विश्व के 100 सबसे गर्म शहरों में 92 भारत के।
प्रचंड गर्मी का प्रकोप जारी है। यूपी के बांदा जिले का तापमान रोजाना सबसे ज्यादा रह रहा है। बांदा तो एक प्रतिनिधि उदाहरण है, आने वाले वर्षों में देश के सभी जिलों की स्थिति ऐसी ही होने वाली है। इसका अनुमान हमें इधर जारी किए गए वैश्विक तापमान के आंकड़ों से भी लगा लेना चाहिए। इधर वैश्विक तापमान के जो आंकड़े जारी हुए हैं, उसमें दुनिया के 100 सबसे ज्यादा गर्म शहरों की सूची जारी की गई है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस सूची में 92 शहर भारत के हैं। इन 92 में से 37 उत्तर प्रदेश के हैं। बांदा को टक्कर देने वाले प्रदेश के दो अन्य शहर वाराणसी और प्रयागराज हैं, जो सऊदी अरब, मिस्र, कतर जैसे रेगिस्तानी देशों के कई शहरों से अधिक गर्म हैं।
हम भीषण गर्मी के मामले में रेगिस्तानी देशों सऊदी अरब, मिस्र और कतर से आगे पहुंचे कैसे? इस प्रश्न पर विचार करते हुए हम सभी को अपने ऊपर शर्म आनी चाहिए। क्योंकि इसके लिए समाज का वो प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से जिम्मेदार है, जिसने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझा। यह कोई सामान्य बात है भी नहीं कि दुनिया के सबसे अधिक 100 गर्म शहरों में 92 भारत के हैं। यह बेहद गंभीर बात है और इसके लिए सभी जिम्मेदार लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। क्योंकि आने वाली पीढ़ी इसके लिए उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले कुछ समय से दुनिया के विभिन्न स्थानों पर जो युद्ध चल रहे हैं, वे भी इस बढ़ी गर्मी के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि इन युद्धों के कारण भी धरती की गर्मी बढ़ रही है, इसकी बात कोई देश या संगठन नहीं कर रहा है। यह बात तो जोर-शोर से हो रही है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते निर्यात चौपट हुआ जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से पेट्रोलियम पदार्थों के जहाजों के कम गुजरने से पेट्रो मूल्यों में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। पेट्रो पदार्थों की खपत कम करने के लिए बहुत से लोग साइकिलों से चल रहे हैं। इसकी चर्चा भी सर्वत्र हो रही है। धरती की गर्मी बढ़ाने के लिए फासिल फ्यूल जिम्मेदार हैं, ये बात भी जोर-शोर से कही जा रही है लेकिन यह बात कोई नहीं कहता कि पहले रूस-यूक्रेन, इजराइल-फलस्तीन युद्ध के बाद अब अमेरिका द्वारा ईरान पर थोपा गया ताजा-ताजा युद्ध भी धरती की इस बढ़ी हुई गर्मी के लिए जिम्मेदार है। इस मुद्दे पर कोई देश क्यों नहीं बोल रहा है? जबकि एक अनुमान के मुताबिक, एक आधुनिक फाइटर जेट एक घंटे में औसतन 3,500 से 4,500 लीटर ईंधन की खपत करता है। इससे औसतन दस टन कार्बन का उत्सर्जन होता है, जो सीधे-सीधे वातावरण में घुल जाते हैं। अब यह आंकड़ा तो एक फाइटर प्लेन के एक घंटे तक उड़ने का है। युद्ध में दोनों पक्षों के अनगिनत फाइटर प्लेन महीनों से आसमान में गड़गड़ा रहे हैं। इतना ही नहीं, लगातार बमबारी भी कर रहे हैं। बमबारी से कितना भयंकर कार्बन उत्सर्जन होता है, इसकी भी बात कोई नहीं करता। अब समय आ गया है कि युद्ध से होने वाले प्रदूषण पर भी बात हो। इस समय चल रहे युद्धों के कारण रोजाना कितना अनुमानित कार्बन उत्सर्जन हो रहा है, उस पर भी बात होनी चाहिए। दुखद यह है कि इस पर कोई चर्चा ही नहीं करता।

डोनाल्ड ट्रंप अपने देश अमेरिका के लिए आफत के परकाले साबित हुए हैं। एक दिन उन्हें अचानक सनक चढ़ी और उन्होंने ईरान पर हमला करके वहां के सुप्रीम लीडर को जान से मार डाला। जिस ईरान को वह मामूली समझकर उस पर हमला किए थे, वह महाबली ट्रंप से डटकर मुकाबला कर रहा है। ट्रंप जब दुबारा सत्ता में आए, तो सत्ता संभालते ही उन्होंने पेरिस एग्रीमेंट से अमेरिका के हटने की घोषणा कर दी। ट्रंप से दुनिया को ऐसी ही गैरजिम्मेदारी की उम्मीद थी, इसलिए इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
