एसीओ समिट में बोले पुतिन, वैगनर विद्रोह के खिलाफ रूसी समाज ने दिखाई एकजुटता

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि रूसी समाज ने सशस्त्र विद्रोह की कोशिशों के खिलाफ एकजुटता दिखाई है और लोगों ने देश की सुरक्षा को लेकर अपनी जवाबदेही का प्रदर्शन किया है। रूसी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में रूस में प्राइवेट आर्मी ‘वैग्नर ग्रुप’ ने मास्को के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। हालांकि, यह बगावत कुछ ही समय तक टिक सकी। इस घटना के बाद किसी बहुपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पुतिन की यह पहली उपस्थिति थी।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के प्रमुखों की परिषद की 23वीं बैठक को डिजिटल माध्यम से संबोधित करते हुए पुतिन ने यूक्रेन संघर्ष के बारे में कहा कि ‘बाहरी ताकतें’ हमारी सीमाओं के पास परियोजनाएं चला रही हैं ताकि रूस की सुरक्षा को खतरे में डाला जा सके। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि पिछले आठ वर्षो से हथियारों की खेप भेजी जा रही है, डोनबास में शांतिप्रिय लोगों के खिलाफ आक्रामकता हो रही है जो ‘नवनाजीवाद’ की तरह है।

पुतिन के नेतृत्व पर उठे सवाल

उन्होंने कहा, ‘रूसी लोग पहले से अधिक एकजुट हैं। देश की खातिर एकजुटता और उच्च जिम्मेदारी का साफ तौर पर प्रदर्शन किया गया और सशस्त्र विद्रोह के खिलाफ पूरे समाज ने एकजुटता दिखाई।’ हाल ही में वैग्नर ग्रुप के प्रमुख येवगेनी प्रिगोझिन और उनके लड़ाकों ने रूस के खिलाफ विद्रोह करते हुए मॉस्को की तरफ कूच किया था। हालांकि, उन्होंने अचानक क्रेमलिन के साथ समझौते के बाद निर्वासन में जाने और पीछे हटने की घोषणा कर दी थी। इसके बाद दो दशकों से अधिक समय से सत्तारूढ़ पुतिन के नेतृत्व पर भी सवाल उठे थे।

एससीओ देशों का दिया धन्यवाद

एससीओ की बैठक में पुतिन ने कहा, ‘इस अवसर पर मैं एससीओ के अपने सहयोगी देशों के सदस्यों को संवैधानिक व्यवस्था, जानमाल और नागरिकों की सुरक्षा करने में रूसी नेतृत्व का समर्थन करने के लिए धन्यवाद देता हूं।’ उन्होंने कहा कि सभी एससीओ सदस्य देशों के साथ निर्यात लेनदेन में रूस की राष्ट्रीय मुद्रा की हिस्सेदारी वर्ष 2022 में 40 प्रतिशत से अधिक रही। रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि एससीओ ‘सही अर्थो में न्यायपूर्ण’ और ‘बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था’ सृजित करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।(एएमएपी)

राजस्थान कांग्रेस की नई टीम का ऐलान, गहलोत का दबदबा, पायलट हुए निराश

राजस्थान कांग्रेस में मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच सुलह होने के बाद नई टीम का ऐलान कर दिया है। नई टीम में गहलोत समर्थकों को दबदबा है। जबकि पायलट समर्थकों को कम जगह मिली है। बता दें 2020 में सचिन पायलट की बगावत के बाद प्रदेश कांग्रेस कमेटी भंग कर दी गई। तीन साल से लंबे अंतराल के बाद चुनाव से ठीक तीन महीने पहले कांग्रेस आलाकमान ने नई टीम का ऐलान किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि सियासी खींचतान की वजह पायलट समर्थकों को जगह नहीं मिली है। हालांकि, कुछ पायलट समर्थक बनाने में सफल रहे है।पायलट समर्थक सोलंकी को दिखाया बाहर का रास्ता
नई टीम में सचिन पायलट समर्थक माने जाने वाले विधायक वेदप्रकाश सोलंकी को जगह नहीं मिली है। जबकि डोटासरा की पुरानी टीम में सोलंकी महासचिव थे। सोलंकी की साथ ही पायलट समर्थक महेंद्र खेड़ी को भी सचिव पद से हटा दिया गया है। वहीं पायलट समर्थक ललित यादव और निंबाराम गरासिया को भी ड्राप कर दिया गया है।  पूर्व सचिव राजेंद्र यादव और रवि पटेल को भी हटा दिया गया है। जबकि एक व्यक्ति एक पद के चलते मंत्री महेंद्र सिंह मालवीया, रामलाल जाट और गोविंद मेघवाल को उपाध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। इसी प्रकार विधायक लाखन सिंह मीना और पूर्व मंत्री मांगीलाल गरासिया को जगह नहीं मिली है। हालांकि, नई टीम में पायलट समर्थक इंद्राज गुर्जर को प्रमोट कर महासचिव बनाया गया है।

गहलोत-डोटासरा के समर्थकों का दबदबा

प्रदेश कांग्रेस कमेटी की नई टीम में सीएम अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा के समर्थकों का दबदबा है। सुलह के बाद ऐसा माना जा रहा था कि पायलट समर्थकों को पर्याप्त जगह मिलेगी। बता दें, सचिन पायलट ने अजमेर से जयपुर के लिए जन संघर्ष यात्रा निकाली थी। उस दौरान उनके साथ बड़ी संख्या में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारी मौजूद रहे थे। हालांकि, उनमें से ज्यादातर पदाधिकारियों को नई टीम में जगह नहीं मिली है। कांग्रेस ने नई कार्यकारिणी का विस्तार करते हुए 48 महासचिव, 21 उपाध्यक्ष, 121 सचिव बनाए हैं। 25 जिलाध्यक्ष नियुक्त किए हैं। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने प्रदेश कार्यकारिणी के पदों पर नियुक्ति के आदेश जारी कर दिए हैं। जून में 85 सचिवों की नियुक्ति रोकने के बाद अब फिर से पुराने नामों को बरकरार रखते हुए 121 सचिवों की लिस्ट जारी की है।

अभी एक और लिस्ट आएगी

नई नियुक्तियों से साफ है कि कांग्रेस में प्रदेश कार्यकारिणी में और भी नियुक्तियां होनी हैं। मौजूदा प्रदेश कार्यकारिणी में केवल 39 पदाधिकारी ही थे। सचिन पायलट खेमे की बगावत के वक्त से ही जिलाध्यक्षों के पद खाली चल रहे थे। बीच में 12 जिलाध्यक्ष पहले बनाए गए थे। जिनमें पायलट समर्थकों को जगह मिली थी। पायलट समर्थकों का कहना है कि नई लिस्टी में पायलट को तवज्जो मिलेगी। बता दें लिस्ट जारी होने से पहले सचिन पायलट ने हाल ही में दिल्ली स्थित पंजाब भवन में प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा से मुलाकात की थी। माना जा रहा था कि संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर ही दोनों नेताओं के बीच चर्चा हुई। (एएमएपी)

भारत में 5जी स्मार्टफोन अभी बेकार, क्यों यूजर्स को होगा भारी नुकसान

आपका अख़बार ब्यूरो।
अगर सब ठीक ठाक होता तो इस महीने से 5जी सेवाएं चालू हो गई होतीं। लाखों लोग 5जी  के लिए पालक पांवड़े बिछाकर इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने बड़ी ठसक के साथ 5जी फोन खरीद भी लिया था। अब उनकी ये ठसक कसक बनने वाली है। उनके ये फोन काफी समय तक 4जी नेटवर्क पर ही रहेंगे। 91mobiles.com की खबर के अनुसार दूरसंचार कंपनियां समय पर 5जी ट्रायल्स पूरा करने में विफल साबित हुई है। हाई स्पीड 5जी इंटरनेट के चक्कर में लोग 5जी स्मार्टफोन खरीद चुके हैं। लेकिन अब आने वाले साल 2022 में भी भारत में 5जी ना चलने के आसार नज़र आ रहे हैं।


यूजर्स को बड़ा झटका

5जी नाम के साथ इस साल की शुरूआत हुई थी। 91mobiles.com की खबर में कहा गया है कि 2021 अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका और 5जी शब्द अभी भी इंडियन स्मार्टफोन मार्केट तथा टेलीकॉम इंडस्ट्री में हॉट टॉपिक बना हुआ है। आम जनता में इंतजार और उत्साह दोनों है कि कब उन्हें 5जी नेटवर्क यूज़ करने को मिलेगा और वह हाई स्पीड 5जी इंटरनेट का मजा उठा पाएंगे। इस चाव के चलते अनेंको लोग 5जी स्मार्टफोन खरीद भी चुके हैं। लेकिन ऐसे यूजर्स को बड़ा झटका लगा है क्योंकि 5जी चलाने के लिए खरीदे गए ये मोबाइल फोन अभी तो पूरी तरह से बेकार है ही वहीं अब आने वाले साल 2022 में भी भारत में 5जी ना चलने के आसार नज़र आ रहे हैं।

मोहलत मांगी

इंडिया में 5जी आने में देरी होगी यह बात लगभग तय नज़र आ रही है। देश में 5जी ट्रॉयल्स अभी पूरी तरह से सफल नहीं हुए हैं और टेलीकॉम कंपनियों ने भारत सरकार से 5जी ट्रायल्स पूरे करने के लिए एक साल की और मोहलत मांगी है। इन कंपनियों में रिलायंस जिओ, भारती  एयरटेल और वोडाफोन-आईडिया तीनों शामिल है। यानी जब तक ये ट्रायल और टेस्टिंग पूरी तरह से संपन्न नहीं हो जाते तब तक आम जनता को 5जी यूज़ करने के लिए नहीं दिया जा सकता है। यह कहना कुछ गलत नहीं होगा कि जब तक देश में 5जी नेटवर्क चालू नहीं होता तब तक, सिर्फ सुपरफास्ट 5जी इंटरनेट चलाने के मकसद से खरीदे गए ये 5जी स्मार्टफोन पूरी तरह से बेकार ही हैं।

5जी बना दूर की कौड़ी

The best 5G phones you can buy right now - Android Authority

रिलायंस जिओ, भारती  एयरटेल और वोडाफोन-आईडिया तीनों टेलीकॉम कंपनियों ने भारत सरकार के सामने गुहार लगाई है उन्हें 5जी ट्रॉयल्स के लिए अभी और वक्त चाहिए। गौरतलब है कि पहले इन ट्रॉयल्स को कम्पलीट करने की आखिरी तारीख नवंबर 2021 तय की गई थी। लेकिन दूरसंचार कंपनियां समय पर ट्रॉयल्स पूरा करने में विफल साबित हुई है। देश में 90 प्रतिशत से भी अधिक मोबाइल यूजर इन तीन कंपनियों के नेटवर्क के साथ जुड़े हैं और ऐसे में यह साफ हो गया है कि अभी इंडियन्स को 5जी मिलने में देरी लगेगी। वहीं इन सबसे उपर बात यहां आकर भी अटक जाती है कि अगर 5जी ट्रॉयल्स में भी सफलता नहीं मिली तो आगे नेटवर्क के बारे में सोचना पूरी तरह से व्यर्थ है।

बेकार हैं  5जी स्मार्टफोन

श्याओमी, रियलमी, ओप्पो, विवो जैसे नामों से लेकर सैमसंग, वनप्लस व नोकिआ जैसे ब्रांड्स भी इंडिया में अपने 5जी स्मार्टफोन लॉन्च कर रहे हैं। ये 5जी फोन मार्केट में हर बजट में उपलब्ध हो चुके हैं और उपभोक्ता भी नई और एडवांस टेक्नोलॉजी तथा 5जी नेटवर्क के लालच में आकर इन मोबाइल फोंस को खरीद रहे हैं। यहां हम साफ शब्दों में कहना चाहते हैं कि 5जी चलाने के लिए खरीदे गए ये स्मार्टफोन फिलहाल भारत में पूरी तरह से बेकार है। जब तक आप तक 5जी नेटवर्क पहुॅंचेगा, तब तक ये मोबाइल फोन खराब भी हो चुके होंगे और टेक्नोलॉजी व फीचर्स के मामले में पुराने और आउट डेटेड हो चुके होंगे।

