प्रदीप सिंह।
कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। लेकिन इस कहावत को गलत साबित करने वाले हमारे देश में कई लोग हैं। इन्हीं में से मैं राजनीति और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कुछ लोगों की बात करूंगा।
इसमें सबसे अगली कतार में दिखते हैं जयप्रकाश नारायण। वह पहले कांग्रेस में थे और बाद में उसे छोड़ दिया। वह सक्रिय राजनीति से भी दूर हो गए। कहते हैं कि सरदार पटेल के निधन के बाद जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि जेपी डिप्टी प्राइम मिनिस्टर बन जाएं,लेकिन उन्होंने मना कर दिया। डॉक्टर लोहिया ने भी उन्हें सक्रिय राजनीति में आने के लिए मनाया, लेकिन वह नहीं माने। डॉक्टर लोहिया ने अपनी आखिरी सभा में कहा भी था कि एक दिन ऐसा आएगा जब जेपी को राजनीति में आना पड़ेगा। और कुछ हद तक उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई। 1974 में छात्र आंदोलन शुरू हुआ। संपूर्ण क्रांति का नारा लेकर जेपी भी मैदान में उतर गए। उन्होंने साबित किया कि व्यक्ति अगर ईमानदार हो और लक्ष्य के प्रति उसकी निष्ठा हो तो वह बदलाव ला सकता है। जेपी ने इंदिरा गांधी और कांग्रेस जैसी सत्ता को उखाड़ फेंका। 77 में इंदिरा सरकार चली गई और जनता पार्टी की सरकार बनी।

मेरी नजर में जेपी के बाद दूसरा नंबर आता है मुख्य चुनाव आयुक्त एसएल शकधर का। उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। हेमवतीनंदन बहुगुणा कांग्रेस छोड़कर पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट से उपचुनाव लड़ रहे थे। इंदिरा गांधी ने इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था। उस लोकसभा सीट के अंदर पांच विधानसभा क्षेत्र आते थे। इंदिरा गांधी हर विधानसभा क्षेत्र में प्रचार करने गईं। यह पहला लोकसभा का उपचुनाव था,जिसमें प्रधानमंत्री ने प्रचार किया। उनके अलावा कांग्रेस के छह राज्यों के मुख्यमंत्री स्टेट हेलीकॉप्टर के साथ प्रचार करते रहे। चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस को फिर भी बेईमानी करनी पड़ी। मामला पकड़ा गया और एसएल शकधर ने हर दबाव को दरकिनार करते हुए इलेक्शन को काउंटरमांड कर दिया। दोबारा चुनाव हुए और फिर गड़बड़ हुई। एसएल शकधर ने इलेक्शन को फिर काउंटरमांड किया। वह सत्ता की ताकत के सामने न झुकने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे। पहले इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उनसे पहले के चुनाव आयुक्तों का हाल जान लीजिए। देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को रिटायरमेंट के बाद पद्म भूषण दिया गया। साथ ही उन्हें पश्चिम बंगाल की जाधवपुर यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर भी बना दिया गया। इसी तरह देश के चौथे और पांचवें मुख्य चुनाव आयुक्तों को भी पद्म भूषण से पुरस्कृत किया गया। चूंकि एसएल शकधर किसी दबाव में नहीं आए और उन्होंने कानून सम्मत कदम उठाए इसलिए उनको कोई पद्म पुरस्कार या रिटायरमेंट के बाद कोई पद नहीं मिला।

