दारुल उलूम देवबंद : अब  सांप्रदायिक दंगों में मरने वालों को शहीद का दर्जा देने का फ़तवा

डॉ. मयंक चतुर्वेदी।

दारुल उलूम देवबंद द्वारा गजवा-ए-हिंद (भारत पर इस्लामी कब्जा)’ करने के संबंध में इसके आए फतवा पर अभी विवाद थमा भी नहीं है कि इसने एक और विवाद पैदा करनेवाला फतवा जारी कर दिया है। इस बार अपने फतवे में इसने साफ कहा है कि ‘सांप्रदायिक दंगों में मारे गए लोगों को भी इस्लामी लोकाचार के अनुसार शहीद का दर्जा मिलेगा ।’ उक्‍त फतवा सोमवार को जारी किया गया है, जिसमें दंगों में या इस्‍लाम को लेकर होनेवाली किसी भी लड़ाई में यदि कोई मारा जाएगा तो उसे शहीद घोषित किया जाएगा। 

आतंकवादियों के मारे जाने पर अतिवादी इन्‍हें देते हैं शहीद का दर्जा

उल्‍लेखनीय है कि अभी भी यह क्रम चल रहा है, जिसमें कि जम्‍मू-कश्‍मीर में आतंकवादियों के मारे जाने पर यहां के कई मुसलमान इन्‍हें ‘शहीद’ करार देते हैं, फिर भी देश के लोकतंत्रात्‍मक शासन में स्‍वाधीनता के बाद से कभी भी किसी संगठन द्वारा ऐसे मामलों में किसी को भी खुलकर समर्थन नहीं दिया गया था और न ही किसी ने अभी तक ‘दारुल उलूम देवबंद’ की तरह सामने आकर ही लिखित में कोई फतवा जारी किया था । लेकिन जो अभी तक नहीं हुआ, वह इस बार ”दारुल उलूम देवबंद” संस्‍था ने कर दिखाया है। जिससे अब साफ हो गया है कि उसे किसी भी शासन-प्र‍शासन का कोई भय नहीं है । इस संगठन से जुड़े लोग भारत में शरियत कानून की भी वकालत करते हैं और इसके भारत पर लागू करने पर जोर देते हैं ।

दारुल उलूम देवबंद पर कानूनी कार्रवाई किए जाने की हो रही मांग

दरअसल, दारुल उलूम देवबंद का यह ताजा फतवा देश में आपसी अराजकता और हिंसा को बढ़ानेवाला दिख रहा है। इस पर एक ओर राष्‍ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एनसीपीआर) ने इसे गंभीरता से लेते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी है तो दूसरी ओर कई प्रबुद्ध लोगों का मत भी सामने आया है, जिसमें सभी ने एक स्‍वर में यह स्‍वीकार किया है कि जल्‍द से जल्‍द इस संस्‍थान पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। योगीआदित्यनाथ की उत्‍तप्रदेश सरकार को धार्मिक, वैचारिक आवरण देकर दंगों को बढ़ावा देने के लिए देवबंद के नेतृत्व की जांच करनी चाहिए!

इस संबंध में एनसीपीआर अध्‍यक्ष प्रियंक कानूनगो का कहना है, ”दारुल उलूम देवबंद बच्चों के लिए एक मदरसा है, इस  संस्था द्वारा किसी भी रूप में हिंसा को महिमामण्डित किए जाने से बच्चों पर ग़लत असर होगा। दारुल उलूम द्वारा सांप्रदायिक दंगों में मरने वालों को शहीद निरूपित करने का फ़तवा जारी करना निश्चित ही एक एजेंडे के तहत किया गया काम है। उत्तर प्रदेश सरकार को कार्यवाही के लिए लिख रहे हैं, जिस राज्य की धरती का उपयोग ऐसे ग़लत कामों के लिए होगा उस राज्य की सरकार को कार्यवाही करनी चाहिये।

गजवा-ए-हिन्द का विवाद खड़ा कर चुका है दारुल उलूम देवबंद

गौरतलब है कि दारुल उलूम देवबंद ने इससे पहले जो विवाद खड़ा किया था,  इसमें कहा गया है कि गजवा-ए-हिन्द में मरने वाले महान बलिदानी होंगे। मुख्तार कंपनी द्वारा प्रकाशित सुन्न अल नसा नाम की किताब के  गजवा-ए-हिन्द को लेकर लिखे गए एक पूरे चैप्टर का हवाला देते हुए यहां हजरत अबू हुरैरा (पैगंबर मोहम्मद साहब के करीबी रहे) से एक हदीस सुनाई गई है। इस हदीस के बारे में बताते हुए कहा गया है कि अल्लाह के पैगंबर ने ‘भारत पर हमला’ करने का वादा किया था। इसमें उन्होंने गजवा ए हिंद पर कहा कि मैं इसमें लडूंगा और अपनी सभी धन संपदा को इसमें कुर्बान कर दूंगा। मर गया तो महान बलिदानी बनूंगा। जिंदा रहा तो गाजी कहलाऊंगा। हजरत मोहम्मद साहब ने इस संबंध में भविष्यवाणी भी की थी। फतवे में किताब को प्रिंट करने वाली कंपनी का भी नाम दिया गया है। देवबंद की मुख्तार कंपनी ने इस किताब को प्रिंट किया है। इस फतवे को एनसीपीआर से गंभीरता से लिया और इसे किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 का उल्लंघन करार दिया।

एनसीपीआर ने इस मामले को भी लिया था अपने संज्ञान में

गजवा-ए-हिन्द मामले में राष्‍ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एनसीपीआर) अध्‍यक्ष प्रियंक कानूनगो का वक्‍तव्‍य भी सामने आ चुका है। मामले में कानूनगो ने स्‍पष्‍ट तौर पर कहा है, ‘दारुल उलुम देवबंद मदरसे में बच्चों को भारत विरोधी शिक्षाएं दे रहा है, जिससे इस्लामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल रहा है। आयोग ने इसे किशोर न्याय अधिनियम की धाराओं में तो उल्लंघन करना माना।  साथ में सीपीसीआर अधिनियम की धारा 13 (1) टीजे के तहत मामले को स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि इस तरह के फतवे की सामग्री से देश के खिलाफ नफरत फैल सकती है।

आयोग ने जिला प्रशासन से दारुल उलुम की बेवसाइट की जांच करने का अनुरोध भी किया और कहा था कि इसके जरिए देश की जनता को गुमराह किया गया है, इसलिए जांच करके इसे तुरंत ब्लॉक किया जाए।  उन्‍होंने जिला प्रशासन को एक्शन नहीं लेने पर जिम्मेदार मानने की भी चेतावनी दी थी।  अब इस पूरे विवाद पर दारुल उलूम देवबंद की तरफ से प्रतिक्रिया का इंतजार है। दूसरी ओर एनसीपीसीआर के कहने के बाद भी फिलहाल इसकी वेबसाइट को अभी बंद नहीं किया गया है और यह ऑनलाइन फतवे पर फतवे जारी कर रही है। इसी में अब आया यह ताजा फतवा फिर से विवाद पैदा कर रहा है।

दारुल उलूम देवबंद का दावा, देश की आजादी में निभाई अहम भूमिका, किंतु सामने हकीकत अलग है !

आपको बतादें कि यह संगठन दावा करता रहा है कि उसने देश की आजादी में मुख्य भूमिका निभाई है। मदरसों के स्थापना का मकसद ही देश की आजादी था।  मदरसों के लोगों ने ही देश को आजाद कराया लेकिन दुख की बात है कि आज मदरसों के ऊपर ही प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे हैं और मदरसे वालों को आतंकवाद से जोड़ने के निंदनीय प्रयास किए जा रहे हैं। इनके इस पक्ष के इतर दूसरा बड़ा सच जो बार-बार सामने आ रहा है, वह इनकी बताई जा रही हकीकत से अलग है। यह आज साफ बता रही है कि अनेक आतंकवादी इस संगठन से ही दीनी तालीम लेकर निकले हैं और उनके पूरे जीवन पर इस संगठन का प्रभाव साफ झलकता है। यहां से कई बार संदिग्ध आतंकी, बांग्लादेशी, रोंहिग्या भी पकड़े गए हैं।

लखनऊ एटीएस ने कोलकाता जेल से जमात उल मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (जेएमबी) से जुड़े आतंकी मुफक्किर उर्फ हमीदुल्ला को रिमांड पर भी लिया था। जांच में सामने आया कि सहारनपुर में कई स्लीपर सेल बनाए गए थे। जेएमबी से जुड़े आठ संदिग्ध आतंकियों में चार सहारनपुर के रहने वाले थे, जिनमें कामिल नामक युवक देवबंद रह रहा था। देवबंद से जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शाहनवाज तेली निवासी कुलगाम (जम्मू-कश्मीर) और आकिब अहमद मलिक निवासी पुलवामा की गिरफ्तारी हुई। इसी तरह से देवबंद से पांच बांग्लादेशियों को पकड़ा, जो यहां लंबे समय यहां रह रहे थे। देबवंद से संदिग्ध इनामुलक को एटीएस ने गिरफ्तार किया। आरोपित के तार आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े मिले थे। आगे इसमें केंद्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) व यूपी एटीएस ने देवबंद में एक मदरसे छात्र को पकड़ा था, जो देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त था।

