सबसे ज्‍यादा अविश्‍वास प्रस्ताव झेल चुकी इंदिरा, लेकिन हर बार सरकार बचाने में रही सफल

आम चुनाव को एक साल से कम का वक्त रह गया है और लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा रहा है। बुधवार को लोकसभा में कांग्रेस द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। चुनाव से एक साल पहले सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने वाले मोदी दूसरे प्रधानमंत्री बन गए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इस तरह के 6 अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर चुकी हैं। बता दें कि अविश्वास प्रस्ताव के बाद केवल मोरारजी देसाई की सरकार गिरी थी। वहीं विश्वास मत के दौरान तीन बार सरकार गिर चुकी है।

कब-कब आया ऐसा अविश्वास प्रस्ताव

पहली बार इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ अगस्त 1966 में एचएन बहुगुणा अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे। इसके बाद नवंबर 1966 में उमाशंकर त्रिवेदी ने दोबारा नो कॉन्फिडेंस मोशन पेश कर दिया। 1970 में  मधु लिमाये ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार के खिलाफ वाईबी चव्हाण अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए। 2003 में अटल सरकार के खिलाफ सोनिया गांधी की अगुवाई में विपक्ष ने प्रस्ताव पेश किया था। पीएम मोदी के पिछले कार्यकाल में भी जब एक साल बचा था तब विपक्ष ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव रखा था। इसे श्रीनिवास केसिनेनी ने पेश किया था।

1979 में जब मोरारजी देसाई सरकार के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ तब सरकार का तीन साल का कार्यकाल बचा हुआ था लेकिन यह सरकार पहले ही गिर गई। इन 6 अविश्वास प्रस्तावों में से पांच मानसून सत्र में ही पेश हुए थे। अब इस बार कंग्रेस नेता गौरव गोगोई ने अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया है जिसपर चर्चा होनी है। इंदिरा गांधी के खिलाफ 12 और बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था।

संसदीय आंकड़ों के मुताबिक अब तक देश की सरकारों के खिलाफ 27 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है। वहीं गौरव गोगोई की तरफ से पेश किया गया  प्रस्ताव 28वां है। नियम के मुताबिक स्पीकर को 10 दिन के भीतर अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा करवानी है। खास बात यह रही है कि मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की सरकार को छोड़ दें तो सभी सरकारें अविश्वास प्रस्ताव का सामना सफलता से कर गई हैं। मोरारजी देसाई ने सदन में चर्चा के दौरान ही इस्तीफा दे दिया था।

क्या है विश्वास मत और अविश्वास प्रस्ताव में अंतर

विश्वास मत और अविश्वास प्रस्ताव में बड़ा अंतर है। दरअसल अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जाता है जबकि विश्वास मत मौजूदा सरकार लाती है। अगर स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव मंजूर करते हैं और फिर सत्तापक्ष बहुमत साबित नहीं कर पाया तो सरकार गिर जाती है। वहीं सरकार जब विश्वास प्रस्ताव लाती है तो इकसका पारित होना जरूरी होता है नहीं तो सरकार गिर जाती है। दो स्थितियों में सरकार विश्वास मत लाती है। पहला सरकार गठन के बाद बहुमत परीक्षण के लिए और दूसरा राष्ट्रपति या फिर राज्यपाल के कहने पर। अगर किसी सरकार के घटक दल टूटने लगते हैं तो राज्यपाल या राष्ट्रपति विश्वास मत हासिल करने को कह सकते हैं। इसे फ्लोर टेस्ट भी कहा जाता है। अविश्वास प्रस्ताव एक बार लाए जाने के छह महीने बाद दोबारा लाया जा सकता है।

विश्वास मत से अलग है अविश्वास प्रस्ताव

बता दें कि विश्वास मत और अविश्वास प्रस्ताव में फर्क है। विश्वास मत के दौरान तीन सरकारें गिर चुकी हैं। 1990 में वीपी सिंह की सरकार, 1997 में एचडी देवगौड़ा और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार विश्वास मत हासिल ना कर पाने की वजह से गिर गई। 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सोनिया गांधी ने रखा था। सदन में तीखी बहस हुई थी हालांकि वाजपेयी सरकार बच गई थी। एक साल बाद चुनाव हुए और बीजेपी की हार हुई।

2018 में जब मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तो सरकार ने 325-126 से इसे जीत लिया। इस बार भी लोकसभा में नंबर्स एनडीए के पक्ष में हैं। एनडीए के 330 सदस्य हैं जबकि INDIA के पास केवल 141 सांसद। (एएमएपी)

क्या 9 जुलाई तक हो जाएगा अमेरिका से व्यापार समझौता?

#pramodjoshiप्रमोद जोशी।
अमेरिका के दंडात्मक ‘पारस्परिक टैरिफ’ से बचने की 9जुलाई की समय-सीमा जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, भारत-अमेरिका व्यापार-समझौते की संभावनाएँ बढ़ रही हैं। इसमें सबसे बड़ी बाधा भारत के किसानों और पशुपालकों के हितों की लक्ष्मण रेखा है।

पिछले सप्ताह राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के इस बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कि नई दिल्ली के साथ होने वाला अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) अमेरिका के लिए भारतीय बाजार को ‘खोल देगा’, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है, हाँ, हम समझौता करना चाहेंगे।
ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय में आई, जब मुख्य वार्ताकार राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में एक भारतीय दल 26जून को ही अमेरिका के साथ अगले दौर की व्यापार वार्ता के लिए वाशिंगटन पहुँचा। अग्रवाल वाणिज्य विभाग में विशेष सचिव हैं।

पहला चरण

अमेरिका ने 2अप्रैल को घोषित उच्च टैरिफ को 9 जुलाई तक निलंबित कर दिया था। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि भारत के साथ समझौता उसके पहले हो जाएगा। यह दीर्घकालीन व्यापार-समझौते का पहला चरण होगा।

इस समझौते से भारतीय अर्थव्यवस्था की बदलती दिशा का पता लगेगा। नब्बे के दशक के आर्थिक-उदारीकरण, के बाद आंतरिक-राजनीति में फिर से नई लहरें पैदा होंगी। अमेरिका के सस्ते कृषि-उत्पादों के भारत आने का मतलब है, खेतों और गाँवों में हलचल।

भारत चाहता है कि अमेरिकी कृषि-उत्पादों की सब्सिडी पर भी बात हो। अब लगता है कि दोनों देश, व्यापार-समझौते के पहले चरण पर जल्द ही पहुँचेंगे, शायद काफी हद तक अमेरिकी शर्तों पर, लेकिन भविष्य में भारतीय चिंताओं को संबोधित करते हुए संभावित समायोजन के साथ।

भारतीय विदेश-नीति के लिहाज से यह हफ्ता काफी महत्वपूर्ण होगा। अगले कुछ समय में अमेरिका के साथ व्यापार-समझौते के अलावा यूरोप और चीन के साथ रिश्तों को लेकर भी महत्वपूर्ण गतिविधियाँ होने वाली हैं।

वैश्विक-समीकरण

ब्राज़ील में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन है, जिसमें भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गए हैं। ब्रिक्स इस समय विस्तार की प्रक्रिया से गुज़र रहा, पर इसके साथ ही यह विकसित देशों के जी-7समूह के समांतर खड़ा होने की कोशिश भी कर रहा है। इसपर चीन और रूस का दबदबा बढ़ रहा है।

इसके सदस्य देशों में भारत, दो धाराओं के बीच में है। इस सम्मेलन में रूस और चीन दोनों देशों के राष्ट्रपति भाग नहीं लेने वाले हैं। हाल में एससीओ रक्षामंत्रियों के सम्मेलन में पहलगाम हमले को लेकर संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं होने के बाद से तल्खी बढ़ी है।

इस साल के अंत में चीन में एससीओ का शिखर सम्मेलन होगा, उसमें पीएम मोदी भी भाग ले सकते हैं। ज़ाहिर है कि पहलगाम और सीमा-पार आतंकवाद की बात वहाँ फिर से एकबार उठेगी।

