पार्टी के चार मुख्यमंत्रियों में से तीन की लॉयल्टी प्रियंका के साथ, घट रहा राहुल का कद ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
आखिर कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस्तीफा दे दिया है और डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना तय हो गया है, लेकिन इस बदलाव में एक साथ कई संदेश छिपे हैं।
पहला संदेश है कि परिवार पहले,पार्टी बाद में। सिद्धारमैया पिछड़ा वर्ग की कुर्बा जाति से आते हैं। वह अहिंदा यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक की राजनीति करते हैं। देवराज अर्स ने यह राजनीति शुरू की थी। वह सिद्धारमैया से पहले कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। उनका रिकॉर्ड पिछले साल नवंबर में सिद्धारमैया ने तोड़ा है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी जो देश भर में घूमघूम कर पिछड़ा वर्ग की बात करते थे। पत्रकारों से पूछते थे कि तुम किस जाति के हो? वह राहुल गांधी अपने एकमात्र पिछड़ा वर्ग के मुख्यमंत्री को पद से हटा रहे हैं। वैसे कर्नाटक में जो सामाजिक संरचना है उसमें वोक्कालिगा और लिंगायत भी पिछड़ा वर्ग में आते हैं, लेकिन इन दोनों समाजों के लोग बहुत संपन्न और प्रभावशाली हैं इसलिए परसेप्शन में उस तरह से उनको पिछड़ा नहीं माना जाता है। डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समाज से आते हैं। तो सिद्धारमैया के हटने और डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का संदेश यह है कि राहुल गांधी पिछड़ा वर्ग का जो खेल खेलते हैं, उसका कोई मतलब नहीं है। यह सिर्फ दिखावा है। दूसरा संदेश यह है कि परिवार तय करेगा कि क्या होगा। विधायकों का बहुमत आज भी सिद्धारमैया के साथ है। लेकिन राहुल गांधी उनको मुख्यमंत्री पद से हटने से रोक नहीं पाए। सिद्धारमैया को लगता है कि राहुल गांधी ने उनको धोखा दिया। याद रखिए कि केरलम में भी विधायकों का बहुमत केसी वेणुगोपाल के साथ था, लेकिन राहुल गांधी उनको मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाए।
सिद्धारमैया वैसे जाते-जाते एक खेल भी कर गए। उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में 2013 में एक कास्ट सर्वे कराया था, लेकिन उसकी रिपोर्ट कभी पब्लिश नहीं हुई। दूसरे कार्यकाल में खूब हल्ला मचा तो उन्होंने दूसरी बार कास्ट सर्वे कराया। उसकी भी रिपोर्ट पब्लिश नहीं हुई थी, लेकिन अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक में उन्होंने कास्ट सर्वे की रिपोर्ट रखी। अब डीके शिवकुमार की सरकार के लिए इसे विधानसभा में पेश करना मजबूरी हो जाएगा। इस कास्ट सर्वे की खबरें जो छन कर बाहर आई हैं,उसके हिसाब से राज्य में लिंगायत और वोक्कालिगा समाज की जो जनसंख्या बताई जाती है,वास्तव में उससे कम है। तो सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार के रास्ते में बड़ा रोड़ा अटका दिया और गांधी परिवार भी इसमें कुछ नहीं कर पाएगा।
कर्नाटक में हो रहे इस बदलाव से कांग्रेस के अंदर जो परिवर्तन हो रहा है, उसको भी समझना पड़ेगा। परिवार की चलती है, इससे किसी को इनकार नहीं है। लेकिन सवाल है कि अब परिवार में किसकी चलती है? एक समय था जब केवल सोनिया गांधी की चलती थी। उन्होंने जो कह दिया वह पत्थर की लकीर हो गया। 2017 दिसंबर में जब राहुल गांधी अध्यक्ष बने तो उनकी चलने लगी। राहुल ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया फिर भी उनकी ही चलती रही। लेकिन राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा के बीच एक रेस चल रही थी। प्रियंका बैकग्राउंड में थीं। पहले उनको चुनाव नहीं लड़ने दिया गया। फिर जब वायनाड की सीट राहुल गांधी ने खाली की तो उनको बाय इलेक्शन में लड़ाया गया। तब वह लोकसभा पहुंचीं। इसके बाद धीरे-धीरे प्रियंका ने पकड़ बनाना शुरू किया। इस समय देशभर में चार राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुक्खू प्रियंका वाड्रा के आदमी माने जाते हैं। इसीलिए राहुल गांधी हिमाचल के दौरे पर भी ज्यादा नहीं जाते। प्रियंका ने बहुत सफाई से दूसरा खेल केरलम में खेला। केरलम में राहुल गांधी केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। विधायकों का बहुमत भी केसी वेणुगोपाल के पक्ष में था। प्रियंका वाड्रा ने वीडी सतीशन को कहा कि मुस्लिम लीग से बात करो। मुस्लिम लीग और सतीशन के पहले से अच्छे संबंध थे और इस बार मुस्लिम लीग को ज्यादा सीटें भी मिली थी। सतीशन और मुस्लिम लीग मिल गए तो उसके बाद प्रियंका वाड्रा ने अपनी अगली चाल चली। ऐसे में राहुल गांधी चाहकर भी केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाए। राहुल गांधी की इच्छा के विरुद्ध वीडी सतीशन केरलम के मुख्यमंत्री बन गए।