स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में चलाए अभियान में एनआईए ने देवबंद से रोहिंग्या छात्र को पकड़ा था। देवबंद में किराए के मकान में रह रहे दो संदिग्धों को एटीएस ने पकड़ा था, जिनके देश विरोधी गतिविधियों लिप्त होने के सबूत मिले थे। उत्तर प्रदेश पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने 10 संदिग्ध आतंकवादियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। उनकी पहचान आदिल उर रहमान अशरफी, अबू हुरैरा गाजी, शेख नाजीबुल हक, मोहम्मद राशिद, कफिलुद्दीन, अजीम के रूप में हुई। अब्दुल अव्वल, अबू सालेह, अब्दुल गफ्फार और अब्दुल्ला गाजी पर भारत में मस्जिद बनाने के लिए अवैध रूप से विदेशों से पैसा मांगने, रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को भारत में बसाने और देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने का आरोप है।

जब से दारुल उलूम देवबंद का अस्‍तित्‍व सामने आया, तभी से आतंकवादी यहां से निकल रहे

इस पूरे मामले में भी खास बात यह है कि यूपी एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए ज्यादातर साजिशकर्ता देवबंद के दारुल उलूम से जुड़े पाए गए। इसी तरह से जब से ये संगठन अपने अस्‍तित्‍व में आया है, तब से अब तक इसके निकले कई विद्यार्थी आतंक के रास्‍ते पर चलते हुए पाए गए हैं, जिनका एक ही स्‍वप्‍न अब तक बार-बार सामने आता रहा है गजवा-ए-हिन्द । देवबंद से ही एक मदरसे के छात्र को एक और ‘पुलवामा जैसे आतंकी हमले’ की धमकी देने वाली सोशल मीडिया पोस्ट पर हिरासत में लिया गया। जिस आरोपी को पकड़ लिया गया है और उसकी पहचान मोहम्मद तल्हा मजार के रूप में हुई, उसने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा, “इंशाअल्लाह, जल्द ही दूसरा पुलवामा होगा।” इस तरह कई अन्‍य आतंकवादी भी यहां से समय-समय पर पकड़े गए हैं।

भारत से जिहाद खत्‍म करने के लिए करना होगा ये काम

यहां इस पूरे प्रकरण पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता अश्‍विनी कुमार उपाध्‍याय का कहना है कि देश से यदि ‘जिहाद खत्म करना है तो पुलिस रिफार्म-ज्यूडिशियल रिफार्म करिए, विशेष स्कूल विशेष कानून विशेष दर्जा बंद करिए, समान शिक्षा समान नागरिक संहिता समान जनसंख्या संहिता समान धर्मस्थल संहिता लागू करिए, घुसपैठ घूसखोरी कालाधान हवाला धर्मांतरण और विदेशी चंदा नियंत्रण के लिए कठोर कानून बनाइए।’

शहीद मामले को लेकर आए नए फतवे पर है एफआईआर दर्ज होने का इंतजार

इस पूरे मामले को अन्‍य दूसरे अधिवक्‍ता एवं सहकारिता क्षेत्र में कार्य करनेवाले धर्मवीर सिंह दाहिया का मानना है कि ‘देश में कानून व्यवस्था सही रखना है तो आतंकवाद पर लगाम कसने की जरूरत है। जितने भी ऐसे संगठन हैं जो बिना सरकार की इजाजत से चल रहे हैं, उनको बंद करना वर्तमान की जरूरत है। देश में एक जैसी शिक्षा दी जाय और उसे पारदर्शी तरीके से सभी के समक्ष रखा जाना चाहिए। यह शिक्षा ऐसी हो जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि की भावना जागृत हो सके। तभी जाकर देश भर में फैल रही कलुषता के वातावरण में कमी आएगी। नहीं तो वर्तमान में दारुल उलूम देवबंद की यह शिक्षा भविष्‍य के आगे बढ़ते भारत के लिए खतरनाक साबित होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।’ फिलहाल इस्‍लाम के लिए लड़ते हुए मरनेवाले को शहीद का दर्जा किए जाने पर आए फतवे पर एफआईआर दर्ज होने का इंतजार है।(एएमएपी)

अल्पसंख्यकों से संपर्क साध रही भाजपा, 2024 से पहले सभी समुदायों को साधने की तैयारी

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी अब खुद ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ चाह रही है। इसी कड़ी में रविवार को ईस्टर के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली स्थित ‘Sacred Heart Cathedral’  चर्च पहुंचे। उनके अलावा उनकी पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री वी मुरलीधरन ने केरल में बिशप से मुलाकात की। ईस्टर पर बिशप से भेंट करने वालों में बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष पी.के. कृष्णदास भी शामिल थे।बीजेपी के नेता अब लगातार अल्पसंख्यकों से संपर्क साध रहे हैं। शनिवार को भी बीजेपी के केरल प्रदेश अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने थमारसेरी के आर्कबिशप मार रेमिगियस पॉल इंचानयिल से मुलाकात की थी। एक अन्य वरिष्ठ नेता और बीजेपी के राज्य उपाध्यक्ष एएन राधाकृष्णन ने भी गुड फ्राइडे पर मलयाट्टूर चर्च उत्सव में भाग लिया था। यहां तक कि इस धर्मस्थल तक पहुंचने के लिए राधाकृष्णन मलयाट्टूर पहाड़ी पर भी चढ़ गए थे, लेकिन कथित तौर पर कुछ किलोमीटर के बाद वह रुक गए।

ऐसा नहीं है कि बीजेपी सिर्फ चुनावी राज्य कर्नाटक के पड़ोसी राज्य केरल में ही और सिर्फ ईसाई समुदाय को ही अपने पाले में लाने की कोशिशों में जुटी है। वह धार्मिक अल्पसंख्यकों में सबसे बड़ी आबादी वाले समूह यानी मुस्लिमों पर भी डोरे डाल रही है। बीजेपी पहले ही यूपी में चार मुस्लिमों को एमएलसी बना चुकी है। अब बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ने मुस्लिम वोटरों तक पहुंच बनाने के लिए पूरे देश में सूफी संवाद महा अभियान चलाने का फैसला किया है।

इस अभियान के तहत केंद्रीय मंत्री, राज्य मंत्री, बीजेपी के मुस्लिम नेता ईद के बाद कव्वाली सुनने दरगाह जाएंगे। योजना है कि कव्वाली कार्यक्रम में बीजेपी के नेता मुस्लिमों को यह बात समझाने की कोशिश करेंगे कि पीएम मोदी की सरकार में सभी योजनाओं का लाभ बिना किसी धार्मिक भेदभाव के मुसलमानों को भी दिया जा रहा है। योजना है कि यूपी निकाय चुनाव के बाद सभी शहरों में सूफी संवाद का आयोजन किया जाएगा। बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ने इसके लिए सूफी दरगाहों और उनके खादिमों की सूची मंगवाई है।

बता दें कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मिशन 400 का लक्ष्य रखा है। इसके लिए बीजेपी के नेता सभी समुदायों को साथ लेकर चलने और सभी का वोट पाने की जुगत में भिड़ी है। बीजेपी अल्पसंख्यकों पर लगातार अपना फोकस बढ़ा रही है। पिछले दिनों कर्नाटक के कलाकार शाह रशीद अहमद कादरी को पद्मश्री से सम्मानित किया था। इस अवसर पर कादरी ने कहा था कि उन्हें नहीं लगता था कि बीजेपी की सरकार में कभी उन्हें ऐसा सम्मान मिलेगा। कर्नाटक में अगले महीने 10 मई को चुनाव है।

जाहिर है बीजेपी इसके जरिए ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ के नारे को धरातल पर उतारने की बात साबित करना चाहती है तो दूसरी तरफ वह कर्नाटक चुनाव के साथ-साथ 2024 की लड़ाई में सबका साथ, सबका विश्वास भी पाना चाहती है।(एएमएपी)

जब बंग बंधु ने बांग्लादेश में जगाई थी आजादी की चिंगारी

(07 मार्च पर विशेष)