भारत और चीन के बीच 2020के गलवान प्रकरण के बाद से रिश्ते खराब चल रहे हैं, पर हाल में दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू हुई है, जिसमें व्यापार भी शामिल है। भारत की दिलचस्पी चीन के साथ व्यापार में असंतुलन को कम करने में है।

अमेरिका से रिश्ते

भारतीय नीति-निर्माता अमेरिका को चीन की तुलना में बेहतर साझेदार मानते हैं, लेकिन वैश्विक-राजनीति में भारत, अपनी नीतिगत स्वतंत्रता से समझौता नहीं कर सकता। हाल में पाकिस्तान के साथ हुए संघर्ष के दौरान ट्रंप के पाकिस्तानी-झुकाव के बाद, भारत में अमेरिकी विश्वसनीयता को लेकर संदेह हैं।

अमेरिका की सत्ता पर चाहे कोई भी पार्टी रही हो, अमेरिकी प्रशासन मानता है कि अमेरिका के नेतृत्व वाली विश्व-व्यवस्था के लिए चीन सबसे बड़ा खतरा है। नतीजतन, अमेरिका ने न केवल अपने औपचारिक सहयोगियों की ओर, बल्कि दूसरे भागीदारों की ओर भी देखा है। भारत के साथ उसकी साझेदारी इस रणनीति का हिस्सा है।

एक बात यह भी स्पष्ट है कि अमेरिका को भारत के हितों की समझ बहुत कम है। वैश्विक-व्यवस्था के विभिन्न मानदंडों में भारत की वही नीति नहीं हो सकती, जो अमेरिका की है। वह अमेरिका के पिछलग्गू जैसी भूमिका नहीं अपना सकता।

इस समझ के बिना, यह उम्मीद व्यर्थ है कि चीन के मुकाबले भारत, सच्चा प्रति-संतुलन बनाएगा। रक्षा संबंधों के तेजी से विकास से कई बार लगता है कि भारत-अमेरिका रिश्ते अच्छे हैं, पर वस्तुतः दोनों के व्यापार संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। भारत के संरक्षणवाद पर अमेरिका को आपत्ति है, जबकि भारत मानता है कि अमेरिका ने विकासशील देश के रूप में हमें ठीक से समायोजित नहीं किया है।

संतुलनकारी-नीति

हाल में इसराइल और ईरान के बीच हुए फौजी टकराव ने भारत की विदेश-नीति के संतुलन से जुड़े सवाल पूछे हैं। भारत के लिए पश्चिम एशिया महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहाँ हम आई2यू2जैसे समूहों में शामिल हुए हैं और पश्चिम एशिया कॉरिडोर बनाना चाहते हैं। यह हमारी ‘लुक वैस्ट पॉलिसी’ का हिस्सा है।

यह नज़रिया जटिल भू-राजनीतिक तनावों को दूर करते हुए ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों के हितों और क्षेत्रीय संपर्क को संतुलित करने के लिए है। यह यूएई और सऊदी अरब के साथ मज़बूत साझेदारी पर आधारित है, जिनके साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2023-24में क्रमशः 84अरब अमेरिकी डॉलर और 43अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। दूसरी तरफ यह ईरान के साथ परंपरागत रिश्तों पर भी आधारित है।

भारत की नीतिगत पहलों में खाड़ी के माध्यम से भारत को यूरोप से जोड़ने वाला ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ इसराइल के साथ रक्षा सहयोग मज़बूत करना और ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ के माध्यम से ईरान के चाबहार बंदरगाह का विकास शामिल है।

व्यापार-समझौता

विशेषज्ञ संकेत कर रहे हैं कि डेयरी और कृषि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में बाधा बन रहे हैं। भारत ने अब तक किसी भी मुक्त व्यापार समझौते में डेयरी को शामिल नहीं किया है।
इस बीच रायटर्स ने खबर दी है कि भारत सरकार के सूत्रों के अनुसार ऑटो कंपोनेंट, स्टील और कृषि उत्पादों पर शुल्कों को लेकर असहमति के कारण व्यापार-वार्ता में रुकावट आ गई है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप की अनिश्चित व्यापार नीतियों के बीच अभी वॉशिंगटन से ठोस प्रस्तावों की प्रतीक्षा है।

भारत प्रस्तावित 26प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ को वापस लेने पर जोर दे रहा है, जो 9जुलाई से लागू होने वाला है, साथ ही स्टील और ऑटो पार्ट्स पर मौजूदा अमेरिकी टैरिफ में रियायत भी चाहता है। लेकिन कुछ भारतीय अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि अमेरिकी वार्ताकार अभी इन बातों पर सहमत नहीं हैं। (आवाज़ द वॉयस)

प्रकृति की सुंदरता और ऐतिहासिक तथ्यों से रूबरू होने आएं बिहार के वाल्मीकीनगर

अगर आप पर्यावरण प्रेमी है, साथ ही घुमने फिरने के शौख रखते है तो बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के वाल्मीकीनगर जरूर आये। यहां सचमुच आपको कश्मीर के वादियो का एहसास होगा। प्रकृति के अनुपम छंटाओ के साथ अध्यात्मशक्ति का भी यह केन्द्र है। कई ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों से भी आप यहां रूबरू होंगे।बिहार से झारखंड के अलग होने के बाद बिहार के महज नौ फीसदी हरित पट्टी का ज्यादतर हिस्सा आपको यही मिलेगा। विगत डेढ दशक से यहां औसतन सामान्य से भी कम वर्षापात होने से सूखे जैसे हालात के बाद भी यह पूरा इलाका हरा भरा दिखेगा। कलरव करती गंडक नदी के साथ कई नेपाली नदियो से घिरे इस इलाके को भी बिहार सरकार राजगीर एवं बोधगया की तर्ज पर यहां ईको टुरिज्म बढाने पर संजीदा है।

जंगल सफारी,हाथी की सवारी के साथ झूरमूठो में विचरण करते बाघो को भी यहां नजदीक से देख सकते है।साथ ही यहां राफ्टिंग की भरपूर व्यवस्था है।कालांतर में यहां बढी कई सुविधाओ के साथ विलुप्त होते थारू जनजातियो के संस्कृति एवं उनके सुस्वादु व्यंजनो का चटकारा भी यहाँ आप ले सकते है। इतना ही नही यहां के जंगलो से निकले गरम मसाला भी आप सस्ते दरो पर ले सकते है। इतना ही नही यहां आपको नेपाल के संस्कृति एवं प्रकृति सौन्दर्य का भी भरपुर आनंद मिलेगा।

बिहार में एकमात्र वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिज़र्व लगभग 880 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला है,जिसका जुड़ाव नेपाल के राजकीय चितवन नेशनल निकुंज से भी है। सोमेश्वर,दून और चूड़िया पर्वत श्रृंखला के बीच अवस्थित यह पूरा इलाका आपको न केवल मंत्रमुग्ध कर देगा बल्कि एकबार आने के बाद बार बार आने को भी विवश करेगा।प.चंपारण के मुख्यालय बेतिया से 105 किलोमीटर दूर बाल्मीकीनगर के इस राष्ट्रीय उद्यान के भीतरी क्षेत्र 335 वर्ग किलोमीटर हिस्से को 1990 में देश का 18 वाँ बाघ अभयारण्य बनाया गया। हिरण, चीतल, साँभर, तेंदुआ, नीलगाय, जंगली बिल्ली,अजगर जैसे जंगली पशुओं के अलावे चितवन नेशनल पार्क से सटे होने कारण यहां एकसिंगी गैडा और जंगली भैंसा भी दिखाई देते है। इस राष्ट्रीय उद्यान की सैर के लिए दूर-दराज से सैलानी यहां तक का सफर तय करते हैं। इसके अलावा यहां पास में मदनपुर जंगल है, जो अपने फ्लाइंग फॉक्स के लिए प्रसिद्ध है।