बेस्ट ऑप्शन 4जी फोन

Best 5G Smartphones Under Rs 30,000 in India (October 2021): OnePlus Nord 2, POCO F3 GT, and More

आज बेशक ट्रेंड को फॉलो करते हुए मोबाइल कंपनियां कम कीमत पर 5जी स्मार्टफोन लॉन्च कर रही है लेकिन यह सच है कि ऐसे मोबाइल फोंस को खरीदने के बेहतर है कि एक अच्छा 4जी फोन ही खरीदा जाए। कम दाम में 5जी फोन लाने के चक्कर में इन स्मार्टफोंस में फीचर्स और स्पेसिफिकेशन्स से समझौता किया जा रहा है। इन फोन में 5जी तो चलता नहीं हैं वहीं साथ में अन्य स्पेसिफिकेशन्स भी फीकी पड़ जाती है। इनकी तुलना में 4जी स्मार्टफोन बेहतर फीचर्स और दमदार स्पेसिफिकेशन्स से लैस होते हैं। इसीलिए बेस्ट ऑप्शन यही है कि 5जी फोन की बजाय एक अच्छा 4जी स्मार्टफोन खरीदा जाए।

अस्सी की उम्र, एक पैर कब्र में… और मंदिर तुड़वाने में जुटा था

औरंगजेब के अंधभक्तों से एक निवेदन।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी।
भारत में अब औरंगजेब की संतानें भले ही दफन हो गई हों, किंतु उस जिहादी सोच से संचालित नफरती इतने अधिक पैदा हो गए हैं कि वे सच को स्‍वीकारना तो दूर, उसके कहे जाने पर पत्‍थर बरसाने और भयंकर हिंसा करने पर उतारू हो जाते हैं।

महाराष्‍ट्र में क्रूर आक्रांता औरंगजेब की कब्र हटाने का विवाद तो एक बहाना है, जैसे कि हिंसा करने के लिए समय-समय पर अन्‍य बहानों का सहारा‍ लिया गया, असल में उन्‍हें तो हिन्‍दू घर और दुकानों में आग लगाना है। हिन्‍दुओं की संपत्‍त‍ि को अधिक से अधिक नष्‍ट करना है, हिन्‍दुओं को मारना है, यहां तक कि सुरक्षा में लगी पुलिस को भी अपनी ह‍िंसा का शिकार बनाना है।  वस्‍तुत: आज इन हिंसक गतिविधियों को देखकर यही लगता है कि ये सभी वे लोग हैं जोकि इस्‍लाम के नाम पर औरंगजेब की तरह ही सिर्फ मजहबी आधार पर नफरत के बीज बो रहे हैं। इनकी नजर में गैर मुसलमान होना ही अपराध है, जैसे कभी औरंगजेब समेत मुगलों और उसके पहले भारत आए इस्‍लामिक आक्रान्‍ताओं का इतिहास रहा है।

नागपुर महाराष्‍ट्र में जो हुआ, उसके एक के बाद एक साक्ष्‍य ठीक वैसे ही सामने आ रहे हैं, जैसे कि मध्‍य प्रदेश के महू में हुई इस्‍लामिक हिंसा हो आ अन्‍य स्‍थानों पर अचानक से भीड़ की शक्‍ल में आकर धावा बोलनेवाले इस्‍लामिक लोगों का आतंक सामने आता रहा है। पत्थरबाजी करने वाली भीड़ ने चुन-चुनकर हिंदुओं की संपत्तियों को निशाना बनाया। तलवारों से दरवाजों को काटने की कोशिश की। जिन्‍हें नहीं काट पाए, वहां तेल डालकर आग लगा दी । गाड़ियों को फूँक दिया। पहचान करते हुए एक भी मुस्लिमों के घर, दुकान, गाड़ियों को छुआ तक नहीं गया। इन जिहादियों ने पहले सारे कैमरे तोड़े, फिर हथियारों के साथ प्लानिंग से हिंसा को अंजाम दिया।

इस पर भी आरोप लगानेवाले नागपुर हिंसा पर उल्‍टे हिन्‍दू समाज को खासकर को ही दोषी ठहरा रहे हैं कि क्‍यों वे औरंगजेब की कब्र को हटाने की मांग कर रहे हैं। इससे मुसलमानों की भावनाएं आहत हुईं। कहा जा रहा है कि विश्व हिंदू परिषद ने औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग को लेकर प्रदर्शन किया और औरंगजेब का पुतला जलाया, जिसमें यह अफवाह फैली कि कुरान जला दी गई है। उसमें हरा कपड़ा जैसी आपत्‍त‍िजनक सामग्री थी। पुलिस ने इसे झूठ बताया, पर मुस्लिम भीड़ ने इसे बहाना बनाकर हिंसा शुरू कर दी। सोचनेवाली बात है कि हरा कपड़ा कैसे आपत्‍त‍िजनक सामग्री हो गई? लेकिन नहीं; उन्‍हें तो हिंसा करनी है और वह कर दी! नागपुर के इलाके महाल, कोतवाली, गणेशपेठ और चितनवीस पार्क से इस्‍लामिक जिहादी नकाबपोश सड़कों पर उतरे और लाठियों, पत्थरों, बोतलों और पेट्रोल बम से एक-एक को चिन्‍हित कर हिन्‍दू घर, दुकान, उनकी गाड़‍ियों पर हमला करने लगे! समझ नहीं आता; जब औरंगजेब तुम्‍हारे बाप-दादा नहीं फिर उनके लिए इतनी हमदर्दी क्‍यों? क्‍या इसलिए कि वह गैर मुसलमानों को बर्दाश्‍त नहीं करता था ?

इतिहास औरंगजेब के अत्‍याचारों से भरा पड़ा है, जिस पिता ने पैदा किया, उसे ही इतने बुरे हाल में रखा गया था कि आखिर उस पिता शाहजहां को अपनी आत्‍मकथा ‘शाहजहांनामा’ में कहना ही पड़ा, ‘‘खुदा करे कि ऐसी औलाद किसी के यहां पैदा ना हो। औरंगजेब से अच्छे तो हिंदू हैं, जो अपने माता-पिता की सेवा करते हैं और उनकी मृत्यु के बाद तर्पण करते हैं।” औरंगजेब ने शाहजहां को आगरा के किले में कैद करके रखा था और उन्हें पानी तक के लिए तरसाया था। केवल पिता ने ही उसके बारे में बुरा नहीं लिखा, बल्‍कि जो औरंगजेब के साथ रहते थे, उनके लिखे एवं अन्‍य लोगों के कई वर्णन मौजूद हैं।

जजिया दो या इस्‍लाम कबूल करो

Deccan Gymkhana: Chhatrapati Sambhaji Maharaj Statue to Get Grand Canopy | TheBridgeChronicle

सोच सकते हैं! औरंगजेब ने छत्रपति शिवाजी के बेटे संभाजी महाराज के साथ जो किया, वह न जाने कितने हिन्‍दुओं के साथ उसने किया था, भयंकर प्रताड़ना देकर इस्‍लाम में धर्मांतरित करने के लिए यहां तक गया कि उसने गरीबों तक को नहीं बख्‍शा। 2 अप्रैल 1679 को फरमान जारी किया कि जिम्मी (गैर मुसलमान) लोगों को जजिया कर देना होगा। जब इसके विरोध में दिल्‍ली में भीड़ सड़कों पर आई तो इसने हाथियों से उन्‍हें कुचलवानें में तनिक भी देरी नहीं की। कई हिन्‍दुओं को मार देने के बाद भी इसकी जजिया कर वसूली जारी रही। औरंगजेब जजिया को कितना जरूरी मानता था , इसका पता उसके दिए इस आदेश से मिलता है, अपने वजीरों से उसने कहा, ‘‘तुम्हें बाकी करों में छूट की आजादी है, लेकिन काफिरों पर जजिया लगाने में मुझे मुश्किल से कामयाबी मिली है, इसलिए अगर कहीं तुम लोगों ने जजिया में छूट दी तो यह इस्लाम के खिलाफ होगा।” इतिहासकार जदुनाथ सरकार एतिहासिक साक्ष्‍यों के आधार पर बताते हैं कि हिंदुओं को मुस्‍लिमों की तुलना में राज्य के अन्य करों के साथ ही अतिरिक्त रूप से उसकी एक तिहाई राशि का जजिया के तौर पर भुगतान करना अनिवार्य था।

प्रयाग में गंगा स्‍नान तभी ज‍ब हिन्‍दू दे देता था सवा छह रुपए

इतना ही नहीं, प्रयाग में गंगा स्नान के लिए जाने वालों पर उसने सवा छह रुपए का यात्री कर लगा दिया था, यानी गंगा में एक हिन्‍दू तभी डुबकी लगा सकता था, जब वह पहले इतना रुपया जमा करवा दे, अन्‍यथा उसे अपने पूर्वजों का तर्पण और अस्‍थी विसर्जन करने तक की अनुमति नहीं थी। दूसरी ओर मुस्लिम व्‍यापारियों तक के लिए उसने चुंगी खत्म कर दी थी। वहीं, हिन्दू व्यापारियों पर पांच फीसद चुंगी लगा कर कर के नाम पर वसूली की जा रही थी। इतिहासकार जदुनाथ सरकार के अनुसार कानूनगो बनने के लिए इस्लाम कुबूल करना जरूरी था। औरंगजेब के समकालीन इतिहासकार मनुची लिखता है कि कमजोर वर्ग के हिन्दू जो जजिया या अन्‍य कर का भुगतान नहीं कर पाते थे, वे अपमान और उत्पीड़न से छुटकारा पाने इस्लाम कुबूल कर लेते। जैसा कि इन दिनों बांग्‍लादेश और पाकिस्‍तान में देखने में आ रहा है।

वर्ष 1665 में उसने यह कहकर कि हिंदू अंधविश्वास में दीपोत्‍सव (दीपावली) पर दिए जलाते हैं। इसलिए यह बंद हो और उसने बाजारों को रोशन करने पर पाबंदी लगा दी। होलिका दहन और रंग उत्‍सव खेलने पर भी उसने पाबंदी लगाना चाही। यहां तक कि उसने कुंभ जैसे हिन्‍दू मेलों को भी बंद करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। 1666 में हरिद्वार में लगा कुंभ इस जिहादी औरंगजेब की बर्बरता की याद दिलाता है। औरंगजेब ने कुंभ मेले पर हमला कर हजारों हिंदुओं का नरसंहार किया था। इतिहास में इससे जुड़े अनेकों प्रमाण मौजूद हैं। अकेले इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने हिस्‍ट्री ऑफ औरंगजेब में नहीं बल्‍कि तत्‍कालीन समय की अन्‍य पुस्‍तकों में भी यह जिक्र आया है।

एहसान फरामोशी की इंतेहा

Aurangzeb: Why is a Mughal emperor who died 300 years ago being debated on social media?

