चौतरफा संकट में घिरने से बौखलाहट बढ़ी।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कहते हैं कि जब दर्द हद से ज्यादा गुजर जाता है तो दवा बन जाता है, लेकिन हताशा अगर हद से आगे बढ़ जाए तो बीमारी बन जाती है। और बीमारी भी कौन सी? सन्निपात की। सन्निपात के मरीज को मालूम ही नहीं होता कि वह क्या बोल रहा है। उसे जो सुन रहे होते हैं, वे भी समझ नहीं पाते कि वह कहना क्या चाहता है। कांग्रेस के सबसे बड़े नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का यही हाल हो गया है।
राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ इस समय जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं,वह इस बात को बताता है कि उनकी हताशा हद से ज्यादा गुजर चुकी है। उनको सुनने वाले भी हैरान हैं कि भाई ये आदमी कहना क्या चाहता है? वह किसी तथ्य की बात क्यों नहीं कर रहा है। राहुल गांधी बोल रहे हैं कि इस देश में लोगों के पास खाने को नहीं है और प्रधानमंत्री बैटरी वाली गाड़ी खरीदने को कह रहे हैं। शायद राहुल को मालूम नहीं है कि 81 करोड़ से ज्यादा लोगों को देश में मुफ्त अनाज मिल रहा है। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों की बीसियों योजनाएं हैं। पिछले 12 साल में 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर आए हैं। लेकिन राहुल गांधी के हिसाब से देश में पेट्रोल और डीजल की कमी से हाहाकार मचा हुआ है। देश में आप कहीं निकल जाइए,पेट्रोल के लिए हाहाकार मचता कहीं नहीं दिखेगा, लेकिन राहुल गांधी को यह दिखाई दे रहा है तो उन पर नाराज मत होइए। बीमार व्यक्ति से हमेशा सहानुभूति दिखानी चाहिए। राहुल गांधी अब उस अवस्था में पहुंच गए हैं जब उनको पता ही नहीं है कि वह जो बोल रहे हैं, उसका मतलब क्या है?
आपने निजी जीवन में भी महसूस किया होगा कि जब आपको गुस्सा आता है तो दो तरह के रिएक्शन होते हैं। गुस्सा बहुत ज्यादा आ जाए और आप कुछ कर न पा रहे हों तो रोने लगते हैं। और अगर गुस्सा बहुत ज्यादा आ रहा हो और रो भी न पाएं तो फिर आप गाली गलौज पर उतर आते हैं, जो इस समय राहुल गांधी कर रहे हैं। राहुल गांधी यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वह उस प्रधानमंत्री के खिलाफ बोल रहे हैं, जिसकी पॉलिटिकल कैपिटल इतनी ज्यादा है कि राहुल गांधी अपना पूरा जीवन लगा दें तब भी उसको खर्च नहीं करवा सकते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में लाख खामियां होंगी,लेकिन लोगों का भरोसा इतना है कि उन्हें लगता है कि सारी समस्याएं मोदी और उनकी सरकार ही दूर कर सकती है। इस भरोसे को 12 साल में राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी और उनके साथी विपक्षी दल तोड़ नहीं पाए। आप देखिए लोकसभा चुनाव के बाद जितने विधानसभा के चुनाव हुए हैं, उनमें बीजेपी जीत ही नहीं रही है,उसकी प्रचंड जीत हो रही है। विपक्ष का सफाया हो रहा है। दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, असम कहीं देख लीजिए,भाजपा की जीत राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने वाली जीत है। अगर यह बात किसी राजनेता को समझ में न आए तो मान लेना चाहिए कि वह राजनीति करने के लायक नहीं है। उसको पता ही नहीं है कि जनता चाहती क्या है। राहुल गांधी की जगह और कोई नेता प्रतिपक्ष होता तो सोचता कि हम प्रधानमंत्री में इतनी कमियां बता रहे हैं फिर भी उन्हें लोग वोट क्यों दे रहे हैं। लेकिन ये सब सोचने के लिए कॉमन सेंस होना चाहिए, वह भी राहुल गांधी में नहीं है।