देश-दुनिया के इतिहास में 07 मार्च की तारीख तमाम अहम वजह से दर्ज है। इस तारीख का संबंध बांग्लादेश में आजादी की चिंगारी भड़काने के रूप में सबसे अहम है। दरअसल ढाका के रेसकोर्स मैदान में बंग बंधु के नाम से मशहूर शेख मुजीब-उर-रहमान ने 07 मार्च 1971 को ऐतिहासिक भाषण दिया था। उन्होंने इसमें पाकिस्तान से आजादी का आह्वान किया था। करीब दस लाख लोग उन्हें सुनने पहुंचे थे। सबके हाथ में बांस के डंडे थे। जो पाकिस्तान की सेना से बचाव के लिए नहीं बल्कि प्रतिरोध का प्रतीक थे।भीड़ का जायजा लेने के लिए पाकिस्तान सेना के हेलिकॉप्टर ऊपर चक्कर लगा रहे थे। रेडियो पाकिस्तान का ढाका स्टेशन भी सरकारी आदेश के खिलाफ जाकर भाषण का पूरे प्रांत में प्रसारण की तैयारी में था। शेख मुजीब के भाषण का एक-एक शब्द पाकिस्तान के खिलाफ ललकार थी। बाद में इस भाषण को भारतीय उपमहाद्वीप में दिए गए सभी राजनीतिक भाषणों में सबसे ऊंची पायदान पर रखा गया। 2017 में यूनेस्को ने शेख मुजीब के इस भाषण को विश्व के दस्तावेजी विरासत के रूप में मान्यता प्रदान की।

दरअसल, इस भाषण के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति याहया खां ढाका पहुंचे। 23 मार्च को जब शेख उनसे मिलने पहुंचे तो उनकी कार में बांग्लादेश का झंडा लगा था। इसके दो दिन बाद 25 मार्च को ऐसा लगा कि पूरे शहर पर पाकिस्तान की सेना ने हमला बोल दिया हो, यह ऑपरेशन सर्चलाइट था। सेना ने शेख मुजीब को गिरफ्तार किया और पाकिस्तान ले गए। इस पर शेख मुजीब की लगाई चिंगारी आग का रूप ले चुकी थी। बांग्लादेश में मुक्ति वाहिनी ने पाकिस्तान की सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। दिसंबर तक ऐसा ही चलता रहा।

क्रांतिकारी, चिंतक और विचारक थे पृथ्वी सिंह आजाद

भारत कुछ महीने तो स्थिति पर नजर रखे रहा, बाद में उसने मुक्ति वाहिनी की मदद करने का फैसला किया। तीन दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोला और 13 दिन में भारत ने उसे घुटनों के बल ला दिया। 16 दिसंबर को पाकिस्तान सेना ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश को आजादी मिली। आज भी भारत में 16 दिसंबर को विजय दिवस के तौर पर मनाया जाता है। शेख मुजीब पाकिस्तान से लंदन के रास्ते दिल्ली आए। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की। इस दौरान इंदिरा गांधी के साथ ही तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि, केंद्रीय मंत्री, सेना के तीनों अंगों के प्रमुख और पश्चिम बंगाल के तत्काल मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर राय दिल्ली के हवाई अड्डे पर मौजूद थे। मुजीब ने सेना के कैंटोनमेंट मैदान पर जनसभा में बांग्लादेश के स्वाधीनता संग्राम में मदद करने के लिए भारत की जनता को धन्यवाद दिया। दिल्ली में दो घंटे रुकने के बाद जब शेख ढाका पहुंचे तो दस लाख लोग उनके स्वागत में ढाका हवाई अड्डे पर मौजूद थे।(एएमएपी)

सीएए : सरकार आईं और गईं, लेकिन मोदी सरकार ने ही ली शरणार्थ‍ियों की सुध

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी।

जिस मिट्टी में पैदा हुए, खेले, खाए बड़े हुए उस स्‍थान और मिट्टी से किसे प्रेम नहीं होता? कौन चाहेगा अपने हाथों से या अपने पूर्वजों के बनाए भवनों को छोड़कर चले जाना ! अपने खेत-खलियानों को छोड़ दूर हमेशा के लिए पलायन कर जाना और अपना सब कुछ, जीवन भर का संपर्क, रुपया, सोना-चांदी, हर वह सुख की वस्‍तु पीछे छोड़ देना, जिसे पीढ़ियों ने अपने अथक पुरुषार्थ से अर्जित किया था ।दरअसल, 1947 भारत विभाजन के बाद नए बने पाकिस्‍तान में जो दृष्‍य उभरा, वह कुछ ऐसा ही था, जहां गैर मुसलमानों के साथ बर्बरता की जा रही थी, लोग जीवन की खातिर पलायन के लिए मजबूर हो उठे । इतिहास के पन्‍नों में दर्ज ऐसी अनेकों कहानियां है, जो आज भी सिसकियां भरने को मजबूर कर देती हैं! आप भरसक प्रयास करें, किंतु अपनी आंखों से पानी गिरने को रोक नहीं सकते । कल तक जो भारतवासी थे, अब उनकी पहचान किसी अन्‍य मुल्‍क के साथ जुड़ चुकी थी। जिस इस्‍लामिक मजहब की सनातन धर्म को माननेवाले हिन्‍दुओं साथ नहीं रहने की जिद के चलते अखण्‍ड भारत दो टुकड़ों में बंटा, वह भी जूठा साबित हुआ । अंग्रेज जा चुके थे, दोनों ओर नई सरकारों का गठन हो चुका था । किंतु गैर मुसलमान अपने आप को फिर से ठगा हुआ पा रहे थे ।

जैसे, खिलाफत आन्‍दोलन को कांग्रेस का समर्थन और उसके बाद इसकी असफलता से उपजे संकट में हिन्‍दुओं का कत्‍लेआम। वामपंथी इतिहासकार और स्‍वाधीन भारत में कांग्रेस द्वारा लिखवाए गए इतिहास में भले ही खिलाफत आन्‍दोलन के असफल हो जाने के बाद मुसलमानों के गुस्‍से का हिन्‍दुओं पर फूटने को एक कृषि विद्रोह  या इसे मजदूरों का विद्रोह कहा जाता रहा हो लेकिन सच, फिर भी छिपा नहीं रह सका । इतिहास में कई पन्‍नों में इस खिलाफत आन्‍दोलन के परिणामों में दर्ज वह हिन्‍दू नरसंहार भी है, जो आज भी सभ्‍य समाज के ऊपर किसी बड़े मानव कलंक से कम नहीं है।

तब महात्‍मा गांधी भी गलत साबित हुए !

महात्‍मा गांधी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस हिन्‍दू-मुस्‍लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए वे जिस खिलाफत आन्‍दोलन का समर्थन कर रहे हैं, उनकी यह सोच यथार्थ में इससे ठीक विपरीत साबित होगी। वे अपनी सोच को लेकर कितने आश्‍वस्‍त थे, वह इससे पता चलता है ; वस्‍तुत: गांधीजी के प्रयोग के तर्क पर संदेह करने वालों में से एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी थे। एक बार वह गांधीजी से भी मिले और उनसे पूछा: “वास्तव में, हमारे भारत में हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, पारसी धर्म और यहूदी धर्म जैसे विभिन्न धर्मों के लोग हैं। तो इन सभी लोगों की एकता की बात करने के बजाय केवल हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करने का क्या औचित्य है?” गांधीजी ने जवाब दिया, “इसके माध्यम से, मेरा विचार यहां के मुसलमानों के मन में इस देश के लिए प्यार पैदा करना है, और क्या आप भारत की आजादी के लिए दूसरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने का तमाशा नहीं देखते हैं?” डॉक्टरजी, जो इस उत्तर से संतुष्ट नहीं थे, फिर बोले, “यह नारा लगने से पहले भी, स्वतंत्रता आंदोलन में लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में बैरिस्टर जिन्ना, अंसारी, हकीम अजमल खान आदि कई मुसलमान सक्रिय थे। और मुझे डर है कि यह नारा मुसलमानों के मन में विभाजनकारी प्रवृत्ति पैदा करेगा।” गांधीजी ने यह कहते हुए अचानक बैठक समाप्त कर दी कि “मुझे ऐसा कोई डर नहीं है।” (डॉ. हेडगेवार चरित, ना. ह. पालकर: पृष्ठ 99)।

 

फिर हुआ ‘महात्‍मा’ को अपने निर्णय पर पछतावा

डॉ. एम.जी.एस. नारायणन, पूर्व अध्यक्ष, आईसीएचआर, नई दिल्ली लिखते हैं, “गांधीजी उस समय ब्रिटिश भारत के संदर्भ में यह मानने के लिए राजनीतिक रूप से निर्दोष थे कि भारत में गरीब और अशिक्षित मुस्लिम समुदाय को आसानी से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सक्रिय राजनीतिक संघर्ष में शामिल किया जा सकता है। मुसलमानों को खुश करने के लिए, उन्होंने मरणासन्न खिलाफत के मामले का समर्थन किया, जिसे अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर तुर्की में ख़त्म कर दिया था। बाद में महात्मा गांधी को खिलाफत को प्रायोजित करने की इस मूर्खता पर पछतावा हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी-नुकसान हो चुका था। मुसलमानों को सामाजिक सुधार और आधुनिक शिक्षा के लिए प्रेरित करने के बजाय, खिलाफत ने उनकी रूढ़िवादी धार्मिक प्रवृत्ति को वैध बना दिया था और बाहरी दुनिया के बारे में उनके डर और संदेह को जगाया था। इसने उनकी सांप्रदायिकता को मजबूत किया, जो अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब के दिनों से निष्क्रिय पड़ी हिंदू काफिरों के खिलाफ नफरत पर आधारित थी।” (चेट्टूर शंकरन नायर की पुस्तक गांधी एंड एनार्की की प्रस्तावना में, पृष्ठ 2)।