औरंगजेब को हिंदुओं के प्रति उदार बताने की कोशिशें ऐतिहासिक सच्चाइयों से उलट हैं। साम्राज्य के विस्तार या फिर रणनीतिक जरूरतों के लिहाज से भले उसने कुछ हिन्दू राजाओं से संधियां कीं या मुगल दरबार में उन्हें जगह दी , पर आम हिंदू उसके लिए काफिर थे, जिनके लिए कुरान और हदीस जो कहती हैं, उसी के अनुसार इन सभी (काफिरों) के लिए उसके शासन में किसी उदारता की गुंजाइश नहीं थी। राजा जयसिंह के बाद उसने किसी हिंदू को गवर्नर नहीं बनाया। लेकिन वह उनके प्रति भी कभी कृतज्ञ नहीं रहा, उल्‍टा उनकी मौत की खबर सुनकर दरबार में खुशी का इजहार करने लगा था, वास्‍तव में औरंगजेब कितना एहसान फरामोश बादशाह था, वह उसके इस व्‍यवहार से पता चलता है, एक प्रसिद्ध इतालवी यात्री, निकोलाओ मनुची, जिन्होंने अपना अधिकांश जीवन भारत में बिताया, ने अपने उद्धरण में लिखा, ‘‘एक राजा से छुटकारा पाकर, जिसका प्रभाव उसके राज्य के लिए खतरनाक हो सकता था, उसने उसी क्षण हिंदू धर्म के विरुद्ध खुले युद्ध की घोषणा कर दी। उसने तुरंत ही दिल्ली के पड़ोस में स्थित लालता नामक सुंदर मंदिर को नष्ट करने का आदेश भेजा। उसने प्रत्येक वायसराय और गर्वनर को अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। अन्य मंदिरों में मटोरा (मथुरा) का महान मंदिर भी नष्ट कर दिया गया, जो इतना ऊंचा था कि उसका सोने का पानी चढ़ा हुआ शिखर अठारह मील दूर आगरा से देखा जा सकता था। इसके स्थान पर एक मस्जिद बनाई जानी थी, जिसे उसने एस्सलामाबाद (इस्लामाबाद) नाम दिया, जिसका अर्थ है, ‘विश्वासियों द्वारा निर्मित। उसने यहां से हिंदुओं के तपस्वी और संत योगियों एवं संन्यासियों को निष्कासित कर दिया। उसने निर्देश दिया कि दरबार के उच्च अधिकारी जो हिंदू थे, अब अपने प्रभार नहीं संभालेंगे, बल्कि उनके स्थान पर मुसलमानों को रखा जाना चाहिए। उसने हिंदुओं को उनके मौज-मस्ती एवं उत्सव मनाने से रोक दिया’’ ( स्टोरिया डू मोगोर , खंड II, पृष्ठ 154)

साक्षात् राक्षस

औरंगजेब ने मौत का भय एवं प्रताड़ना की हर सीमा पार कर न जानें कितनों को इस्‍लाम में धर्मांतरित होने के लिए मजबूर किया । वो तो संभाजी थे, छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र, जिन्‍होंने मृत्‍यु का आलिंगन स्‍वीकार किया, किंतु मुसलमान होना नहीं। संभाजी महाराज के दुखद अंत की कहानी ब्रिटिश भारत में सिविल सेवक और इतिहासकार रहे डेनिश किनकेड ने अपनी किताब “शिवाजी: द ग्रैंड रिबेल” में विस्‍तार से लिखी है। इस्‍लाम के इस मजहबी मतान्‍ध औरंगजेब ने संभाजी महाराज की अत्‍यंत क्रूर तरीके से हत्या करवाई थी। औरंगजेब के कहने पर जब छत्रपति संभाजी महाराज और उनके कवि दोस्त कवि कलश  इस्लाम कबूलने से इनकार किया तो उन दोनों को कई दिनों तक भयंकर अमानवीय यातनाएं दी गईं। सबसे पहले संभाजी महाराज की जीभ काट कर रात भर तड़पने के लिए उन्‍हें छोड़ दिया गया। फिर लोहे की गर्म सलाखें घोपकर उनकी आंखें निकाली गईं, लेकिन वे फिर भी इस्लाम स्वीकार नहीं करते हैं।  औरंगज़ेब ने अपना डर कायम रखने के लिए और हिन्दुओं की रूह कँपाने के लिए संभाजी के सिर को कई शहरों में घुमाया। इतना ही नहीं संभाजी महाराज का हिन्‍दू रीति से दाह संस्‍कार न हो सके, इसके लिए उनके शरीर के कई टुकड़े कर नदी में बहा दिए ।

बनारस

जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर (1605-1689), फ्रांसीसी व्यापारी और यात्री थे, उन्‍होंने भारत में व्यापार के साथ अपनी यात्रा का विवरण प्रकाशित किया। उनकी दो खण्‍डो में आई पुस्‍तक Travels in India: Volume 1 and 2 (Cambridge Library Collection) पुस्‍तक के भाग एक के पृष्ठ संख्या 118-119 में वे बनारस को एक अच्‍छे शहर के रूप में वर्णित करते हैं। अपने यात्रा वृत्‍तान्‍त में इन दो फ्रांसीसी यात्रियों बर्नियर और तावेर्निए ने लिखा कि बनारस एक बड़ा और बहुत अच्छी तरह से बना हुआ शहर है, ज्यादातर घर ईंट और कटे हुए पत्थर के बने हैं…इसमें कई सराय हैं।…प्रांगण के बीच में दो गैलरी हैं जहाँ वे सूती कपड़े, रेशमी सामान और अन्य प्रकार के माल बेचते हैं। माल बेचने वालों में से अधिकांश वे कारीगर हैं जिन्होंने इसे बनाया है, और इस तरह विदेशी इसे सीधे प्राप्त करते हैं।…मूर्तिपूजकों का एक प्रमुख शिवालय बनारस में है, और मैं इसका वर्णन पुस्तक II में करूँगा, जहाँ मैं… धर्म के बारे में बात करूँगा। …शहर से लगभग 500 कदम की दूरी पर, उत्तर-पश्चिमी दिशा में, एक मस्जिद है जहाँ आपको कई मुस्लिम कब्रें दिखाई देंगी। …यहां नाव में चढ़ने से पहले सभी यात्रियों के सामान की जाँच होती है, व्यक्तिगत संपत्ति पर कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है, और केवल माल पर ही शुल्क देना पड़ता है।

और तोड़ दिया गया काशी विश्‍वनाथ मंदिर …

PLATFORM: Excavating the Vishwanath Corridor in Varanasi, India

इस यात्रा का जिक्र कर इतिहासकार मोती चंद्र ने अपनी पुस्तक ‘काशी का इतिहास’ में इस बात का उल्लेख किया है कि जब ये दोनों 1660 ई. और 1665 ई. के बीच बनारस आए थे तब के समय औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता का शिकार बनारस नहीं हुआ था, इसलिए इन दोनों ही विदेशी यात्रियों ने शिवालय के रूप में बाबा विश्‍वनाथ मंदिर का जिक्र किया है, यह तब तक तोड़ा नहीं गया था। इसके साथ यह भी ध्‍यान में आता है कि मस्‍जिद का जो जिक्र इनके यात्रा वृत्‍तान्‍त में आया है, वह शहर से 500 कदम की दूरी पर स्‍थ‍ित थी, न कि बीच शहर में। यानी काशी में सिर्फ शिवमंदिर एवं अन्‍य हिन्‍दू देवी-देवताओं के मंदिर ही मौजूद थे। लेकिन जैसे ही औरंगजेब ने बादशाह का ताज पहना वैसे ही सबसे पहले काशी की ओऱ वह चल पड़ा। उसने पूरे देश में फैले अपने सूबेदारों को फरमान जारी किया कि सभी सूबेदार अपनी इच्छा से हिन्दुओं के सभी मंदिरों और पाठशालाओं को गिरा दें। मूर्ति पूजा पूरी तरह से बंद होना चाहिए, वह उसे  करवा दें। 18 अप्रैल 1669 को दिए गए उसके इस आदेश के बाद उसे इसी वर्ष 2 सितंबर 1669 को खबर दी गई कि काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर को गिरा दिया गया है। इतिहासकार मोती चंद्र अपनी इस पुस्‍तक “काशी का इतिहास” में यह भी लिखते हैं कि औरंगजेब ने यह तर्क दिया था कि ‘मंदिरों में गैर इस्लामिक चीजें पढ़ाई और सिखाई जाती हैं। उसने अपने हतोत्साहित सैनिकों को भी यही कह कर हौसला दिया था कि यह ऊपर वाले की इच्छा है कि यह मंदिर ध्वस्त किए जाएं।’

वस्‍तुत: इस घटना के संदर्भ में यहां बताना है कि औरंगजेब की सबसे प्रमाणिक जीवनी ‘मासिर-ए-आलमगीरी’ को माना जाता है, इस किताब में औरंगजेब के द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने की घटना का पूरा जिक्र मौजूद है। मंदिर तोड़कर ज्ञानव्यापी मस्जिद का निर्माण हुआ था। मुहम्मद ताहिर (1628-671) जिन्हें उनके नाम इनायत खान के नाम से जाना जाता है ने शाहजहाँनामा में औरंगजेब के अब्‍बा शाहजहाँ का जीवन वृत्तांत लिखा है, उनके मुंशी मोहम्मद साफी मुस्तइद खां ने ही यह मआसिर-ए-आलमगीरी लिखी है।

हिन्‍दुओं से इतनी नफरत

मासिर-ए-आलमगीरी के मुताबिक 9 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने अपने सभी प्रांतों के गवर्नर को आदेश जारी किए कि हिंदुओं के सभी स्कूलों और मंदिरों को ध्वस्त कर दिया जाए। मासिर-ए-आलमगीरी के ही एक और प्रमाण के मुताबिक एक बार जब औरंगजेब चित्तोड़ पहुंचा तो उसने वहां कई मन्दिरों में हिन्दुओं को पूजा करते हुए देखा, जिसके बाद उसने चित्तौड़ के मन्दिरों को ध्वस्त करा दिया। “… शनिवार, 24 जनवरी 1680 दूसरे मुहर्रम को बादशाह राणा द्वारा निर्मित उदयसागर झील देखने गए और उसके किनारे पर स्थित तीनों मंदिरों (जिसमें कि अन्‍य 189 मंदिर थे) को ध्वस्त करने का आदेश दिया।…और उदयपुर के आसपास के बहत्तर अन्य मंदिर नष्ट कर दिए गए थे…सोमवार, 22 फरवरी/माह के पहले सफ़र को सम्राट चित्तौड़ देखने गए, उनके आदेश से उस स्थान के 63 मंदिर नष्ट कर दिए गए…” (मासिर-ए-आलमगिरी, पृष्ठ 116-117) उसने उज्‍जैन के मंदिरों  को   ध्‍वस्‍त करने सेना भेजी। वह  दक्कन के जिन गाँवों में गया, वहाँ के मंदिरों को नष्ट किया और उन ज़मीनों पर मस्जिदें बनवाईं। महाराष्ट्र के कई किलों पर बने मंदिरों को औरंगजेब द्वारा ध्वस्त करने के प्रमाण मौजूद हैं, जैसे वसंतगढ़ और पन्हाला के मंदिर। वसंतगढ़ की मस्जिद की नींव औरंगजेब ने अपने हाथों से रखी थी । अहमदाबाद के पास सरसपुर शहर में काफी मशहूर चिंतामण मंदिर था। भगवान गणेश के इस मंदिर में पूरे इलाके के लोग पूजा करने के लिए आते थे। इस मंदिर को औरंगजेब के आदेश पर कुव्वत-इल-इस्लाम नाम की एक मस्जिद में बदल दिया गया। आज से 350 साल पहले जयपुर शहर अजमेर प्रांत का हिस्सा था। यहां एक भव्य मलरीना मंदिर था, जिसे औरंगजेब ने सेना भेजकर गिरवाया था। मंदिर गिराने के 22 साल बाद 23 जून 1694 को दोबारा से औरंगजेब ने अजमेर के गवर्नर को मूर्ति पूजा पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। ‘मुगल सम्राटों की धार्मिक नीति’ किताब के पेज नंबर-149 में इतिहासकार श्रीराम शर्मा ने इस घटना का जिक्र किया है। ये संदर्भ मुगल दरबार के समाचारपत्रों में आए हैं।

इलियट, हेनरी एम.,और जॉन डाउसन, संपादक। भारत का इतिहास, जैसा कि इसके अपने इतिहासकारों द्वारा बताया गया । 5 खंड। लंदन: ट्रबनर, 1873-1877 से प्रकाशित में  पाँच खंडों का उद्देश्य भारत में मुस्लिम शासन के इतिहास को पूरी तरह से फ़ारसी इतिहास के अंशों के अनुवाद के माध्यम से बताना है। मुगल शासन की निरंकुश प्रकृति और मुगलों के अधीन उत्पीड़ित बहुसंख्यकों के रूप में हिंदुओं की कहानी को पढ़कर कोई भी यह सहज अंदाजा लगा सकता है कि हिन्‍दुओं ने अपने ही देश भारत में कितना भयंकर उत्‍पीढ़न सहा है!

