बांकीपुर हार से सबक नहीं सीखा तो मुश्किलें बढ़ेंगी।
प्रदीप सिंह।
तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा को झटका लगा है। इनमें से दो सीटें उसके पास थीं,लेकिन वह एक ही गुजरात की मांजलपुर जीत पाई। बिहार की बांकीपुर सीट हारना उसे लंबे समय तक खलेगा। यहां मतदाता और कार्यकर्ताओं को ठेंगे पर रखने की कीमत उसने चुकाई है।
बिहार में बांकीपुर सीट भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने खाली की थी। पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनके राज्यसभा चले जाने से यह सीट खाली हुई थी। यह पटना शहर की कायस्थ बहुल सीट है। यहां से नितिन नवीन खुद पांच बार विधायक रहे, जबकि उनके पिता भी चार बार जीते। इस तरह ये भाजपा की परंपरागत सीट मानी जाती रही। पार्टी को इस बार भी जीत की पूरी उम्मीद थी, लेकिन अहंकार जब बहुत ज्यादा आ जाता है तो वहां से समस्या शुरू हो जाती है। भाजपा के एक नेता ने मतदाता और कार्यकर्ता दोनों को ठेंगे पर रखते हुए बयान दिया कि यहां से तो हम कुत्ता-बिल्ली खड़ा कर दें तो वह भी जीत जाएगा। दोनों ने भाजपा को ही ठेंगा दिखा दिया। जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने बांकीपुर में बड़ी जीत हासिल की। हालांकि बाय इलेक्शन हमेशा कोई राजनीतिक दिशा बदलने वाले नहीं होते लेकिन कई बार होते भी हैं। 1988 में विश्वनाथ प्रताप सिंह इलाहाबाद से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस के सुनील शास्त्री के खिलाफ लड़े और भारी बहुमत से जीत गए। उसके बाद जनता दल का गठन हुआ और फिर वह प्रधानमंत्री बन गए। उस एक बाय इलेक्शन ने उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश की राजनीतिक दिशा बदल दी। मान लीजिए कि विश्वनाथ प्रताप सिंह उपचुनाव हार गए होते तो उनकी सारी राजनीति वहीं खत्म हो जाती। ऐसा भी हुआ है कि उपचुनाव हारने के बाद राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ा। 2017 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत से सरकार बनी। 312 सीटें अकेले बीजेपी की आईं। उसके बाद गोरखपुर और फतेहपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुआ। ये सीटें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने खाली की थीं। भाजपा दोनों सीटें हार गई किंतु प्रदेश की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ा। लेकिन बिहार के मामले में अभी निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ संकेत जो उभर कर आ रहे हैं उन पर गौर करना जरूरी है।
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी अभी नवंबर 2025 में ही विधानसभा का चुनाव लड़ी थी लेकिन बिहार की एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। उस चुनाव में प्रशांत किशोर खुद उम्मीदवार नहीं बने थे। बांकीपुर में पहली बार खुद उम्मीदवार बने और जीत गए। वह भी उस सीट पर जीते जो भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। उन्होंने कहा कि किसी पार्टी का गढ़ नहीं होता। मतदाता का गढ़ होता है। बिल्कुल ठीक बात है। तो प्रशांत किशोर की राजनीतिक पारी की शुरुआत हो गई और इसका पूरा श्रेय भाजपा नेतृत्व को जाता है। इस सीट को जीतने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत लगा दी थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष का मामला था तो कई केंद्रीय मंत्री तक लगे हुए थे। इसके बावजूद सीट जिता नहीं पाए। अब सवाल है कि क्या यह रिफ्लेक्शन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पर है या प्रदेश के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर। मेरा मानना कि इन दोनों पर होना चाहिए। दोनों अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नहीं बचा पाए। 