एजेंडा चलाने में ऐसे तर्क देते हैं जिन्हें कोई भी आम आदमी खारिज कर दे ।
मैंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पढ़ी कि अंग्रेजी दैनिक हिंदू हिंदी में अपना अखबार लाने जा रहा है। उसमें एक वाक्य बड़ा महत्वपूर्ण था कि भारत की राजनीति हिंदी में समझी जाती है इसलिए वे हिंदी में आ रहे हैं। उसके बाद हाल ही में मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया में दो लेख पढ़े। एक लेख एक व्यक्ति ने लिखा है जबकि दूसरा तीन लोगों ने मिलकर लिखा है। इन तीन लोगों में एक ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर और दूसरे जेएनयू के विद्वान हैं। साथ ही ये सेफोलॉजिस्ट और राजनीति व समाजशास्त्र के प्रकांड विद्वान भी माने जाते हैं,लेकिन इन्होंने जो लिखा है उसे पढ़कर कोई सामान्य सा व्यक्ति भी हंसेगा।
लेख उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव पर है। उसमें कहा गया है कि सत्तारूढ़ दल तीन तरह की एंटी इनकंबेंसी का सामना कर रहा है। सेंटर की एंटी इनकंबेंसी, स्टेट की और लोकल। इसमें कोई गलत बात नहीं है। जाहिर है कि जो तीनों जगह सत्ता में होगा तो एंटी इनकंबेंसी का सामना करेगा ही। लेकिन अगर कोई विशेषज्ञ लेख लिख रहा है तो दूसरे फैक्टर की भी बात करेगा कि पिछले करीब तीन दशक से भारत में एंटी इनकंबेंसी से ज्यादा प्रो इनकंबेंसी चल रही है। सरकारें बार-बार लौट कर आ रही हैं, लेकिन पूरे लेख में प्रो इनकंबेंसी शब्द का जिक्र तक नहीं है। लेख में एक और बात कही गई है कि इस बार उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति एक नए स्वरूप में दिखाई देगी। इस सरकार में ब्राह्मण उपेक्षित महसूस कर रहा है। उसकी नाराजगी के दो कारण बताए गए हैं। एक गैंगस्टर विकास दुबे का एनकाउंटर और दूसरा शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से प्रयागराज में हुआ व्यवहार। अविमुक्तेश्वरानंद की कोई प्रतिष्ठा नहीं है। अब आप देखिए कि जब इनको भाजपा के खिलाफ या भाजपा विरोधी ताकतों के पक्ष में नैरेटिव बनाना होता है तो तथ्यों को कैसे तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं? अब विकास दुबे के एनकाउंटर की वजह से अगर ब्राह्मण नाराज है तो उसका खंडन भी इसी लेख में कर दिया गया है। इसी में लिखा है कि सीएसडीएस के पोस्ट पोल सर्वे के मुताबिक 2022 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण समाज ने अब तक की सबसे बड़ी वोटिंग 89% भाजपा के पक्ष में की। विकास दुबे का एनकाउंटर 10 जुलाई 2020 को हुआ था। इसका मतलब है कि इससे ब्राह्मण इतने नाराज हो गए कि 89% ने जाकर भाजपा को वोट कर दिया। अब इस तरह का तर्क तो हाईस्कूल—इंटरमीडिएट का कोई बच्चा भी नहीं दे सकता। जो बात आप कह रहे हैं, उसी को आप काट रहे हैं। लेख में कहा गया है कि ब्राह्मण की लगातार उपेक्षा हो रही है। सवाल है कि 10 साल से उत्तर प्रदेश में डिप्टी सीएम ब्राह्मण है। इससे पहले कभी बना था कोई?
लेख में एक और बात कही गई है कि हवा किस ओर बह रही है,यह पता लगाने के लिए किसी गठबंधन के सहयोगी दल सबसे बढ़िया बैरोमीटर होते हैं। वे सारा गणित पता करके फैसला लेते हैं। इसमें संजय निषाद और ओम प्रकाश राजभर की चर्चा की गई है। ओम प्रकाश राजभर ने भाजपा के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया है। संजय निषाद ने जरूर कहा है कि अगर उनके समाज को एससी का दर्जा नहीं मिला तो वह विकल्प पर विचार करेंगे। अब उत्तर प्रदेश की राजनीति की जिसको रंच मात्र भी समझ होगी वह जानता है कि संजय निषाद कहीं नही जा सकते। उनके पास भाजपा के साथ रहने के अलावा कोई विकल्प है ही नहीं। उन्होंने यह बयान सिर्फ अपने लोगों को चुप कराने के लिए दिया कि देखिए हम आपके लिए संघर्ष कर रहे हैं। संजय निषाद अभी सरकार में मंत्री हैं। समाजवादी पार्टी में रहकर उसका समर्थन करके और फिर उसको गाली देकर आ चुके हैं। सपा अगर सत्ता में आ भी जाए तो भी उनकी मांग पूरी नहीं करा सकती। एससी का दर्जा देने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। तो अपनी इस सबसे बड़ी मांग के लिए वह समाजवादी पार्टी के पास क्यों जाएंगे? दूसरा, 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद ओम प्रकाश राजभर की पार्टी और जयंत चौधरी की आरएलडी ने अखिलेश यादव का साथ छोड़ दिया था। यानी उन्होंने हवा का रुख भांप लिया था कि भाजपा और ज्यादा मजबूत होने वाली है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तो भाजपा की सीटें घट गईं। वह 62 से 33 पर आ गई और समाजवादी पार्टी पांच से 37 पर चली गई। तो ये कौन सा दिशा सूचक यंत्र है, जो इस तरह की सूचना देता है। तो भाई जो तथ्य आप लिख रहे हैं उसकी तस्दीक करते हैं कि नहीं। लेकिन आपको तो नैरेटिव बनाना था कि बीजेपी बड़ी कमजोर है। आप यह नहीं बता रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती क्या है? 2022 में उसके साथ जो दो मुख्य सहयोगी थे, वे छोड़कर जा चुके हैं। कोई नया सहयोगी जुड़ा नहीं है।
