प्रदीप सिंह।पश्चिम बंगाल की सत्ता से ममता बनर्जी गईं। अब यह मत समझिए कि वह लौट कर आने वाली हैं। वैसे तो राजनीति में आने-जाने का सिलसिला चलता रहता है, लेकिन कुछ का जाना और आना स्थाई होता है। ममता बनर्जी के लिए मैं गईं तो गईं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास ऐसा ही रहा है। उनकी पार्टी में भी टूट तय है।
पश्चिम बंगाल में 1947 से 1977 तक 30 साल कांग्रेस पार्टी सत्ता में रही। हालांकि उसने कोई ऐसा काम नहीं किया, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन की लिगेसी का उसको फायदा मिलता रहा। 1977 में कांग्रेस पार्टी राज्य की सत्ता से चली गई तो चली ही गई। आज पूरे पांच दशक हो गए हैं वह सत्ता में लौट नहीं पाई। कांग्रेस को हटाकर सत्ता में लेफ्ट फ्रंट आया, जिसका नेतृत्व सीपीएम कर रही थी। सीपीएम एक विचारधारा पर आधारित कैडर बेस्ड पार्टी थी। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक वह नेशनल पार्टी भी थी। वह 34 साल सत्ता में रही। उसने सरकार,प्रशासन और पार्टी तीनों को एक कर दिया। जो-जो गलत हो सकता था, वह सब सीपीएम ने किया। उसने सिर्फ एक अच्छा काम किया जमींदारी उन्मूलन का। छोटे मजदूर और किसानों को भूमि का आवंटन किया गया। लेकिन पूंजीवाद के खिलाफ काम करने के लिए ज्योति बसु की सरकार ने पश्चिम बंगाल में उद्योगों को उजाड़ना शुरू कर दिया। पश्चिम बंगाल देश का एकमात्र राज्य रहा, जहां सत्तारूढ़ पार्टी हड़ताल करती थी। नतीजा यह हुआ कि पश्चिम बंगाल उद्योग विहीन हो गया। यह गलत हो रहा है इस बात को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने समझा, जब उन्होंने टाटा के नैनो प्लांट को लाने की कोशिश की। उन्हें समझ आ गया कि लोगों को रोजगार देना है तो उसके लिए उद्योगों की जरूरत है। ममता बनर्जी ने सीपीएम की उसी रणनीति से उसको मात दी। उन्होंने पूंजीवाद विरोध का नारा तो नहीं दिया लेकिन उद्योग के विरोध का नारा दिया क्योंकि उनकी पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं था। वह कांग्रेस से निकली हुई पार्टी थी। ममता बनर्जी पार्टी, सरकार और प्रशासन के मेलजोल को एक नए स्तर पर ले गईं। जहां पुलिस पार्टी के कैडर के रूप में काम करने लगी, सरकारी कर्मचारी पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगे और पार्टी का कार्यकर्ता गुंडागर्दी का काम करने लगा। ममता बनर्जी ने टाटा के प्रोजेक्ट को तो बाहर कर ही दिया,वह राज्य में उसके बाद कोई उद्योग ला भी नहीं पाईं। बेरोजगार युवा सरकार के खिलाफ विद्रोह न करें। इसके लिए उन्होंने कट मनी,तोलाबाजी और सिंडिकेट का एक तंत्र बनाया कि तुम पैसा वसूलो। राज्य में 100 टोल बूथ तो अभिषेक बनर्जी के थे। तृणमूल कांग्रेस हर वाहन से टैक्स वसूलती थी। आपने देश के किसी और राज्य या दुनिया में कहीं सुना है कि राजनीतिक पार्टी का टोल बूथ हो। 15 साल राज करने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने मान लिया कि अब हमको हटाने वाला कोई नहीं है। लेकिन अब लड़ाई में सामने बीजेपी थी। सीपीएम के बाद दूसरी कैडर बेस्ड पार्टी,जो पूंजीवाद की विरोधी नहीं है। उसका सिद्धांत यह नहीं है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।
