जुलाई में जो दहाड़ रहे थे कानून का डंडा चलते ही अक्टूबर में गिड़गिड़ाने लगे।
जिन लोगों को लग रहा था कि कॉकरोच जनता पार्टी देश में क्रांति ला देगी, उनसे ज्यादा निराश और हताश इस समय कोई नहीं होगा। अमेरिका से आए इस अभिजीत दीपके को लगा कि भारत के लोग उसके समर्थन में सड़क पर उतर आएंगे और रिजीम चेंज कर देंगे,लेकिन आज वह खुद रोता—गिड़गिड़ाता नजर आ रहा है।
रिजीम चेंज एक शब्द नहीं, सिद्धांत है। यह उन जगहों पर चलता है जहां अधिनायकवाद या मिलिट्री रूल हो। यह भारत का शब्द नहीं है। राजा—रजवाणों के जमाने में सत्ता परिवर्तन अनुवांशिक रूप से होता था। रिजीम चेंज का कांसेप्ट भारत में मुगल लेकर आए कि अपने बाप—भाई का गला काट दो यानी हिंसा से सत्ता पर काबिज हो जाओ। यही अधिनायकवादी और मिलिट्री रूलर करते हैं कि निर्वाचित सरकार को अपदस्थ कर दो। हमारे बगल में पाकिस्तान में यह होता ही रहता है। कुछ लोगों को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गई है कि चुनाव से तो सरकार नहीं बदल सकते। उनका आत्मविश्वास खत्म हो चुका है। उनको सिर्फ अराजकता में विश्वास है। तो जब कॉकरोच जनता पार्टी आई तो ऐसे लोगों की बाछें खिल गईं। उनको लगा कि जो हम नहीं कर पा रहे हैं, ये कर देंगे। और जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ एवं सरकार ने इनकी मांगें मान लीं तो जितने सरकार विरोधी थे,उन सबको लगा कि बस अब हमारा मौका आ गया है। सोशल मीडिया पर आपको कई विद्वान दिख जाएंगे जो रोज भविष्यवाणी करते हैं कि सरकार किस दिन गिरेगी। जरा उनसे पूछ लीजिए कि कैसे गिर जाएगी तो उनके पास कोई जवाब नहीं होगा। दरअसल सरकार गिर जाएगी,यह उनकी इच्छा है। यह वास्तविकता नहीं है। तो दुनिया में इच्छा होने से तो कुछ हो नहीं जाता। कौन सत्ता में रहेगा और कौन नहीं, इस देश में यह फैसला करने का अधिकार सिर्फ मतदाता को है। उसका यह अधिकार कोई छीन नहीं सकता। अभिजीत दीपके के आने से अरविंद केजरीवाल को भी लग रहा था कि अब हमारा जमाना लौट रहा है। हमारे बच्चे देखिए क्या क्रांति कर रहे हैं। जो हम नहीं कर पाए ये उससे ज्यादा करेंगे। अभिजीत दीपके जब भारत आए तो उनको सीधे एयरपोर्ट पर ही धरने की परमीशन मिल गई थी। हालांकि परमीशन सिर्फ एक दिन की थी,लेकिन वह धरने पर 30 दिन बैठे। सरकार ने उनकी सारी मांगें मान भी लीं तो इनको लगा कि अब हम जो कहेंगे, वह होगा। इस सबमें वे भूल गए कि उनकी औकात ढेले भर की नहीं है। ये तो सरकार उनके गुब्बारे में हवा भर रही थी। उसने उनको बड़ा बना दिया। जब वे छोटे थे तब उनको मारने पर शायद उतना असर नहीं होता। बड़ा करके मारने पर ज्यादा असर होता है। वही अब हो रहा है।
अभिजीत दीपके के दो साथी आशुतोष रांका और सौरव दास सात दिन जेल में रहे। जिस जंतरमंतर को सरकार ने प्रदर्शनस्थल के रूप में डिनोटिफाई कर दिया था,वे उसकी दीवार फांदकर अंदर चले गए और हाथ में तिरंगा ले लिया। अब तिरंगे का इससे बड़ा अपमान क्या होगा कि आप कानून तोड़ने जा रहे हैं और हाथ में तिरंगा है। तिरंगा वह सिर्फ इसलिए लिए थे ताकि उनको विक्टिम कार्ड खेलने का मौका मिल जाए। वे दिखाना चाहते थे कि इस देश में तिरंगा फहराना अपराध हो गया है। इनको मालूम ही नहीं है कि तिरंगा फहराना होता क्या है? इसके लिए लोगों ने कुर्बानी दी है। मैं सिर्फ ब्रिटिश काल की बात नहीं कर रहा। याद कीजिए जम्मू कश्मीर का लाल चौक। वहां पर तिरंगा फहराने के लिए कितने ही भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं का दमन व गिरफ्तारी हुई। सेना की मदद से भाजपा के कुछ नेताओं को तिरंगा फहराने की परमीशन मिली। आज कानून तोड़ने वाले कह रहे हैं कि हम तिरंगा फहरा रहे हैं इसलिए गिरफ्तार किया गया। अब इनके खिलाफ क्राइम ब्रांच और अन्य एजेंसियां जांच कर रही हैं। पता लगाया जा रहा है कि इनकी फंडिंग कौन कर रहा है। अभी तक कहा जा रहा था कि आम आदमी पार्टी फंडिंग कर रही थी। सवाल है कि आम आदमी पार्टी को पैसा कहां से आ रहा है? एक खालिस्तानी है