विधायकी छोड़कर सांसद बने रहने का फैसला विधानसभा चुनाव में बहुत भारी पड़ेगा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कहते हैं कि मनुष्य गिरता पहले है दिखाई बाद में देता है। कमोबेश वही हाल राजनीतिक दलों का भी होता है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी इस समय इसी दौर से गुजर रही है।
अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो हैं। लगातार पांच साल तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके पिता मुलायम सिंह यादव भी करीब साढ़े सात तक मुख्यमंत्री रहे। सपा इस समय विधानसभा सीटों के लिहाज से उत्तर प्रदेश में नंबर दो की पार्टी है और लोकसभा की स्ट्रेंथ देखें तो उत्तर प्रदेश में नंबर एक की पार्टी है, लेकिन इस सबके बावजूद अखिलेश यादव की पार्टी गिरी हुई क्यों दिखाई दे रही है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? भाजपा ने अपना सामाजिक आधार एवं नैरेटिव सेट करने की कोशिश की है और सफल भी हुई है। इसके अलावा उसके पास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में मजबूत लीडरशिप भी है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के सामने समस्या ही समस्या हैं। मेरा मानना है कि अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का मैदान ढाई साल पहले ही छोड़कर भाग चुके हैं। समाजवादी पार्टी एक क्षेत्रीय दल है। उसका उत्तर प्रदेश से बाहर जनाधार नहीं है। उसकी सारी राजनीति उत्तर प्रदेश तक सिमटी हुई है। अखिलेश यादव भी उत्तर प्रदेश के नेता हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उनका कोई कद नहीं है। इस समय उनकी जो थोड़ी बहुत पूछ है वह इसलिए क्योंकि लोकसभा में उनकी पार्टी की 37 सीटें हैं। इतनी सीटें होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर अखिलेश का कद बहुत बड़ा दिखना चाहिए था,लेकिन जब तक डीएमके तमिलनाडु की सत्ता में भी तब तक स्टालिन का,जब तक तृणमूल कांग्रेस टूटी नहीं थी तब तक ममता बनर्जी का, यहां तक कि बहुत छोटी पार्टियां होने के बावजूद शरद पवार और उद्धव ठाकरे का कद अखिलेश से बड़ा था। मैं क्यों कह रहा हूं कि ढाई साल पहले अखिलेश ने मैदान छोड़ दिया तो उसका कारण है। ढाई साल पहले लोकसभा का चुनाव हुआ था। अखिलेश यादव लोकसभा का चुनाव लड़े। उस समय विपक्ष के लोगों को लग रहा था कि भाजपा सत्ता में नहीं आएगी। उस लिहाज से उनका लोकसभा चुनाव लड़ना शायद ठीक था क्योंकि केंद्र में अगर गठबंधन सरकार बनती तो उनकी प्रमुख भूमिका होती। उसमें बड़ा मंत्रालय मिलता तो उनकी राष्ट्रीय छवि बनती और उसका असर उत्तर प्रदेश पर भी पड़ता। लेकिन नतीजे के बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि केंद्र में भाजपा की ही सरकार बन रही है तो उसके बाद अखिलेश यादव के सामने विकल्प था कि वह लोकसभा में जाएं या विधानसभा की अपनी सदस्यता को बरकरार रखें। तो उन्होंने चुना क्या? उन्होंने लोकसभा की सदस्यता चुनी और विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी। एक क्षेत्रीय दल का नेता अगर निकल कर राष्ट्रीय राजनीति में चला जाता है तो दरअसल वह अपना मैदान छोड़कर भाग जाता है। फिर वह लौटकर उस मैदान पर कब्जा नहीं कर सकता।
अखिलेश यादव के विधानसभा की सदस्यता छोड़ देने से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी एक तरह से नेतृत्वविहीन हो गई। इसके अलावा उन्होंने उत्तर प्रदेश में कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं चलाई और न ही कोई आंदोलन चलाकर यूपी सरकार को घेरने की कोशिश की। प्रदेश के विभिन्न इलाकों का दौरा भी नहीं किया जिस कारण वह सियासी जमीन खोते चले गए। दरअसल आराम पसंद नेता के साथ यही होता है। उनको लगा कि दिल्ली का सोशल नेटवर्क बहुत बड़ा है। कुल मिलाकर उन्होंने उस उत्तर प्रदेश को छोड़ दिया जो उनकी राजनीति का आधार होना चाहिए था। वह लोकसभा में तभी तक रह पाएंगे या उनकी पार्टी रह पाएगी जब तक उत्तर प्रदेश में मजबूत रहेंगे। 