संविधान निर्माता डॉ. अम्‍बेडकर ने चेताया था

डॉ. भीमराव अम्बेडकर लिखते हैं, “(खिलाफत) आंदोलन मुसलमानों द्वारा शुरू किया गया था। इसे श्री गांधी ने दृढ़ता और विश्वास के साथ उठाया, जिसने स्वयं कई मुसलमानों को आश्चर्यचकित कर दिया होगा। ऐसे कई लोग थे जिन्होंने खिलाफत आंदोलन के नैतिक आधार पर संदेह किया और श्री गांधी को आंदोलन में भाग लेने से रोकने की कोशिश की, जिसका नैतिक आधार बहुत संदिग्ध था। (पाकिस्तान या भारत का विभाजन, पृष्ठ 146,147)।

वास्‍तव में डॉ. अम्‍बेडकर जिस आन्‍दोलन को नैतिक आधार पर संदिग्‍ध मान रहे हैं, भविष्‍य में वह सच ही निकला। इस आन्‍दोलन का मूल परिणाम यह हुआ कि हजारों हिन्‍दुओं को इस खिलाफत आन्‍दोलन की असफलता के साथ ही मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया गया था। अम्‍बेडकर आगे इस बात को और अधिक स्‍पष्‍ट भी करते हैं, उन्होंने लिखा, ‘बहादुर और अल्‍लाह से डरने वाले मोपला अपने मजहबी सिद्धांतों के अनुसार अपने धर्म के लिए लड़ रहे थे जैसा कि वे उन्हें समझते थे।’ (डॉ. अम्बेडकर, पाकिस्तान या भारत का विभाजन, पृष्ठ 148)।

डॉक्टर आंबेडकर लिखते हैं, “मोपला मुस्लिमों ने मालाबार के हिन्दुओं के साथ जो किया वो विस्मित कर देने वाला है। मोपला के हाथों मालाबार के हिन्दुओं का भयानक अंजाम हुआ। नरसंहार, जबरन धर्मांतरण, मंदिरों को ध्वस्त करना, महिलाओं के साथ अपराध, गर्भवती महिलाओं के पेट फाड़े जाने की घटना, ये सब हुआ। हिन्दुओं के साथ सारी क्रूर और असंयमित बर्बरता हुई। मोपला ने हिन्दुओं के साथ ये सब खुलेआम किया, जब तक वहाँ सेना न पहुँच गई।” बाबासाहब डॉ. भीमराव ने इसे हिन्दू-मुस्लिम दंगा मानने से इनकार करते हुए कहा था कि हिन्दुओं की मौत का कोई आँकड़ा नहीं है, लेकिन ये संख्या बहुत बड़ी है।

इस एक ही घटना से समझे; हिन्‍दू नरसंहार कितना भयंकर था, ऐसी अनेक घटनाएं हुईं

इस समय की एक वीभत्स घटना का यहां जिक्र किया जा सकता है, जोकि 25 सितंबर 1921 को, उत्तरी केरल में थुवूर और करुवायाकांडी के बीच बंजर पहाड़ी पर घटित हुई, जहां खिलाफत नेताओं में से एक चैम्बरसेरी इम्बिची कोइथंगल ने अपने 4,000 से अधिक अनुयायियों के साथ एक रैली निकाली और इस दौरान 40 से अधिक हिंदुओं को पकड़ लिया गया । उनके हाथ पीछे बांध कर उनके पास ले जाया गया, जहां  38 की हत्या कर दी गई। इन 38 में से 3 को गोली मारी गई थी और अन्‍यों के सिर काटकर थुवूर कुएं में फेंक दिया गया था। इन सभी हिन्‍दुओं पर आरोप यह लगाया गया था कि इन्‍होंने मोपला कट्टरपंथी जिहादियों के खिलाफ  सेना की मदद की थी । दीवान बहादुर सी. गोपालन नायर, जोकि कालीकट, मालाबार के डिप्टी कलेक्टर थे, इनके द्वारा लिखित पुस्तक द मोपला रिबेलियन, 1921 में 25 सितंबर के उस घातक दिन का विस्तृत विवरण मौजूद है। पुस्तक के पृष्ठ 56 पर गोपालन ने इस पूरी घटना को विस्‍तार से लिखा है।

अपनी इस पुस्‍तक में सी. गोपालन नायर लिखते हैं, जिन लोगों को इस प्रकार फेंका गया उनमें से कई लोग मरे नहीं थे। लेकिन बचना असंभव था। कुएं से बाहर निकलने के लिए कोई सीढ़ियां नहीं हैं। बताया जाता है कि हत्याकांड के तीसरे दिन भी कुछ लोग कुएं से चिल्ला रहे थे।  वे अवश्य ही एक विशेष रूप से भयानक मौत मरे होंगे। जिस समय यह नरसंहार किया गया, उस समय बरसात का मौसम था और सप्ताह में कुछ पानी रहता था, लेकिन अब सूखा है। और कोई भी आगंतुक इस भयानक दृश्य को देख सकता है। इसका निचला हिस्सा पूरी तरह से मानव हड्डियों से भरा हुआ है। आर्य समाज मिशनरी के पंडित ऋषि राम, जो मेरे पास खड़े थे, उन्होंने 30 खोपड़ियाँ गिनाईं। एक खोपड़ी विशेष उल्लेख की पात्र है। यह  ऐसा कहा जाता है कि यह कुमारा पणिक्कर नाम के एक बूढ़े व्यक्ति की खोपड़ी है, जिसके सिर को आरी से धीरे-धीरे दो हिस्सों में काट दिया गया था। इतनी भयंकर थी इस मोपला विद्रोह की वीभत्‍सता।

विदेशी इतिहासकारों ने भी माना, कितना दुखदायी रहा हिन्‍दुओं के लिए ये समय

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स (यूसीएलए) एवं अन्‍य विश्‍वविद्यालयों में प्रोफेसर रहे इतिहासकार स्टैनले वोलपार्ट ने अपनी पुस्तक ‘जिन्ना ऑफ पाकिस्तान’ (1984) में लिखा है कि ‘खिलाफत के खात्मे पर पूरे भारत में जहां-तहां मुसलमानों ने हिंदुओं पर गुस्सा उतारा, वहां उन्‍होंने हत्या, दुष्कर्म, जबरन धर्मांतरण, अंग-भंग और क्रूर अत्याचार किए।’ आधिकारिक तौर पर, मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा 10,000 से अधिक हिंदुओं की हत्या कर दी गई थी। यह तो तत्‍कालीन ब्रिटिश गवर्नमेंट का आंकड़ा है, किंतु हकीकत में यह संख्‍या बहुत अधिक रही है।

बोल रहा था जिहादियों के सिर चढ़कर गजवा-ए-हिंद का पागलपन

देखा जाए तो ऐसी अनगिनत घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं। मुस्‍लिम लीग का डारेक्‍ट एक्‍शन का आह्वान और उसके बाद हिन्‍दुओं के सामूहिक नरसंहार, धर्मान्‍तरण, महिला अत्‍याचार यहां तक कि इन जिहादियों ने बच्‍चों तक को नहीं बख्‍शा। कई पुस्‍तकें और ढेरों प्रसंग इतिहास में मौजूद हैं। अखण्‍ड भारत में तत्‍कालीन समय के अंग्रेज अत्‍याचार भी इस वीभत्‍सता के सामने गौण हो चुके थे। गजवा-ए-हिंद का पागलपन तत्‍कालीन इस्‍लामवादियों के सिर पर इस तरह चढ़ा था कि जहां भी उनकी बहुसंख्‍यक संख्‍या थी, वहां कहीं भी गैर मुसलमान सुरक्षित नहीं था। नोआखाली में हजारों-हजार हिन्‍दू हत्‍याएं इसका एक सशक्‍त उदाहरण है।

इसी का परिणाम रहा जोकि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 (Indian Independence Act 1947) युनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट द्वारा पारित किया गया। जिसके अनुसार ब्रिटेन शासित भारत को दो भागों (भारत तथा पाकिस्तान) में विभाजन किया गया था। यह अधिनियम 4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में प्रस्‍तुत हुआ और 18 जुलाई 1947 को स्वीकृत हुआ और 15 अगस्त 1947 को भारत दो भागों में बंट गया।