21 साल बाद बिहार में यह पहला चुनाव है जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं हैं। तो जेडीयू का मतदाता किधर गया? क्या उसने प्रशांत किशोर का साथ दिया? लेकिन मेरी नजर में वह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय जनता पार्टी का समर्थक कहां गया? भाजपा समर्थक प्रशांत किशोर की जीत से खुश क्यों हैं? भाजपा नेतृत्व को यह बात सोचनी चाहिए। मेरा मानना है कि इस उपचुनाव में कार्यकर्ताओं ने भाजपा के नेतृत्व को जवाब दिया है। उन्होंने दम दिखाया है कि हमको कूड़ा कर्कट मत समझो। अगर किसी फैसले में हमारी हिस्सेदारी नहीं होगी,हमसे संवाद नहीं होगा,हमारे सम्मान का ध्यान नहीं रखा जाएगा तो कीमत चुकानी पड़ेगी। यह संकेत अभी से नहीं 2024 से मिल रहा है। बांकीपुर में जिस तरह उम्मीदवार बदला गया,जिस तरह कार्यकर्ताओं के मुद्दों की कोई परवाह नहीं की गई,नतीजे को इन सारी बातों से जोड़ा जा रहा है। नतीजे को पटना में हुए छात्र आंदोलन,एके 47 चलने और यूजीसी की गाइडलाइंस से भी जोड़ा जा रहा है। इस चुनाव को सवर्ण बनाम पिछड़ा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि नंबर एक और नंबर दो दोनों कैंडिडेट सवर्ण हैं। लेकिन इस उपचुनाव के नतीजे से भाजपा को चिंतित होना चाहिए। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी यह पहली अग्नि परीक्षा थी, जिसमें वह पास नहीं हुए। प्रशांत किशोर के लिए एक नया रास्ता खुला है और वह छोटे से छोटे मुद्दे को बड़ा बनाना और उसके आधार पर एक परसेप्शन क्रिएट करना जानते हैं।
इस उपचुनाव के नतीजे से राष्ट्रीय जनता दल और तेजस्वी यादव को भी चिंता होनी चाहिए। उनका उम्मीदवार तीसरे नंबर पर चला गया। उपचुनाव के बीच ही तेजस्वी छुट्टी मनाने विदेश चले गए। प्रचार खत्म होने से दो दिन पहले आए। फिर भी कुछ नहीं किया। उनको लगा कि हमारा कोर वोट कहीं जाने वाला नहीं। जो नतीजा आया है उससे लग रहा है कि आरजेडी का कोर वोट भी किसका है। अगर नंबर दो की जगह कोई और पार्टी लेती दिख रही है तो आरजेडी को चिंता होनी चाहिए। यह एक टर्निंग पॉइंट बन सकता है, जहां से आरजेडी का सफाया होना शुरू हो जाए। एक विधानसभा उपचुनाव जीत जाने से प्रशांत किशोर प्रदेश या देश के बहुत बड़े नेता नहीं हो जाएंगे, लेकिन उनके पास दावा करने के लिए यह है कि मैंने भारतीय जनता पार्टी को उसके गढ़ में घुसकर हराया। इसका गुणगान वह खुद तो करेंगे ही साथ ही देश का एक बड़ा बौद्धिक, राजनीतिक और पत्रकारों का वर्ग मौजूद है, जो आने वाले काफी लंबे समय तक उनका ढोल पीटेगा। इस नतीजे के बाद यह बताने की कोशिश होगी कि कैसे बीजेपी ढलान पर है। हालांकि एक बाय इलेक्शन हारने से बीजेपी या कोई पार्टी ढलान पर नहीं चली जाती। उसके लिए बड़ा वातावरण चाहिए जैसा 1988 में वीपी सिंह की इलाहाबाद बाय इलेक्शन में जीत के समय था। उस समय राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स और भ्रष्टाचार का मामला चरम पर था। लोग कांग्रेस से बहुत नाराज थे। आप यह नहीं कह सकते कि ऐसा ही इस समय है। वैसे भी बिहार में विधानसभा का चुनाव अब से चार साल बाद 2030 में होगा। चार साल का समय बहुत होता है। किसी नई पार्टी के लिए दोनों संभावनाएं होती हैं। चार साल तक सर्वाइव करना मुश्किल होता है और चार साल तैयारी का भी मौका मिलता है। सीजेपी के आंदोलन से इस समय देश में जो माहौल बना हुआ है उसमें बीजेपी की इस हार को बहुत बड़ा करके दिखाया जाएगा। इसे बड़ी चुनौती के रूप में पेश किया जाएगा और भाजपा को इसको चुनौती के रूप में लेना भी चाहिए। कार्यकर्ता क्यों नाराज हैं, इस पर अगर भाजपा नहीं सोचेगी तो आने वाले समय में और मुश्किल का सामना करना पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा को झटका लगा है। इनमें से दो सीटें उसके पास थीं,लेकिन वह एक ही गुजरात की मांजलपुर जीत पाई। बिहार की बांकीपुर सीट हारना उसे लंबे समय तक खलेगा। यहां मतदाता और कार्यकर्ताओं को ठेंगे पर रखने की कीमत उसने चुकाई है।