अपने भाषणों में राहुल गांधी यह बताने की कोशिश करते हैं कि वह युगदृष्टा हैं। भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में उनको पहले पता चल जाता है। लेकिन वह अपने और अपनी पार्टी के बारे में नहीं जानते कि क्या होने वाला है। मैं राहुल गांधी की तरह से भविष्यदृष्टा नहीं हूं,लेकिन वर्तमान जो इशारा कर रहा है वह मुझे दिखाई दे रहा है। वर्तमान बता रहा है कि कांग्रेस और राहुल गांधी की राजनीतिक नाव लगातार डूब रही है। वह इस बात का संकेत दे रही है कि राहुल गांधी बहुत बड़े संकट में घिरने वाले हैं। जिस तरह के मुकदमे उनके खिलाफ हो रहे हैं। उनकी नागरिकता पर सवाल उठ रहा है। उन पर और उनकी पार्टी के नेताओं पर जिस तरह मानहानि के मुकदमे हो रहे हैं। इसके अलावा जिस तरह अदालत ने राहुल गांधी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में जांच कराने को कहा है, इन सबको आप जोड़ कर देखिए तो समझ आएगा कि राहुल गांधी के इर्दगिर्द जो घेरा है, वह लगातार कसता जा रहा है। यही स्थिति अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी की भी हुई थी। दोनों को लगता था कि हमें सत्ता से कौन हटाएगा? हमें कौन बेईमान साबित कर सकता है? लेकिन जनता जब अपना गांडीव उठाती है तो पता नहीं चलता कि सत्ता कहां गई। राहुल गांधी और उनकी पार्टी की सत्ता तो 2014 में ही चली गई थी। सत्ता गए आज 12 साल हो गए। फिर भी राहुल गांधी को समझ में नहीं आ रहा है कि हुआ क्या है? क्यों एक व्यक्ति, जो गुजरात का मुख्यमंत्री था, लगातार तीन बार देश का प्रधानमंत्री बन जाता है। देश की जनता 1984 से जोर से चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि भाई अब कांग्रेस नहीं चाहिए। जुगाड़ और जोड़तोड़ करके आप एक-दो बार सत्ता में आ गए लेकिन फिर जनता ने ऐसा उखाड़ा कि जोड़तोड़ करने लायक भी नहीं छोड़ा। लेकिन राहुल गांधी को यह समझाए कौन? जो सन्निपात का मरीज होता है, उसको डॉक्टर भी नहीं समझा पाते हैं। उसको केवल दवा देते हैं कि वह शांत रहे। तो देश की जनता लगातार यह दवा राहुल और कांग्रेस को दे रही है। लेकिन उस दवा का कोई असर ही नहीं दिख रहा है। बल्कि सन्निपात का असर और बढ़ता जा रहा है। अब तो लगता है कि लाइलाज हो गया है। राजनीति में जब रोग लाइलाज हो जाए तो उसके बाद नेता और पार्टी का क्या होता है, इसके बारे में कोई भविष्यवाणी करने की जरूरत नहीं है।
तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री, भाजपा और केंद्र सरकार के बारे में जो बोलते हैं उसे छोड़ दीजिए,वह जब देश के बारे में बोलते हैं कि बर्बादी होने वाली है,सब खत्म होने वाला है तब उनके अंदर जो खुशी है वह देखिए। उनको लगता है कि देश बर्बाद होगा तभी मैं आबाद होऊंगा। अब यह सपना तो दुनिया में किसी का पूरा हुआ नहीं है, लेकिन राहुल गांधी को लगता है कि उनका यह सपना पूरा होगा। जब देश बर्बाद हो जाएगा तब देश के लोग उनकी ओर देखेंगे। भारत की बर्बादी होने वाली है, यह दुनिया में किसी को नहीं दिख रहा है। यह सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी को दिख रहा है। दुनिया के सभी देशों को मालूम है कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में भारत का जो स्थान है वह कितना जरूरी है। भारत के पास मैन पावर है, टेक्नोलॉजी है। भारत के पास मार्केट है। इतना बड़ा मार्केट दुनिया में और किसी देश के पास नहीं है। भारत की मजबूत और दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। भारत एक मजबूत सैन्य शक्ति वाला देश है, जिसका मुकाबला अमेरिका, चीन और रूस के अलावा किसी से नहीं हो सकता। इसके बावजूद राहुल गांधी को देश की बर्बादी दिख रही है। तो मैं फिर कह रहा हूं कि इस सन्निपात के मरीज से सहानुभूति जताइए। सन्निपात का दौरा अभी और बढ़ने वाला है क्योंकि राहुल गांधी, उनका परिवार और पार्टी चौतरफा संकट में घिरते जा रहे हैं और बचने के रास्ते बंद होते जा रहे हैं। राहुल गांधी इस समय बंद गली के आखिरी मकान में खड़े हैं,वहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं है लेकिन फिर भी उनको समझ में नहीं आ रहा है। उनके पैर के नीचे से जमीन तो पता नहीं कब की खिसक गई, लेकिन राहुल गांधी को इसका अहसास भी नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)