तब विभाजित भारत ने अपने लिए चुना पंथ निरपेक्षता का रास्‍ता

इसमें खास बात यह है कि धर्म के आधार पर बंटवारा अविभाजित भारत में रहनेवाले मुस्‍लिम नेताओं (मुस्‍लिम लीग) ने चाहा था। वह उन्‍हें मिल गया। विभाजन में पाकिस्‍तान मुस्‍लिम राष्‍ट्र बना। किंतु शेष भारत ने फिर भी बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं की संख्‍या होने के बाद भी अपने लिए हिन्‍दू राष्‍ट्र बनना स्‍वीकार्य नहीं किया। भारत ने पंथ निरपेक्षता का रास्‍ता चुना। वह पाकिस्‍तान की तरह एक मजहबी राज्‍य नहीं बना। इसीलिए ही जब भारत विभाजन के समय भारत में हिन्‍दू बस्‍तियों के बीच में रह रहे मुसलमान भविष्‍य का भय सोचकर नए बने पाकिस्‍तान में जा रहे थे, उन्‍हें भारत के बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं ने रोका और कहा कि क्‍या फर्क पड़ता है तुम्‍हारी पूजा पद्धति अलग है। तुम्‍हें कहीं जाने की जरूरत नहीं। यह देश उतना ही तुम्‍हारा है जितना कि हमारा; और इस तरह एक बड़ी संख्‍या मुसलमानों की बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं के बीच रहती रही। वह भी भारत के अन्‍य हिन्‍दुओं की तरह ही यहां के आम नागरिक हैं। किंतु पाकिस्‍तान,अफगानिस्‍तान में ऐसा नहीं हुआ। भारत विभाजन के वक्‍त 44 लाख हिंदू और सिख अपना सब कुछ छोड़कर, लुटपिटकर  भारत में आए थे।

आंकड़े गवाही दे रहे पाकिस्‍तान-बांग्‍लादेश में कितनी घटी हिन्‍दू संख्‍या

इतने पर भी पाकिस्‍तान में जो बड़ी हिन्‍दू और सिख बस्‍तियां थीं, जहां वे बड़ी संख्‍या में रहते थे, वे भी इस्‍लामिक प्रशासन की प्रताड़ना के शिकार बनाए जाते रहे और आज भी बनाए जा रहे हैं । शरिया कानून लागू है। जबरन धर्मांतरण और लड़कियों को उठाकर इस्‍लामवादी ले जाते हैं। विरोध करने पर मौत के घाट उतार दिया जाता है। नहीं तो ईश निंदा, (कुरान-प्रोफेट मोहम्‍मद का अपमान) करने के नाम पर सजा दिलवाने और आजीवन कारावास में रखने का काम किया जाता है।  हिन्‍दू एवं सिख उपासना स्‍थलों पर लगातार आक्रमण, उन्‍हें नष्‍ट किए जाने के प्रयास, यहां तक कि हजारों हजार साल पुरानी सांस्‍कृतिक हिन्‍दू विरासत तक को नष्‍ट कर दिया गया है और यह अभी भी किया जा रहा है।

आंकड़े गवाही दे रहे हैं । तत्‍कालीन समय के अकेले पश्चिमी पाकिस्तान में हिन्‍दुओं की संख्‍या 15 फीसदी थी, वह आज महज 1.6 फीसदी रह गई है। यही हाल बांग्‍लादेश का है । बांग्लादेश की पहली जनगणना में हिंदुओं की आबादी जहां 9,673,048 थी और इस लिहाज से अगले 5 दशकों में यह संख्या बढ़कर 2 करोड़ के पार यानी 20,219,000 तक हो जानी चाहिए थी, लेकिन इनकी संख्या में गिरावट आती चली गई और इनकी संख्या महज 12,730,650 तक सिमट कर रह गई है।

हिन्‍दुओं की मूल एवं पितृभूमि हमेशा से भारत

ऐसे में अपनी संस्‍कृति को बचाने के लिए कई लोग पाकिस्‍तान और बाद में बने बांग्‍लादेश से भाग कर भारत में शरण लेने आते रहे। वे भारत सरकार से गुहार लगाते रहे, पीढ़‍ियां बदल गईं। कई परिवारों में चौथी पीढ़ी आ गई, लेकिन वे अब भी भारत में शरणार्थी थे। वे बार-बार यही कह रहे हैं, उनकी मूल एवं पितृभूमि हमेशा से भारत है। अपनी परम्‍परा और संस्‍कृति की रक्षा के लिए वे मुस्‍लिम नहीं बने, हमें मानवता के लिए संरक्षण दो। भारत का विभाजन उनके पूर्वजों ने नहीं चाहा था। जिन्‍होंने चाहा, उन्‍हें मिला। फिर हमें क्‍यों सजा दी जा रही है। भारत हमें अपने नागरिक के रूप में स्‍वीकार करे।

सीएए का कई राज्‍यों में विरोध, लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम जमात ने किया स्‍वागत

मोदी सरकार ने ही लाखों शरणार्थ‍ियों के दर्द को किया महसूस

वर्षों गुजर गए, सरकार आईं और गईं, किंतु किसी ने उन लाखों शरणार्थ‍ियों के दर्द को महसूस नहीं किया। फिर जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार 2014 में आई, तब जाकर इन सभी शरणार्थ‍ियों की सुध लेना शुरू हुआ। लगातार इस पर कानूनी    रास्‍ता क्‍या निकाला जा सकता है, इसके लिए मंथन आरंभ हुआ,  जिसका परिणाम अब जाकर नागरिकता संशोधन कानून (सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट) यानी कि सीएए के रूप में सामने आया है ।

अच्‍छा है अब 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से धार्मिक आधार पर प्रताड़ित होकर भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता दी जा सकेगी । वे भी भारत के आम नागरिक की तरह अब स्‍वाभिमान के साथ खुली हवा में सांस ले सकेंगे। अब  यह सभी भारत में शरणार्थी नहीं रहेंगे। अवैध नहीं कहलाएंगे।

इन सभी की तिलक, माला, देव पूजा, गंगा, गायत्री, कृपाण, गुरुग्रंथ साहेब पूजा । बौद्ध धर्म की अभ्यास पूजा और अनुष्ठान । जैन धर्म 24 तीर्थंकर पूजा, गृहस्थों के छह आर्यकर्म – इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम और तप। अरहंत भगवान् की पूजा। पारसियों की अग्नि को अत्यन्त पवित्र मानते हुए अहुरा मज़्दा की पूजा और ईसाई गिरिजा घरों में ईशू प्रार्थनाएं पंथ निरपेक्ष भारत से समान रूप से आगे भी गूंजती रहेंगी। जो हिन्‍दू, मुस्‍लिम, सिख, ईसाई एवं अन्‍य मत, पंथ, धर्म को माननेवाले भारत में पूर्व से रह रहे हैं, उनकी नागरिकता के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं है, वह तो सदैव ही भारत वासी हैं ।(एएमएपी)

असम में बारिश और तूफान ने मचाई तबाही, 41000 से ज्यादा लोग प्रभावित

असम के विभिन्न जिलों में पिछले 48 घंटों में आई बारिश, ओलावृष्टि और तेज तूफान से कम से कम दो लोगों की मौत हो गई और 144 गांवों के 41,400 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक, ओलावृष्टि और तूफान के कारण राज्य के कई हिस्सों में पेड़ और बिजली के खंभे उखड़ गए।

असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एएसडीएमए) की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार को जिले में आए भयंकर तूफान के बाद तिनसुकिया जिले के डूमडूमा क्षेत्र में दो लोगों की मौत हो गई। मृतकों की पहचान बिजॉय मानकी (57) और देव कुमार ठाकुर (26) के रूप में हुई है। वहीं हैलाकांडी, तिनसुकिया, नागांव के 144 गांवों के कुल 41410 लोग प्रभावित हुए हैं। इसके अलावा गोलपारा, कछार, धुबरी, बोंगाईगांव भीषण तूफान से प्रभावित हुए हैं।

एएसडीएमए की रिपोर्ट में कहा गया है कि आंधी और बारिश के कारण कई घरों को भी नुकसान पहुंचा है। रिपोर्ट में कहा गया, 633 कच्चे घर और 42 पक्के घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए। 205 कच्चे और तीन पक्के घर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए और पांच अन्य संस्थान भी प्रभावित हुए। रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार को गोलपारा जिले के बंदरमाथा इलाके में बिजली गिरने से पांच गायों की मौत हो गई।

एएसडीएमए की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ओलावृष्टि के कारण धातु की छत की चादरों में छिद्र हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप बोंगाईगांव जिले में डांगताल राजस्व मंडल के अंतर्गत घिलागुरी, डाबली और दिगदारी गांवों में 85 घरों की छत लीक हो गई थी। धुबरी जिले के 24 गांव भी भयंकर तूफान से प्रभावित हुए हैं।