अब कर्नाटक का हाल देखिए। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सारी मेहनत डीके शिवकुमार ने की, लेकिन सामाजिक समीकरणों को देखते हुए सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बना दिया गया। डीके शिवकुमार को डिप्टी सीएम बनाया गया और कहा गया कि ढाई साल बाद आप मुख्यमंत्री बन जाएंगे। जब से ढाई साल पूरे हुए तब से डीके शिव कुमार कई बार दिल्ली आए, लेकिन राहुल गांधी ने उन्हें मिलने का समय तक नहीं दिया। डीके शिवकुमार को हारकर प्रियंका वाड्रा से बात करनी पड़ी। प्रियंका वाड्रा ने पहले सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी से बात की। अब उन्होंने क्या समझाया यह तो मालूम नहीं, लेकिन सार्वजनिक जानकारी है कि डीके शिवकुमार गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी दोनों के एटीएम हैं। तो राहुल गांधी को न चाहते हुए भी डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजी होना पड़ा। वह सिद्धारमैया को हटाने के पक्ष में नहीं थे। उनका जो पिछड़ा वर्ग का कार्ड था, वह कार्ड खत्म हो रहा है, लेकिन राहुल गांधी कुछ नहीं कर पाए। तो कांग्रेस के चार मुख्यमंत्रियों में से तीन की लॉयल्टी प्रियंका वाड्रा के साथ है। चौथे मुख्यमंत्री तेलंगाना के रेवंत रेड्डी तो अपने आप में स्वतंत्र इकाई हैं। वह सार्वजनिक रूप से बोल चुके हैं कि मेरा कोई हाईकमान नहीं है। सार्वजनिक मंच से वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बड़े भाई कहकर संबोधित करते हैं। वह कोई परवाह नहीं करते कि मोदी के बारे में राहुल गांधी क्या सोचते हैं,क्या बोलते हैं।
तो इन चार मुख्यंत्रियों में से किसी की लॉयल्टी राहुल गांधी के प्रति नहीं है। कांग्रेस पार्टी में इस तरह की स्थिति कभी नहीं आई कि जो परिवार से सबसे बड़ा नेता हो, उसकी चले ही नहीं। यह कांग्रेस के अंदर बड़े परिवर्तन की शुरुआत है। मैं यह नहीं कहने जा रहा हूं कि कल ही राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष पद से हटा दिया जाएगा और प्रियंका वाड्रा नेता प्रतिपक्ष हो जाएंगी, लेकिन यह एक दिन होगा जरूर। परिस्थितियां और घटनाक्रम जिस तरफ बढ़ रहा है, उससे बहुत स्पष्ट है कि राहुल गांधी का कद कांग्रेस के अंदर घटता जा रहा है और प्रियंका वाड्रा की ताकत लगातार बढ़ रही है। याद रखिए प्रियंका वाड्रा कांग्रेस की राष्ट्रीय महामंत्री हैं, लेकिन उनको कोई काम नहीं दिया गया है। फिर भी वह अपने लिए काम तलाश लेती हैं। मजबूरी में असम में उनको स्क्रीनिंग कमेटी में रखा गया। केरलम में औपचारिक रूप से उनको कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई। सोनिया गांधी पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरमैन हैं। राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। कांग्रेस और गांधी परिवार के अंदर ये दो बड़े पावर सेंटर माने जाते हैं। प्रियंका वाड्रा को फ्रिंज प्लेयर माना जाता है। लेकिन वह फ्रिंज प्लेयर अब मेन प्लेयर बन गई है। आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी के अंदर राहुल गांधी की नहीं, प्रियंका वाड्रा की चलेगी, यह कर्नाटक का घटनाक्रम बता रहा है। आने वाले समय में राहुल लगातार प्रियंका वाड्रा से पीछे होते जाएंगे। अगर किसी के मन में शंका है तो 2027 में जो सात राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उसके नतीजे आने का इंतजार कीजिए। उसके बाद आप देखेंगे कि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में कितना बड़ा परिवर्तन आ गया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)