बृज संस्‍कृति समाप्‍त करने के कई जतन

इस सिरफिरे और जिहादी औरंगजेब के मन में हिन्‍दू नफरत किस तरह से रही, वह इसकी इस करतूत से भी पता चलता है- वर्ष 1670 में मथुरा में केशव राय के देहरा को नष्ट करने के बाद, उसने मूर्तियों को आगरा लाकर “बेगम साहब की मस्जिद” की सीढ़ियों के नीचे दफना दिया, ताकि उन पर लगातार पैर रखे जा सकें ( मासीर-ए-आलमगीरी , पृष्ठ 60)। औरंगज़ेब ने ब्रज संस्कृति को खत्म करने के लिए ब्रज के नाम तक बदल डाले थे।  उसने मथुरा को इस्लामाबाद, वृन्दावन को मेमिनाबाद और गोवर्धन को मुहम्मदपुर का बना दिया था। यह अलग बात है कि श्रीकृष्‍ण और राधारानी की भक्‍ति भारत के रोम-रोम में बसी थी, इसलिए उसके मंसूबे विफल हो गए और उसके दिए नाम प्रचिलत नहीं हो सके, उल्‍टा जो औरंगजेब श्री कृष्ण की संस्कृति को वह खत्म करने चला था, उन्‍हीं की भक्‍ति में उसकी बेटी ‘जेबुन्निसा’ डूब गई और श्री कृष्ण भक्त बनकर उसके सामने खड़ी हो गई थी। वे किले में कैद होकर भी श्रीकृष्ण की भक्ति‍ में  डूब कर गजलें, शेर और रुबाइयां  लिखती रहीं। 20 सालों की कैद के दौरान उन्होंने लगभग 5000 रचनाएं कीं, जिसका संकलन उनकी मौत के बाद दीवान-ए-मख्फी के नाम से छपा।

भारत की प्राचीन भव्‍यता से भयंकर चिढ़

विलियम जेम्स ड्यूरेंट एक सुप्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार और दार्शनिक थे, जो अपने ग्यारह-खंड में किए गए एतिहास‍िक कार्य ‘‘द स्टोरी ऑफ़ सिविलाइज़ेशन’’ के लिए जाने जाते हैं, इसमें इन्‍होंने पूर्वी और पश्चिमी सभ्यताओं के इतिहास का अध्‍ययन किया है और इसका सविस्‍तार विवरण प्रस्‍तुत किया है। वे अपनी इस पुस्तक ‘स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन’ में औरंगजेब की धर्मान्‍धता का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि उसने अपनी नजर में आने वाली ‘हर मूर्ति को तोड़ डाला’।

उन्‍होंने लिखा, “औरंगजेब को कला की कोई परवाह नहीं थी, उसने घोर कट्टरता के साथ (इस्‍लाम को छोड़) उसकी नजर में आए सभी अन्‍य पंथों के धार्म‍िक स्मारकों, मंदिरों को नष्ट कर दिया, और आधी सदी के शासनकाल में, भारत से अपने धर्म (इस्‍लाम) को छोड़कर लगभग सभी धर्मों को मिटाने के लिए संघर्ष किया। उसने प्रमुख शासकों और अपने अन्य अधीनस्थों को आदेश जारी किया कि वे हिंदुओं या ईसाइयों के सभी मंदिरों को जमींदोज कर दें, हर मूर्ति को तोड़ दें और हर हिंदू स्कूल को बंद कर दें। एक साल (1679-80) में अकेले आमेर में 66 मंदिर, चित्तौड़ में 63 मंदिर, उदयपुर में 123 मंदिर तोड़ दिए गए; और बनारस के एक मंदिर की जगह पर, जो हिंदुओं के लिए विशेष रूप से पवित्र था, उसने जानबूझकर अपमान करते हुए एक मुस्लिम मस्जिद बनवाई। उसने हिंदू धर्म की सभी सार्वजनिक पूजा पर रोक लगा दी और हर अपरिवर्तित हिंदू पर भारी कैपिटेशन टैक्स लगा दिया। उसकी कट्टरता के परिणामस्वरूप, हजारों मंदिर जो एक सहस्राब्दी से भारत की कला का प्रतिनिधित्व करते थे, खंडहर में तब्दील हो गए। आज के भारत को देखकर हम कभी नहीं जान सकते कि एक समय में इसमें कितनी भव्यता और सुंदरता थी।”

वाराणसी गजेटियर में अत्‍याचारों के सबूत

औरंगजेब का खुद का इकबाली  बयान कलीमत-ई-तय्यीबत में दर्ज है, जिसमें वो अपने पोते बिदार बख्त से कहता है- ‘औरंगाबाद के पास सतारा गांव मेरे शिकार की जगह था हां पहाड़ पर खांडेराय की छवि वाला एक मंदिर था। अल्लाह के फजल से मैंने उसे ढहा दिया।’ साकी मुस्तैद खान की पुस्‍तक  ‘मासिर-ए-आलमगीरी’ के अध्‍याय 12 में मुताबिक नौ अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने अपने सभी प्रांतों के गवर्नर को आदेश जारी किए कि हिंदुओं के सभी स्कूलों और मंदिरों को ध्वस्त कर दिया जाए। ये आदेश उसके शासन वाले सभी 21 सूबों में लागू हुए। यहां हिंदुओं की धार्मिक प्रथाओं और त्योहारों को मनाने पर भी रोक लगा दी गई। इस आदेश का जिक्र 1965 में प्रकाशित वाराणसी गजेटियर के पेज नंबर- 56-57 पर भी देखा जा सकता है।

इन पृष्‍ठों पर साफ लिखा है, “औरंगज़ेब को कीर्तती विश्‍वेश्वर का पुराना मंदिर मिला, जो उस साइट पर नष्ट कर दिया गया, इसकी कुछ सामग्री के साथ, आलमगिरी मस्जिद जो रत्नेश्वर के मंदिर के पास खड़ी है…से पुराने मंदिर के अवशेषों की वास्तुकला की शैली से संकेत मिलता है कि मंदिर उसके विनाश के समय लगभग छह या सात शताब्दियों पुराना रहा होगा- हिंदू आज भी इस स्थान पर आते हैं क्योंकि वे इसे पवित्रता का स्थान मानते हैं और प्रांगण के एक हिस्से (संभवतः पुराने मंदिर का अवशेष) की पूजा करते हैं, खासकर शिवरात्रि के अवसर पर जब कम से कम पिछली सदी के मध्य तक भीड़ इस स्थान पर उमड़ती थी और अपनी भेंट चढ़ाती थी जिसे मस्जिद के मुल्ला हड़प लेते थे।’ 9 अप्रैल, 1669 को औरंगजेब ने प्रांतीय गवर्नर को हिंदू मंदिरों और स्कूलों को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया जिसे वाराणसी के फौजदार ने शहर में विश्वनाथ और बिंदुमाधव सहित कई मंदिरों को गिराकर पूरा किया। प्रत्येक दो ऊंची मीनारों के स्थान पर एक मस्जिद बनाई गई। औरंगजेब ने शहर का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद भी कर दिया और यहां की टकसाल से जारी सिक्कों ने भी इस नाम को पीछे छोड़ दिया। हालाँकि, नया नाम प्रचलन में नहीं आया बल्कि इसका इस्तेमाल केवल आधिकारिक तौर पर किया गया, जो कि बादशाह की मृत्यु के बाद से ही चलन में है।’’

विध्वंस ही विध्वंस

इस आदेश के बाद तो जैसे भारत भर में जहां तक भी औरंगजेब की सत्‍ता थी, मंदिर गिराने का सिलसिला ही शुरू हो गया था, जिसे लेकर सभी बड़े इतिहासकार एकमत हैं और यह मानते हैं कि इसी आदेश के बाद सोमनाथ, काशी विश्वनाथ समेत सेकड़ों मंदिरों का विध्वंस किया गया। केवल मंदिरों को ही नहीं, इतिहास को भी तोड़-मरोड़कर उसे नष्ट करने का काम औरंगजेब ने अपने शासनकाल में शुरू करवा दिया था। जैसे ही उसके शासन का दूसरा दशक आरंभ हुआ, उसने सभी काल क्रम के अभिलेख मिटा दिए और आगे से निरंतर लिखे जानेवाले किसी भी लेखन को बंद कर देने का आदेश दिया। यही कारण है कि उस दौरान के औरंगजेब के कृत्यों का ब्योरा शाही दस्तावेजों में नाममात्र का सिर्फ सूचना के स्‍तर पर मिलता है। इसका जिक्र इतिहासकार स्टेनली लेनपूल ने “औरंगजेब एंड द डिके आफ द मुगल एंपायर” में किया है।

अब्राहम एराली के अनुसार, “1670 में औरंगज़ेब ने, उज्जैन के आसपास के सभी मंदिरों को नष्ट कर दिया था” और बाद में “300 मंदिरों को चित्तौड़, उदयपुर और जयपुर के आसपास नष्ट कर दिया गया” अन्य हिंदू मंदिरों में से 1705 के अभियानों में कहीं और नष्ट कर दिया गया; और “औरंगज़ेब की धार्मिक नीति ने उनके और नौवें सिख गुरु, तेग बहादुर के बीच घर्षण पैदा कर दिया, जिसे जब्त कर लिया गया और दिल्ली ले जाया गया, उन्हें औरंगज़ेब ने इस्लाम अपनाने के लिए बुलाया और मना करने पर, उन्हें यातना दी गई और नवंबर 1675 में उनका सिर कलम कर दिया गया। Eraly, Abraham (2000), “Emperors of the Peacock Throne: The Saga of the Great Mughals”

तत्‍कालीन अंग्रेज अधिकारियों के आपसी पत्रों से भी सामने आया, कैसा धर्मांध था औरंगजेब

1685 में, औरंगजेब ने पंढरपुर में विठोबा के मंदिर को ध्वस्त कर दिया था (Mogal Darbarchi Batmipatre, Setu Madhavrao Pagadi, Volume III, page 472)। औरंगजेब को लेकर 1670 में दो अंग्रेजों गैरी से लॉर्ड अर्लिंगटन के बीच हुए पत्राचार को देखा जा सकता है, तो तत्‍कालीन समय की स्‍थ‍ितियों को एक-दूसरे के बीच साझा कर रहे थे, उसमें वे लिखते हैं , ‘‘एक कट्टर विद्रोही सेवगी (शिवाजी) फिर से ओरंगशा (औरंगजेब) के खिलाफ युद्ध में लगे हुए हैं, दूसरी ओर एक अंधे उत्साह से औरंगजेब ने कई गैर-यहूदी, (हिन्‍दू) मंदिरों को ध्वस्त कर दिया और कई लोगों को मुसलमान बनने के लिए मजबूर किया है, उसने सेवगी (शिवाजी) के कई महलों पर कब्ज़ा कर लिया है…दक्कन युद्ध क्षेत्र बनने वाला है; (Letter from Gary to Lord Arlington, 23rd January 1670, English Records on Shivaji, Volume I, page 140)

आज जो भी औरंगजेब के समर्थन में खड़े हो रहे हैं, उन्‍हें यह समझना ही होगा कि इतिहास इस बादशाह की गैर मुसलमानों खासकर हिन्‍दुओं के प्रति किए गए उसके गुनाहों के लिए कभी माफ नहीं करेगा। वह कितना असहिष्णु शासक था। वह उसके आरंभ से लेकर अंत तक के जीवन के कई उदाहरणों से समझा जा सकता है, जब वह 1644 में (वह एक राजकुमार था और गुजरात में वायसराय के रूप में तैनात था), तभी उसने चिंतामन के एक नए बने मंदिर को मस्जिद में बदल दिया था (मिरत-ए-अहमदी , पृष्ठ 222)। जैसा बताया जाता है, उसने मंदिर में एक गाय का वध करके उसे अपवित्र भी किया (स्रोत: बॉम्बे प्रेसीडेंसी का गजेटियर (खंड I, भाग I, पृष्ठ 280)।

