अब हिंदुत्व प्लस सामाजिक समीकरण की राजनीति चलेगी बिहार में।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
बिहार में जिस राजनीतिक परिवर्तन की चर्चा काफी समय से चल रही थी आखिर वह हो गया। भाजपा को पहली बार बिहार में मुख्यमंत्री का पद मिल गया। पार्टी ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया है। सम्राट चौधरी मूल रूप से भाजपाई नहीं हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी उनका संबंध नहीं रहा है। पहले वह आरजेडी में रहे फिर जेडीयू में रहे और उसके बाद भाजपा में आए हैं। लेकिन पिछले दो-तीन सालों में भाजपा ने उनको जिस तरह से आगे बढ़ाया, उससे स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वह सम्राट चौधरी को बिहार में भाजपा के नए नेता के रूप में देख रही है। 
भाजपा ने पहले उनको प्रदेश अध्यक्ष बनाया फिर जब सरकार बनी तो डिप्टी सीएम बनाया गया। दूसरी बार सरकार बनी तो फिर डिप्टी सीएम बने और साथ ही गृह मंत्रालय मिला। बहुत से लोग कह रहे हैं कि भाजपा ने ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया है,जो मूल रूप से भाजपा का नहीं है। इस तरह के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले बिहार और देश की राजनीतिक परिस्थिति पर ध्यान देने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि बिहार में भाजपा का अपने दम पर बहुमत नहीं है। सरकार चलाने के लिए उसको जेडीयू के समर्थन की जरूरत है। बात यहां केवल अपना मुख्यमंत्री बना लेने की नहीं है बल्कि भाजपा की योजना लंबे समय तक बिहार की राजनीति पर अपना प्रभुत्व कायम करने की है। दूसरा केंद्र की भाजपा सरकार जेडीयू के समर्थन पर टिकी है। इन दोनों बातों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तीसरी बात बिहार समाजवादी रुझान वाला आखिरी राज्य था, जहां से समाजवाद की राजनीति की विदाई हो रही है। यह बिहार की राजनीति में संक्रमण काल है। संक्रमण काल में एकदम से बड़ा परिवर्तन नहीं आता। धीरे-धीरे आता है। तो सम्राट चौधरी उसी ब्रिज का काम कर रहे हैं। अब बिहार में हिंदुत्व प्लस सामाजिक समीकरण की राजनीति चलेगी, जो अभी तक बीजेपी नहीं चला पाई। उस समीकरण में सम्राट चौधरी बिल्कुल फिट बैठते हैं। पिछड़ा वर्ग में यादवों के बाद बिहार में सबसे ज्यादा आबादी कुशवाहा समाज की है, जिससे सम्राट चौधरी आते हैं।
बिहार में नीतीश कुमार ने कुर्मी और कुशवाहा का लवकुश गठबंधन बनाया। उसके अलावा दलितों के एक गुट और पासमांदा मुसलमान को साथ लिया। लेकिन यह सब उनके काम नहीं आता अगर बीजेपी का कोर वोटर सवर्ण उनके साथ नहीं होता। तो इसलिए जेडीयू और भाजपा दोनों एक दूसरे पर निर्भर थे। स्मूथ ट्रांजिशन के लिए जरूरी था कि बीजेपी शपथ ग्रहण समारोह के मौके पर कोई बहुत तामझाम न करती। इसीलिए शपथ ग्रहण समारोह में न तो प्रधानमंत्री आए और न ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह। कोई जश्न नहीं हो रहा है। शपथ ग्रहण समारोह गांधी मैदान में न होकर लोक भवन यानी गवर्नर हाउस में हुआ। यह साधारण रूप से असाधारण बात है। बिहार की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है और आने वाले दिनों में इस परिवर्तन का असली स्वरूप आपको दिखाई देगा। जो लोग कहते हैं कि ये सरकार नीतीश कुमार के बताए रास्ते पर चलेगी, ज्यादा समय नहीं लगेगा जब यह सरकार अपना रास्ता तय करेगी। हर मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री, चाहे उसी पार्टी का क्यों न हो, अपने विज़न को लागू करने की कोशिश करता है और सम्राट चौधरी का विज़न भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व बनाएगा। वह तय करेगा कि बिहार की राजनीति की दिशा कैसे बदलनी है। इसलिए मैं कहता हूं कि सम्राट चौधरी बिहार में भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान हैं, भविष्य नहीं हैं।
