उसे लगता है भाजपा उसके साथ वही करेगी जो उसने 2008 में भाजपा के साथ किया।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कांग्रेस पार्टी भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो डरती ही थी अब एक नया डर उसके मन में समा गया है। उस डर ने कांग्रेस को बदहवास बना दिया है और उसी बदहवासी में उसने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को पारित नहीं होने दिया। वह डर है परिसीमन का।
कांग्रेस ने परिसीमन का डर दक्षिण भारत की पार्टियों को भी दिखाया और दक्षिण भारत का नुकसान करा दिया। दक्षिण भारत के नेता और पार्टियां यह समझ ही नहीं सके कि कांग्रेस पार्टी दरअसल अपने डर को कम करने के लिए उनका नुकसान करा रही है। सवाल है कि यह डर क्यों? पहले तो एक बात हम लोगों को अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि राहुल गांधी, उनकी पार्टी और उनके साथी दल महिला आरक्षण को रोक नहीं सकते। उन्होंने केवल इसको डिले कर दिया है। दूसरी बात वे परिसीमन को भी रोक नहीं सकते। परिसीमन संवैधानिक प्रक्रिया है। 2027 में जब जनगणना के नए आंकड़े आ जाएंगे, उसके बाद परिसीमन को कोई ताकत रोक नहीं सकती। कांग्रेस पार्टी इससे डर इसलिए रही है क्योंकि उसे लगता है कि भाजपा उसके साथ वही करेगी, जो उसने 2009 में भाजपा और दूसरे दलों के साथ किया था।
2008 में लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन हुआ था। लोकसभा की सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई गई थी, लेकिन सीटों में आमूलचूल बदलाव किया गया था। जनरल सीटों को एससी में बदल दिया गया। हालांकि यह सामान्य प्रक्रिया है,लेकिन खासतौर से उन निर्वाचन क्षेत्रों को टारगेट किया गया, जहां गैर कांग्रेसी दल और खासतौर से भाजपा मजबूत थी। भाजपा उस समय लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। 2004 के चुनाव नतीजों के मुताबिक दोनों पार्टियों के बीच सिर्फ सात-आठ सीटों का फर्क था। इस परिसीमन में क्या हुआ,इसे महाराष्ट्र की ठाणे लोकसभा सीट से समझा जा सकता है। ठाणे सीट पर 32 लाख मतदाता थे। वहां शिवसेना का स्ट्रांग होल्ड था। उस सीट को चार सीटों में बांट दिया गया और 2009 में उन चार में से तीन कांग्रेस और उसके सहयोगी दल जीत गए। इस परिसीमन ने 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की 61 सीटें बढ़ा दीं। कांग्रेस की सीटों की संख्या में इतना बड़ा जंप इससे पहले सिर्फ दो बार 1971 और 1984 में आया था। 1971 में कांग्रेस का गरीबी हटाओ का नारा खूब चला था और उसकी सीटें 283 से बढ़कर 352 हो गई थीं। 1984 में कांग्रेस को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर का लाभ मिला और उसकी सीटें 353 से बढ़कर 415 पर पहुंच गईं। यानी इतनी बड़ी सिंपैथी लहर के बाद भी उसकी कुल 62 सीटें बढ़ी थीं।
सवाल यह है कि 2009 में क्या हुआ? इसको स्वराज्य की निष्ठा अनुश्री ने आंकड़े निकालकर बताया है। 2009 में कांग्रेस और बीजेपी के बीच बड़ा कड़ा मुकाबला था। लेकिन नतीजा आया तो कांग्रेस की सीटें 206 तक पहुंच गईं। कहा गया कि यह मनरेगा और मनमोहन सिंह ने जो पॉलिटिकल स्टेबिलिटी दी है, उसकी वजह से हुआ है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। इसका कारण 2008 में हुआ परिसीमन था। उस चुनाव में कांग्रेस राजस्थान में ऐसी 11 सीटें जीत गई, जो 1999 और 2004 में बीजेपी जीती थी। यूपी में कांग्रेस 21 सीटें जीत गई। 1984 के बाद इतनी बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को लोकसभा की सीटें कभी नहीं मिली थीं। उस चुनाव में तीन नई सीटें बनीं थीं। हालांकि सीटों की संख्या नहीं बढ़ी थी, उन्हीं सीटों में से काट-छांट कर ये नई सीटें इस तरह से बनाई गईं,जिससे कांग्रेस के लिए फायदेमंद हों। यही हुआ और यह तीनों नई सीटें कांग्रेस जीत गई। 