बुढ़ापे में भी चेन नहीं

इसके बाद आप उसके अंतिम समय को भी देखें, मरने के पहले भी वह चेन से नहीं बैठा था, उसके ह्दय में हिन्‍दुओं के प्रति घोर अपमान और उन्‍हें लगातार यातनाएं देने की सूझ रही थी। ये 80 साल का बुड्डा बादशाह 1698 में हामिद-उद-दीन खान बहादुर को बीजापुर के मंदिर को नष्ट करने और एक मस्जिद बनाने के लिए नियुक्त करता है। (औरंगजेब का इतिहास, खंड III, पृष्ठ 285, यदुनाथ सरकार)।

औरंगजेब ने अपने शासनकाल में गुजरात के सोमनाथ मंदिर को भी दो बार तोड़ने के आदेश जारी किए थे। पहली बार 1659 में और दूसरी बार 1706 में सोमनाथ मंदिर को जमींदोज करने का फरमान सुनाया गया। अपनी मौत के पहले औरंगजेब की उम्र जब 88 साल हो चुकी थी त‍ब भी वह हिन्‍दू नफरत नहीं छोड़ पाया, उसे जैसे ही पता चलता है कि कुछ हिंदुओं ने सोमनाथ के खंडित मंदिर में भी पूजा-अर्चना शुरू कर दी है, तो उसे शेष बचे हिस्‍से को भी फरमान सुनाकर और अपनी शाही सेना भेजकर ध्वस्त करा दिया था। मुराक़त ए अबुल हसन के प्रस्‍तुत साक्ष्‍य कहते हैं कि अपने शासनकाल के 10-12 सालों में ही औरंगजेब ने हर उस मंदिर को तुड़वा दिया जिसे ईट, मिट्टी या पत्‍थर से बनाया गया था।

वास्‍तव में उनकी धार्मिक ज्यादतियों की सूची इतनी लंबी है कि एक लेख कभी भी संपूर्ण वर्णन नहीं कर सकता। कुछ इतिहासकार हैं जो औरंगजेब के नाम पर कसीदे गढ़ने का काम करते हैं और तर्क देते हैं कि अगर औरंगजेब इतना ही निष्ठुर और हिंदू द्रोही था तो फिर उसने अपने राज्य के संपूर्ण मंदिरों को नष्ट क्यों नहीं कर दिया? यह हिंदू राजाओं को अपने साथ क्यों मिलाकर रखता था ? किंतु उन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि तत्कालीन समय में हिंदू राजाओं की आपसी फूट का लाभ मुगल सल्‍तनत उठाती रही। छत्रपति शिवाजी की एक इच्‍छा अधुरी रह गई है, वे चाहते थे कि भारत में मराठा, सिख और राजपूत यह तीनों शक्तियां मिलकर एक हो जाएं तो भारत का प्राचीन वैभव वर्तमान में जीवंत हो उठेगा। वह कामना करते थे कि ऐसा होने पर ही भारत के जितने शत्रु हैं, उनका नाश आसानी से संभव है।

काश; स्‍वतंत्र भारत में ही सही छत्रपति शिवाजी जी की यह इच्‍छा हिन्‍दू समाज एकता का मंत्र गुनगुनाकर पूरा कर दे! तब फिर शायद किसी की हिम्‍मत न हो कि वह झुंड में आकर के हिन्‍दू आस्‍था, उनके घर, दुकान, मंदिर, संपत्‍ति‍ को किसी भी तरह से चोट पहुंचा सकें। आखिर संगठन में शक्‍ति है, यह मंत्र समझना ही होगा, सिर्फ शासन, सरकार के भरोसे नहीं रहा जा सकता। अन्‍यथा नागपुर, मुंबई, दिल्‍ली, कोलकाता, जयपुर, भोपाल जैसे तमाम दंगे होते रहेंगे! हां, इतना तय है कि औरंगजेब से मुहब्‍बत करनेवाले भारत के हिमायती बिल्‍कुल नहीं हैं और इनसे निपटना अकेले शासन का काम नहीं है, यह  समाज का सामूहिक कार्य है।

(लेखक, पत्रकार और केंद्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड एडवाइजरी कमेटी में सदस्‍य हैं)  

जब 120 देशों ने की थी अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की स्थापना

देश-दुनिया के इतिहास में 17 जुलाई की तारीख तमाम अहम वजह से दर्ज है। 1998 में 17 जुलाई को 120 से ज्यादा देशों ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की स्थापना की थी। इस अदालत को बनाने का मकसद गंभीर अपराधों के मामलों की सुनवाई करना है था। जुलाई 2002 से इस अदालत ने अपना कामकाज शुरू किया था। हालांकि भारत रोम में हुई उस संधि से अलग है, जिसमें शामिल देशों ने इस अदालत की स्थापना की थी।दरअसल, 1945 में यूनाइटेड नेशंस के बनने के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय बनाने की कोशिश हो रही थी। नौ दिसंबर, 1948 को यूनाइटेड नेशंस ने इस बारे में एक रेजोल्यूशन पास किया। इसमें कहा गया कि इतिहास में नरसंहार जैसी क्रूर घटनाओं ने मानवता का बहुत नुकसान किया है। मानव जाति को इस तरह के जघन्य संकट से मुक्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।

इस रेजोल्यूशन में नरसंहार को अंतरराष्ट्रीय अपराध माना गया। यूनाइटेड नेशंस ने एक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के गठन के लिए इंटरनेशनल लॉ कमीशन से भी सुझाव मांगा। कमीशन के सुझावों के आधार पर एक कमेटी बनाई गई। इस कमेटी का काम अंतरराष्ट्रीय अदालत की स्थापना से जुड़ी रिसर्च करना था। 1953 में इस कमेटी ने एक ड्राफ्ट तैयार किया।

1993 में यूगोस्लाविया में भीषण गृह युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में जातीय हिंसा में हजारों लोगों का नरसंहार हुआ। इसके बाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के गठन की मांग बढ़ने लगी। 1994 में इंटरनेशनल लॉ कमीशन ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के गठन संबंधी ड्राफ्ट पर काम पूरा किया। इस ड्राफ्ट को यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली के सामने रखा गया। इस दौरान ड्राफ्ट में सुधार होते रहे और अप्रैल 1998 में ड्राफ्ट पूरी तरह बनकर तैयार हो गया।

यूनाइटेड नेशंस ने रोम में 15 जून से 17 जुलाई तक इस ड्राफ्ट को कानून का रूप देने के लिए एक कॉन्फ्रेंस बुलाई। आज ही के दिन 1998 में 120 से भी ज्यादा देशों ने इस ड्राफ्ट पर अपनी सहमति जताते हुए इसे कानून का रूप दे दिया। इसी के तहत अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की स्थापना हुई।

2006 में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने अपने पहले मामले पर सुनवाई शुरू की। ये मामला कांगो के मिलिट्री कमांडर थॉमस लुबांगा से जुड़ा था, जिन पर आरोप था कि उन्होंने सेना में बच्चों को भर्ती किया। लुबांगा ने युद्ध में उनका इस्तेमाल किया। 2009 में इस मामले में लुबांगा पर ट्रायल शुरू हुआ। 2012 तक इस मामले की सुनवाई चली। मार्च 2012 में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने लुबांगा को इस अपराध का दोषी पाते हुए उन्हें 14 साल की सजा सुनाई।(एएमएपी)

गांधी परिवार की तीन पीढ़ियां जो न कर सकी वह मोदी सरकार कर रही

प्रदीप सिंह।

पूर्वोत्तर के राज्यों के आपसी सीमा विवाद सुलझाने की शुरू हुई कवायद, असम ने मेघालय से सुलझाया आधा विवाद, बाकी राज्यों से भी जल्द खत्म होगा विवाद।


 

“हरि अनंत हरि कथा अनंता” यह भगवान के बारे में कहा गया है। मगर कांग्रेस की बात करें तो उसका भ्रष्टाचार,उसकी अकर्मण्यता, विवादों को बनाए रखने की उसकी क्षमता, कमीशन बनाने और कमीशन लेने की उसकी ताकत का कोई सानी नहीं है। उसकी कथा अनंत है। जितना कहिए, जितना बोलिए वह हमेशा कम लगता है।इस बारबात करूंगा पूर्वोत्तर की। पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्य असम से काट कर बनाए गए हैं।वर्ष 1963में असमके एक हिस्से को निकालकर नगालैंड बनाया गया।1972 में मिजोरम और मेघालय बनाया गया। उसके बाद 1987 में अरुणाचल प्रदेश बनाया गया। नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी जिसे नेफा कहा जाता था  में असम के कुछ हिस्सों को मिलाकर यह राज्य बनाया गया। जब ये राज्य बने तो जाहिर है उनकी सीमा भी निर्धारित होनी चाहिए थी। उनकी सीमा निर्धारित तो हुई लेकिन सिर्फ नक्शे पर।

फूट डालो शासन करो

Assam-Meghalaya Border Dispute

नक्शे पर लाइन खींचकर सीमा बना तो दी गई लेकिन जमीनी स्तर पर इस सीमा को लागू करने की कभी कोशिश ही नहीं हुई। कभी इस बात का प्रयास ही नहीं हुआ कि कैसे वह लाइन व्यवहारिक हो, दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो।जब विवाद बढ़ने लगे, झगड़े होने लगे, हिंसक झड़पें होने लगी तब भी कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार इस मामले में “फूट डालो और शासन करो” की नीति पर चलती रही कि दो राज्य आपस में लड़ेंगे तो समझौता करने का मौका मिलेगा, दोनों को काबू में रखने का मौका मिलेगा। इसकी वजह से आज तक इन विवादों का निपटारा नहीं हुआ। असम, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश के बीच जो आपसी सीमा विवाद है उसका कुल इलाका500 वर्ग किलोमीटर है। इससे आप अंदाजा लगा लीजिए कि कितना बड़ा इलाका है और कितन बड़ा विवाद है जो अब तक होता रहा है।सभी के अपने-अपने दावे हैं। कोई अपने दावे से पीछे हटने को तैयार नहीं है। सब अपनी हठ पर कायम हैं। अपने-अपने दावों को सही साबित करने के लिए सभी अलग-अलग तरीके अपनाते रहे हैं। दस्तावेज दिखा कर, जहां दस्तावेज नहीं मिल रहे हैं वहां स्थानीय स्तर पर निर्माण करवा कर, स्थानीय लोगों को अपने पक्ष में कर विवाद को नया-नया रूप दिया जाता रहा है।

बढ़ता रहा झगड़ा

असम और नगालैंड की एक दूसरे से 512 किलोमीटर की सीमा लगती है।सीमा को लेकर सबसे ज्यादा विवाद और हिंसक झड़पें इन्हीं दोनों राज्यों के बीच हुई हैं।वर्ष1968 में पहली बार सीमा को लेकर दोनों के बीच हिंसक झड़पें हुईं जिनमें डेढ़ सौ लोग मारे गए थे। एक ही देश में सीमा को लेकर दो राज्यों के बीच हुए विवाद में इतनी बड़ी संख्या में लोग मारे गए यह कोई छोटी बात नहीं है।इसके बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं।1979 में फिर से 54 लोग और1985 में 41 लोगमारे गए।इनमें 28 लोग असम पुलिस के सिपाही थे। इसके अलावा 2014 में 17 लोग मारे गए।पिछले साल जुलाई में सीमा को लेकर असम और मिजोरम में झड़प हुई जिसमें असम पुलिस के 6 कर्मी मारे गए। उसके बाद माहौल और गर्म हो गया। असम और मेघालय के बीच 12 जगहों को लेकर विवाद है जो शायद सबसे कम है। असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच 12 सौ जगहों को लेकर विवाद है। असम, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश का विवाद इतना बढ़ा कि वह सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अभी सुप्रीम कोर्ट में यह मामला लंबित है।

विवाद सुलझाने की नहीं हुई कोशिश

After protests, Vajpayee's ashes immersed in Nagaland's 'unnamed river' - The Hindu

