कब-कब आया ऐसा अविश्वास प्रस्ताव
पहली बार इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ अगस्त 1966 में एचएन बहुगुणा अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे। इसके बाद नवंबर 1966 में उमाशंकर त्रिवेदी ने दोबारा नो कॉन्फिडेंस मोशन पेश कर दिया। 1970 में मधु लिमाये ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार के खिलाफ वाईबी चव्हाण अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए। 2003 में अटल सरकार के खिलाफ सोनिया गांधी की अगुवाई में विपक्ष ने प्रस्ताव पेश किया था। पीएम मोदी के पिछले कार्यकाल में भी जब एक साल बचा था तब विपक्ष ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव रखा था। इसे श्रीनिवास केसिनेनी ने पेश किया था।
1979 में जब मोरारजी देसाई सरकार के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ तब सरकार का तीन साल का कार्यकाल बचा हुआ था लेकिन यह सरकार पहले ही गिर गई। इन 6 अविश्वास प्रस्तावों में से पांच मानसून सत्र में ही पेश हुए थे। अब इस बार कंग्रेस नेता गौरव गोगोई ने अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया है जिसपर चर्चा होनी है। इंदिरा गांधी के खिलाफ 12 और बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था।

संसदीय आंकड़ों के मुताबिक अब तक देश की सरकारों के खिलाफ 27 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है। वहीं गौरव गोगोई की तरफ से पेश किया गया प्रस्ताव 28वां है। नियम के मुताबिक स्पीकर को 10 दिन के भीतर अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा करवानी है। खास बात यह रही है कि मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की सरकार को छोड़ दें तो सभी सरकारें अविश्वास प्रस्ताव का सामना सफलता से कर गई हैं। मोरारजी देसाई ने सदन में चर्चा के दौरान ही इस्तीफा दे दिया था।
क्या है विश्वास मत और अविश्वास प्रस्ताव में अंतर
विश्वास मत और अविश्वास प्रस्ताव में बड़ा अंतर है। दरअसल अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जाता है जबकि विश्वास मत मौजूदा सरकार लाती है। अगर स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव मंजूर करते हैं और फिर सत्तापक्ष बहुमत साबित नहीं कर पाया तो सरकार गिर जाती है। वहीं सरकार जब विश्वास प्रस्ताव लाती है तो इकसका पारित होना जरूरी होता है नहीं तो सरकार गिर जाती है। दो स्थितियों में सरकार विश्वास मत लाती है। पहला सरकार गठन के बाद बहुमत परीक्षण के लिए और दूसरा राष्ट्रपति या फिर राज्यपाल के कहने पर। अगर किसी सरकार के घटक दल टूटने लगते हैं तो राज्यपाल या राष्ट्रपति विश्वास मत हासिल करने को कह सकते हैं। इसे फ्लोर टेस्ट भी कहा जाता है। अविश्वास प्रस्ताव एक बार लाए जाने के छह महीने बाद दोबारा लाया जा सकता है।
विश्वास मत से अलग है अविश्वास प्रस्ताव
बता दें कि विश्वास मत और अविश्वास प्रस्ताव में फर्क है। विश्वास मत के दौरान तीन सरकारें गिर चुकी हैं। 1990 में वीपी सिंह की सरकार, 1997 में एचडी देवगौड़ा और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार विश्वास मत हासिल ना कर पाने की वजह से गिर गई। 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सोनिया गांधी ने रखा था। सदन में तीखी बहस हुई थी हालांकि वाजपेयी सरकार बच गई थी। एक साल बाद चुनाव हुए और बीजेपी की हार हुई।
2018 में जब मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो सरकार ने 325-126 से इसे जीत लिया। इस बार भी लोकसभा में नंबर्स एनडीए के पक्ष में हैं। एनडीए के 330 सदस्य हैं जबकि INDIA के पास केवल 141 सांसद। (एएमएपी)
प्रमोद जोशी।