भाजपा बहुत लंबा सोचती है। दीर्घकालीन योजना बनाती है। भाजपा ने नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से जाने का 25 साल इंतजार किया। कभी भाजपा ने नीतीश को यह धमकी भी नहीं दी कि हम समर्थन विड्रॉ कर लेंगे। दो बार नीतीश कुमार गए तो अपनी मर्जी से गए। फिर जब लौटने की इच्छा जाहिर की तो भाजपा ने मना नहीं किया क्योंकि भाजपा को अपना लक्ष्य दिखाई दे रहा था कि बिहार की राजनीति में पार्टी का वर्चस्व स्थापित करना है। बिहार की राजनीति केवल जाति या केवल हिंदुत्व से नहीं चल सकती। भाजपा जब इसका कॉम्बिनेशन बनाती है तो सफलता की गारंटी हो जाती है। उत्तर प्रदेश में 1991 में जब उसने कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया और 2014 के लोकसभा चुनाव एवं 2017 के विधानसभा चुनाव में यही कॉम्बिनेशन बनाया और सफलता पाई। बिहार में भाजपा ऐसा नहीं कर पाई। वह न तो सामाजिक समीकरण को उस तरह से  साध पाई और न ही हिंदुत्व का कोई नेता उभार पाई है। तो बीजेपी के लिए यह राह लंबी है। बीजेपी की नजर जेडीयू पर भी है। बीजेपी को पता है कि नीतीश कुमार के बाद इस पार्टी का कोई खेनहार नहीं है। बीजेपी वहां सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश लंबे समय से कर रही है। 2020 से 2025 के बीच उसने जो उप मुख्यमंत्री बनाए,वे भी इसी दृष्टि से बनाए। वह सम्राट चौधरी को भी इसीलिए लेकर आई कि वह सामाजिक समीकरण में फिट बैठते हैं। अब उनको हिंदुत्व की ट्रेनिंग देने की जरूरत है।
सम्राट चौधरी को मालूम है कि उनकी इतनी बड़ी ताकत नहीं है कि वह अकेले कुछ कर सकें। उनका जो राजनीतिक स्थायित्व और विकास है, बीजेपी के साथ ही है। और बीजेपी को मालूम है कि सम्राट चौधरी को साथ लेकर वह अपना लक्ष्य हासिल कर सकती है। आप कह सकते हैं यह एक स्टॉप गैप अरेंजमेंट है। यह कितना लंबा चलेगा, वह निर्भर करेगा कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में सरकार कैसी चलती है। उसकी छवि कैसी बनती है और इन पांच सालों में भाजपा से कोई नया नेतृत्व उभरता है या नहीं। उसके अलावा सम्राट चौधरी के बारे में भाजपा को मालूम है कि वह नीतीश कुमार नहीं हैं, जिनको अगर हटाने की जरूरत पड़े तो हटाना मुश्किल हो। इसलिए सम्राट चौधरी हर दृष्टि से भाजपा की इस समय की जो पॉलिटिकल स्कीम ऑफ थिंग्स है, उसमें फिट बैठते हैं। इसलिए मैं मानता हूं कि भाजपा ने बड़ी सूझबूझ के साथ इस मामले में फैसला लिया है। वर्तमान परिस्थितियों में उसके पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं था। वह चाहे तो किसी को भी मुख्यमंत्री बना सकती थी, लेकिन सवाल यह है कि वह नीतीश कुमार को स्वीकार होता। उसे इस समय नीतीश कुमार को नाराज करके उनके समर्थकों में यह संदेश नहीं देना है कि वह उनकी उपेक्षा कर रही है।
नीतीश कुमार को साथ लेकर जेडीयू को भाजपा में समाहित करना भाजपा का दूरगामी लक्ष्य दिखाई दे रहा है। अब सफल होगी नहीं होगी, वह बाद की बात है, लेकिन बिहार में अगर भाजपा को अपना राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना है तो इसी रास्ते पर आगे बढ़ना पड़ेगा और इसमें बहुत सावधानी की जरूरत पड़ेगी। अगर भाजपा ऐसा करने में सफल होती है तो आप मान लीजिए कि लंबे समय के लिए वह बिहार की राजनीति में स्थापित हो जाएगी और बिहार से समाजवादी रुझान की राजनीति का पूरी तरह समापन हो जाएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)