2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत पूरे पूर्वोत्तर में जिस तरह का विकास हुआ है आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते कि सिर्फ सात साल में विकास के इतने काम हो सकते हैं। विकास के रूपक बदल गए हैं। मैं अभी हाल ही में घूमने के लिए असम गया था। गुवाहाटी से काजीरंगा जाने के दौरान गुवाहाटी से नया गांव की जो सड़क थी उसके बारे में मेरे ड्राइवर ने कहा कि यह अटल जी की सड़क है। नया गांव में एक जगह पर उससे आगे जब बढ़े तो उसने बताया कि अब यह मोदी जी की सड़क शुरू हो गई है। अब आप इससे अंदाजा लगाइए कि स्थानीय लोगों के मन में विकास का, उसकी पहचान का रूपक कितना बदल गया है। सड़कों का जाल बिछाने में सबसे ज्यादा काम भारतीय जनता पार्टी की सरकारों में हुआ है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में शुरू हुआ था हाईवे बनाने और ग्रामीण सड़कों को बनाने का काम।  आजादी के बाद 60  सालों तक जिस की उपेक्षा होती रही थी। सब गांव की बात करते रहे, उसके विकास की बात करते रहे लेकिन वहां इंफ्रास्ट्रक्चर बने इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।उसी तरह सीमा विवाद सुलझाने के लिए कमिटियां बनती रही, कमीशन बनते रहे, उनकी रिपोर्ट आती रही और वह ठंडे बस्ते में डाल दी जाती रही।पूर्वोत्तर के राज्यों का सीमा विवाद जवाहरलाल नेहरू के समय ही शुरू हुआ। उसके बाद इंदिरा गांधी आईं, राजीव गांधी आए, फिर 2004 से 2014 तक 10 साल तक प्रधानमंत्री भले ही मनमोहन सिंह रहे लेकिन सत्तादरअसल सोनिया गांधी के हाथ में थी, गांधी परिवार की इन तीन पीढ़ियां ने इस विवाद को सुलझाने में कोई रुचि नहीं ली। जबकि लोग मारे जाते रहे, झगड़े होते रहे, छोटे-छोटे झगड़े आए दिन होते रहते हैं।

अब क्या हो रहा बदलाव

TV anchor's remarks draw sharp reaction from Assam CM Himanta Biswa Sarma: 'Racism has no place in India' - The Financial Express

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बादजो भी सीमा विवाद हैं, जो भी समस्याएं हैं उसको हल करने की पहल शुरू हुई है। 2021 में हिमंत बिस्वसरमा असम के मुख्यमंत्री बने। जुलाई 2021 में जब सीमा को लेकर झड़प हुई तो हिमंत बिस्वसरमा ने इस पर काफी सोच विचार किया।उन्हें लगा कि इस समस्या का स्थायी हल निकाला जाना चाहिए। अगर दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे तो कोई समझौता नहीं हो सकता। उन्होंने मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराडो संगमा से बात की। उन्होंने संगमा से कहा कि जब तक हम इस विवाद को हल नहीं करेंगे तब तक झगड़े होते रहेंगे। नक्शे पर खींची गई लाइन की बजाय हमें यह देखना होगा कि जमीनी स्तर पर इसे कैसे लागू किया जाए। उन्होंने एक फार्मूला दिया लेन-देन (गिव एंड टेक) का। उन्होंने कहा कि दोनों अपनी जिद से हटें। कुछ हम छोड़ते हैं और कुछ आप छोड़िए जिससे समझौता हो सकता है। मेघालय के मुख्यमंत्री इसके लिए तैयार हो गए। तीन कमिटियां बनाई गई।दोनों राज्यों के बीच 12 स्थानों को लेकर  विवाद है।पहले यह पहचान की गई कि छहजगह ऐसे विवाद हैं जिनको हल करने में बाकी छह जगह की जुलना में थोड़ी कम मेहनत करनी पड़ेगी।तो पहले उन पर बात कर लें। तीनों कमिटियों में दोनों राज्यों के वरिष्ठ मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और इसके अलावा स्थानीय लोग जो उन विवादित इलाकों में रहते हैं को शामिल किया गया। लंबी-लंबी बैठकचली, काफी समय तक चली,बैठक में गर्मा गर्मी हुई, बहस हुई। कई बार ऐसा लगा कि मीटिंग खत्म हो जाएगी आगे बात नहीं होगी लेकिन बातचीत चलती रही। आखिर में उन छह जगहों पर दोनों पक्षों की रजामंदी से समझौता हो गया। दोनों राज्यों के बीच कुल 36.79 वर्ग किलोमीटर का झगड़ा सुलझ गया। उन छहजगहों को लेकर जो फैसला हुआ उसके मुताबिक 18.28 वर्ग किलोमीटर जमीन मेघालय को मिलेगी और 18.51 वर्ग किलोमीटर जमीन असम को मिलेगी। इस नतीजे पर पहुंचने के लिए पांच सूत्रीय फार्मूला अपनाया गया।पहला ऐतिहासिक सबूत, दूसरासंबंधित इलाके की एथ्निसिटी (सामाजिक, सांस्कृतिक, जातीय, भाषाई, धार्मिक आधार पर भिन्नता), तीसरा प्रशासनिक सहूलियत (संबंधित जगह के लोगों को किस इलाके में रहने से ज्यादा सहूलियत होगी), चौथी शर्त रखी गई थी एकरूपता ताकि एक जैसा दिखाई दे।ऐसा न हो कि एक कोना इधर चला गया दूसरा कोना उधर चला गया और पांचवींशर्त थी विवादित इलाकों के लोगोंकी भावनाओं का सम्मान कि वह क्या चाहते हैं। एक तरह से इसे प्राथमिकता दी गई क्योंकि इस तरह का कोई भी समझौता तभी चल सकता है जब स्थानीय लोगों को वह समझौता मंजूर हो। इस तरह से इन पांचसिद्धांतों के आधार पर इन तीन कमिटियों ने जो फैसला किया उसे दोनों पक्षों ने स्वीकार कर लिया।

केंद्र की मंजूरी

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इस समझौते को लेकर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिले। केंद्र ने इस समझौते को मंजूरी देते हुएदोनों राज्यों को इसे जमीनी स्तर पर लागू करने को कहा।इसके बाद हिमंत बिस्वसरमा ने अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम के मुख्यमंत्रियों से बात की।हिमंत बिस्वसरमा ने उनके सामने भी गिव एंड टेक का ही प्रस्ताव रखा। उन्होंने उनसे कहा कि अड़े रहेंगे तो कुछ निकलेगा नहीं। हम एक ही देश के अलग-अलग राज्य के रहने वाले लोग हैं। हमें नॉर्थ-ईस्ट को एक इकाई के रूप में देखना चाहिए। अगर रोज-रोज झगड़े होते रहेंगे तो सभी राज्यों के विकास पर असर पड़ेगा, लोगों के मन पर असर पड़ेगा, उनके मन में वैमनस्य पैदा होगा। झगड़े से फायदा किसी का नहीं होने वाला है।इसके लिए फिर वही फार्मूला तय किया गया कि पांच कसौटियां होंगी जिन पर कसा जाएगा की लेन-देन किस तरह का होगा।तीनों राज्य सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और कोर्ट से कहेंगे कि वे कोर्ट से बाहर समझौते के लिए तैयार हैं।

जिम्मेदार कौन?

अब आप सोचिए कि सीमा को लेकर नॉर्थ-ईस्ट को हिंसा की आग में धकेला गया तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? बहुत से लोगों को इस बात से ऐतराज होता है कि हर बात के लिए नेहरू-गांधीपरिवार को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। मुझे बताइए कि मैंने ये जो तथ्य आपके सामने रखे उसके बाद किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? नरेंद्र मोदी या अटल बिहारी वाजपेयी को या फिर गांधी-नेहरू परिवार को। वे अपनी जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं? मैं इस बात से इंकार नहीं करता हूं कि जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के कार्यकाल में काम नहीं हुए हैं।उनके समय में बड़े और अच्छे काम हुए हैं। लेकिन सवाल यह है कि और क्या क्या हो सकता था?बात इस देश की क्षमता की है कि हम क्या कर सकते थे, यहां के लोगों की क्षमता की है  कि क्या बन सकते थे, कहां तक पहुंच सकते थे।उनकी जब आलोचना होती है तो इसके लिए होती है।इस वजह से देश की और यहां के लोगों की क्षमता का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया। एक हिमंत बिस्वसरमा एक फार्मूला लेकर आते हैं और विवाद का हल शुरू हो जाता है। आप इससे अंदाजा लगाइए कि यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। बात नीयत की थी, बात राजनीतिक इच्छाशक्ति की थी। अगर कांग्रेस की सरकार केंद्र में होती औरहिमंत बिस्वसरमा भाजपा के मुख्यमंत्री के तौर पर केंद्र के पास इस प्रस्ताव को लेकर जाते  तो हो सकता इसे रिजेक्ट कर दिया जाता या ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता।ये जो डबल इंजन की सरकार की बातें होती है वो यहां पर काम करता है। राज्य में और केंद्र में अगर भाजपा की सरकार नहीं होती तो यह मुद्दा भी हल नहीं होता।

राजनीतिक इच्छाशक्ति से विवाद का हल

हिमंत बिस्वसरमा के मुताबिक अगले ढाई-तीनसाल में पूर्वोत्तर राज्यों के सभी आपसीसीमा विवाद सुलझा लिए जाएंगे। उनके लिए कमिटियां बन रही हैं, बातचीत शुरू हो रही है, किस आधार पर फैसला करना है यह भी तय हो रहा है जिसमें केंद्र सरकार का पूरा सहयोग है। राजनीतिक इच्छाशक्ति है, हल निकालने की इच्छा है, मिलकर आगे चलने की इच्छा है इसलिए यह सब हो पा रहा है। यह फर्क है कांग्रेस और नरेंद्र मोदी के शासन में। जब भी आप तुलना करें तो इन बड़ी बातों पर आपकी नजर होनी चाहिए कि किस तरह का परिवर्तन हो रहा है। आप देखिए कि इस सरकार की आधी से ज्यादा शक्तियां तो पिछली सरकारों की गलतियों को सुधारने में लग रहा है, उनको ठीक करने में खर्च हो रहा है। अगर यह सब पहले हो गया होता तो आप सोचिए कि ये राज्य किस स्थिति में होते, उनके विकास पर कितना असर पड़ा होता है।मगर जब आप दोराज्यों को या दो लोगों को लड़ाने में अपनी काबिलियत समझते हैं तब समस्याओं के हल नहीं निकलते हैं। समस्याओं के हल तब निकलते हैं जब आप उसे निकालना चाहते हैं, जब आपमें राजनीतिक इच्छा शक्ति होती है जो कि अब हो रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले ढाई-तीन साल में पूर्वोत्तर के राज्यों के आपसी सीमा विवाद समाप्त हो जाएंगे जिसकी शुरुआत हो चुकी है।

जब राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ा भारत का इतिहास

देश-दुनिया के इतिहास में 22 जुलाई की तारीख तमाम अहम वजह से दर्ज है। भारत की आजादी के इतिहास में इस तारीख का खास महत्व है। यह इतिहास राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ा है। दरअसल 22 जुलाई, 1947 को ही दिल्ली के कांस्टिट्यूशनल हॉल में संविधान सभा के सदस्यों की बैठक में तिरंगे को देश के राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर अंगीकार किया गया था। इस बैठक में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आजाद भारत के लिए एक झंडे को अपनाने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव पर गहन चर्चा हुई और फैसला लिया गया कि केसरिया, सफेद और हरे रंग वाले झंडे को ही कुछ बदलावों के साथ आजाद भारत का झंडा बनाया जाए।भारत के वर्तमान राष्ट्रध्वज को बनाने का श्रेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिंगली वेंकैया को जाता है। वेंकैया के बनाए ध्वज में लाल और हरे रंग की पट्टियां थीं, जो भारत के दो प्रमुख धर्मों का प्रतिनिधित्व करतीं थीं। 1921 में पिंगली जब इसे लेकर गांधी जी के पास गए, तो उन्होंने ध्वज में एक सफेद रंग और चरखे को भी लगाने की सलाह दी। सफेद रंग भारत के बाकी धर्मों और चरखा स्वदेशी आंदोलन और आत्मनिर्भर होने का प्रतिनिधित्व करता था।

