भाजपा ने चल दिया बड़ा दांव, 2029 से पहले 21 राज्यों में लागू होगा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
जगजीत सिंह की गाई एक मशहूर गजल है- रेखाओं का खेल है मुकद्दर, रेखाओं से मात खा रहे हो। इसको अगर राजनीति के संदर्भ में विशेषकर कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए कहें तो मुद्दों का खेल है राजनीति, मुद्दों से मात खा रहे हो। एक के बाद एक मुद्दा ऐसा आ रहा है, जो कांग्रेस पार्टी को बैकफुट पर धकेलता जा रहा है।
वंदे मातरम् का मुद्दा अभी शांत नहीं हुआ है कि कांग्रेस के सिर पर एक और तलवार लटक रही है। इससे परेशान कांग्रेसी हर दूसरे दिन बयान देते हैं कि संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान क्यों नहीं हो रहा है? वह बताते हैं कि सत्रावसान न करने का भाजपा ने अपना ही पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है। उनको डर है कि सत्रावसान न होने से कोई भी बिल पारित कराने के लिए सरकार को संसद का सत्र नए सिरे से बुलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सरकार महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन विधेयकों को फिर से कभी भी ला सकती है। सरकार कुछ बता नहीं रही है कि वह लाएगी कि नहीं लाएगी। क्या वह इसीलिए सत्रावसान नहीं कर रही या वह इन्हें संसद के शीतकालीन सत्र में लाएगी? कांग्रेसी कह रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी चोरी-छिपे दो तिहाई बहुमत जुटा रही है। खैर, बहुमत तो चोरी छिपे नहीं जुट सकता। वह तो संसद में सामने आ ही जाएगा। कौन समर्थन में है और कौन विरोध में, यह स्पष्ट हो जाएगा पर इतना तय है कि पिछली बार जब विशेष सत्र में यह विधेयक गिरा था तब इसका विरोध करने वाले जितने लोग थे अब उतने नहीं रह गए हैं। इसीलिए कांग्रेस का डर और ज्यादा बढ़ रहा है। उसे मालूम है कि अगर महिला आरक्षण संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक पास हो गया और 2029 के चुनाव से पहले ये दोनों लागू हो गए तो फिर कांग्रेस की जीत 2029 ही नहीं, कई दशकों तक संभव नहीं हो पाएगी। कांग्रेस को मालूम है कि यह उसके अस्तित्व की लड़ाई है। इसको रोक कर ही वह अपना रास्ता खोज सकती है।
कांग्रेस के लिए इस मुसीबत के साथ ही एक नई मुसीबत भी आ गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा कर दी है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के 21 राज्यों में यूनिफार्म सिविल कोड (यूसीसी) लागू हो जाएगा। अब आप इस बात से अंदाजा लगाइए कि कांग्रेस को कितनी परेशानी हो सकती है। देश में अभी 21 राज्य ऐसे हैं, जहां भाजपा की अकेले या साथी दलों के साथ सरकार है। इनमें यह कानून लाने में कोई दिक्कत नहीं होने वाली है। 2027 के फरवरी-मार्च में जिन पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में चुनाव होने वाले हैं, उनमें गोवा और उत्तराखंड में पहले से ही यूसीसी लागू है। पंजाब में भाजपा या उसके साथी दलों की सरकार नहीं है। अगर वहां परिस्थिति बदल जाती है तो यह 22वां राज्य हो सकता है। उसके बाद दिसंबर  2027 में ही गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव होने वाले हैं। हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा की सत्ता में वापसी तय लग रही है। तो वह 23वां राज्य हो जाएगा। इसके बाद कांग्रेस बुरी तरह से घिर जाएगी क्योंकि केवल कांग्रेस शासित या उसके समर्थक दलों की सरकार वाले राज्यों में ही यूसीसी लागू नहीं रहेगा। क्या कांग्रेस 2029 के चुनाव इस स्थिति का सामना कर सकती है। उससे पूछा जाएगा कि वह इसे क्यों रोक रही है? अभी तक बहुत से लोग सवाल उठा रहे थे कि आखिर केंद्र सरकार केंद्रीय स्तर पर ये कानून क्यों नहीं ला रही है? उसके पीछे की रणनीति अब समझ में आ रही है। अगर राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का कानून लाने की