फ्लाईंग फॉक्स चमगादड़ की एक प्रजाति है। इऩ्हें आप यहां किसी भी समय देख सकते हैं। इसके अलावा आप अनेक दुर्लभ प्रजाति के पक्षियो को भी चहकते देख सकते हैं। अध्यात्मिक दृष्टि से भी यह पूरा क्षेत्र संपन्न है,इसके एक छोर पर महर्षि बाल्मिकी का वह आश्रम है जहाँ प्रभु श्रीराम के त्यागे जाने के बाद देवी सीता ने आश्रय लिया था। सीता माता ने इसी स्थान पर अपने ‘लव’ और ‘कुश’ दो पुत्रों को जन्म दिया था। महर्षि वाल्मिकी ने हिंदू महाकाव्य रामायण की रचना भी यहीं की थी। आश्रम के मनोरम परिवेश के साथ ही पास ही गंडक नदी पर बनी बहुद्देशीय परियोजना है जहाँ 15 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है और यहाँ से निकाली गयी नहरें चंपारण के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में सिंचाई की जाती है। गंडक बैराज के आसपास का शांत परिवेश चित्ताकार्षक है।

बेतिया महाराज के द्वारा बनवाया गया शिव-पार्वती मंदिर और मदनपुर देवी का स्थान भी दर्शनीय है। यहाँ के सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा इतना मनोरम है कि इसकी व्याख्या शब्दों में करना संभव नहीं है। जंगल में जानवरों को विचरते देखना किसी रोमांच से कम नहीं है। एक ओर खुशहाल जंगल और दुसरी ओर पहाड़ी नदियों अनवरत करलव बरबस सबको आकर्षित करता है।ऐसे तो पर्यटक बरसात को छोड़ सालो भर आते जाते रहते है,लेकिन मुख्यत: वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व को अक्टूबर माह में खोला जाता है।क्योकी इस समय पर्यटकों की सुविधा के लिए VTR प्रशासन खास तैयारी रखता है।यहां पर्यटकों को ठहरने के लिए आधुनिक सुविधा युक्त टूरिज्म होटल का निर्माण किया गया है। पर्यटकों के लिए जंगल सफारी कराने के भी विभिन्न इंतजाम भी किये हैं। यहां आने वाले पर्यटक हाथी सफारी का भी आनंद उठा सकते है।

उल्लेखनीय है कि बिहार सरकार वीटीआर के घने जंगलों में स्थित प्राचीन काल के लगभग आधा दर्जन से अधिक धार्मिक स्थल को इको टूरिज्म से जोड़ा है।जिसमें नरदेवी मंदिर जटाशंकर धाम, कौलेश्वर धाम, सोमेश्वर, मदनपुर देवी स्थान, सोफा मंदिर आदि शामिल हैं। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में इको टूरिज्म सेंटर को वाल्मीकि नगर से मंगुराहा तक पर्यटकों के लिए इको हट,थ्री हट,होटल बिहार, वश्रिामागार आदि संसाधनों का जाल बिछाया गया है।साथ ही इको टूरिज्म से जुड़े वन क्षेत्रों में पर्यटकों की सुविधाओं को लेकर कई योजनाओं पर तेजी से काम हो रहा है।

अन्य नजदीकी पर्यटन स्थल

बाल्मिकीनगर आश्रम और गंडक परियोजना, त्रिवेणी संगम तथा बावनगढी, भिखनाठोरी,भितहरवा आश्रम एवं रामपुरवा का अशोक स्तंभ, नन्दनगढ, चानकीगढ एवं लौरिया का अशोक स्तंभ, सुमेश्वर का किला, सरैयां मन (पक्षी विहार)

कैसे आयें

वाल्मीकिनगर पश्चिमी चम्पारण जिला मुख्यालय बेतिया से लगभग 108 किलोमीटर, गोरखपुर (उत्तरप्रदेश) से 125 किमी की दूरी पर अवस्थित है। बिहार की राजधानी पटना से यह लगभग 300 सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पटना तक देश के किसी भी कोने से हवाई जहाज, रेल व सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। यहां से सड़क मार्ग से बेतिया,बगहा होते वाल्मीकिनगर पहुंचा जा सकता है। साथ ही मुजफ्फरपुर गोरखपुर रेलखंड पर बिहार का अंतिम स्टेशन व यूपी के बाद बिहार का पहला स्टेशन वाल्मीकिनगर रोड है। यहां से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर वाल्मीकिनगर है।इसके साथ ही इस रेलखंड पर बगहा या नरकटियागंज स्टेशन सें भी यहां पहुंच सकते है।

कब आयें

वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिज़र्व सामान्यतः 15 अक्टूबर से 31 मई पर्यटकों के लिए खुला रहता है।लेकिन यहाँ आने का सर्वोत्तम समय अक्टूबर–मार्च है। दिसम्बर–जनवरी में यहाँ का निम्नतम तापमान 3-4 डिग्री सेल्सियस रहता है।(एएमएपी)

मीनाक्षी जैन राज्यसभा के लिए मनोनीत 

राममंदिर मुकदमे में दिया गया था उनकी पुस्तक का संदर्भ।

#pramodjoshiप्रमोद जोशी।

इतिहासकार डॉ मीनाक्षी जैन को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है। साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत चार सदस्यों में डॉ जैन के अलावा उज्ज्वल देवराज निकम, सी. सदानंदन मास्टर और हर्ष वर्धन श्रृंगला शामिल हैं।
डॉ मीनाक्षी जैन दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर रह चुकी हैं। उन्होंने भारतीय सभ्यता, धर्म और राजनीति से संबंधित कई पुस्तकें लिखी हैं। इस तथ्य का उल्लेख ज्यादा नहीं हुआ है कि वे  टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक गिरिलाल जैन की पुत्री हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। सामाजिक आधार और जाति एवं राजनीति के बीच संबंधों पर उनका शोध प्रबंध 1991 में प्रकाशित हुआ था। इतिहास के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए 2020 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। उनकी कुछ पाठ्य पुस्तकों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।

डॉ जैन नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद की शासी परिषद की पूर्व सदस्य भी हैं। संप्रति वे भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की वरिष्ठ अध्येता हैं। उनके शोध के क्षेत्रों में मध्यकालीन और प्रारंभिक आधुनिक भारत में सांस्कृतिक और धार्मिक विकास शामिल हैं।

डॉ जैन ने विभिन्न ऐतिहासिक विषयों पर व्यापक शोध किया है और मध्यकालीन एवं आधुनिक भारतीय इतिहास से संबंधित मुद्दों पर उनका व्यापक शोधकार्य है। उनकी ऐतिहासिक कृतियों में शामिल हैं, फ्लाइट ऑफ डेटीस एंड रिबर्थ ऑफ टेंपल्स (देवताओं की उड़ान और मंदिरों का पुनर्जन्म) (2019), द बैटल फॉर राम: केस ऑफ द टेंपल एट अयोध्या (राम के लिए युद्ध: अयोध्या में मंदिर का मामला) (2017), सती: इवेंजेलिकल बैप्टिस्ट्स मिशनरीज़ एंड चेंजिंग कॉलोनियल डिसकोर्स (सती: इंजीलवादी बैप्टिस्ट मिशनरी और बदलते औपनिवेशिक विमर्श (2016), राम एंड अयोध्या (राम और अयोध्या) (2013), पैरलल पाथवेज़: एसेज़ ऑन हिंदू-मुस्लिम रिलेशंस (1707-1857) (समानांतर रास्ते: हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर निबंध) (1707-1857) (2010) और हिंदूज़ ऑफ हिंदुस्तान: अ सिविलिज़ेशनल जर्नी (हिंदुस्तान के हिंदू: एक सभ्यतागत यात्रा) (2023)।
2019 में अयोध्या विवाद पर चले सर्वोच्च न्यायालय के मुकदमे में उनकी पुस्तक का संदर्भ भी दिया गया था, जिसमें कहा गया है कि जन्मभूमि स्थल पर ऐतिहासिक रूप से राम मंदिर मौजूद था। उनका कहना है कि अंग्रेजों द्वारा इस स्थल को राम का जन्मस्थान मानने के बाद वामपंथी  इतिहासकारों ने ऐतिहासिक और सरकारी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की। जैन के अनुसार, 1989 से पहले के सभी साहित्यिक साक्ष्य, इस तथ्य की ओर इशारा करते थे। उन्होंने यह भी लिखा है कहा कि मुसलमानों का एक वर्ग चाहता था कि अयोध्या में राम मंदिर स्थल हिंदुओं को सौंप दिया जाए, लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने मुसलमानों को यह विश्वास दिलाकर विवाद को ज़िंदा रखा कि उनके पास राम मंदिर के ख़िलाफ़ एक मज़बूत तर्क है और उन्हें इसके लिए सबूत देने का वादा किया।