1923 में नागपुर में एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान हजारों लोगों ने इस ध्वज को अपने हाथों में थामा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इस ध्वज का इस्तेमाल किया। 1931 में कांग्रेस ने इस ध्वज को अपने आधिकारिक ध्वज के तौर पर मान्यता दी। हालांकि भारत के नागरिकों को राष्ट्रीय पर्व के अलावा किसी भी दिन अपने घर और दुकानों में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की छूट नहीं थी। 2002 में इंडियन फ्लैग कोड में बदलाव किए गए। अब हर भारतीय नागरिक किसी भी दिन अपने घर, दुकान, फैक्टरी और ऑफिस में सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहरा सकता है।

भारत के झंडा गीत या ध्वज गीत की रचना श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने की थी। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा…नामक झंडा गीत को 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वीकार किया गया था। झंडा गीत हमारे जीवन में विशेष महत्व रखता है। यह हमारे गौरव का प्रतीक है।(एएमएपी)

‘डिप्लोमा इन करप्शन’ के मंचन की जानिब से

सत्यदेव त्रिपाठी।
फ़रवरी की एक शाम सातबंगला, मुंबई में ‘वेदा फ़ैक्ट्री आर्ट स्टूडियो’ में सुरेंद्र चतुर्वेदी लिखित नाटक ‘डिप्लोमा इन करप्शन’ का मंचन हुआ। ‘ओंकार थिएटर ऐंड बेस्ट वे मोशन पिक्चर्स’ समूह के लिए इसका निर्देशन योगेश शर्मा ने किया है। और अवसरानुकूल इस प्रस्तुति का सबसे शुभ पक्ष है सद्य: दिवंगत हुए नाटककार के प्रति श्रद्धांजलि की भावभीनी संवेदना!

इसी नाट्यसमूह का योगेश शर्मा द्वारा ही निर्देशित एक नाटक ‘अपने ही पुतले’ का मंचन अभी माह-डेढ़ माह पहले हुआ था। इस बार पता लगा कि यह समूह अपना नाट्याभ्यास सुबह सात बजे से 10-11 बजे तक किसी सार्वजनिक उद्यान में करता है। सुनकर अनोखा भी लगा, रोमांचक भी। ऐसी साधना और आज के ऐसे संकट काल में यह सक्रियता बड़ा मायने रखती है, थिएटर-कर्म के लिए बड़ी उम्मीद जगाती है। वह नाटक जीवन-सृजन के बीच द्वंद्व का था। कई विमर्श लिये हुए था। लेकिन यह नाटक, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, भ्रष्टाचार पर केंद्रित है और भ्रष्टाचार की खानें सिद्ध हुई हैं- सत्ता-सरकार व सरकारी महकमे। परसाईजी ने लिखा है – सत्ता के कण-कण में भ्रष्टाचार भरा है। और इस विषय पर इतना लिखा- कहा- खेला- गाया- बजाया गया है कि नाम सुनते ही ऊब-सी आने लगती है।

बात तरीक़े यानी शैली की

ऐसे में वस्तु (कंटेंट) को लेकर तो कोई जिज्ञासा या कुत्तूहल रह नहीं जाता। अब बचती है बात तरीक़े की याने शैली की। तो लेखक ने बड़ा अच्छा उठाया कि एक सेवामुक्त अध्यापक इस भ्रष्ट होते जा रहे समाज को शिष्टाचार सिखाना चाहता है और प्रचार के तौर पर इसकी सूचना अख़बार में भेजता है, जहां गलती से ‘डिप्लोमा इन करप्शन’ छप जाता है। नाट्यालेख का यह विधान विचारणीय है, क्योंकि नाटक के सारे सरंजाम का मूल कारण अख़बार की यह गलती ही है। सवाल है यह हुई कैसे? ऐसी ग़लतियाँ कुछ समान शब्दों में वर्तनी के हर-फेर से होती हैं। तो मास्टरजी ने क्या लिख के दे दिया था? यदि ‘शिष्टाचार में डिप्लोमा’ लिखा, तो भी अधिकतम ग़लत होता, तो ‘भ्रष्टाचार में डिप्लोमा’ बनता। यह ‘करप्शन’ कहाँ से कूद आया? और यह सिर्फ़ शीर्षक में आया- वरना लगभग पूरे नाटक में भ्रष्टाचार छाया है। तो क्या अख़बार ने उनका दिया पूरा रद्द करके नया ही शीर्षक दे दिया?

 

अब डिप्लोमा पर आयें…। घर में पढ़ा-सिखाकर कोई डिप्लोमा कैसे दिया जा सकता है? डिप्लोमा देना हो, तो पहले संस्था को सरकार के यहाँ पंजीकृत कराना होगा, मान्यता लेनी होगी? इस सबके उल्लेख मात्र के भी बिना ऐसा सब घटित होने से तो नाटक का बिस्मिल्ला ही ग़लत हो जाता है…। यह सब विवेचन इसलिए ज़रूरी है कि रचना के पीछे भी जीवन-जगत की कोई संगति होती है। यूँ ही या हवा में कुछ भी नहीं होता – न रचना में, न जीवन में।
और भारतीयता में अपार आस्था रखने वाले मुझ जैसे व्यक्ति के लिए तो ‘करप्शन’ के साथ ‘डिप्लोमा’– याने शीर्षक के दोनो शब्द खाँटी अंग्रेज़ी के- गोया दोनो गाल पर तमाचा मार रहे हों! भाई, जिस भाषा में नाटक लिखना-करना है, उस भाषा में यदि शीर्षक तक रखने की लियाक़त नहीं है, तो नाटक क्यों लिखना! अंग्रेज़ी में लिखिए। हाँ, कोई तकनीकी, रूढ़ शब्द हो या जिसकी हिंदी प्रचलित हो ही नहीं, तो अवश्य समझा जा सकता है। और यह बात मैं तमाम फ़िल्मों व अखबारी भाषाओं के लिए भी कहता रहता हूँ। अब कोई कहेगा कि जमाने का चलन ही यही है, तो मै कहूँगा कि चलन पर चलने वाला ‘चलताऊ’ भर होता है। चलन (प्रैक्टिस) में होने से कोई बात सही नहीं हो जाती – ख़ासकर सृजन के क्षेत्र में। सृजन का अर्थ ही है- नवनिर्माण। इसकी मूल वृत्ति ही ‘नये प्रयोग’ से बावस्ता होती है।

लिखे से बंधे हुए प्रस्तोता

इस सबसे छनकर यही आता है कि स्वर्गीय चतुर्वेदी का व्यामोह है कि अंग्रेज़ी नाम ज्यादा असरकारक होता है। और प्रस्तोता बेचारे लिखे से बंधे हुए… लेकिन यदि यह बात मन में आती, तो करार के समय यह बदलाव लिखा लेना चाहिए और उनके ‘ना’ कहने पर नाटक को छोड़ देने, न करने का साहस भी होना चाहिए– बशर्ते प्रतिबद्धता हो!
इसी प्रकार की दो असंगतिया और होती हैं शुरू में ही। जैसे ही मास्टरजी अख़बार में खबर पढ़ते ही  सम्पादक को फ़ोन लगा देते हैं। वह मास्टरजी का दोस्त है। सो, दफ़्तर बुला लेता है और वे तैयार होने लगते हैं। अब पहली असंगति यह कि सुबह-सुबह कौन सा दफ़्तर खुलता है- वह भी अख़बार का? दूसरी यह कि गलती को ठीक करने के लिए मास्टरजी को जाने की क्या ज़रूरत? वह तो खबर लगाने वाला व फिर यंत्र करेगा…!

बहरहाल, सम्पादक के बुलावे पर जाने के लिए तैयार होने के साथ नाट्यालेख के जो सूत्र जुड़ते हैं, वह बेहद रंगमंचीय साबित होते हैं…। वे जाने वाले ही होते हैं कि इतने में अख़बार पढ़ कर पहले तो एक-एक करके सरकारी महकमे के लोग आने लगते हैं– नगरपालिका, पुलिस, आयकर विभाग आदि। हास्य-व्यंग्य नाटक में झट-पट की नाटकीयता का यह बेहद सटीक संयोजन है। मास्टरजी के निकलते हुए एक जूते का न मिलना- और अंत तक न मिलना भी हास्य का ठीकठाक आयोजन बन पड़ा है। जूते की खोज के दौरान ही पहला व्यक्ति आ जाता है। उसके जाने के बाद फिर जूते की खोज के बीच दूसरा… फिर तीसरा… इस प्रकार समय का यह संयोजन (टाइमिंग) ख़ासा नाटकीय सिद्ध हुआ है। बार -बार जाने को उद्यत होने, रुक जाने, पैसे देने… आदि रूटीन कार्यों को इतनी सफ़ाई से करते हैं मास्टर-मास्टरनी कि एकरसता नहीं आती। इन दृश्यों पर निर्देशक का पूरा संयम (कंट्रोल) भी बिना ज़ाहिर हुए कारगर होता रहता है। और ये दृश्य ही पूरे नाटक हैं, जिन्हें देखना होगा – पढ़ाके मै आपका व नाटक का मज़ा किरकिरा न करना चाहूँगा।

हास्य में उभरता शातिर व्यंग्य

 

 

ज़ाहिर है कि सभी इस कार्य को लेकर वैधानिक सवाल खड़ा करते हैं और पैसे लेकर चुपचाप चलने देने की छूट दे देते हैं। पैसे के मोल-भाव, ना-नुकूर व अंत में पत्नी से दिलवाने में भी बड़े क़ायदे के हँसी के क्षण जुटे हैं। लेकिन इन हास्य आयोजनों में उभरता है शातिर व्यंग्य- कि इसी तरह देश चल रहा है। पैसा सब कुछ को जायज़ बना देता है। आज के समय को जानने वाले एक पक्ष के लोग इसमें जोड़ सकते हैं कि मौजूदा केंद्रीय सरकार एवं उसकी पार्टी वाले प्रांतों की सहयोगी सरकारों ने कुछ बड़े-बड़े माफ़ियाओं को पकड़ा है, लेकिन घुन की तरह हर महकमे की कुर्सी-कुर्सी में घुस कर और चाल-चाल कर देश को छननी-छलनी कर देने वाले इस दैनंदिन के भ्रष्टाचार का क्या होगा?