तूफान प्रभावित तिनसुकिया में स्कूल, कॉलेज बंद
तिनसुकिया में आई तेज आंधी और ओलावृष्टि ने तबाही मचाई है। जिसके बाद जिला प्रशासन ने 24 अप्रैल को जिले के सभी स्कूलों और कॉलेजों को बंद करने का आदेश दिया है। तिनसुकिया जिले के उपायुक्त की ओर से जारी एक आदेश में कहा गया है कि शनिवार और रविवार को तेज आंधी और ओलावृष्टि से हुई तबाही को देखते हुए जिले के सभी स्कूल और कॉलेज बंद रखने का फैसला लिया गया।(एएमएपी)

मंगलेश डबराल : समय के आर-पार लड़ने वाला एक जुझारू कवि

आपका अख़बार ब्यूरो ।

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता, हिंदी भाषा के प्रख्यात लेखक और कवि मंगलेश डबराल (Manglesh Dabral) का बुधवार, 9 दिसंबर को कार्डियक अरेस्ट की वजह से निधन हो गया। मंगलेश डबराल के काव्य संग्रह पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज काफी प्रसिद्ध हैं। मंगलेश डबराल को साहित्य जगत में उनके अतुलनीय योगदान के लिए साल 2000 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

 


पत्रकार मिथिलेश कुमार सिंह अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं : “खबर सिर्फ इतनी नहीं है कि 1948 में टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गांव में वह पैदा हुआ था, पढ़ाई- लिखाई देहरादून में हुई, नौकरी उसने देश के मुख्तलिफ शहरों में की, वह कवि पहले था और जिंदगी की जरूरतों ने उसे पत्रकार बाद में बनाया लेकिन पत्रकारिता में भी वही खनक, वही पहाड़ से उतरती किसी मेघाछन्न नदी का वेग…। वह शख्स मर गया। अब नहीं है वह। उसका नाम था मंगलेश डबराल। खबर सिर्फ इतनी नहीं है कि उसे कोरोना ने निगल लिया और राजधानी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उसने जिंदगी से कहा- अब तुमसे रुखसत होता हूं।

खबर यह भी है कि वह एक जुझारू कवि था। समय के आर- पार लड़ने वाला और जीवन के महा महासमरों में भी जिबह होने के बावजूद हर बार उठ खड़ा होने वाला,  जैसे शमशेर की कविता का पुनर्पाठ उनका कोई चश्मे चराग़ कर रहा हो: काल तुझसे होड़ है मेरी… जैसे विजयदेव नारायण साही के ‘मछलीघर’ के फंदे काट रहा हो वह बूढ़ा जिसका तसव्वुर अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने किया था, जैसे रो रहा है कोई बाजबहादुर और उसके साथ समूचा मालवा जारोकतार रो रहा हो कि इस मोहब्बत को उसके अंजाम तक पहुंचाने के लिए हमें और कितने रतजगे करने होंगे, कि कब वह घड़ी आएगी और बोलने लगेंगे पेड़। मंगलेश की कविताएं कुछ वैसी ही हैं। लड़ती- भिड़ती, निजता को सामूहिकता में बदलती और अंतत: अपनी जड़ों (मनुष्यत्व) की ओर लौटती।“


मंगलेश डबराल की 3 कविताएं

 

1- इन सर्दियोँ में

पिछली सर्दियाँ बहुत कठिन थीं

उन्हें याद करने पर मैं सिहरता हूँ इन सर्दियों में भी

हालाँकि इस बार दिन उतने कठोर नहीं

पिछली सर्दियों में चली गई थी मेरी माँ

खो गया था मुझसे एक प्रेमपत्र छूट गई थी एक नौकरी

रातों को पता नहीं कहाँ भटकता रहा

कहाँ कहाँ करता रहा टेलीफ़ोन

पिछली सर्दियों में

मेरी ही चीज़ें गिरती रही थीं मुझ पर

 

इन सर्दियों में

निकालता हूँ पिछली सर्दियों के कपड़े

कंबल टोपी मोज़े मफ़लर

देखता हूँ उन्हें गौर से

सोचता हुआ बीत गया है पिछला समय

ये सर्दियाँ क्यों होगी मेरे लिए पहले जैसी कठोर

 

2- माँ का नमस्कार

जब माँ की काफ़ी उम्र हो गई

तो वह सभी मेहमानों को नमस्कार किया करती

जैसे वह एक बच्ची हो और बाक़ी लोग उससे बड़े।

 

वह हरेक से कहती — बैठो कुछ खाओ।

ज़्यादातर लोग उसका दिल रखने के लिए

खाने की कोई चीज़ लेकर उसके पास कुछ देर बैठ जाते

माँ खुश होकर उनकी तरफ़ देखती

और जाते हुए भी उन्हें नमस्कार करती

हालाँकि वह उम्र में सभी लोगों से बड़ी थी।

 

वह धरती को भी नमस्कार करती कभी अकेले में भी

आख़िर में जब मृत्यु आई तो

उसने उसे भी नमस्कार किया होगा

और अपना जीवन उसे देते हुए कहा होगा —

बैठो कुछ खाओ।

 

3- मेरा दिल

एक दिन जब मुझे यक़ीन हो गया

कि मेरा दिल ही सारी मुसीबतों की जड़ है

इस हद तक कि अब वह ख़ुद एक मुसीबत बना हुआ है

मैं उसे डॉक्टर के पास ले गया

और लाचारी के साथ बोला — डॉक्टर ! यह मेरा दिल है

लेकिन यह वह दिल नहीं है

जिस पर मुझको कभी नाज़ था।

 

डॉक्टर भी कम अनुभवी नहीं था

इतने दिलों को दुरुस्त कर चुका था

कि ख़ुद दिल के पेशेवर मरीज़ से कम नहीं लगता था

उसने कहा तुमने ज़रूर मिर्ज़ा ग़ालिब को ग़ौर से पढ़ा है

मैं जानता हूँ यह एक पुराना दिल है

पहले यह पारदर्शी था, लेकिन धीरे-धीरे अपारदर्शी होता गया

और अब उसमें कुछ भी दिखना बन्द हो गया है

वह भावनाएँ सोखता रहता है और कुछ प्रकट नहीं करता

जैसे एक काला विवर सारी रोशनी सोख लेता हो

लेकिन तुम अपनी हिस्ट्री बताओ ।

मैंने कहा — जी हाँ, आप शायद सही कहते हैं

मुझे अक्सर लगता है, मेरा दिल जैसे अपनी जगह पर नहीं है

और यह पता लगाना मुश्किल है कि वह कहाँ है

कभी लगता है, वह मेरे पेट में या हाथों में चला गया है

अक्सर यही भ्रम होता है कि वह मेरे पैरों में रह रहा है

बल्कि मेरे पैर नहीं यह मेरा दिल ही है

जो इस मुश्किल दुनिया को पार करता आ रहा है ।

 

डॉक्टर अपना पेशा छोड़कर दार्शनिक बन गया

हाँ-हाँ — उसने कहा — मुझे देखते ही पता चल गया था

कि तुम्हारे जैसे दिलों का कोई इलाज नहीं है

बस, थोड़ी-बहुत मरम्मत हो सकती है, कुछ रफू वगैरह

ऐसे दिल तभी ठीक हो पाते हैं

जब कोई दूसरा दिल भी उनसे अपनी बात कहता हो

और तुम्हें पता होगा, यह ज़माना कैसा है

इन दिनों कोई किसी से अपने दिल की बात नहीं कहता

सब उसे छिपाते रहते हैं

इतने सारे लोग लेकिन कहीं कोई रूह नहीं

इसीलिए तुम्हारा दिल भी अपनी जगह छोड़कर

इधर-उधर भागता रहता है, कभी हाथ में, कभी पैर में ।

 

2021 कर्क राशि : नया वाहन- मकान, वेतन वृद्धि व पदोन्नति का योग

समीर उपाध्याय, ज्योतिर्विद

(ही, हु, हे, हो, डा, डी, ड, डे, डो)

पारिवारिक जीवन सामान्य रूप से व्यतीत होगा। सभी एक दूसरे का सहयोग करेंगे। यही नहीं जनवरी से अप्रैल महीने में आपका अपने जीवन साथी के साथ मनमुटाव हो सकता है। परिवार में छोटे भाई-बहन और मित्रों के साथ आपके संबंध पहले से अधिक बेहतर होंगे। इस साल में कोई नया वाहन ले सकते हैं। बच्चों के पढ़ाई के ऊपर अधिक धन व्यय करना पड़ सकता है। यदि आपके बच्चे नौकरी कर रहे हैं तो उनका ट्रांसफर, विभाग या स्थान परिवर्तन हो सकता है। साल के अंत तक जमीन जायदाद को लेकर कोई विवाद हो सकता है या लोन लेकर कोई मकान लेंगे- दोनों संभावित हैं। अब निर्भर करता है कि इस समय आपकी कुंडली की दशा अंतर्दशा क्या बोल रही है। घर में कोई मांगलिक कार्य हो सकता है। प्रेम और वैवाहिक जीवन में मिठास बढ़ेगी। आपको जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा। धार्मिक स्थलों की यात्रा भी संभावित है। नौकरी में किसी न किसी बात को लेकर आप परेशान रहेंगे। किन्तु यह सब जून महीने तक रहेगा। फिर धीरे धीरे सब ठीक होने लगेगा। वास्तव में यह आपके धैर्य की परीक्षा का समय है। प्रतियोगिता परीक्षा या साक्षात्कार के माध्यम से नौकरी का योग बन रहा है, प्रतिदिन पीपल में जल तथा शनिवार के दिन हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। ऐसा करने से अवश्य ही रुके हुए कार्य पूरे हो जाएंगे। कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार के विवाद से बचें तथा संयम से काम लें। अपने अधिकारियों से तालमेल बनाकर रखें। आपके मेहनत का फल वेतन वृद्धि ,पदोन्नति  के रूप में मिल सकता है। आपका ट्रांसफर भी हो सकता है। कार्यवश लम्बी यात्रा भी संभव है।

