बिहार में सम्राट चौधरी की ताजपोशी ।

राजीव रंजन।
वर्षों के इंतजार के बाद, आखिरकार बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अपना पहला मुख्यमंत्री बनाने में सफलता मिल गई है। सम्राट चौधरी सिर्फ इस बात से ही बिहार के राजनीतिक इतिहास में दर्ज हो गए हैं कि वे राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं। सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर लगभग तीन दशकों का है, जिसमें वे राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) से होते हुए 2017 में भाजपा में आए और मुख्यमंत्री बने। यह सौभाग्य उनके पिता शकुनी चौधरी को उनके 35 वर्षों के राजनीतिक करियर में प्राप्त नहीं हो सका। हालांकि, वे बिहार में ‘लव-कुश’ समीकरण के आधारस्तंभ रहे और सात बार विधायक तथा एक बार सांसद रहे। उनके रसूख का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी पत्नी पार्वती देवी को तारापुर से विधायक बनवा दिया, जहां से सम्राट चौधरी अभी विधायक हैं। लेकिन शकुनी चौधरी पहले लालू यादव और फिर बाद में नीतीश कुमार की छाया के चलते बिहार के सर्वोच्च पद तक नहीं पहुंच पाए। 
गौरतलब है कि शकुनी चौधरी समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में थे, जो बाद में चलकर जदयू के रूप में सत्ता में आई। उम्र के नौ दशक पूरे कर चुके शकुनी चौधरी अपने पुत्र की ताजपोशी से खुश हैं। जो वे नहीं कर सके, पुत्र ने कर दिखाया। एक वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक, शकुनी चौधरी से वर्षों पहले एक दिन सम्राट चौधरी ने कहा था—‘‘पापा, आप मुख्यमंत्री नहीं बन पाए, लेकिन मैं बनकर दिखाऊंगा।’’ 16 नवंबर 1968 को मुंगेर में जन्मे सम्राट चौधरी को राजनीति विरासत में मिली है। कर्पूरी ठाकुर के बाद सम्राट चौधरी बिहार के सिर्फ दूसरे ऐसे नेता हैं, जो उपमुख्यमंत्री के बाद मुख्यमंत्री भी बने हैं।