अच्छी बात यह है कि भारत इस मामले में बढ़-चढ़कर अपना योगदान दे रहा है। भारत ने एक जिम्मेदार देश की तरह पेरिस एग्रीमेंट की शर्तों का पालन करने के प्रयास शुरू किए हैं। भारत सरकार ने लक्ष्य रखा है कि हम 2030 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को 45 फीसदी तक कम करेंगे। इसी के साथ ही 2030 तक हमारा देश अपनी कुल बिजली उत्पादन क्षमता का 50 प्रतिशत हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन (सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत और परमाणु ऊर्जा) से प्राप्त करेगा। इसी के साथ वर्ष 2030 तक 2.5 से 3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य भी केंद्र सरकार ने निर्धारित किया है। इसी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया ‘लाइफ मिशन’ लोगों को चीजों के अंधाधुंध उपयोग के स्थान पर सचेत उपभोग के लिए लगातार प्रेरित कर रहा है। इसी के साथ भारत का सबसे बड़ा दीर्घकालिक लक्ष्य 2070 तक ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन प्राप्त करना है, यानी जितना कार्बन हम उत्सर्जित करेंगे, उतनी ही सोख लेंगे। लेकिन धरती को गर्म होने से बचाना केवल भारत की जिम्मेवारी नहीं है। इसके लिए दुनिया के दूसरे देशों को भी इसी शिद्दत के साथ आगे आना होगा।

केंद्र सरकार की तरह ही उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार भी पर्यावरण संबंधी इस अंतरराष्ट्रीय संकट से पूरी तरह परिचित और इसके समाधान के लिए संकल्पबद्ध है लेकिन राज्य सरकार के रास्ते में इतने अवरोध हैं कि सदेच्छापूर्वक इस दिशा में किए जा रहे कार्यों का प्रभावी परिणाम सही जगह तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसीलिए लखनऊ दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल है (एनबीआरआई के नए अध्ययन के मुताबिक) और गंगा और आदिगंगा (गोमती) पहले की तरह ही प्रदूषित हैं। उनका पानी आचमन करने योग्य नहीं है। प्रदूषण संकट से भली प्रकार से निपटने के लिए यूपी सरकार ने सभी 75 जिलों में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कार्यालय बनाने की घोषणा की है लेकिन बोर्ड में स्टाफ की इतनी कमी है कि अभी तक इसके जितने क्षेत्रीय कार्यालय हैं, वहां पर ही काम करने के लिए पर्याप्त स्टाफ नहीं हैं।
ग्लोबल, राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर हो रहे प्रयासों की तरह ही लोकल स्तर पर भी समाज के हर वर्ग की तरफ से इस दिशा में सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए। क्योंकि लोकल स्तर पर देखें तो लखनऊ शहर की स्थिति भी बहुत बुरी है। लखनऊ स्थित नेशनल बॉटनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनबीआरआई) के मार्च 2026 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार लखनऊ की हवा में एल्युमिनियम, आयरन, कैडमियम और क्रोमियम जैसी जहरीली भारी धातुएं पाई गई हैं, जिससे शहरवासियों का स्वास्थ्य खतरे में है। एक अन्य अध्ययन के अनुसार लखनऊ दुनिया का 58वां सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर भी है। जिस शहर को हवा-पानी जैसी मूलभूत चीजें भी शुद्ध नहीं मिल रही हैं तो फिर अगर वहां गर्मी ने अपना कहर बरपा रखा है, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? अब जब पानी सिर के ऊपर से गुजर गया है तो देर से ही सही, हमें प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को पुनः समझना होगा।
(लेखक ’लखनऊ फोकस’ पत्रिका के संपादक हैं।)