बिहार में बांकीपुर सीट भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने खाली की थी। पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनके राज्यसभा चले जाने से यह सीट खाली हुई थी। यह पटना शहर की कायस्थ बहुल सीट है। यहां से नितिन नवीन खुद पांच बार विधायक रहे, जबकि उनके पिता भी चार बार जीते। इस तरह ये भाजपा की परंपरागत सीट मानी जाती रही। पार्टी को इस बार भी जीत की पूरी उम्मीद थी, लेकिन अहंकार जब बहुत ज्यादा आ जाता है तो वहां से समस्या शुरू हो जाती है। भाजपा के एक नेता ने मतदाता और कार्यकर्ता दोनों को ठेंगे पर रखते हुए बयान दिया कि यहां से तो हम कुत्ता-बिल्ली खड़ा कर दें तो वह भी जीत जाएगा। दोनों ने भाजपा को ही ठेंगा दिखा दिया। जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने बांकीपुर में बड़ी जीत हासिल की। हालांकि बाय इलेक्शन हमेशा कोई राजनीतिक दिशा बदलने वाले नहीं होते लेकिन कई बार होते भी हैं। 1988 में विश्वनाथ प्रताप सिंह इलाहाबाद से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस के सुनील शास्त्री के खिलाफ लड़े और भारी बहुमत से जीत गए। उसके बाद जनता दल का गठन हुआ और फिर वह प्रधानमंत्री बन गए। उस एक बाय इलेक्शन ने उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश की राजनीतिक दिशा बदल दी। मान लीजिए कि विश्वनाथ प्रताप सिंह उपचुनाव हार गए होते तो उनकी सारी राजनीति वहीं खत्म हो जाती। ऐसा भी हुआ है कि उपचुनाव हारने के बाद राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ा। 2017 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत से सरकार बनी। 312 सीटें अकेले बीजेपी की आईं। उसके बाद गोरखपुर और फतेहपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुआ। ये सीटें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने खाली की थीं। भाजपा दोनों सीटें हार गई किंतु प्रदेश की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ा। लेकिन बिहार के मामले में अभी निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ संकेत जो उभर कर आ रहे हैं उन पर गौर करना जरूरी है।
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी अभी नवंबर 2025 में ही विधानसभा का चुनाव लड़ी थी लेकिन बिहार की एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। उस चुनाव में प्रशांत किशोर खुद उम्मीदवार नहीं बने थे। बांकीपुर में पहली बार खुद उम्मीदवार बने और जीत गए। वह भी उस सीट पर जीते जो भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। उन्होंने कहा कि किसी पार्टी का गढ़ नहीं होता। मतदाता का गढ़ होता है। बिल्कुल ठीक बात है। तो प्रशांत किशोर की राजनीतिक पारी की शुरुआत हो गई और इसका पूरा श्रेय भाजपा नेतृत्व को जाता है। इस सीट को जीतने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत लगा दी थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष का मामला था तो कई केंद्रीय मंत्री तक लगे हुए थे। इसके बावजूद सीट जिता नहीं पाए। अब सवाल है कि क्या यह रिफ्लेक्शन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पर है या प्रदेश के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर। मेरा मानना कि इन दोनों पर होना चाहिए। दोनों अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नहीं बचा पाए। 