पन्नू। उसका वीडियो आया है कि हम सीजेपी का समर्थन और फंडिंग कर रहे हैं। तो धीरे-धीरे कड़ियां जुड़ रही है और इन लोगों की कलई खुल रही है। तो जैसे ही दीपके को खबर मिली कि जांच एजेंसियां इसके यहां भी आने वाली हैं तो वह रोने लगा। ये सिर्फ दो दिन जेल में रहा था और सारी क्रांतिकारिता भूल गया। अब क्रांति की बात नहीं करता। अब वीडियो बनाकर रोता है कि आशुतोष और सौरव की मुझे बड़ी याद आती है। बोलता है कि ये दोनों मुझे रोज कई—कई बार मीम भेजते थे। यह थी इनकी क्रांति। एक दूसरे को मीम भेजकर खुश होते थे। दरअसल न इनको छात्रों से कोई मतलब था, न चुनाव व्यवस्था से कोई मतलब है। इनको केवल प्रसिद्धि चाहिए थी। अब उसके बाद पानी उतर रहा है तो रो रहे हैं। अब कह रहे हैं कि दिवाली तक कुछ नहीं करेंगे। सवाल है कि दशहरे से पहले क्यों कर रहे थे? कनाट प्लेस में इतने सारे व्यापारियों का करोड़ों का नुकसान क्यों कराया? दरअसल इनको पता चल गया है कि इनके साथ कोई नहीं है। इनकी जो फंडिंग करने वाले हैं, उनको भी पता चल गया है कि इनको कोई जनसमर्थन नहीं है। अब वे भी हाथ खींच रहे हैं। कानून क्या होता है, कानूनी एजेंसियां क्या होती हैं, जांच एजेंसियां क्या होती हैं, ये अब इनको पता चलना शुरू हुआ है।
वीडियो में ये जो दीपके रो रहा है,वह आशुतोष राका और सौरभ दास के लिए नहीं रो रहा। ये अपने लिए रो रहा था। इसको मालूम है कि इसका नंबर आने वाला है। अब जेल की रोटी खाने का समय आ गया है। फाइव स्टार से आर्डर करके धरना स्थल पर जो खाना मंगा रहे थे, उसका समय चला गया है। तब इसको गांधी जी याद आने लगे हैं कि गांधी जी ने जैसे सत्याग्रह किया था, वैसे ही आशुतोष और सौरवदास ने किया। गांधी जी तो आक्रांता ब्रिटिश शासन से लड़ाई लड़ रहे थे। तुम किसके खिलाफ लड़ रहे हो? इस देश की चुनी हुई सरकार से। चुनी हुई सरकार के खिलाफ आंदोलन करना कोई गलत नहीं है, लेकिन देश के संविधान और कानून का उल्लंघन करना बिल्कुल गलत है। इनको लगता था कि हम कानून और संविधान का उल्लंघन करेंगे और कोई सजा नहीं मिलेगी। पिछली बार सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने इनकी हिम्मत बढ़ा दी तो इनको लगा कि अब हम इस देश में कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन इस बार कार्रवाई हो रही है तो रो रहे हैं। अभिजीत दीपके अब कह रहा है कि मैं तो नेता हूं ही नहीं। असली नेता तो सौरव दास और आशुतोष रांका थे। ये लोग जो आदेश देते थे, मैं उसका पालन कर रहा था। ये जांच एजेंसियों को बता रहा है कि भैया हमको मत पकड़ना। हम तो इनके हुकुम के गुलाम थे। तो जो जून और जुलाई में दहाड़ रहे थे अब वे गिड़गिड़ा रहे हैं। लेकिन बात वही है कि रस्सी जल गई बल नहीं गए। यह दीपके उस वीडियो में गाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे रहा है। लेकिन अब पता चलेगा कि इस देश में कानून तोड़ने और अराजकता फैलाने की कोशिश का मतलब क्या होता है। जो कुछ फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों में हो रहा है उससे इनका काम और बिगड़ गया। अब लोगों को समझ में आ गया है कि फ्रांस में तो उपद्रवी अपना ही देश जला रहे हैं। जो लोग शिक्षा और छात्रों के नाम पर आंदोलन कर रहे थे, अब अपने देश में ही लूटपाट कर रहे हैं। उन्हीं लोगों के रास्ते पर ये चलना चाहते थे। तो जिन लोगों की इनसे थोड़ी बहुत सहानुभूति भी थी, उनको भी समझ में आ गया कि ये बड़ा खतरनाक खेल है। ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए। इसलिए जगह-जगह इनसे सवाल पूछे जा रहे हैं। इनसे कहा जा रहा है कि शर्म करो। इनको पता नहीं था कि इस स्थिति का भी सामना करना पड़ेगा। इनको लगा था कि सरकार से जो मांग करेंगे, वह मान ली जाएगी। तो जेल जाने का डर दीपके को रुला रहा है। यह तो दर्द की शुरुआत है। अभी बहुत माइल्ड डोज दिया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह डोज और बढ़ने वाली है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)