चूंकि यह साबित करना था कि ब्राह्मण बीजेपी से अलग हो रहा है तो लेख में एक और तर्क दिया गया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का बड़ा ब्राह्मण चेहरा आराधना मिश्रा को कांग्रेस ने अपना प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। सवाल है कि आराधना मिश्रा को प्रतापगढ़ से बाहर कौन जानता है? उनकी सारी पहचान उनके पिता प्रमोद तिवारी के कारण है। आराधना मिश्रा इतनी ही बड़ी ब्राह्मण नेता हैं तो 2022 में अपनी सीट के अलावा कोई और सीट कांग्रेस को क्यों नहीं जिता पाईं? लेकिन लेख के आखिर में इन विद्वानों ने सच्चाई बयां कर ही दी। वे कह रहे हैं कि हो सकता है कि ज्यादातर ब्राह्मण समाज के लोग अब भी भाजपा को वोट करें, लेकिन हो सकता है कि इनमें से कुछ पोलिंग बूथ तक जाएं ही नहीं। अब आप इस बात को समझिए। इतना सबके बावजूद वे यह लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाए कि ब्राह्मण समाजवादी पार्टी या कांग्रेस के साथ जा सकता है। खुद ही कह रहे हैं कि ब्राह्मण समाज के लोग या तो भाजपा के साथ जाएंगे या घर बैठ जाएंगे। अब आता हूं आखिरी बात पर। जब आप किसी भी राज्य के विधानसभा चुनाव का आकलन करते हैं तो यह जरूर तुलना करते हैं कि सरकार से असंतुष्टों की संख्या संतुष्टों की संख्या से ज्यादा है या कम? योगी आदित्यनाथ की सरकार के पक्ष में सबसे बड़ा मुद्दा प्रदेश की कानून व्यवस्था में सुधार है। ये ऐसा मुद्दा है जो जाति के प्रभाव को खत्म कर देता है। अगर लोग सुरक्षित महसूस कर रहे हैं तो ऐसा नहीं है कि किसी एक खास जाति के लोग सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। यहां धर्म और मजहब की दीवार भी टूट जाती है। ऐसा नहीं है कि किसी एक मजहब या धर्म के लोग सुरक्षित हैं। आप किसी भी मुसलमान से पूछ कर देख लीजिए कि अखिलेश यादव के राज में वह ज्यादा सुरक्षित था या आज है। दंगा होने पर मुसलमान भी प्रभावित होता है। उसके रोजगार पर भी असर पड़ता है। पिछले 10 साल से उत्तर प्रदेश में एक दंगा नहीं हुआ है तो मुसलमानों का फायदा हुआ है या नुकसान? आप उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की बात करेंगे और कानून व्यवस्था के मुद्दे की बात ही नहीं करेंगे क्योंकि आपको डर लगता है कि यह तो बीजेपी के पक्ष में चला जाएगा। ऐसे में या तो आपको राजनीति की समझ नहीं है या आप एजेंडा चला रहे हैं। कम से कम और कुछ नहीं तो अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखते। इन दोनों लेखों में जो भी तथ्य रखे गए हैं, उन्हें किसी सामन्य से व्यक्ति के सामने रख दीजिए तो वह सबको खारिज कर देगा। लेकिन ये अंग्रेजी वाले हैं। प्रकांड विद्वान माने जाते हैं। ये दोनों लेख इस बात को प्रमाणित करते हैं कि उनको भारत की राजनीति बिल्कुल समझ में नहीं आती और जब राजनीति की समझ नहीं है तो वे एजेंडे पर चले जाते हैं,लेकिन इसका उत्तर प्रदेश के मतदाता पर इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला है। 2027 के विधानसभा चुनाव का जब नतीजा आ जाएगा तो ऐसे लेख लिखने वालों में से कोई आकर नही कहेगा कि हमसे गलती हो गई। वे एक नई थ्योरी लेकर आ जाएंगे। वैसे यह बात जो मैं अंग्रेजी के राजनीतिक विश्लेषकों व विद्वानों के बारे में कह रहा हूं, उसमें मैं अंग्रेजी अखबारों के उन रिपोर्टरों को शामिल नहीं करता जो ग्राउंड से रिपोर्टिंग करते हैं या जमीन से जुड़े हुए हैं या जो हिंदी बैकग्राउंड के लोग हैं। उनकी समझ इन अंग्रेजी दां लोगों से बिल्कुल अलग होती है। मैं सारे अंग्रेजी पत्रकारों पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूं। मैं एक वर्ग विशेष के बारे में कह रहा हूं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)