अपनी नवीनतम पुस्तक, “विश्वनाथ राइज़ एंड राइज़” (2024) में, जैन ने काशी के इतिहास के बारे में लिखा है। इस पुस्तक में, उन्होंने प्रारंभिक इस्लामी आक्रमणों से लेकर 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर के विध्वंस तक, सदियों के आक्रमणों और अपवित्रीकरण का विवरण दिया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

वायु सेना को मिली इजरायली स्पाइक एटीजीएम, हेलीकॉप्टरों से होगा परीक्षण

जमीनी, विमानन और समुद्री प्लेटफार्मों के साथ एकीकरण करने में सक्षम।
इजरायल के अलावा अन्य 38 देश कर रहे हैं स्पाइक मिसाइलों का उपयोग।

भारतीय वायु सेना ने परीक्षण के लिए कुछ मात्रा में इजरायली स्पाइक एनएलओएस एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) की डिलीवरी ली है। फायरिंग परीक्षणों के लिए इसे एमआई-17 वी5 हेलीकॉप्टर के साथ एकीकृत किया जाएगा। बाद में इसे अन्य भारतीय अटैक हेलीकॉप्टरों पर भी लैस किए जाने की योजना है। स्पाइक एनएलओएस जमीनी, विमानन और समुद्री प्लेटफार्मों के साथ एकीकरण करने में सक्षम है।इजरायली स्पाइक एनएलओएस एक बहुउद्देशीय, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड मिसाइल प्रणाली है। फिलहाल इसकी रेंज 32 किलोमीटर है, इसलिए भारतीय सेनाएं इसे ”मेक इन इंडिया” के जरिए बड़ी मात्रा में चाहती हैं। स्पाइक एनएलओएस को जमीन, विमानन या समुद्री प्लेटफार्मों के साथ एकीकृत किया जा सकता है, जबकि ऑपरेटर दूर के या भौगोलिक रूप से छिपे हुए लक्ष्यों पर लाइन-ऑफ-विजन के बिना हमला करने की अपनी स्टैंड-ऑफ क्षमता का लाभ उठा सकते हैं।

इजरायली स्पाइक का वायरलेस डेटा लिंक ऑपरेटरों को मिसाइल की उड़ान के दौरान वास्तविक समय की वीडियो इमेजरी और मैन-इन-द-लूप नियंत्रण प्रदान करता है। यह ऑपरेटरों को लक्ष्य के रास्ते में मिशन को बदलने या निरस्त करने का भी मौका देता है। एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) के स्पाइक परिवार को इजरायल स्थित रक्षा प्रौद्योगिकी कंपनी राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स ने विकसित किया है। राफेल ने दुनिया भर में 30 हजार से अधिक स्पाइक मिसाइलें बेची हैं, जिन्हें 45 से अधिक विभिन्न प्लेटफार्मों से लॉन्च किया जा सकता है।

ये इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल (ईओ) और फाइबर-ऑप्टिक प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने वाली हल्की ”दागो और भूल जाओ” सामरिक निर्देशित मिसाइलें हैं। सिस्टम का उपयोग पैदल सैनिकों, विशेष तीव्र प्रतिक्रिया बलों, जमीनी बलों और हेलीकॉप्टर से किया जाता है। स्पाइक मिसाइलों का उपयोग इजरायल के अलावा अन्य 38 देशों के रक्षा बल कर रहे हैं, जिनमें लातविया, स्लोवेनिया, स्लोवाकिया, यूके, फिलीपींस, सिंगापुर, नीदरलैंड, रोमानिया, चिली, कोलंबिया, फिनलैंड, जर्मनी, पोलैंड, इटली, पेरू, स्पेन, बेल्जियम, ब्राजील, कनाडा, इक्वाडोर, एस्टोनिया और लिथुआनिया शामिल हैं।

(एएमएपी)

52 सालों बाद दादीमाँ के मायके में एक दिन (1)

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उजड़ने-बसने की पीड़ा और सहने का धैर्य

सत्यदेव त्रिपाठी।

दादीमाँ का मायका- यानी मेरे पिता-काका… आदि का ननिहाल और मेरा अजियाउर। दादी को आजी भी कहा जाता है- दक्षिण भारत में अज्जी।

हमारे यहाँ रिश्ते-नातेदारियाँ स्त्रियों के अपना घर छोड़कर अन्य घर जाने से बनती हैं– यानी स्त्री-संचालित है हमारा कुटुम्ब व समाज। जन्म का घर, जो होश सँभालते से ही अपना होता है, जिसे स्त्री अपने कठिन जाँगर से बना-सजा के रखती है, जहां बचपने से सारे अपने लोग रहते हैं… उस समग्र अपनापे व अधिकार को छोड़कर एक दिन वह किसी अजनवी घर भेज दी जाती है और वहाँ भी वैसा ही कर पाती है। यह प्रतिभा, यह कूबत स्त्री को ही दी है प्रकृति ने। या पुरुष-संचालित समाज ने उसे ऐसे साँचे में ढाल दिया है। चाहे जैसे हुआ हो, पर स्त्री-जाति ने ही इसे साधा है। इस उजड़ने-बसने की पीड़ा और सहने का धैर्य तथा उसे अपना बनाकर रह पाने की क्षमता के लिए समूचे मानव-समाज को उसका ऋणी होना चाहिए। और ऋषियों ने जो कहा है–‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता’, इसके लिए उनका सिर्फ़ यह एक सुकृत्य ही काफ़ी है। बहरहाल,

स्त्री-संचालित होने के कारण हीहमारी सारी रिश्तेदारियों के नाम स्त्री के बनाये या स्त्री से बने रिश्तों से रखे गये हैं। नानी का घर ननिहाल, बहन का घर बहनिआउर, मौंसी का घर मौंसियान, फूआ (बुआ) का घर फूफुआउर… आदि। तो इसी क्रम में आजी का मायका अजियाउर। और हमारी आजी के मायके का गाँव है भूपालपुर– मेरे घर से 8-9 किमी. पूरब।

वहाँ 52 साल तक न जाने का मतलब ऐसा- जैसा दिलीपकुमार ने बहुत दिनों बाद पाकिस्तान से आने पर नूरजहाँ के लिए कहा था  ‘तुम जितने दिन नहीं आयीं, हमने ठीक उतने ही दिन तुम्हारा इंतज़ार किया है’। उसी तरह मैं 52 साल नहीं गया, तो ठीक 52 साल ही रोज़ जाना चाहता रहा। बीच में एक ख़ास बात भी हुई थी, जिसके चलते वहाँ जाना बन रहा था। हमारे यहाँ सास के मायके जाने का एक रवाज है– बल्कि कहें कि रूढ़ि है। इससे पुण्य-लाभ जैसी कोई बात लोक में है… या वेद से ही आयी हो… , मुझे पता नहीं। तो मेरी दादी का यह मायका, मेरी माँ की सास का मायका हुआ। सो, मेरी माँ भूपालपुर आना चाहती थी– कम से कम एक बार। लेकिन मैं ला न सका और अब जब ला सकता हूँ, तो 16 साल पहले मां चली गयी।

