कोलकाता में दो कॉरपोरेटरों की जीत से ही भाजपा ने तय कर लिया था अपना लक्ष्य।

#pradepsinghप्रदीप सिंह
चरैवेति,चरैवेति,चरैवेति। यह ऋग्वेद से लिया हुआ संस्कृत का एक वाक्यांश है। इसका अर्थ है कि जो चलता रहता है, सफलता उसे ही मिलती है। यह अथक प्रयास और सतत विकास का संदेश देता है। यह विषय मैं इसलिए लेकर आया हूं क्योंकि मुझे दो राज्यों गुजरात और पश्चिम बंगाल की राजनीति की बात करनी है।
गुजरात में हाल ही में स्थानीय निकाय के चुनाव हुए हैं और भाजपा ने उनमें बंपर जीत हासिल की है। अब गुजरात में भाजपा की जीत कोई समाचार नहीं रह गई है। अगर वह हार जाए या उसको झटका लग जाए तो खबर बनेगी। गुजरात में भाजपा को पहली जीत अहमदाबाद कॉरपोरेशन में मिली थी। वहां से भाजपा रुकी नहीं। लगातार चलती रही। कितने ही अवरोध आए लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा। भाजपा के सबसे लोकप्रिय पाटीदार नेता केशु भाई पटेल ने पार्टी छोड़कर अलग पार्टी बना ली और भाजपा के खिलाफ लड़े लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने उनका साथ नहीं दिया। शंकर सिंह वाघेला भाजपा में केशु भाई पटेल के बाद नंबर दो माने जाते थे। दोनों ने गुजरात में संगठन खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। वाघेला ने भी पार्टी छोड़कर विद्रोह किया। बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन उनका कुछ हुआ नहीं। गुजरात में भाजपा की सत्ता की यात्रा 1990 से शुरू हुई,जब उसने जनता दल के साथ अलायंस किया। चिमन भाई पटेल के नेतृत्व में सरकार बनी। उसके बाद 1995 में भाजपा अकेले चुनाव लड़ी और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। बीच में शंकर सिंह वाघेला की बगावत के कारण एक डेढ़ साल का व्यवधान आया। उसके बाद से वह समय और आज, भाजपा गुजरात में कभी नहीं हारी। चुनाव चाहे स्थानीय निकाय का हो या जिला परिषद,पंचायत, विधानसभा या लोकसभा का,इनमें सिर्फ 2009 का लोकसभा चुनाव था जिसमें भाजपा की सीटें कम हुई थीं, वरना हर चुनाव में भाजपा बहुत शानदार प्रदर्शन करती रही है। तो 1990 से 2026 तक यानी 36 साल में एंटी इनकंबेंसी के बावजूद पार्टी के प्रति लोगों का इतना बड़ा विश्वास है तो आप समझिए कि पार्टी की जड़ें कितनी गहरी हैं। तो गुजरात के उदाहरण से आप समझ सकते हैं कि चरैवेति का जो मंत्र है, उसको भाजपा ने कैसे पकड़ा।

इसी तरह पश्चिम बंगाल में भाजपा की यात्रा रही है। असफलता के बाद अच्छे-अच्छे निराश हो जाते हैं और रास्ता बदल देते हैं। भाजपा ने ऐसा नहीं किया। 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की देशभर में सिर्फ दो सीटें आई थीं। उसके बाद कोलकाता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का चुनाव हुआ। उस चुनाव में भाजपा के पहली बार दो कॉरपोरेटर श्याम सुंदर और शांति लाल जैन जीते। अब किसी भी मेट्रोपॉलिटन सिटी में किसी पार्टी के दो कॉरपोरेटर बन जाएं तो यह क्या कोई खबर होती है? लेकिन जो पार्टियां लंबा लक्ष्य लेकर चलती है,उनके लिए यह बड़ी खबर थी। इस पर मीडिया से लालकृष्ण आडवाणी ने बात की और उन्होंने ऐसी खुशी जताते हुए इसकी घोषणा की, जैसे पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बन गई हो। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में हमारा खाता खुल गया है। अब जरा ध्यान दीजिए, तब के दो कॉरपोरेटर और 4 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आएंगे,जिसमें मेरा मानना है कि भाजपा की सरकार बन रही है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह से वोटिंग हुई है, जिस तरह का माहौल है और जो परिवर्तन की लहर चल रही है,वह पूर्ण बहुमत की भाजपा की सरकार बनने का संकेत दे रही है। यूं तो इस चुनाव में बहुत सारे मुद्दे हैं, लेकिन मेरी नजर में एक मुद्दा सब पर भारी पड़ा और वह है महिला सुरक्षा का, जिसको ममता बनर्जी ने इग्नोर किया। ममता बनर्जी ने हर ऐसी घटना के बाद जो आरोपी थे, उनको बचाने और जो पीड़ित थे उनको परेशान करने की कोशिश की।