ममता से लड़ने के लिए भाजपा ने जनता पर हो रहे अत्याचार को मुद्दा बनाया। उसने किसी प्रशासनिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया। आपमें से बहुत से लोगों का मानना था कि 2021 के बाद राज्य में जिस तरह की हिंसा हुई, आरजी कर और संदेशखाली की घटना हुई उसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाना चाहिए था। केंद्र सरकार के लिए यह आसान काम था। लेकिन उसने वह रास्ता नहीं चुना। बीजेपी ने तय किया कि ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर राजनीतिक लड़ाई लड़कर ही करेंगे और उस राजनीतिक लड़ाई में जब जनता का साथ मिल गया तो देखिए कितना बड़ा बदलाव हो गया। कांग्रेस और सीपीएम राज्य की सत्ता से बाहर हो गईं, लेकिन उनका अस्तित्व बचा हुआ है क्योंकि कांग्रेस का राष्ट्रीय आधार और सीपीएम वैचारिक आधार है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं होने वाला है क्योंकि तृणमूल का न तो कोई राष्ट्रीय आधार है और न वह कैडर बेस्ड पार्टी है। ममता बनर्जी की पार्टी की कोई विचारधारा नहीं है और उनका जो कैडर है, वह एक तरह का गुंडा तंत्र है। और गुंडा कानून के डंडे से बहुत डरता है। कानून का वह डंडा शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले दिखाना शुरू किया और उसके बाद उसको आजमाना शुरू कर दिया। नतीजा यह है कि सरकार को केवल कहना पड़ा कि जुमे के दिन सड़क पर नमाज नहीं होगी तो नहीं हुई। वही गुंडे जो लोगों के घर पर कब्जा करते थे, अब उन गुंडों के घर बुलडोजर से गिराए जा रहे हैं। गुंडों के सरदार अभिषेक बनर्जी के घर पर नगर निगम का नोटिस लग गया है कि बताइए कैसे बनाया? ये जमीन कब और कहां से खरीदी? नक्शा पास कराया कि नहीं कराया? अभिषेक बनर्जी आज छिपते घूम रहे हैं। सड़क पर निकलते हैं तो चोर-चोर का नारा लगता है। ममता बनर्जी अदालत पहुंचती हैं तो चोर-चोर का नारा अदालत के परिसर में लगता है। आप देखिए कि 4 मई से पहले तक ममता और अभिषेक बनर्जी की क्या स्थिति थी और आज क्या है? आज उनके साथी उनका साथ देने को तैयार नहीं हैं। ममता बनर्जी सिर्फ सत्ता से बाहर नहीं गई हैं, अब अगला नंबर उनकी पार्टी का है। वह पार्टी और विधायक दल की बैठकें बुला रही हैं,लेकिन उनमें ज्यादातर नेता और विधायक आ नहीं रहे हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो किसी के सगे नहीं हैं। इसीलिए भाजपा ने शुरू में ही घोषणा कर दी कि तृणमूल कांग्रेस से किसी को नहीं लेंगे, लेकिन यह आधा सच है। तृणमूल के सांसद और विधायक टूटने को तैयार हैं।
लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 29 सदस्य हैं। आने वाले दो-तीन महीने या संसद के मानसून सत्र से पहले अगर आपको यह सुनने को मिले कि तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल में टूट हो गई है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। विधायकों की हालत यह है कि वे आने को तैयार हैं लेकिन भाजपा उनको लेने को तैयार नहीं है। ये विधायक अगर तृणमूल कांग्रेस में रहे भी तो तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ ही बोलेंगे। आप ज्यादा से ज्यादा छह महीने रुक जाइए। ममता बनर्जी की सत्ता गई है, गुरूर टूटा और अब पार्टी टूटेगी। तृणमूल कांग्रेस को टूटने से कोई रोक नहीं सकता। सीपीएम का कार्यकर्ता तो आईडियोलॉजी से जुड़ा हुआ कार्यकर्ता था। फिर भी वह छोड़कर चला गया। तृणमूल कांग्रेस से जुड़े जो कार्यकर्ता हैं वे दरअसल गली के गुंडे हैं। जो तोलाबाजी, कट मनी और सिंडिकेट पर जीवित थे। यह तीनों बंद हो गए। अब उनके सर्वाइवल का सवाल है। उनको नया रास्ता खोजना है। भाजपा रास्ता दे नहीं रही है। तृणमूल कांग्रेस से जुड़े रहे तो उनको मालूम है कि कानून का शिकंजा उनके इर्द-गिर्द जरूर कसेगा। तो टीएमसी के पास 2029 के लोकसभा चुनाव तक का भी समय नहीं है। उससे पहले तृणमूल कांग्रेस टूटेगी। भाजपा को इसके लिए कोई ऑपरेशन कमल चलाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस जहां खड़ी है, उसके नीचे जमीन ही नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)