लेकिन अजिअउरे आने की मेरी यह प्रबल मंशा शायद अब भी फलित न होती, यदि इस अजियाउर के मेरे एक भतीजे एडवोकेट विनोद तिवारी का बार-बार आग्रह न होता। पिछले 20 सालों से आज़मगढ़ में विनोद से भेंट होती रही– कभी मैं कोई क़ानूनी सलाह लेने कचहरी पहुँच जाता, कभी शहर गया रहूँ, तो यूँ ही मिलने चला जाता। और एक ख़ास बात– काशी विद्यापीठ में पढ़ाने आ जाने पर आज़मगढ़ के एकमात्र नाट्यसमूह ‘सूत्रधार’ के संचालक अभिषेक पंडित के बुलावे पर मैं प्राय: अपने गृह नगर आ जाता… तो एकाध बार कार्ड में मेरा नाम देखकर प्रिय विनोद वहाँ आये और मिले। यानी ऐसे कई तरह के आसंगों से यह सिलसिला चलता रहा, जिसे फ़ेस बुक ने ज्यादा गहरा भी दिया व फैला भी दिया। इधर उनका आग्रह यूँ भी सामने आया–‘एक बार आ जाइए… अभी आपको पहचानने वाले कई लोग मौजूद हैं’। फिर इसी के साथ नयी पीढ़ी से भी परिचय हो जायेगा। इससे यह रिश्तेदारी एक पीढ़ी और आगे चल लेगी… के आकर्षण से भी मेरा इरादा सक्रिय हो उठा। और इन सबके परिणाम स्वरूप पिछले 5 जून (2022) की सुबह रवाना हो लिया।

रास्ते में भूपालपुर के सम्बंधों का अतीत नुमायाँ होने लगा…

दर्जा 7 में पढ़ते हुए (1965) से मैं अपने बड़के बाबू–कुबेर त्रिपाठी उर्फ़ पुजारी- के साथ इस गाँव भूपालपुर पैदल जाता रहा। तब हमारे गाँव में ठीक से सायक़िलें भी नहीं हुआ करती थीं। बड़के बाबू रात को 3-4 बजे मुझे उठा के चला देते… और कई बार तो सूरज उगते-उगते हम भूपालपुर होते। तब तक वहाँ कुछ लोग सोते ही मिलते, जिन्हें हम जगाते। बता दूँ कि हमारे यहाँ ननिहाल जाने और रहने की परम्परा बड़ी सुदृढ़ और खूब रवाँ रही है। अपने ननिहाल में तो मैं 2-4-6 महीने रहता था और उन दिनों वहीं के स्कूल में नानी पढ़ने भेज देती। कुछ बच्चे तो ननिहाल से ही सारी पढ़ाई-लिखाई भी करते। महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपने ननिहाल ‘पंदहा’ (आज़मगढ़ शहर से बहुत दूर नहीं) में ही पले-बढ़े थे। और इस परम्परा के बड़े वाहक रहे मेरे बड़के बाबू भी, जो 85 साल तक जीवित रहे और अपने जीवन के अंतिम दिनों (जब तक चल-फिर पाते रहे) तक नियमित रूप से अपने ननिहाल भूपालपुर जाते रहे… और सप्ताह से कम तो कभी न रहते– कभी तो महीने भर भी रह जाते।

मेरी जानतदारी में इस घर के ज्येष्ठ पुरुष थे पंडित रामविलास तिवारी। वे मेरे पितादि के बड़े ममेरे भाई थे– यानी मेरे पितादि उनके छोटे फ़ुफेरे भाई थे। बड़े और हर फ़न में कुशल होने तथा अपने फ़ुफ़ेरे भाइयों के प्रति अगाध स्नेह… आदि के कारण वे मेरे घर के संरक्षक की तरह थे। इनकी चलती थी मेरे घर में। मैं उन्हें भी बड़का बाबू ही कहता। मेरे घर के सारे फ़ैसले इनसे पूछ के इनके बताये-अनुसार ही होते। एक उदाहरण दूँ– मेर पिता ज्योतिष के बड़े विद्वान थे, लेकिन मैं एक ही साल का था, वे मर गये। मेरे साधुवत बड़के बाबू और पहलवान काकाओं ने मुझे भी ज्योतिष पढ़ने के लिए उसी गुरु (पंडित-प्रवर रघुनाथ उपाध्याय) के पास भेजना शुरू किया, जहां से पिता ने पढ़ाई की थी। एक महीने ऐसा चला होगा कि ये बड़के बाबू यानी पंडित रामविलासजी मेरे घर आये। वह दृश्य आज भी मेरी आँखों के सामने वैसा ही जीवंत है, जब शाम को कौड़ा (अलाव) तापते हुए उन्होंने पूछा था– ‘अरे बचवा पढ़ने जाने लगा– कहाँ जाता है’? काका-बाबू ने बड़ी शान से बताया– ‘भइया, रघुनाथ पंडितजी के यहाँ जाने लगा है। हम चाहते हैं कि यह भी अपने पिता जैसा ही विद्वान बने… ’। सुनते ही वे चिल्लाए– ‘मूर्खो, बच्चे की ज़िंदगी ख़राब करोगे? कल से चुपचाप प्राइमरी पाठशाला, ठेकमा में पढ़ने भेजो’। अब यह तो मेरे बाबू-काकाओं के लिए ब्रह्म-वाक्य हुआ। बस, अगले दिन से मुझे ‘वृहत होड़ाचक्रम्’ व ‘शीघ्रबोध’ … आदि (ज्योतिष के शुरुआती) ग्रंथों से मुक्ति मिल गयी। (जारी)

(लेखक साहित्य, कला एवं संस्कृति से जुड़े विषयों के विशेषज्ञ हैं)