लेकिन नाटक देखते हुए इस बात पर इतना ध्यान न जाना भी हास्य-व्यंग्य की कुदरत होती है। क्योंकि इधर ध्यान गया, तो नाटक का मज़ा न आयेगा। फिर और इस प्रकार के नाटक का मूल उद्देश्य होता है दर्शक को खुश कर देना- लहका देना। तालियाँ-ठहाके न आयें, तो हास्य-व्यंग्य फेल- याने नाटक फेल। और आते रहे, तो समाज-परिवर्तन एवं विरोध वाला नाटक-विधा का मक़सद फ़ौत…! और यह सीमा हास्य-व्यंग्य विधा की है। इस सीमा को तोड़कर पार जाने वाले सक्सेनाजी के ‘बकरी’, शरद जोशी के ‘एक था गधा’… और परसाईजी के व्यंग्यों ‘सदाचार का तावीज़’ व ‘भोलाराम का जीव’… आदि की प्रस्तुतियाँ हुईं, लेकिन अब न रहे ऐसे देवता… और हों भी कहीं, तो उन्हें खोजकर उन पर अक्षत चढ़ाने वाले नहीं मिलते…! फिर इस हास्यमय घटना-प्रवाह में ज्ञानेस्वर वाघमारे के प्रकाश व सुमित जोशी के संगीत पर ध्यान देने के लिए दूसरा शो देखना चाहिए।

व्यंग्य जो लोगों के पल्ले पड़ा

आमंत्रण की सूचना में शीर्षक के साथ कथा-सार पढ़कर मेरे मन में नाटक का जो खाका उभरा, वह यूँ कि भ्रष्टाचार सीखने वालों की क़तारें लग जायेंगी…और तब मारक व्यंग्य यूँ बनेगा कि ऐसी चीजें सीखने का ही जमाना है– शिष्टाचार छपा होता, तो कोई न आता। फिर यह अध्यापक उस अख़बार वाले का शुक्रिया अदा करेगा….! लेकिन ऐसा सब न होकर अच्छा ही हुआ। प्रदर्शन में सरकारी विभागों का आना ज्यादा समझ में आने वाला बना, व्यंग्य भी ज्यादा सीधा बनकर आ गया और लोगों के पल्ले पड़ा। पात्र बन आने वालेशिवि सिंहल, उत्कर्ष राज, बालाजी सिंह राजपूत और संतोष यादव… सभी अपने-अपने विभागों के अनुरूप अपनी एक-एक अलहदा ख़ासियत लिये हुए प्रकटे– वेशभूषा की, रूप की, संवादों की, लहजे की, अदाओं की। सबके लिए प्रतिक्रियाएँ भी बड़ी अच्छी आयीं।

लेकिन तब तक उत्कर्ष (क्लाइमेक्स) आते-आते आँखें फटी की फटी रह गयीं… उँगली दब गयी दांतों तले… यह क्या,किन्नर आ गये…! इनका तो कोई विभाग नहीं होता! फिर इनके आने का कोई तुक समझ में नहीं आया… लेकिन तब तक तो दर्शकों में ख़ुशी का ज्वार आ गया… तालियों व होहो की पुकार के साथ सीटियाँ भी बजीं… सब कुछ अल्ट्रा मॉडर्न- सचमुच का चरम-उत्कर्ष (सुपर-क्लाइमेक्स)। और मेरी भी समझ में इस दृश्य का मक़सद आ गया। निर्देशक को पहले से ही मालूम था– तभी तो सबसे बड़ा दृश्य इसी को बनाना था और वे सारी हरकतें, सारे नख़रे करने का मौक़ा दिया गया… इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए अगुई चरित्र चम्पा बने रोहित चौधरी छा गये और शेष लोग बंटी-राम-यश मिश्रा आदि ने भी खुलकर सहयोग दिया। और इस दृश्य ने तो अब तक स्वर्ग के द्वार तक पहुँची प्रस्तुति को सीधे मोक्ष ही दिला दिया!

फिर इस मुक़ाम पर पहुँचकर तो सब कुछ के कर्त्ता-धर्ता मास्टर मोहन बाबू एवं उनकी पत्नी कस्तूरी देवी भी द्रष्टा ही बनकर रह गये– महफ़िल तो लूट ली दर्शकों सहित बाक़ियों ने– ‘दुलहिन लइ गयो लच्छ निवासा, नृप समाज सब भयउ उदासा’।

जबकि मास्टर के रूप में निर्देशक स्वयं श्री योगेश शर्मा का बेहद सलीके का सहज नाट्यमय अभिनय और सब कुछ की भोक्ता कस्तूरी देवी बनी स्वेता (श्वेता क्यों नहीं?) मोंडल की सधी-सजग-शालीन-आज्ञाकारी उपस्थिति को प्रस्तुति का श्रिंगार होना था। लेकिन गोया दुष्यंतजी ही साकार हुए–
‘दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो, तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गये’!
(लेखक कला एवं संस्कृति से जुड़े विषयों के विशेषज्ञ हैं)

गंधर्व वापस अपने लोक गए

लड़ाई रुक गई, पर इससे पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति पर गहरा असर होगा

#pramodjoshiप्रमोद जोशी । 

भारत ने 7 मई को नौ स्थानों पर हमले करने के बाद स्पष्ट कर दिया था कि हमारा इरादा और किसी जगह पर हमला करने का नहीं है। हमारा उद्देश्य केवल आतंकी गतिविधियों का संचालन करने वालों को सजा देना है। आज भारत ने उन पाँच बड़े आतंकवादियों की सूची जारी की, जो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान मारे गए। पाकिस्तानी सेना ने इस बात को स्वीकार नहीं किया और जवाबी हमले शुरू कर दिए। भारतीय सेना लगातार कह रही थी कि हम अब पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई का उसी जगह और उसी गति से जवाब देंगे। आज भारत ने यह बात भी सिद्धांततः घोषित कर दी कि भविष्य में किसी भी आतंकी कार्रवाई को हम  भारत के खिलाफ युद्ध की घोषणा मानेंगे। पाकिस्तानी सेना को लगता था कि जवाब नहीं देंगे, तो नाक कटेगी। अंततः उन्होंने नाक कटवा कर युद्धविराम को स्वीकार कर लिया। 

भारत ने कहा है कि पाकिस्तान के साथ अब केवल युद्धविराम की प्रक्रिया से जुड़े मसलों पर ही बात होगी। शेष किसी भी विषय पर वार्ता नहीं होगी। सबसे बड़ा सवाल सिंधु जल-संधि से जुड़ा है। मुझे लगता है कि भारत अब भारत इस संधि की शर्तों में बदलाव पर जो़र देगा। बहरहाल देखना होगा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’  के तहत तीन दिन चली लड़ाई का पाकिस्तानी राजनीति पर क्या असर होगा। उससे भी बड़ा सवाल जनरल आसिम मुनीर के भविष्य का है। लगता है कि पाकिस्तान की सेना के भीतर उनका विरोध हो रहा है।

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शनिवार शाम को पुष्टि की कि पाकिस्तान द्वारा भारत से संपर्क करने के बाद भारत अमेरिका की मध्यस्थता में युद्ध विराम पर सहमत हो गया है। इससे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति  डॉनल्ड ट्रंप ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में कहा, अमेरिका की मध्यस्थता में हुई एक लंबी बातचीत के बाद, मुझे यह घोषणा करते हुए ख़ुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान ने पूर्ण और तत्काल सीज़फ़ायर पर सहमति जताई है।

इसके कुछ ही देर बाद भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने एक संक्षिप्त बयान जारी कर संघर्ष-विराम पर सहमति की जानकारी दी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर कहा कि भारत और पाकिस्तान व्यापक मुद्दों पर बातचीत शुरू करने पर राज़ी हो गए हैं। उन्होंने लिखा, “मुझे ये बताते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान तत्काल सीज़फ़ायर करने और एक निष्पक्ष स्थान पर व्यापक मुद्दों पर बातचीत करने के लिए सहमत हो गए हैं। इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस विषय पर विस्तृत जानकारी दी। इस ब्रीफिंग में कर्नल सोफिया कुरैशी ने इस दौरान पाकिस्तान के दुष्प्रचार को गलत बताया।

इसके पहले पाकिस्तानी वायु सेना के जेट विमानों ने शनिवार सुबह श्रीनगर पर हमला किया, भारतीय सशस्त्र बलों ने “प्रभावी रूप से” उसका जवाब दिया। भारतीय मीडिया के कुछ चैनल बता रहे हैं कि भारतीय एयर डिफेंस ने पाकिस्तान के दो विमानों को मार गिराया है। कल रात भारत ने पाकिस्तान के उन हवाई अड्डों को निशाना बनाया, जहाँ से ड्रोन भेजे जा रहे थे। इस बीच एक खबर यह भी है कि पाकिस्तान का एक फतह-2 मिसाइल (रॉकेट) सिरसा के पास गिरा लिया गया। इस मिसाइल का निशाना दिल्ली बताया गया है।

पाकिस्तान ने शुक्रवार रात और शनिवार सुबह भारतीय सीमावर्ती जिलों में कई ड्रोन हमले किए, जिनमें भारत की वायु रक्षा प्रणाली ने उन्हें रोक दिया। इस बीच, राजौरी के अतिरिक्त जिला आयुक्त राज कुमार थापा के साथ-साथ कश्मीर जिले की डीसी कॉलोनी में पाकिस्तान की ओर से भारी गोलाबारी में दो अन्य नागरिकों की मौत हो गई। कल रात राजौरी में डीसी कॉलोनी में उनके घर पर गोला गिरने से थापा घायल हो गए थे क्योंकि इलाके में रात भर भारी गोलाबारी जारी रही। कुछ घंटों बाद उनकी मौत हो गई। शुक्रवार शाम को श्रीनगर के हवाईअड्डा क्षेत्र, सांबा, जम्मू शहर और जम्मू-कश्मीर के बारामुला, पंजाब के पठानकोट और फिरोजपुर और राजस्थान के बाड़मेर में विस्फोटों की आवाज सुनी गई।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

मस्क ने फिर किया Twitter में बदलाव, चिड़िया की जगह अब X आया

ट्विटर को अब X के नाम से जाना जाएगा। ट्विटर का डोमेन भी अब Twitter.com से X.com हो गया है। पिछले साल इसे खरीदने वाले अमेरिकी अरबपति एलन मस्क ने सबसे बड़े बदलाव के तौर पर पुराने Twitter को खत्म करते हुए नए X की शुरुआत की है। अब ट्विटर का नाम बदलकर X हो गया है और नीली चिड़िया (ब्लू बर्ड) वाले लोगो की जगह X लोगो दिख रहा है। यही नहीं, अब प्लेटफॉर्म का नया URL भी बदलकर x.com कर दिया गया है। ये बदलाव प्लेटफॉर्म पर लाइव हो चुके हैं।ट्विटर सीईओ लिंडा याकारिनो ने खुद इस बदलाव की जानकारी दी है और मस्क के दावे पर मुहर लगाई है। एलन मस्क ने पहले ही संकेत दिए थे कि ट्विटर में ढेरों बदलाव करते हुए वह बिल्कुल नया अनुभव यूजर्स को देंगे और वह ढेरों बदलाव कर भी चुके थे, लेकिन अब उनकी ओर से सबसे बड़ा कदम उठाया गया है। प्लेटफॉर्म की पहचान पूरी तरह से बदलने के पीछे मकसद है कि मस्क Twitter नाम के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। इस बदलाव को लोगों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है।

x.com लिखने पर हो रहा twitter पर रीडायरेक्ट

मस्क ने ट्वीट में बताया था कि ट्विटर में किया जा रहा बदलाव धीरे-धीरे सभी मार्केट्स में यूजर्स को दिखने लगेगा और इसकी शुरुआत कर दी गई है। ट्विटर के आधिकारिक अकाउंट के नाम से लेकर प्रोफाइल फोटो तक बदल चुकी है। हालांकि, इसका हैंडल अब भी @twitter ही है। इसके अलावा अब यूजर्स को x.com पर जाने की स्थिति में ट्विटर पर रीडायरेक्ट किया जा रहा है।

Threads से मिल रही है टक्कर

मार्क जुकरबर्ग की सोशल मीडिया Meta ने बीते दिनों Threads by Instagram ऐप लॉन्च की है, जिसका कॉन्सेप्ट काफी हद तक Twitter से मिलता-जुलता है। इसे Twitter के विकल्प के तौर पर पेश किया गया है और खुद मस्क भी Threads लॉन्च से खुश नहीं हैं। बेहद कम वक्त में एक करोड़ से ज्यादा यूजर्स जुटाते हुए Threads सबसे तेज बढ़त दर्ज करने वाली सोशल मीडिया ऐप बनी है। नए बदलाव के साथ मस्क बेहतर सोशल ऐप का वादा दोहरा रहे हैं।

पहले भी बदला गया था ट्विटर लोगो

एलन मस्क ने पिछले साल ट्विटर खरीदने के बाद से इसमें कई बड़े बदलाव किए हैं और ब्लू टिक के लिए यूजर्स को मंथली सब्सक्रिप्शन लेने का विकल्प दिया गया है। इससे पहले मस्क ने मजाक में डोजीकॉइन क्रिप्टो टोकन के लोगो शीबा इनू डॉग मीम को ट्विटर का लोगो बना दिया था। मस्क ट्विटर में आए दिन ऐसे बदलाव कर रहे हैं, जो सुर्खियां बनते हैं। देखना होगा कि नई पहचान के साथ X खुद को साबित कर पाता है या नहीं। (एएमएपी)