2021 में भारी विदेशी निवेश, मजबूत अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर होगा देश

क्या करें क्या न करें

  1. प्रतिदिन शिव-पार्वती की पूजा करें तथा ‘ॐ नम: शिवाय’ मन्त्र का जप करें।
  2. हनुमान जी का ध्यान करें तथा हनुमान चालीसा का पाठ करें। साथ ही हनुमानजी का सिंदूरी टीका प्रतिदिन लगाएं।
  3. यदि स्वास्थ्य को लेकर परेशान हैं तो विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। साथ ही वृहस्पतिवार का व्रत भी करे तो आपका कल्याण होगा।
  4. घर में कोई प्रॉपर्टी को लेकर विवाद हो सकता है आप उसका समाधान शांति से तथा कोर्ट कचहरी के बाहर ही करे तो अच्छा रहेगा नहीं तो उलझ कर रह जाएंगे।
  5. यदि चन्द्रमा कमजोर है तो सोमवार का व्रत करने से शुभ परिणाम मिलेगा और यदि ज्यादा परेशानी अनुभव कर रहे है तो रुद्राभिषेक भी करा सकते है।

(राशिफल चंद्र राशि के अनुसार)


2021 मेष राशि : मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि, आय के स्रोत बढ़ेंगे

2021 वृष राशि : आर्थिक स्थिति बेहतर होगी, कुछ नया करने की सोचें

2021 मिथुन राशि : नए कार्यों की योजनाएं बनेंगी और सफल होंगे

2021 कर्क राशि : नया वाहन- मकान, वेतन वृद्धि व पदोन्नति का योग

2021 सिंह राशि : ऐसी खुशी मिलने की संभावना जिसका इंतजार कर रहे हैं

सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों पर अमल रोका, समिति बनाई 

अनूप भटनागर।

किसानों के आन्दोलन से उत्पन्न स्थिति के मद्देनजर उच्चतम न्यायालय ने आज तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों के अमल पर अगले आदेश तक के लिये रोक लगाने के साथ ही किसानों की शंकाओं और शिकायतों पर विचार के लिये एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दी।


 

न्यायालय ने इन कानूनों के संदर्भ में किसानों की शंकाओं और शिकायतों पर विचार के लिये समिति गठित की है। इस समिति में भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिन्दर सिंह मान और शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घंवत, डा. प्रमोद जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी को शामिल किया गया है।

खालिस्तानी तत्वों की पैठ

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ को केन्द्र सरकार ने सूचित किया कि दिल्ली की सीमा पर आन्दोलनरत किसानों के बीच खालिस्तानी तत्वों ने पैठ बना ली है। पीठ ने जब अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल से कहा कि क्या वह इसकी पुष्टि करते हैं तो देश के इस सर्वोच्च विधि अधिकारी ने कहा, हां ऐसी सूचनाएं मिली हैं।

SC Stays Implementation of 3 Controversial Farm Laws; Forms 4 Member Committee

न्यायालय ने अटार्नी जनरल से कहा कि वह इस बारे में कल तक हलफनामा दाखिल करें। अटार्नी जनरल ने कहा कि वह ऐसा करेंगे।

केन्द्र की ओर से सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि उसके नये आवेदन में इस तथ्य का उल्लेख है। इसके बाद, पीठ ने कोर्ट मास्टर से वह आवेदन मांगा जिसमें केन्द्र ने इस तरह के आरोप लगाये थे।

किसान अधिवक्ता अनुपस्थित

वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के दौरान कुछ किसान संगठनों की ओर से कल पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे, कॉलिन गोन्साल्विज और एच एस फूलका की आज अनुपस्थिति का न्यायालय ने भी संज्ञान लिया।

Dushyant Dave is used to getting urgent hearings by the SC, but objects when Arnab Goswami gets it

कुछ किसान संगठनों द्वारा इस समिति के समक्ष नहीं जाने का जिक्र किये जाने पर पीठ ने कहा कि कृषि कानूनों को लेकर उत्पन्न समस्या का जो वास्तव में समाधान चाहते हैं वे समिति के पास जायेंगे।

पीठ ने न्यायपालिका और राजनीति में अंतर को इंगित करते हुए किसानों से कहा कि वे समिति के साथ सहयोग करें क्योंकि यह राजनीति नहीं है।

दुष्प्रचार से किसानों में आशंका

सरकार की ओर से दलील दी गयी कि इन कानूनों को लेकर किये जा रहे दुष्प्रचार की वजह से किसानों में यह आशंका व्याप्त हो रही है कि उनकी जमीन ले ली जायेगी जबकि ऐसा नहीं है।

Why are thousands of Indian farmers protesting? | Agriculture News | Al Jazeera

इस बीच, न्यायालय ने दिल्ली पुलिस के उस आवेदन पर भी नोटिस जारी किया  जिसमे कहा गया है कि सुरक्षा एजेन्सियों के अनुसार गणतंत्र दिवस के अवसर पर आन्दोलनरत किसान ट्रैक्टर मार्च निकालकर इस आयोजन में व्यवधान डालने की योजना बना रहे हैं।

सभी किसान विरोध में नहीं

सुनवाई के दौरान न्यायालय में दलील दी गयी कि देश के सभी किसान इन कानूनों का विरोध नहीं कर रहे हैं। किसानों के एक कंसोर्टियम की ओर से कहा गया कि वह करोड़ों किसानों का प्रतिनिधित्व करती है और इन कानूनों पर रोक लगाने से फल जैसी उपज की पैदावार करने वाले किसान प्रभावित होंगे।

किसान महापंचायत ने किसानों की समस्याओं और शंकाओं पर विचार के लिये समिति गठित करने के साथ ही इन कानूनों के अमल पर रोक लगाने के प्रस्ताव का भी समर्थन किया।

पहले ही दे दिए थे संकेत

न्यायालय ने कल ही स्पष्ट कर दिया था कि इन कानूनों को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे किसानों के संगठनों और केन्द्र सरकार के बीच व्याप्त गतिरोध खत्म करने के लिये वह एक समिति गठित करेगा।

हालांकि, अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने दलील दी कि किसी भी कानून पर उस समय तक रोक नहीं लगाई जा सकती जब तक न्यायालय यह नहीं महसूस करे कि इससे मौलिक अधिकारों या संविधान की योजना का हनन हो रहा है।

Farmers Protest in Delhi LIVE Updates: Farmers Reject Govt's Conditions for Talks; PM Targets Oppn

केंद्र के रवैये से कोर्ट दुखी

यही नहीं, इस मामले में सरकार के रवैये और किसानों के विरोध प्रदर्शन से निबटने के तरीके पर न्यायालय ने सोमवार को केन्द्र को आड़े हाथ लिया था ओर कहा था कि वह किसानों के साथ उसके बातचीत के तरीके से वह ‘बहुत निराश’ है। पीठ ने कहा था, ‘‘हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि केन्द्र इस समस्या और किसान आन्दोलन को नहीं सुलझा पाया।’’

किसानों के आन्दोलन की वजह बने तीन नये कानूनों में  कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार, कानून, 2020, कृषक उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) कानून, 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून शामिल हैं।

आन्दोलनरत किसान इन कानूनों की वापसी की मांग पर अड़े हुए हैं जबकि सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया है। सरकार ने इन किसान संगठनों से यह भी कहा था कि अगर वे चाहें तो उच्चतम न्यायालय जा सकते हैं। लेकिन इन किसान संगठनों का कहना है कि वे न्यायालय नहीं जायेंगे और न ही उसकी समिति के सामने अपना पक्ष रखेंगे।