पाण्डुलिपियों में संरक्षित ज्ञान लोगों तक पहुंचाना ज़रूरी

आपका अखबार ब्यूरो।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) द्वारा आयोजित ‘भगवद्गीता एवं नाट्यशास्त्र का यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड के इंटरनेशनल रजिस्टर में अभिलेखन’ पर केन्द्रित दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का गुरुवार देर शाम समापन हुआ। समापन सत्र आईजीएनसीए, नई दिल्ली के समवेत सभागार में आयोजित हुआ। इस सत्र के मुख्य अतिथि थे केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल और अध्यक्षता की आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने। आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) एवं कला निधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने स्वागत भाषण दिया और दो दिनों में हुई गतिविधियों का सार प्रस्तुत किया।
समापन सत्र में विवेक अग्रवाल ने कहा, भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र का यूनेस्को की ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर’ में अंकन होना राष्ट्र के लिए गर्व का क्षण है। यह उपलब्धि ‘ज्ञान भारतम् मिशन ऑन मैन्यूस्क्रिप्ट्स’ के शुभारम्भ के साथ-साथ आई है, जिसका उद्देश्य केवल पाण्डुलिपियों का संरक्षण नहीं, बल्कि उनमें संचित ज्ञान को विद्वानों, छात्रों और सामान्य जन तक सक्रिय रूप से पहुंचाना भी है। उन्होंने पूरे देश में संस्थानों और व्यक्तियों का एक ऐसा नेटवर्क बनाने की योजना पर बल दिया, जो सूचना साझा करने, क्षमता निर्माण और निजी ट्रस्टों व धार्मिक संस्थाओं सहित पाण्डुलिपि-संग्रहण केन्द्रों के लिए वित्त पोषण सुनिश्चित कर सके। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्राचीन लिपियों को समझना और इतिहास में विद्यमान रिक्तियों को भरना आज आवश्यक है, जिसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग जैसी उन्नत तकनीकों की सहायता से संभव किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि भविष्य के यूनेस्को नामांकनों के लिए एक राष्ट्रीय रजिस्टर का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, जिसमें विशिष्ट पाण्डुलिपियों और दस्तावेजों को संकलित किया जाएगा और इसके लिए आईजीएनसीए को संस्थागत केंद्र के रूप में प्रस्तावित किया गया है। उन्होंने अभिलेखों (एपिग्राफी) और दुर्लभ दृश्य सामग्री जैसे सहायक प्रयासों को भी इस व्यापक ढांचे में सम्मिलित करने की बात कही। पिपरहवा अवशेषों की देश में वापसी का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे सार्वजनिक-निजी सहभागिता का एक आदर्श उदाहरण बताया। पिपरहवा अवशेष में भगवान बुद्ध की अस्थियों के टुकड़े, क्रिस्टल के पात्र, सोने के आभूषण और अन्य चढ़ावे शामिल थे, जो बौद्ध परम्परा के अनुसार स्तूप में रखे गए थे। ये पवित्र वस्तुएं 1898 में ब्रिटिश अधिकारी विलियम क्लॉक्सटन पेप्पे द्वारा उत्तर प्रदेश के पिपरहवा स्तूप की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थीं।
अध्यक्षीय सम्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यूनेस्को ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ नामांकन के संदर्भ में आईजीएनसीए की भूमिका निरंतर बढ़ रही है और हाल ही में जिन डोजियर का निर्माण हुआ, वे पूरी तरह से आईजीएनसीए के विद्वानों द्वारा तैयार किए गए हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि छह देशों के प्रतिनिधियों के साथ आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के माध्यम से आईजीएनसीए अब क्षमता निर्माण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है। डॉ. जोशी ने सितंबर में भारत मंडपम में आयोजित होने वाले ‘ज्ञान भारतम मिशन’ पर आधारित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की ज़िम्मेदारी आईजीएनसीए को सौंपे जाने के लिए मंत्रालय का आभार प्रकट किया। उन्होंने वर्तमान में चल रही परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें कल्हण के राजतरंगिणी की मूल शारदा पांडुलिपि का पता लगाना तथा ‘लोकतंत्र की जननी’ के रूप में भारत के दावे को पुष्ट करने वाले उत्तरमेरु शिलालेखों का पूर्ण दस्तावेज़ीकरण सम्मिलित है। उन्होंने संगोष्ठी में भाग लेने वाले सभी प्रतिष्ठित विद्वानों और युवा शोधार्थियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा कि अब आईजीएनसीए क्षमता निर्माण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है। उन्होंने जानकारी दी कि आईजीएनसीए वर्तमान में सात नए नामांकन के लिए डोजियर तैयार कर रहा है। चार इंटरनेशनल रजिस्टर और तीन रीजनल रजिस्टर के लिए। इंटरनेशनल रजिस्टर के लिए तैयार किए जा रहे नामांकनों में वाल्मीकि रामायण, तिरुक्कुरल और नेपाल के साथ संयुक्त रूप से अशोक के अभिलेख तथा हंगरी के साथ एक संयुक्त नामांकन शामिल हैं। हंगरी के साथ संयुक्त नामांकन में चित्रकार एलिज़ाबेथ ब्रूनर और एलिज़ाबेथ सॉस ब्रूनर का उल्लेखनीय कार्य सम्मिलित है। इनमें कई दुर्लभ चित्र महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर से संबंधित हैं, जो भारत के सांस्कृतिक अभिलेख का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इससे पूर्व, संगोष्ठी के दूसरे दिन ‘भगवद्गीता’ और ‘नाट्यशास्त्र’ से जुड़े कई विषयों पर विद्वानों, शिक्षाविदों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने चार सत्रों में गहन चर्चा की। प्रथम सत्र में ‘धर्म और कर्तव्य की संकल्पना तथा विभिन्न युगों में भगवद्गीता की प्रासंगिकता’ विषय पर संवाद हुआ, वहीं द्वितीय एवं चतुर्थ सत्रों में यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ रजिस्टर में अभिलेखन की वर्तमान प्रासंगिकता और प्रभाव पर चर्चा की गई।

तृतीय सत्र में ‘नाट्यशास्त्र की कालजयी सांस्कृतिक छवि एवं अभिव्यक्ति की विविध विधाओं – नाटक, संगीत एवं नृत्य पर इसका प्रभाव’ पर गहन चर्चा हुई। सभी सत्रों में प्रतिष्ठित वक्ताओं ने भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र की ज्ञान-परंपरा को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने की दिशा में किए गए प्रयासों की सराहना की।

पहले सत्र की अध्यक्षता प्रो. शशिप्रभा कुमार ने की, जबकि संचालन प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने किया। इस सत्र में वक्ता थे- प्रो. ओमनाथ बिमली, प्रो. रजनीश कुमार मिश्रा और प्रो. सम्पदानंद मिश्रा। दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. राजेंद्रकुमार अनायथ ने की, जबकि संचालन डॉ. सुधीर लाल ने किया। इस सत्र में वक्ता थे- के. शिवा प्रसाद (आईएएस) और नीरा मिश्रा। तीसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. भरत गुप्त ने की, जबकि संचालन डॉ. योगेश शर्मा ने किया। इस सत्र में वक्ता थे- प्रो. कृपाशंकर चौबे, प्रो. पियाल भट्टाचार्य और डॉ. श्रीनंद बापट। चौथे सत्र की अध्यक्षता डॉ. संध्या पुरेचा ने की, जबकि संचालन डॉ. मयंक शेखर ने किया। इस सत्र में वक्ता थे- प्रो. बिप्लब लोहा चौधुरी, डॉ. रमाकांत पांडेय और एनएसडी के डायरेक्टर एवं अभिनेता चितरंजन त्रिपाठी।

यह संगोष्ठी न केवल भारत की शास्त्रीय बौद्धिक परम्परा को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही, बल्कि इसने युवाओं और शोधार्थियों को भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा दी।

इमरान के राजनीतिक जीवन पर संकट, पांच साल चुनाव लड़ने पर लगा प्रतिबंध

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को पांच साल तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है। पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने बुधवार यह फैसला सुनाया। सियासत की पिच पर पाकिस्तान के पूर्व कप्तान रनआउट हो गए हैं। इसके साथ ही वह पांच साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इमरान खान को हाल ही में तोशाखाना केस में सजा सुनाई गई है। गौरतलब है कि जेल में बंद इमरान खान ने तोशाखाना भ्रष्टाचार मामले में उन्हें दोषी ठहराए जाने के एक निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। मंगलवार को अपनी अपील में उन्होंने कह कि एक पक्षपातपूर्ण न्यायाधीश का फैसला उचित प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई के चेहरे पर तमाचा और न्याय का घोर उपहास है।यह है मामला
पाकिस्तान को 1992 में विश्वकप जिताने वाले इमरान खान 2018 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि साल भर पहले अविश्वास प्रस्ताव में हार जाने के बाद पद से हटना पड़ा। इमरान के खिलाफ 100 से अधिक मामले हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए अपने फायदे के लिए कीमती तोहफे बेचे। इमरान ने चुनाव आयोग को दी गई संपत्ति की घोषणा में उसका ब्योरा नहीं दिया था। चुनाव आयोग ने बाद में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में शिकायत दर्ज की थी कि पीएम रहते हुए इमरान को जो गिफ्ट मिले उसे उन्होंने बेच दिया। इस मामले में उन्हें आपराधिक कानूनों के जरिए सजा की भी मांग की गई थी।

शनिवार को हुए थे गिरफ्तार

बता दें कि इस्लामाबाद की एक अदालत द्वारा तोशाखाना भ्रष्टाचार मामले में खान (70) को भ्रष्टाचार का दोषी ठहराए जाने के तुरंत बाद शनिवार को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। अदालत ने खान को तीन साल जेल की सजा सुनाई है। वह इस समय अटक जेल में हैं। वहीं, पंजाब पुलिस के अनुसार खान की गिरफ्तारी के बाद से प्रांत के विभिन्न हिस्सों में पीटीआई के 200 से अधिक पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि पीटीआई ने आरोप लगाया है कि न केवल पुलिस ने खान की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे उसके कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया बल्कि उसने पार्टी पदाधिकारियों को हिरासत में लेने के लिए उनके घरों पर छापा मारा।

