाल बनाने की बात कर रहे हैं। देश का कौन सा मतदाता इसके लिए तैयार होगा? ये दल किसी मतदाता की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, दरअसल ये सत्ता में आने के नए-नए तरीके खोजने की लड़ाई लड़ रहे हैं। इन्होंने मान लिया है कि जब तक इस देश में डेमोक्रेसी रहेगी तब तक ये सत्ता में नहीं आ सकते इसलिए डेमोक्रेसी को खत्म करो। जो लोग भी इनका समर्थन करते हैं, उनसे मेरा सिर्फ एक प्रश्न है कि क्यों गाजा में शांति होनी चाहिए और भारत में अराजकता होनी चाहिए। ये सारे विपक्षी दल गाजा में शांति के समर्थक हैं। बड़ी अच्छी बात है। दुनिया भर में शांति होनी चाहिए। लेकिन गाजा में जहां आतंकवादी हैं, वहां शांति होनी चाहिए और भारत में जहां डेमोक्रेसी है, वहां अशांति और अराजकता होनी चाहिए। इससे इनकी नीयत को समझिए। इनकी नीयत इस देश को बर्बाद करने की है।
अमेरिका की कोई शर्त मानने के लिए भारत तैयार नहीं है इसलिए वह भारत से नाराज है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर हमने रुकवा दिया। भारत ने कहा— सफेद झूठ। अमेरिका ट्रेड डील पर दबाव डालता रहा। 50% टैरिफ लगा दिया,लेकिन फिर भी भारत टस से मस नहीं हुआ। फिर अमेरिका ने कहा कि रूस से तेल खरीदना बंद कर दो। भारत ने कहा, बंद नहीं करेंगे बल्कि ज्यादा तेल लेना शुरू कर दिया। अब अमेरिका ने खुद ही रूस से तेल खरीदने के लिए समझौता कर लिया है। तो उसने भारत पर हर तरह का दबाव डालकर देख लिया,लेकिन भारत को झुका नहीं पाया। अमेरिका से डील के बिना भी भारत सर्वाइव कर सकता है, यह साफ संदेश डोनाल्ड ट्रंप को दे दिया गया है। इसीलिए लगातार कोशिश हो रही है कि भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसी अराजकता हो, लेकिन यह भारत है। यह विविधता में एकता वाला देश नहीं है। यह एकता में विविधता वाला देश है। इसलिए भारत न तो कभी बांग्लादेश बनेगा, न नेपाल। पार्टी और सरकार सब आती—जाती रहती हैं। देश स्थाई है। देश के हित में क्या है, इस बात को जितनी ज्यादा अच्छी तरह से इस देश के लोग समझते हैं अन्य कोई नहीं समझता और उसी के आधार पर फैसला लेते हैं। ऐसा न होता तो राहुल गांधी कबके देश के प्रधानमंत्री बन गए होते,जो कभी नहीं बनेंगे। राहुल के पास इस देश के लिए कोई विज़न नहीं है। हां,इस देश को तोड़ने का विजन जरूर है। जो व्यक्ति यह कहे कि हमारी लड़ाई भारतीय स्टेट से है, वह इस देश को कैसे जोड़ सकता है? जो व्यक्ति हिंसा की बात करे और ऐसा करने वालों का समर्थन करे, जो व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट पर चढ़ाई करने चला जाए, वह इस देश का भला कैसे सोच सकता है? और जो इस देश का भला नहीं सोच सकता, उसको इस देश का मतदाता कभी सत्ता की कुंजी नहीं सौंपेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)