21 साल बाद बिहार में यह पहला चुनाव है जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं हैं। तो जेडीयू का मतदाता किधर गया? क्या उसने प्रशांत किशोर का साथ दिया? लेकिन मेरी नजर में वह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय जनता पार्टी का समर्थक कहां गया? भाजपा समर्थक प्रशांत किशोर की जीत से खुश क्यों हैं? भाजपा नेतृत्व को यह बात सोचनी चाहिए। मेरा मानना है कि इस उपचुनाव में कार्यकर्ताओं ने भाजपा के नेतृत्व को जवाब दिया है। उन्होंने दम दिखाया है कि हमको कूड़ा कर्कट मत समझो। अगर किसी फैसले में हमारी हिस्सेदारी नहीं होगी,हमसे संवाद नहीं होगा,हमारे सम्मान का ध्यान नहीं रखा जाएगा तो कीमत चुकानी पड़ेगी। यह संकेत अभी से नहीं 2024 से मिल रहा है। बांकीपुर में जिस तरह उम्मीदवार बदला गया,जिस तरह कार्यकर्ताओं के मुद्दों की कोई परवाह नहीं की गई,नतीजे को इन सारी बातों से जोड़ा जा रहा है। नतीजे को पटना में हुए छात्र आंदोलन,एके 47 चलने और यूजीसी की गाइडलाइंस से भी जोड़ा जा रहा है। इस चुनाव को सवर्ण बनाम पिछड़ा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि नंबर एक और नंबर दो दोनों कैंडिडेट सवर्ण हैं। लेकिन इस उपचुनाव के नतीजे से भाजपा को चिंतित होना चाहिए। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी यह पहली अग्नि परीक्षा थी, जिसमें वह पास नहीं हुए। प्रशांत किशोर के लिए एक नया रास्ता खुला है और वह छोटे से छोटे मुद्दे को बड़ा बनाना और उसके आधार पर एक परसेप्शन क्रिएट करना जानते हैं।
इस उपचुनाव के नतीजे से राष्ट्रीय जनता दल और तेजस्वी यादव को भी चिंता होनी चाहिए। उनका उम्मीदवार तीसरे नंबर पर चला गया। उपचुनाव के बीच ही तेजस्वी छुट्टी मनाने विदेश चले गए। प्रचार खत्म होने से दो दिन पहले आए। फिर भी कुछ नहीं किया। उनको लगा कि हमारा कोर वोट कहीं जाने वाला नहीं। जो नतीजा आया है उससे लग रहा है कि आरजेडी का कोर वोट भी किसका है। अगर नंबर दो की जगह कोई और पार्टी लेती दिख रही है तो आरजेडी को चिंता होनी चाहिए। यह एक टर्निंग पॉइंट बन सकता है, जहां से आरजेडी का सफाया होना शुरू हो जाए। एक विधानसभा उपचुनाव जीत जाने से प्रशांत किशोर प्रदेश या देश के बहुत बड़े नेता नहीं हो जाएंगे, लेकिन उनके पास दावा करने के लिए यह है कि मैंने भारतीय जनता पार्टी को उसके गढ़ में घुसकर हराया। इसका गुणगान वह खुद तो करेंगे ही साथ ही देश का एक बड़ा बौद्धिक, राजनीतिक और पत्रकारों का वर्ग मौजूद है, जो आने वाले काफी लंबे समय तक उनका ढोल पीटेगा। इस नतीजे के बाद यह बताने की कोशिश होगी कि कैसे बीजेपी ढलान पर है। हालांकि एक बाय इलेक्शन हारने से बीजेपी या कोई पार्टी ढलान पर नहीं चली जाती। उसके लिए बड़ा वातावरण चाहिए जैसा 1988 में वीपी सिंह की इलाहाबाद बाय इलेक्शन में जीत के समय था। उस समय राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स और भ्रष्टाचार का मामला चरम पर था। लोग कांग्रेस से बहुत नाराज थे। आप यह नहीं कह सकते कि ऐसा ही इस समय है। वैसे भी बिहार में विधानसभा का चुनाव अब से चार साल बाद 2030 में होगा। चार साल का समय बहुत होता है। किसी नई पार्टी के लिए दोनों संभावनाएं होती हैं। चार साल तक सर्वाइव करना मुश्किल होता है और चार साल तैयारी का भी मौका मिलता है। सीजेपी के आंदोलन से इस समय देश में जो माहौल बना हुआ है उसमें बीजेपी की इस हार को बहुत बड़ा करके दिखाया जाएगा। इसे बड़ी चुनौती के रूप में पेश किया जाएगा और भाजपा को इसको चुनौती के रूप में लेना भी चाहिए। कार्यकर्ता क्यों नाराज हैं, इस पर अगर भाजपा नहीं सोचेगी तो आने वाले समय में और मुश्किल का सामना करना पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)