तो यह जो भाजपा का मंत्र है कि रुकना नहीं है चलते रहो,यही उसे सफलता दिला रहा है। गुजरात में तो कम से कम भाजपा के पास नेतृत्व था। केशु भाई, शंकर सिंह वाघेला, काशीराम राणा, सुरेश मेहता और दूसरे नेता थे। गुजरात में पाटीदारों की संख्या और प्रभाव बहुत ज्यादा है और उनके सबसे बड़े नेता केशु भाई पटेल को हटाकर भाजपा ने नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया। उसने इस बात की चिंता नहीं की कि जाति की ओर से क्या प्रतिक्रिया होगी। गुजरात की तुलना में पश्चिम बंगाल में तो भाजपा के साथ समस्या यह भी थी कि उसके पास कोई नेता नहीं था। लेकिन विडंबना देखिए कि हिंदुत्व के मामले में या कहें कि पश्चिम बंगाल में अगर कोई असली बंगाली पार्टी है तो भाजपा है। उसके संस्थापक ही डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। उसके नारे हैं-वंदे मातरम, जय हिंद और भारत माता की जय। ये तीनों नारे पश्चिम बंगाल से निकले हैं। उसके सामने ममता बनर्जी के नारे देखिए। वह बात तो बंगाली संस्कृति और भाषा की करती हैं लेकिन उनका जय बांग्ला का नारा असल में बांग्लादेश का है। जो भाजपा वंदे मातरम और जय हिंद के लिए लड़ती है, उसको ममता बनर्जी बाहरी साबित करने की कोशिश करती हैं और कहती हैं कि ये लोग पश्चिम बंगाल की संस्कृति को खत्म करने आए हैं। लेकिन समय का चक्र जब घूमता है तो सारे दांव उल्टे पड़ जाते हैं। इस बार कोलकाता में जिस तरह की पोलिंग हुई है,वह बताता है कि भद्र लोग या मिडिल क्लास या अपर मिडिल क्लास सभी निकल कर वोट देने के लिए आए हैं और उनमें से ज्यादातर लोगों की जुबान पर एक ही बात थी- परिवर्तन।
तो यह जो चरैवेति,चरैवेति,चरैवेति का मंत्र भाजपा ने अपनाया है, यह किसी भी संगठन और किसी भी व्यक्ति के लिए मूल मंत्र होना चाहिए। यही सफलता का मंत्र है। दूसरी पार्टियों को आप देख लीजिए। उनको लगता है कि सतत और अथक प्रयास करना बेकार की बात है। कांग्रेस को लगता है कि एक दिन लोग बीजेपी से ऊब जाएंगे तो हमको सत्ता में ला देंगे। मेहनत करने की क्या जरूरत है। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। भाजपा राज्यों में जीत ही नहीं रही है, लगातार जीत रही है। महाराष्ट्र में उसकी तीसरी बार सरकार बनी है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां मुस्लिम वीटो चलता था, वहां भाजपा की दो बार सरकार बन चुकी है और तीसरी बार 27 में बनने वाली है। असम जहां 33% मुस्लिम मतदाता हैं, वहां भाजपा की तीसरी बार सरकार बनने जा रही है। हरियाणा जहां वह तीसरे नंबर की पार्टी थी, लगातार तीन बार सरकार बना चुकी है। बिहार में भी वह लगातार सत्ता में है और अब तो उसने अपना मुख्यमंत्री भी बना लिया है। इसी तरह से त्रिपुरा और उड़ीसा का उदाहरण ले लीजिए। हार न मानने और निरंतर प्रयास करते रहने से ही सफलता मिलती है। दूसरी ओर कुछ पार्टियां और नेता ऐसे हैं, जो हारने से पहले ही हार मान लेते हैं। इन्हीं पांच विधानसभा के चुनावों में देख लीजिए। कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी कहां गए? कितने राज्यों में प्रचार किया? तो निरंतर प्रयास करते रहने का कोई विकल्प नहीं है। भाजपा की लगातार हो रही जीत यही बता रही है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)