2004 के चुनाव में शेड्यूल कास्ट के लिए आरक्षित सीटों में से कांग्रेस 17 पर जीती थी लेकिन 2008 के परिसीमन के बाद जब पहला चुनाव हुआ तो कांग्रेस 33 एससी सीटों पर जीती। इसी तरह से 2004 में कांग्रेस को 14 एसटी सीटों पर जीत मिली थी, परिसीमन के बाद वह 21 सीटों पर पहुंच गई। सबसे इंटरेस्टिंग केस उत्तर प्रदेश की बुलंदशहर सीट का है। बुलंदशहर सीट को बिना किसी कारण के एससी सीट में बदल दिया गया। सवाल है क्यों? क्योंकि बुलंदशहर को अगर आरक्षित न करते तो रायबरेली सीट आरक्षित हो जाती। यह है परिसीमन की कहानी, जिसमें सीटों की संख्या नहीं बढ़ी।
अब जो परिसीमन होगा, उसमें सीटों की संख्या भी बढ़ेगी और कांग्रेस को पता है कि 2008 में उसने जो किया, उससे ज्यादा बड़े पैमाने पर भाजपा करेगी। उसका नया डर यही है। कांग्रेस ने महिला आरक्षण संशोधन बिल गिरा दिया और उसके साथ ही परिसीमन आयोग का जो बिल था आया ही नहीं क्योंकि उसी से जुड़ा हुआ था। अब नई चीज क्या होगी? सरकार उस समय लिखित आश्वासन देने को तैयार थी कि सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में आनुपातिक रूप से बढ़ोतरी होगी। यानी सभी राज्यों की सीटें डेढ़ गुनी कर दी जाएंगी। इसमें दक्षिण के राज्यों को बहुत फायदा था क्योंकि आबादी के हिसाब से अगर सीटें तय होंगी तो सबसे ज्यादा घाटा दक्षिण के राज्यों को होगा। यह बात चंद्रबाबू नायडू और जगन मोहन रेड्डी ने समझी। लेकिन कांग्रेस के प्रभाव में एमके स्टालिन ने इस बात को नहीं समझा। सिद्धारमैया और रेवंत रेड्डी के समझने का सवाल ही नहीं था क्योंकि वे तो कांग्रेस पार्टी के ही हैं। तो कांग्रेस पार्टी ने अपने डर से अपने आप को बचाने के लिए दक्षिण के राज्यों का नुकसान कर दिया। लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर लगा फ्रीज 2026 की जनगणना के आंकड़े आने के साथ ही समाप्त हो जाएगा। अब सीटों का निर्धारण आबादी के अनुपात में होगा तो उत्तर के राज्यों को फायदा और दक्षिण के राज्यों को नुकसान होगा।
कांग्रेस पार्टी किसी भी हालत में परिसीमन चाहती नहीं है, लेकिन उसको यह भी पता है कि यह संवैधानिक प्रावधान है। इसको रोका नहीं जा सकता। नए परिसीमन में सीटों का निर्धारण फिर से होगा। उनका भौगोलिक क्षेत्र भी बदलेगा और जो जनरल सीटें हैं उनमें से बहुत सी रिजर्व होंगी, जो रिजर्व हैं उनमें बहुत सी जनरल होंगी। कांग्रेस पार्टी ने यह देख लिया है कि भाजपा ने असम और जम्मू कश्मीर में यह सफलतापूर्वक किया। उसको पता है कि परिसीमन के बाद जो भी चुनाव होगा, आज उसकी जो 99 सीटें हैं, उनमें से आधी भी रह जाएं तो बड़ी बात होगी। तो कांग्रेस को पिछले 12 साल में यह तीसरा डर सता रहा है। एक डर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का, दूसरा डर भाजपा का और अब यह तीसरा डर है परिसीमन का। कांग्रेस को मालूम है कि आबादी के अनुपात में सीटों की संख्या का निर्धारण हुआ तो उसका राजनीतिक खेल बहुत लंबे समय के लिए खत्म हो जाएगा। बदहवासी में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक का विरोध कर उसने अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मारी है। अब वह महिला विरोधी पार्टी के रूप में भी देश के सामने आ गई। इसका नतीजा उसे आने वाले विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव में भुगतना ही पड़ेगा। तो जनगणना के आंकड़ों और उसके बाद परिसीमन कमीशन बनने व उसके काम शुरू करने का इंतजार कीजिए। देश की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव आने वाला है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)