बंगाल में आक्रामक हुई भाजपा तो बचाव की मुद्रा में आईं ममता

सेल्फ गोल करने में भाई ने तो पीएच.डी. कर ही रखी थी, अब बहन भी…


apka akhbar-ajayvidyutअजय विद्युत।

बापू की पुण्यतिथि पर शनिवार, 30 जनवरी 2021 को ट्वीट करते हुए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी कहती हैं- ‘गांधीजी ने कहा था जनता की राय की अवहेलना करने वाला शासक क्रूर होता है व कोई भी अन्यायपूर्ण कानून अपने आप में हिंसा का एक रूप है। गांधीजी की हत्या उनके विचारों की हत्या के उद्देश्य से भी की गई थी। लेकिन गांधी जी का सत्याग्रह आज पूरे भारत की ताकत है व हमारा दायित्व भी।’


 

प्रियंका गांधी जाहिर है कि दिल्ली में किसानों के नाम पर दंगाइयों के गणतंत्र दिवस पर देश को दुनिया के सामने शर्मसार करने वाले अराजकतापूर्ण आचरण को सत्याग्रह बता रही हैं। अगर निशाना मोदी हो तो कांग्रेस का ऐसा आचरण निश्चित ही उसकी रणनीति का हिस्सा है। इसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में लिया जाना चाहिए। वैसे भी कांग्रेस की ये ‘गांधियन फैमिली’ महात्मा गांधी पर अपना कापीराइट मानती रही है और हर साल 30 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि पर नरेंद्र मोदी, भाजपा, या संघ और उसके संगठनों के बहाने हिंदू राष्ट्रवाद पर कुछ टिप्पणी करना उसकी आदत का हिस्सा रहा है। चौंकने की बात यह कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से तो लोग कैसे भी बयान या आचरण की अपेक्षा कर सकते हैं, लेकिन उनकी बहन कम से कम कांग्रेसियों के बीच एक पढ़ी लिखी और समझदार छवि के लिए जानी जाती हैं।

 Why do some people hate Indira Gandhi? - Quora

प्रियंका गांधी को तो मालूम ही होगा कि गांधी जी की जितनी बातें उन्होंने उद्घृत की हैं वे उनके ही परिवार पर ज्यादा सटीक बैठती हैं। जैसे ‘जनता की राय की अवहेलना करने वाला शासक क्रूर होता है व कोई भी अन्यायपूर्ण कानून अपने आप में हिंसा का एक रूप है।’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण उनकी दादी पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी रही हैं जिन्होंने अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरे देश को आपातकाल के नर्क में झोंक दिया था। और कितने जुल्म किए थे कोई हिसाब है?

राजीव गांधी ने दुश्मन की तरह व्यवहार किया -महेंद्र सिंह टिकैत

Rajiv Gandhi govt had lathi-charged to end 'farmers' protest in 1988

प्रियंका को ‘क्रूर शासक’ के तौर पर तीस साल पहले अपने पिता स्व. राजीव गांधी का उन असली किसानों के प्रति अपनाया गया भीषण अमानवीय रवैया भी देखना चाहिए जो न तो दिल्ली की सड़कों पर दंगे कर रहे थे, न खालिस्तानियों का समर्थन। साल 1988 का अक्टूबर महीना।  भारतीय किसान यूनियम (बीकेयू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के पिता (स्व.) महेंद्र सिंह टिकैत बीकेयू अध्यक्ष थे और (स्व.) राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री। महेंद्र सिंह टिकैत के आह्वान पर लगभग पांच लाख किसानों ने अपने अधिकारों के लिए दिल्ली में बोट क्लब और उसके पास के लॉन में सात दिनों तक डेरा डाले रखा। उसे दबाने के लिए राजीव गांधी सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था।

सबसे पहले प्रदर्शनकारी किसानों के लिए पानी की सप्लाई बंद की। फिर खाने की सप्लाई को रोक दिया गया। लेकिन यह सब होने पर भी किसान डटे रहे तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया। शांतिपूर्ण प्रदर्शन में पुलिस द्वारा गोलियां चलाने के बाद भी प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे थे। राजेंद्र सिंह और भूप सिंह नाम के दो किसानों की मौत हो गई थी।

उस समय महेंद्र सिंह टिकैत ने कहा था कि ‘प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दुश्मन की तरह व्यवहार किया है। किसानों की नाराजगी उन्हें महंगी पड़ेगी।’

30 साल पहले महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्‍ली में फूंका था बिगुल, अब बेटा करने जा रहा किसान आंदोलन - Mahendra Singh Tikait founder of Bhartiya Kisan Union son naresh leading another
महेंद्र सिंह टिकैत

टिकैत द्वारा रखी गई सभी 35 मांगों पर सरकार की सहमति के बाद विरोध-प्रदर्शन समाप्त हो गया था। मांगों से सहमति जताना एक बात है और जमीनी स्तर पर उन्हें पूरा करना दूसरी बात।  क्या किसानों की मांगें पूरी की गयीं ? यह अपने आप में ऐसा सवाल है जिसका जवाब कांग्रेस को ही देना है। अगर मांगें पूरी की गई होतीं तो आज किसानों की यह दुर्दशा न होती। बहरहाल, किसानों की बात करने से पहले कांग्रेस को अपने गिरेबान में एक बार झांकना तो बनता है!

बापू कुछ समय और जी जाते तो कहां होती कांग्रेस

कांग्रेस के ये गांधी (परिवार) अपनी आवरण सज्जा के लिए बार-बार गांधीजी का नाम लेते रहते हैं। उधर यह भी एक ज्ञात तथ्य है कि गांधीजी भविष्य में कांग्रेस को भंग करने की राय रखते थे।

Why Nehru chose to ignore Gandhi

झारखंड विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा. संतोष कुमार तिवारी बताते हैं कि अपनी हत्या से एक दिन पहले यानी 29 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी ने अपने साप्ताहिक पत्र ‘हरिजन’ के लिए एक लेख लिखा था। यह लेख उनकी मृत्यु के बाद 15 फरवरी 1948 के ‘हरिजन’ (अंग्रेजी) में छपा। ‘हिज लास्ट विश एंड टेस्टामेंट’ (उनका अंतिम इच्छापत्र और वसीयत) शीर्षक इस लेख में गांधीजी ने सुझाव दिया था कि कांग्रेस संगठन को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। इसके स्थान पर ‘लोक सेवक संघ’ बनाया जाना चाहिए। नए संगठन के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए गांधी जी ने कहा कि लोक सेवक संघ का कोई भी सदस्य मदिरापान नहीं करेगा, यदि वह हिंदू है तो छुआछूत को नहीं मानेगा, आदि। गांधी जी ने यह भी लिखा कि नए लोक सेवक संघ से इन संगठनों को जोड़ा जाए : 1- आल इंडिया स्पिनर्स एसोसिएशन, 2- आल इंडिया विलेज इंडस्ट्रीज एसोसिएशन, 3- हिंदुस्तानी तालीमी संघ, 4- हरिजन सेवक संघ, और 5- गोसेवा संघ।

अपने लेख में गांधीजी ने इस बात का भी उल्लेख किया कि लोक सेवक संघ के लिए धन कहां से जुटाया जाएगा। कहने का मतलब यह है कि यदि गांधीजी कुछ दिन और जीवित रहते तो कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व समाप्त हो चुका होता।

एक झटके में सरकारी दस्तावेजों से ‘हलाल’ गायब

बेल्जियम के साथ मजबूत होंगे भारत के रिश्ते

यूरोपीय संघ से बढ़ेगा तकनीकी सहयोग।

यूरोपीय संघ के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ाने की दिशा में भारत काम कर रहा है। बेल्जियम दौरे पर पर पहुंचे भारतीय विदेश, सूचना प्रौद्योगिकी और वाणिज्य मंत्रियों ने बेल्जियम के प्रधानमंत्री के साथ विचार-विमर्श में दोनों देशों के बीच रिश्ते मजबूत करने की बात कही है।

 

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री राजीव चंद्रशेखर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल बेल्जियम के दौरे पर हैं। तीनों मंत्रियों ने बेल्जियम के प्रधानमंत्री एलेक्जेंडर डे क्रू से मुलाकात की और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा की। दोनों देशों में आपसी संबंधों में विस्तार करने और नए क्षेत्रों में काम करने पर सहमति जताई गई। तीनों भारतीय मंत्री ब्रसेल्स में आयोजित हो रही भारत-यूरोपीय संघ की ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल की पहली बैठक में शामिल होंगे।

तीनों भारतीय मंत्रियों ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन से भी मुलाकात की। इस बैठक के दौरान भारत और यूरोपीय संघ के बीच बने कार्यदायी समूहों के कामकाज पर चर्चा होगी। भारत और यूरोपीय संघ रणनीतिक तौर पर अहम तकनीक, डिजिटल प्रशासन और डिजिटल कनेक्टिविटी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाएंगे। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमी कंडक्टर और साइबर सिक्योरिटी जैसी अहम तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर होगा। इसके अलावा हरित ऊर्जा और अक्षय ऊर्जा तकनीक के क्षेत्र में सहयोग पर जोर होगा। भारत व यूरोपीय संघ निवेश व व्यापार के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाएंगे।(एएमएपी)