डॉ मीनाक्षी जैन दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर रह चुकी हैं। उन्होंने भारतीय सभ्यता, धर्म और राजनीति से संबंधित कई पुस्तकें लिखी हैं। इस तथ्य का उल्लेख ज्यादा नहीं हुआ है कि वे टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक गिरिलाल जैन की पुत्री हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। सामाजिक आधार और जाति एवं राजनीति के बीच संबंधों पर उनका शोध प्रबंध 1991 में प्रकाशित हुआ था। इतिहास के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए 2020 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। उनकी कुछ पाठ्य पुस्तकों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
2019 में अयोध्या विवाद पर चले सर्वोच्च न्यायालय के मुकदमे में उनकी पुस्तक का संदर्भ भी दिया गया था, जिसमें कहा गया है कि जन्मभूमि स्थल पर ऐतिहासिक रूप से राम मंदिर मौजूद था। उनका कहना है कि अंग्रेजों द्वारा इस स्थल को राम का जन्मस्थान मानने के बाद वामपंथी इतिहासकारों ने ऐतिहासिक और सरकारी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की। जैन के अनुसार, 1989 से पहले के सभी साहित्यिक साक्ष्य, इस तथ्य की ओर इशारा करते थे। उन्होंने यह भी लिखा है कहा कि मुसलमानों का एक वर्ग चाहता था कि अयोध्या में राम मंदिर स्थल हिंदुओं को सौंप दिया जाए, लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने मुसलमानों को यह विश्वास दिलाकर विवाद को ज़िंदा रखा कि उनके पास राम मंदिर के ख़िलाफ़ एक मज़बूत तर्क है और उन्हें इसके लिए सबूत देने का वादा किया।
सत्यदेव त्रिपाठी।
समापन सत्र में विवेक अग्रवाल ने कहा, भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र का यूनेस्को की ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर’ में अंकन होना राष्ट्र के लिए गर्व का क्षण है। यह उपलब्धि ‘ज्ञान भारतम् मिशन ऑन मैन्यूस्क्रिप्ट्स’ के शुभारम्भ के साथ-साथ आई है, जिसका उद्देश्य केवल पाण्डुलिपियों का संरक्षण नहीं, बल्कि उनमें संचित ज्ञान को विद्वानों, छात्रों और सामान्य जन तक सक्रिय रूप से पहुंचाना भी है। उन्होंने पूरे देश में संस्थानों और व्यक्तियों का एक ऐसा नेटवर्क बनाने की योजना पर बल दिया, जो सूचना साझा करने, क्षमता निर्माण और निजी ट्रस्टों व धार्मिक संस्थाओं सहित पाण्डुलिपि-संग्रहण केन्द्रों के लिए वित्त पोषण सुनिश्चित कर सके। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्राचीन लिपियों को समझना और इतिहास में विद्यमान रिक्तियों को भरना आज आवश्यक है, जिसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग जैसी उन्नत तकनीकों की सहायता से संभव किया जा सकता है।
अध्यक्षीय सम्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यूनेस्को ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ नामांकन के संदर्भ में आईजीएनसीए की भूमिका निरंतर बढ़ रही है और हाल ही में जिन डोजियर का निर्माण हुआ, वे पूरी तरह से आईजीएनसीए के विद्वानों द्वारा तैयार किए गए हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि छह देशों के प्रतिनिधियों के साथ आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के माध्यम से आईजीएनसीए अब क्षमता निर्माण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है। डॉ. जोशी ने सितंबर में भारत मंडपम में आयोजित होने वाले ‘ज्ञान भारतम मिशन’ पर आधारित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की ज़िम्मेदारी आईजीएनसीए को सौंपे जाने के लिए मंत्रालय का आभार प्रकट किया। उन्होंने वर्तमान में चल रही परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें कल्हण के राजतरंगिणी की मूल शारदा पांडुलिपि का पता लगाना तथा ‘लोकतंत्र की जननी’ के रूप में भारत के दावे को पुष्ट करने वाले उत्तरमेरु शिलालेखों का पूर्ण दस्तावेज़ीकरण सम्मिलित है। उन्होंने संगोष्ठी में भाग लेने वाले सभी प्रतिष्ठित विद्वानों और युवा शोधार्थियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

प्रदीप सिंह।