राजनीतिक सफर

सम्राट चौधरी के राजनीतिक सफर को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है। 
1. राजद का दौर (1990-2014) : राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल में सबसे युवा मंत्री बने, लेकिन उम्र को लेकर हुए विवाद के कारण उन्हें हटा दिया गया। उन्होंने परबत्ता विधानसभा सीट से 2000 और 2010 में चुनाव जीता। 2010 में उन्हें बिहार विधानसभा में विपक्ष का मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाया गया था।
2. जेडीयू का दौर (2014-2017) : 2014 में सम्राट चौधरी जदयू में शामिल हो गए और जीतनराम मांझी की सरकार में नगर विकास एवं आवास मंत्री बने।
3. भाजपा में प्रवेश और मुख्यमंत्री का सफर (2017 से वर्तमान तक) : वे 2017 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। 2018 में उन्हें बिहार भाजपा का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद मार्च 2023 में वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी बने। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में उन्होंने उपमुख्यमंत्री और पंचायती राज मंत्री के रूप में कार्य किया। अब 14 अप्रैल 2026 को वे नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने।
सम्राट चौधरी बिहार में ओबीसी राजनीति का बड़ा चेहरा बन चुके हैं। वे बिहार में कुशवाहा (कोइरी) समुदाय के एक सशक्त नेता माने जाते हैं, जो भाजपा के लिए जातीय समीकरणों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। संभवतः यही कारण है कि भाजपा ने प्रेम कुमार, नित्यानंद राय, संजय जायसवाल तथा अपने अन्य पुराने नेताओं को परे रखकर सम्राट चौधरी को इस पद के लिए चुना है। आप चाहे कुछ भी कह लें, कर लें, लेकिन आज की तारीख में भी बिहार में जातीय समीकरणों को चुनौती नहीं दे सकते। वैसे कुछ राज्यों को छोड़ दें, तो पूरे देश में कमोबेश यही स्थिति है।
मुख्यमंत्री के चयन को लेकर चौंकाने वाली भाजपा ने बिहार में मुख्यमंत्री के चयन को लेकर वही किया है, जैसी उम्मीद की जा रही थी। यहां भाजपा ने किसी को चौंकाया नहीं, बल्कि निर्णय बिहार की जातिगत राजनीति को ध्यान में रखते हुए ही लिया है। इसके पीछे सबसे बड़ा आधार जातीय समीकरण ही लग रहा है। बिहार में सम्राट चौधरी की जाति पिछड़ी जातियों में यादवों के बाद सबसे मजबूत है। वे जिस जाति से ताल्लुक रखते हैं, वह परम्परागत रूप से भाजपा समर्थक नहीं रही है। वह ‘टैक्टिकल वोटिंग’ यानी उम्मीदवारों और परिस्थितियों को देखकर वोट करती है। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद कुशवाहा समाज में भाजपा की स्वीकार्यता पहले से बढ़ेगी, इसकी पूरी उम्मीद है।
बहुत लंबे समय से भाजपा कार्यकर्ताओं की आकांक्षा थी कि बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री हो और यह आकांक्षा पूरी भी हो गई, लेकिन इसे लेकर जिस तरह का उत्साह और उल्लास कार्यकर्ताओं में दिखना चाहिए था, वह दिखाई नहीं दे रहा है। कम से कम सोशल मीडिया पर तो यह बात जरूर दिखाई पड़ रही है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि जो पुराने कार्यकर्ता हैं, वे इस फैसले से निराश हों कि जो पुराने कार्यकर्ता दशकों से पार्टी के लिए अपना सब कुछ अर्पित कर काम कर रहे थे, उन्हें इस लायक नहीं समझा गया। सूत्रों की जानकारी के मुताबिक, बिहार में भाजपा और आरएसएस के कुछ आदर्शवादी तबके को ऐसा व्यक्ति चाहिए था, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-विद्यार्थी परिषद् की पृष्ठभूमि से आता हो, जिसकी जड़ें जातिवाद-मुक्त राष्ट्रवादी राजनीति से जुड़ी हों, न कि जाति-राजनीति वाले वर्ग से। इसलिए जिन कार्यकर्ताओं की राजनीतिक जड़ें संघ आधारित विचारधारा में गहरी हैं, उन्हें यह फैसला निराश करने वाला लग रहा है। उन्हें लगता है कि यह एक ‘समझौता’ है। लेकिन आदर्श की राजनीति और राजनीतिक व्यावहारिकता में फर्क होता है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि केवल चुप्पी ही है। जहां सम्राट चौधरी की जमीनी उपस्थिति रही है, वहां भाजपा कार्यकर्ता उत्साहित भी दिखे हैं। कई जिला नेताओं ने इसे भाजपा और बिहार के लिए सुअवसर बताया है। इस बात को इस रूप में भी लिया जा सकता है कि सम्राट चौधरी की ताजपोशी पार्टी-विस्तार की रणनीति है, न कि अपने विचारों से दूरी। हो सकता है, पुराने कार्यकर्ताओं को ये बात अभी असहज कर रही हो, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाले समय में भाजपा को इससे लाभ हो सकता है।
सम्राट चौधरी के पास राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव है। वे उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, उनके पास कृषि, नगर विकास, पंचायती राज और वित्त जैसे विभिन्न विभागों का लंबा प्रशासनिक अनुभव है। यह भी प्रतीत होता है कि भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों से एक रणनीति के तहत उन्हें बड़ी भूमिका के लिए तैयार करना शुरू कर दिया था। पहले प्रदेश अध्यक्ष, फिर उपमुख्यमंत्री बनाना संभवतः इसी रणनीति का हिस्सा था। कभी नीतीश के कट्टर विरोधी रहे सम्राट को पिछले कुछ समय से नीतीश का समर्थन भी मिल रहा था। सार्वजनिक सभाओं में जिस तरह से नीतीश ने संकेत दिए, उससे भी लग रहा था कि सम्राट को राज्य के मुखिया का पद मिल सकता है। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि उनकी ताजपोशी में नीतीश की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
लेकिन सम्राट चौधरी के सामने कई चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती है, नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी बनना। नीतीश कुमार की राजनीति के चाहे आप जितने विरोधी हों, लेकिन इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि वे बिहार के सबसे अच्छे मुख्यमंत्रियों में से एक हैं। उन्होंने बिहार में बिजली-सड़क-पानी, कानून व्यवस्था और महिला सशक्तीकरण में सर्वोच्च मानदंड स्थापित किए हैं। उन्होंने बिहार की छवि को बदलने का काम किया है। उन्होंने बहुत बड़ी लकीर खींची है। सम्राट चौधरी को हमेशा इस कसौटी पर तौला जाएगा। थोड़ी भी चूक उनकी किरकिरी करा सकती है और भारी पड़ सकती है। साथ ही, संघ-भाजपा के परम्परागत तबके में भी अपने लिए भरोसा पैदा करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती होगी।