अंधेरे कमरे में रखने का आरोप

बता दें कि इमरान खान के अटॉर्नी जनरल नईम हैदर पंजोठा ने कहा कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) अध्यक्ष को पंजाब प्रांत में स्थित जेल में सी-श्रेणी की सुविधाएं दी गयी हैं। उन्होंने बताया कि देश की विश्व कप विजेता क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान को जेल की जिस कोठरी में रखा गया है वहां मक्खियां तथा खटमल भरे पड़े हैं। पंजोठा ने सोमवार को खान से जेल में मुलाकात करने के बाद कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री छोटे-से कमरे में बंद हैं जिसमें खुले में शौचालय बना हुआ है। पंजोठा ने कहा कि खान ने उन्हें बताया है कि पुलिस ने उन्हें गिरफ्तारी वारंट नहीं दिखाया और पुलिस ने लाहौर में उनके घर में उनकी पत्नी के कमरे का दरवाजा तोड़ने की कोशिश भी की थी।(एएमएपी)

“मोदी विरोध” से राष्ट्रवाद विरोधी खेमे में खड़ी होती कांग्रेस

‘हर घर तिरंगा’ का विरोध- ‘हर घर से अफजल निकलेगा’ का समर्थन।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से हर घर तिरंगा (#HarGharTiranga) फहराने की अपील की है। यह अभियान 13 से 15 अगस्त तक चलेगा। अब अपील प्रधानमंत्री मोदी ने की है तो जाहिर है कांग्रेस पार्टी को परिपाटी के अनुसार इसका विरोध करना था, तो वह कर भी रही है। कांग्रेस एक ऐसे दल का उदाहरण बन गई है, जिसे देखकर सीखा जा सकता है कि किसी राष्ट्रीय पार्टी को कैसा नहीं होना चाहिए। राष्ट्रवाद के विरोध को कांग्रेस ने अपनी रणनीति बना लिया है। वह हर उस संवैधानिक संस्था का विरोध करने को तैयार रहती है, जो उसकी इस रणनीति के रास्ते में आए। आजादी के अमृत महोत्सव (#AmritMahotsav) वर्ष में कांग्रेस ने विरोध के लिए हर घर तिरंगा अभियान को चुना है।

किसी भी देश का राष्ट्रीय ध्वज उसके गौरव का प्रतीक होता है। कुछ ऐसे प्रतीक होते हैं, जो दलगत राजनीति से ऊपर होते हैं, पर कांग्रेस हर घर तिंरगा अभियान का भी विरोध करेगी, क्योंकि इसकी अपील प्रधानमंत्री मोदी ने की है। वह शायद यह भी भूल गई कि आजादी की लड़ाई राष्ट्रवाद के मुद्दे को केंद्र में रखकर लड़ी गई थी। विडंबना और कांग्रेस के पतन की पराकाष्ठा देखिए कि ‘हर घर तिरंगा’ का विरोध होगा, लेकिन ‘हर घर से अफजल निकलेगा’ का समर्थन होगा।

कांग्रेस: पल पल रंग ढंग बदलता किरदार

कांग्रेस पिछले 75 साल से पहले जनसंघ और फिर भाजपा से पूछती रही है कि आजादी के आंदोलन में उसका क्या योगदान रहा है? जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था तो उसमें उसकी क्या भूमिका थी? जो कांग्रेस को समझने लगे हैं, उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश की प्रतिक्रिया पर कोई आश्चर्य नहीं होगा। जयराम ने इस अभियान को पाखंड कहा है। वह 2002 में हुए राष्ट्रीय ध्वज के नियमों में बदलाव का हवाला देकर भाजपा को कोस रहे हैं। इस संशोधन के जरिये राष्ट्रीय ध्वज के केवल खादी का होने की अनिवार्यता खत्म कर दी गई थी, पर वह यह नहीं बताते कि दस साल तक मनमोहन सरकार ने इसे बदला क्यों नहीं? उन्होंने आरएसएस के कार्यालयों पर 52 साल तक तिरंगा न लहराने का मुद्दा तो उठाया, पर अभी एक साल पहले तक अपने पार्टी कार्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज न लहराने वाली उन कम्युनिस्ट पार्टियों से सवाल नहीं किया, जो आज कांग्रेस की सबसे बड़ी सलाहकार हैं।

आखिर जो कांग्रेस आजादी की लड़ाई की विरासत का दावा करती है, वह हर घर तिरंगा अभियान का विरोध कैसे कर सकती है? प्रधानमंत्री मोदी ने हर घर तिरंगा फहराने की अपील 22 जुलाई को की। इसी दिन 1947 में संविधान सभा ने तिरंगे के मौजूदा स्वरूप को स्वीकार किया था। तिरंगे का मूल डिजाइन आंध्र के पिंगली वेंकैया ने पांच साल तक तीस देशों के झंडों का अध्ययन करने के बाद 1921 में तैयार किया था। उस समय इसमें ऊपर लाल रंग था और बीच में चरखा। संविधान सभा ने लाल की जगह केसरिया और बीच में चरखे की जगह चक्र रखा। कांग्रेस ने इतने वर्षों में कभी वेंकैया को याद नहीं किया। वेंकैया पर डाक टिकट जारी करने के लिए देश को मोदी का इंतजार करना पड़ा।

संजय राउत की गिरफ्तारी से महाराष्ट्र के एक बड़े नेता की चिंता बढ़ी

आजादी की लड़ाई की विरासत…?

सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई के तमाम नायकों की तरह आजादी की लड़ाई की विरासत का दावा भी छोड़ दिया है? वैसे कांग्रेस सिर्फ महात्मा गांधी को छोड़ने का साहस नहीं जुटा पाई। हालांकि उनके आदर्शों को तो उसने आजादी के बाद ही भुला दिया था। गांधी जी यदि लंबे समय तक जीवित रहते तो शायद उन्हें वही देखना पड़ता, जो लोकनायक जयप्रकाश नारायण को जनता पार्टी ने दिखाया। आखिर आजादी के अमृत महोत्सव को मनाने की कांग्रेस की योजना क्या है? क्या प्रवर्तन निदेशालय की जांच का विरोध उसका अमृत महोत्सव काल का सबसे बड़ा कार्यक्रम है? कांग्रेस ने कई महीने पहले एक देशव्यापी आंदोलन का कार्यक्रम बनाया था। उसके लिए दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का भी गठन किया था। क्या आजादी के अमृत महोत्सव के लिए भी उसने कोई कार्यक्रम बनाया है? देश की सबसे पुरानी विपक्षी पार्टी के पास इस ऐतिहासिक वर्ष को मनाने का कोई कार्यक्रम क्यों नहीं है?

कांग्रेस किस कदर अपनी विरासत की जड़ों और आम जन की भावनाओं से कट चुकी है, इसका शायद उसे आभास भी नहीं है। हालत यह है कि कम्युनिस्ट पार्टी, जो पाकिस्तान बनाने के मुद्दे पर अंग्रेजों के साथ थी और जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय चीनी कामरेडों के साथ थी, उसे भी समझ में आ रहा है कि मोदी ने जिस अभियान की शुरुआत की है, उसमें चुपचाप शामिल हो जाने में ही भलाई है। सीताराम येचुरी ने घोषणा की है कि माकपा हर घर तिरंगे का अपना कार्यक्रम चलाएगी। केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने आदेश जारी किया है कि प्रदेश में हर घर पर तिरंगा फहराया जाएगा।

कोई राहुल गांधी से पूछे जब भारत राष्ट्र ही नहीं तो गांधी राष्ट्रपिता कैसे?