कोशिश होगी तो कांग्रेस और उसके साथी दल विरोध और हंगामा करेंगे। उसको रोकने की कोशिश होगी। लेकिन राज्यों में जहां भाजपा की अकेले या गठबंधन की सरकार है, वहां इसको लाने में कोई समस्या नहीं है। अगर 22-23 राज्यों में यूसीसी लागू हो जाता है तो कांग्रेस के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। संविधान के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में लिखा हुआ है कि सरकार को यूनिफार्म सिविल कोड लाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी दो-तीन फैसलों में कह चुका है कि यूसीसी लागू होना चाहिए। इस स्थिति में यूसीसी का विरोध करना कांग्रेस के उसके साथी दलों के लिए बहुत कठिन हो जाएगा। खासतौर से झारखंड में हेमंत सोरेन के लिए मुश्किल बढ़ जाएगी। कांग्रेस शासित कर्नाटक में 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं। वहां भी कांग्रेस के लौट कर सत्ता में आने की संभावना बहुत कम नजर आ रही है। तेलंगाना का मामला अभी उलझा हुआ है। कुल मिलाकर स्थिति है कि कांग्रेस के हाथ से एक के बाद एक मुद्दा निकलता जा रहा है।
ब्रिक्स के सफल सम्मेलन के बाद पूरी दुनिया में भारत की तारीफ हो रही है। कांग्रेस पार्टी के पास विरोध करने के लिए कुछ नहीं था तो उसने सवाल उठाया कि जो भोजन परोसा गया वह केवल शाकाहारी क्यों था। भाई, जो भी मेहमान आपके यहां आता है तो आप अपनी संस्कृति दिखाते हैं। नॉन वेजिटेरियन फूड तो इन विदेशी मेहमानों के लिए कोई नई बात नहीं थी। लेकिन वेजिटेरियन फूड की इतनी वैरायटी परोसकर भारत की अपनी सॉफ्ट पावर दिखाने की कोशिश की। किसी विदेशी मेहमान ने शाकाहारी भोजन पर एतराज नहीं जताया, लेकिन केवल कांग्रेस पार्टी को बुरा लगा। पूरे सम्मेलन में अगर कांग्रेस को यही एक मुद्दा मिला तो इससे आप उसकी हताशा समझ सकते हैं। उसके पास मुद्दों का लगातार अभाव होता जा रहा है क्योंकि उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं बची है। पहली बात तो कांग्रेस और राहुल गांधी ऐसे मुद्दे उठाते हैं जिनका कोई आधार नहीं होता। वे झूठ साबित हो जाते हैं। उसके अलावा वे जो मुद्दा उठाते हैं, उस पर कभी टिकते नहीं। आप याद कीजिए राफेल, हिंडनबर्ग रिपोर्ट, पेगासस, एसआईआर और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन जैसे मुद्दों पर राहुल ने कितना हंगामा किया था,लेकिन आज वे उनका नाम नहीं लेते। वह छात्रों की गूंज कार्यक्रम करते हैं तो वह झूठ की गूंज से ध्वस्त हो जाता है। हालांकि देश में मुद्दों की कमी नहीं है। सरकार के खिलाफ बहुत सारे मुद्दे हैं। सवाल है कि जो मुद्दा उठा रहा है उसमें लोगों का विश्वास कितना है? राहुल और कांग्रेस जो भी मुद्दा उठाते हैं उस पर टीवी चैनल्स पर चर्चा तो हो जाती है, अखबारों में खबर भी छप जाती है,लेकिन वह नीचे कहीं नहीं पहुंचता। गांव या कस्बों में चले जाए तो उसकी चर्चा भी नहीं होती है और चर्चा होती भी है तो राहुल का मजाक उड़ाने के लिए होती है। इसलिए आने वाले समय में कांग्रेस की समस्या और ज्यादा बढ़ने वाली है। महिला आरक्षण संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक शीतकालीन सत्र में जरूर आएगा। सरकार की जिस तरह की तैयारी दिख रही है, उससे लग रहा है कि उसने दो तिहाई बहुमत जुटा लिया है। उसके बाद कांग्रेस की स्थिति देखने लायक होगी। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि सरकार के खिलाफ जो मुद्दे उठाए जा सकते हैं, उन्हें उठाने की कांग्रेस पार्टी में हिम्मत नहीं है। यूजीसी गाइडलाइंस और एससी-एसटी एट्रोसिटीज एक्ट ऐसे ही मुद्दे हैं,लेकिन इन पर आपने राहुल गांधी का कोई बयान सुना। तो सरकार के खिलाफ जो सबसे बड़ा मुद्दा है, उस पर अगर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी चुप्पी साधे हुए है तो आप समझिए कि उसकी क्या स्थिति है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)