अब भी येदियुरप्पा है जरूरी
साफ है कि भाजपा अब भी येदियुरप्पा के सहारे है और उनके रहते वह किसी और नेता को राज्य का नेतृत्व नहीं सौंप सकती है, भले ही वह किसी पद पर रहें या नहीं। यही वजह है कि उनको पार्टी ने अपने सर्वोच्च नीति निर्धारक निकाय केंद्रीय संसदीय बोर्ड में भी शामिल किया हुआ है। हालांकि बीच बीच में येदियुरप्पा के बेटों को लेकर चर्चाएं होती रही है कि उनको आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है, लेकिन फिलहाल वह भी इस मुद्दे को तूल देने के मूड में नहीं हैं। दूसरी तरफ राज्य के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए पार्टी जिस रणनीति पर चल रही है, उसमें चुनावी राजनीति से दूर हो चुके पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा को चुनाव अभियान की अगुआई सौंप रखी है।
बोम्मई से भी मिल सकता है लाभ
बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाए जाने के पीछे एक बड़ी वजह लिंगायत समुदाय को यह संदेश देना था कि पार्टी उसको पूरा सम्मान दे रही है। इसके अलावा बोम्मई चूंकि समाजवादी पृष्ठभूमि से आते हैं और उनके पिता एसआर बोम्मई भी जनता दल से मुख्यमंत्री रह चुके हैं, ऐसे में इस चुनाव में वह समाजवादी खेमे खासकर जद एस के समर्थक वर्ग में सेंध लगा सकते हैं। हालांकि इसका खुलासा तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही हो सकेगा।
वोक्कालिगा पर नजर
भाजपा की कोशिश इस बार वोक्कालिगा समुदाय में पैठ बढ़ाने की है। राज्य की भाजपा सरकार में आधा दर्जन से ज्यादा मंत्री इसी समुदाय के हैं। पार्टी ने दूसरे दलों के प्रमुख वोक्कालिगा नेताओं को सरकार में अहमियत भी दी है। पूराना मैसूर क्षेत्र में इस समुदाय का प्रभाव है और वही भाजपा की सबसे कमजोर कड़ी है। ऐसे में अगर बोम्मई के चेहरे पर सीधे दांव लगाया जाता है तो उसे दोहरे नुकसान की आशंका है। एक तो येदियुरप्पा पीछे चले जाएंगे और दूसरा उसके सामाजिक समीकरण बिगड़ जाएंगे।(एएमएपी)