जुबानी जमा खर्च

जयराम रमेश औपचारिक रूप से कांग्रेस और अनौपचारिक रूप से नेहरू गांधी परिवार के प्रवक्ता हैं। उन्हें साल 2002 में राष्ट्रीय ध्वज बनने के नियमों में हुए बदलाव से खादी को होने वाले नुकसान का दर्द है। सवाल है कि कांग्रेस ने जुबानी जमा खर्च के अलावा खादी के लिए किया क्या है? मोदी राज के दौरान खादी ग्रामोद्योग देश में उपभोक्ता वस्तुओं की सबसे बड़ी कंपनी बन गई है- हिंदुस्तान यूनिलीवर से भी बड़ी। इस अभियान के लिए भी सबसे ज्यादा झंडे खादी के ही खरीदे जा रहे हैं। तो कांग्रेस पहले अपनी प्राथमिकता तय कर ले। उसकी प्राथमिकता तिरंगा है या अफजल गुरु और टुकड़े-टुकड़े गैंग।

सवाल है कि बार-बार ऐसा क्यों होता है कि कांग्रेस राष्ट्रवाद और उसके प्रतीकों पर विरोधी खेमे में खड़ी नजर आती है? उसके पास मोदी सरकार के हर काम के विरोध का भोथरा हथियार तो है, पर जवाब में कोई वैकल्पिक विचार नहीं है। इसलिए आम लोगों को वह एक शिकायती और सदैव रोने वाले बच्चे जैसी नजर आती है। उसकी मुश्किल यह है कि वह बच्चा नहीं है और कोई बालिग बच्चे जैसा व्यवहार करे तो उसके बारे में लोग क्या सोचते कहते हैं, बताने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस जिस हालत में पहुंच गई है, उसमें उसका सर्जरी से भी इलाज संभव नहीं रह गया है। ऐसी ही अवस्था को लाइलाज कहते हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं। आलेख ‘दैनिक जागरण’ से साभार)


जब 14 साल में मातृभूमि पर बलिदान हुए थे पुरी माधव, आजाद हो गया था मेदिनीपुर

(आजादी विशेष)

भारतीय स्वतंत्रता दिवस के 77वें उत्सव को अब केवल दो दिन शेष रह गए हैं। ऐसे में हम उन हजारों-हजार क्रांतिकारियों का स्मरण कर रहे हैं जिनके बलिदान से गुलामी की बेडियां कट सकीं और हम आजाद हुए। हम खासकर उन स्वतंत्रता सेनानियों का चरित्र सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं, जिन्हें इतिहास में स्थान नहीं मिला, जो गुमनाम रह गए। यह वह दौर था जब भारत माता को अंग्रेजों के जुल्म से आजाद कराने के लिए युवाओं ही नहीं तरूणों ने भी अपनी छोटी उम्र की परवाह नहीं की। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुदीराम बोस और करतार सिंह सराभा सबसे कम उम्र में फांसी पर लटकने वाले थे। खुदीराम बोस को 16 साल और करतार सिंह सराभा को 15 साल की उम्र में फांसी पर लटकाया गया था। वहीं दूसरी ओर इतिहास में जिनका नाम दर्ज नहीं हो सका, ऐसे बिहार विधानसभा पर लहरा रहे अंग्रेजी झंडा उतार कर तिरंगा लहराने के दौरान अंग्रेजों की गोलियों से छलनी होकर बलिदान हुए देवीपद चौधरी केवल 14 साल के थे। उसी तरह से पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के पुरी माधव प्रमाणिक भी 29 सितंबर, 1942 को आतताई गोरों की गोलियों से छलनी होकर जब मातृभूमि पर बलिदान हुए, तब उनकी भी उम्र महज 14 साल थी।अगस्त क्रांति के बलिदानियों के बारे में लिखी अपनी किताब में इतिहासकार नागेन्द्र सिन्हा बताते हैं कि पुरी माधव प्रमाणिक का जन्म तत्कालीन बंगाल प्रांत के मेदिनीपुर जिला के सुताहाटा थाना क्षेत्र के द्वारी बेरिया गांव में वर्ष 1928 में हुआ था। मेदिनीपुर एक ऐसा जिला था जहां शुरुआत से ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारियों ने बिगुल फूंक दिया था।

मेदिनीपुर में पोस्टिंग से डरते थे अंग्रेज अधिकारी, तीन मजिस्ट्रेट की हुई थी हत्या

इस जिले में पोस्टिंग होते ही अंग्रेज अधिकारी सिहर उठते थे। इसकी वजह थी कि सात अप्रैल 1931 को पेड्डी, 30 अप्रैल 1932 को डगलस और 2 सितंबर 1933 को बुर्ज अंग्रेज मजिस्ट्रेट को क्रांतिकारियों ने सरेआम मौत के घाट उतार दिया था। मेदिनीपुर का अपना एक अलग इतिहास है। यहां क्रांतिकारियों ने इस कदर एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी कि आजादी से बहुत पहले 1942 में ही यहां पूरी अंग्रेजी फौज को खदेड़ कर स्वतंत्र “ताम्रलिप्त सरकार” का गठन कर दिया गया था।

1942 में जब पूरे देश में भारत छोड़ो का प्रस्ताव पारित कर अगस्त क्रांति की शुरुआत की गई तो मेदिनीपुरी जिला कहां पीछे रहने वाला था। यहां क्रांतिकारियों के उग्र रवैये से भयभीत ब्रिटिश सरकार ने अगस्त 1942 में मुनादी करवा दी थी कि किसी भी क्रांतिकारी को देखते ही गोली मार दी जाएगी। इससे उन क्रांतिकारियों को क्या फर्क पड़ने वाला था जिन्होंने लगातार अंग्रेज मजिस्ट्रेटों को मौत के घाट उतारा था। वे कहां चुप बैठने वाले थे। उस पूरे वातावरण से प्रभावित पुरी माधव प्रमाणिक की आयु उस समय केवल 14 साल की थी। पर पुरी माधव और उनके दोस्त भी क्रांति की मशाल को लेकर सामने आ गए थे। उन सभी ने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत की अवहेलना कर 26 सितंबर, 1942 को मेदिनीपुर जिले के अंग्रेजी सरकार के दफ्तरों पर हमले शुरू कर दिए। पूरे इलाके में टेलीग्राफ के तार काट दिए गए। सड़कों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया, बिजली के खंभों को उखाड़ कर तोड़ दिया गया। सरकारी संपत्तियों और प्रशासनिक कार्यालयों को आग के हवाले कर दिया गया। सैनिकों को नदी पार करने के लिए जो नाव रखी थी, उसे भी 28 सितंबर 1942 को क्रांतिकारियों ने पानी में डुबो दिया।

उसके बाद अगले दिन 29 सितंबर को भी ग्रामीणों की मदद से एक विशाल जुलूस मेदिनीपुर में निकाला गया। अंग्रेजी हुकूमत इस मौके की ताक में थी। तमलुक स्थित सरकारी दफ्तरों की ओर बढ़ते जुलूस को घेरकर अंग्रेजी फौज और पुलिसकर्मियों ने निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। पुरी माधव प्रमाणिक महज 14 साल के क्रांतिकारियों में सबसे आगे थे और पुलिस की गोलियों से छलनी हो गए। वहीं मातृभूमि पर लहूलुहान होकर उन्होंने जीवन समर्पित कर दिया।

क्रांतिकारियों ने बनाई थी स्वतंत्र ताम्रलिप्त सरकार

अंग्रेजी हुकूमत के इस रक्त कांड से क्रांति की ज्वाला ऐसी भड़की कि पूरे क्षेत्र के लोगों ने एकजुट होकर अंग्रेजों को मारना और सरकारी दफ्तरों में आग लगाना शुरू कर दिया। डरे-सहमे पुलिसकर्मी और अंग्रेज अधिकारी मेदिनीपुर छोड़कर भाग गए। तब क्रांतिकारियों ने यहां भारत की पहली ताम्रलिप्त सरकार का गठन किया। यहां तिरंगा लहराया गया और मेदिनीपुर को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया। हालांकि बाद में अंग्रेजों ने बड़ी फौज लाकर मेदिनीपुर पर दोबारा कब्जा किया था।(एएमएपी)