37 लोकसभा सीटें लेकर भी ढाई साल में राष्ट्रीय राजनीति में वह अपनी कोई छवि नहीं बना पाए सिवाय इसके कि राहुल गांधी के पिछलग्गू हैं। राहुल गांधी कोई कॉल दें तो वह वहां मौजूद हो जाते हैं और वहां भी मन से नहीं रहते। हाजिरी देकर भाग आते हैं। किसी आंदोलन में या किसी संघर्ष में उनका मन नहीं लगता। उनको लग रहा है कि कुछ किए बिना ही उनको उत्तर प्रदेश की सत्ता मिल जाएगी। 10 साल की योगी सरकार के खिलाफ वह एक मुद्दा नहीं खड़ा कर पाए बल्कि लगातार डिफेंसिव हैं। अमूमन होता यह है कि विपक्ष हमला करता है और सत्तारूढ़ दल डिफेंसिव होता है। उत्तर प्रदेश में उल्टा है। योगी जी हमला करते हैं और अखिलेश यादव बचाव की मुद्रा में रहते हैं। वह एक पीडीए लेकर आए लेकिन उसकी परिभाषा रोज बदलती रहती है। अब वह कांग्रेस पार्टी पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं और यही कांग्रेस उनका खेल बिगाड़ सकती है। जब आपने खुद ही उत्तर प्रदेश का मैदान छोड़ दिया तो कोई खिलाड़ी मैदान छोड़कर जीत का दावा नहीं कर सकता। इसलिए मैं कहता हूं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा की राजनीति में अब अखिलेश यादव की भूमिका खत्म हो चुकी है। चूंकि उनकी पार्टी प्रदेश की नंबर दो पार्टी है इसलिए वह प्रासंगिक बने रहेंगे, लेकिन सत्ता में उनके आने की दूर—दूर तक कोई उम्मीद नजर नहीं आती। पार्टियां नेता की विश्वसनीयता से बढ़ती हैं और वह अखिलेश यादव के मामले में है नहीं। संगठन के नाम पर केवल मुस्लिम—यादव हैं। लोगों को जोड़ने वाला कोई नैरेटिव है नहीं। उनके साथ 2022 के विधानसभा चुनाव में जो सामाजिक आधार था उसमें भी कमी आई है। ओमप्रकाश राजभर और जयंत चौधरी को साथ रखकर उन्होंने 2022 में जो सामाजिक समीकरण बनाया था उसने विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुत नुकसान पहुंचाया था, लेकिन चुनाव के ठीक बाद उन्होंने उसे तोड़ दिया। अब ये दोनों भाजपा के साथ हैं। उसके बाद से आधे परसेंट की आबादी वाले भी किसी समाज को अखिलेश यादव 5 साल में जोड़ नहीं पाए हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करके सपा को थोड़ा बहुत फायदा भले मिला हो,लेकिन 2027 में विधानसभा चुनाव होना है,जहां कांग्रेस की कोई हैसियत नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 2.3% वोट मिला था।इसके अलावा कांग्रेस खासतौर से राहुल गांधी को एक बीमारी है। आप याद कीजिए बिहार में विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले राहुल गांधी ने प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी बदल दिया था,जिसका कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ। यही काम उन्होंने उत्तर प्रदेश में किया है। अखिलेश यादव ने एक बड़ी भूल यह भी की है कि 2024 के नतीजे को उन्होंने अपनी असली ताकत मान लिया। मैं लोकसभा चुनाव के नतीजे के बाद से लगातार कह रहा हूं कि ये बाढ़ का पानी था, जो उतर चुका है। अखिलेश यादव अभी भी उसी में मगन हैं कि हमको दलित और कुछ अति पिछड़ा वोट मिल गया था। उनको पता नहीं है कि वह जमीन खिसक चुकी है। उन्होंने ढाई साल में ऐसा कुछ नहीं किया है, जिसकी वजह से वह उनके साथ बना रहे। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का नतीजा तो मार्च में आएगा,लेकिन क्या आएगा वह आज ही दिखाई दे रहा है। बहुत से लोगों को लग रहा है कि दो ध्रुवीय चुनाव है इसलिए करीबी मुकाबला होगा। आप याद कीजिए कि बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा और असम में क्या हुआ,वहां भी दो ध्रुवीय चुनाव था। मुकाबला कांटे का तब होता है जब दोनों पार्टियों की ताकत में अंतर बहुत कम हो। जब अंतर इतना ज्यादा हो तो वह चुनाव एकतरफा होता है। वही उत्तर प्रदेश में होने जा रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)