दायर की पुनर्विचार याचिका।
आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
बता दें कि 13 मई को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि सजा 2008 में मिली, इसलिए रिहाई के लिए 2014 में गुजरात में बने कठोर नियम लागू नहीं होंगे। 1992 के नियम ही लागू होंगे जिसके तहत गुजरात सरकार ने 14 साल की सजा काट चुके लोगों को रिहा किया था। अब बिलकिस बानो 13 मई के आदेश पर पुनर्विचार की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि जब मुकदमा महाराष्ट्र में चला, तो नियम भी वहां के लागू होंगे गुजरात के नहीं।
इससे पहले भी दो याचिकाएं दायर
बिलकिस बानो केस में इससे पहले भी दो याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। मुख्य याचिका के बाद 21 अक्तूबर को एक महिला संगठन की ओर से भी याचिका दायर की गई थी। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने यह याचिका भी मुख्य याचिका के साथ जोड़ दी। दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की जाएगी। शीर्ष कोर्ट ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमन’ द्वारा दायर एक याचिका पर पहले से सुनवाई कर रही है। इसमें सजा की छूट और मामले में दोषियों की रिहाई को चुनौती दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार के जवाब को बताया था भारी भरकम
सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्टूबर को कहा था कि सजा में छूट को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुजरात सरकार का जवाब बहुत भारी है। इसमें कई फैसलों का हवाला दिया गया है, लेकिन तथ्यात्मक बयान गायब हैं। इसके बाद शीर्ष कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को गुजरात सरकार के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए समय देते हुए 29 नवंबर को मामले की आगे सुनवाई तय की।
जानें क्या है मामला?
बता दें, यह मामला गोधरा कांड के बाद 2002 में हुए हुए गुजरात दंगों से जुड़ा है। तब बिलकिस बानो 21 साल की थी और पांच माह की गर्भवती थीं। दंगों के बीच भागते समय बिलकिस के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ था और उसके परिवार के सात सदस्य की हत्या कर दी गई थी। मृतकों में उसकी तीन साल की बेटी भी शामिल थी।
15 साल जेल काटने के बाद हुई रिहाई
उधर, गुजरात सरकार का कहना है कि उसने अपनी सजा माफी नीति के अनुरूप 11 दोषियों को छूट दी है। इन दोषियों को इसी साल 15 अगस्त को जेल से रिहा किया गया। दोषियों को गोधरा उप-जेल में 15 साल से अधिक की सजा काटने के बाद छोड़ा गया है। (एएमएपी)