देश के सातवें मुख्य चुनाव आयुक्त आर के त्रिवेदी बने। रिटायरमेंट के बाद उनको राजीव गांधी सरकार ने गुजरात का गवर्नर बना दिया। कांग्रेस पार्टी यह जो निष्पक्षता की बात करती रहती है, उसका इतिहास देखिए तब आपको समझ में आएगा कि उसने सत्ता में होने पर क्या किया। देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने टीएन शेषन। शेषन ने बताया कि किसी चुनाव सुधार के बिना भी चुनावी प्रक्रिया में बड़ा परिवर्तन किया जा सकता है। जितनी संभव कोशिश हो सके बेईमानी को रोका जा सकता है। उस समय पूरा का पूरा बूथ लूट लिया जाता था। उन सब पर अंकुश लगाने का सबसे बड़ा काम अगर किसी ने किया तो टीएन शेषन ने किया। उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति केवल प्रधानमंत्री करते थे और उसमें किसी की सलाह नहीं ली जाती थी। जबकि आज मोदी के समय में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के फैसले में प्रतिपक्ष का नेता भी शामिल होता है और तब भी कहा जाता है कि बेईमानी हो रही है। देश के 11वें मुख्य चुनाव आयुक्त एम एस गिल बनाए गए। रिटायरमेंट के बाद कांग्रेस पार्टी ने उनको राज्यसभा में भेजा और फिर केंद्र में मंत्री बनाया। मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का मामला तो चुनाव आयोग के इतिहास में पढ़ाया जाना चाहिए कि अगर आपके हाथ में सत्ता हो तो कैसे एक अयोग्य व्यक्ति को इतने बड़े संवैधानिक पद पर बिठाया जा सकता है। चावला पहले चुनाव आयुक्त थे और कांग्रेस के आदमी थे। जब वह चुनाव आयुक्त थे उस समय एन गोपालस्वामी मुख्य चुनाव आयुक्त थे। गोपालस्वामी ने चावला के बारे में राष्ट्रपति को पत्र लिखा कि यह आदमी अयोग्य है। इसके खिलाफ तुरंत कारवाई होनी चाहिए। लेकिन गोपालस्वामी के रिटायर होने के बाद उन्हीं नवीन चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया गया।

तो अब फिर से लौट कर थोड़ा राजनीतिक लोगों पर आते हैं। वीपी सिंह ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक आंदोलन खड़ा किया और उस आंदोलन ने राजीव गांधी की सत्ता उखाड़ दी। 1984 में जो पार्टी 415 लोकसभा सीटें लेकर आई थी। वीपी सिंह के इस आंदोलन के कारण 1989 में वह 192 सीटों पर सिमट गई। वह दिन और आज का दिन कांग्रेस पार्टी को लोकसभा में कभी बहुमत नहीं मिला। उसके बाद आया अन्ना हजारे का आंदोलन। अन्ना हजारे ने अपने आंदोलन से पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक वातावरण बनाया, जिसका फायदा एक ठग ने उठाया,जो जेल भी जा चुका है। तो आप देखिए जेपी ने जो किया, उसको जनता पार्टी के आपसी झगड़ों ने बर्बाद किया। विश्वनाथ प्रताप सिंह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सत्ता में आए थे, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने कुछ नहीं किया। हां,मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू जरूर किया और उसी में जनता दल टूट गया। वीपी सिंह केवल 11 महीने ही प्रधानमंत्री रह पाए। उनके बाद कुछ समय कांग्रेस के समर्थन से गठबंधन की सरकारों का दौर चला। चंद्रशेखर की सरकार कांग्रेस के समर्थन से बनी। उससे पहले 79 में चौधरी चरण सिंह की सरकार इसी तरह बन चुकी थी। चंद्रशेखर के बाद देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की सरकारें भी कांग्रेस के समर्थन से बनीं लेकिन किसी सरकार को कांग्रेस ने चलने नहीं दिया। हर सरकार को गिराया और देश को मध्यावधि चुनाव में झोंका। अन्ना हजारे के आंदोलन का सबसे बुरा हश्र हुआ। उसके बाद लोगों का ऐसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से एक तरह से भरोसा उठ सा गया। उस भरोसे को कायम किया 2014 में नरेंद्र मोदी ने और वह भरोसा पिछले 12 साल से अब भी कायम है।
अब बात आती है वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की। पूरा विपक्ष उनके खिलाफ है। उन पर आरोप लग रहा है कि वह बीजेपी के एजेंट के तौर पर काम करते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि ज्ञानेश कुमार को एक नायक के रूप में लंबे समय तक याद किया जाएगा, जिसने वर्तमान नियमों के तहत ही पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में जनतंत्र की पुनरस्थापना की। पश्चिम बंगाल में 50-55 साल से चुनाव के दौरान खूब हिंसा होती थी। ज्ञानेश कुमार ने बताया कि वहां निष्पक्ष चुनाव कराए जा सकते हैं। चुनाव आयोग को जो संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं,केवल उन्हीं का इस्तेमाल करना है। उसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि हर कदम पर सुप्रीम कोर्ट ने उनका साथ दिया। आज तक एक भी प्रतिकूल टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के खिलाफ नहीं की है। सबसे ताजा मामला 2 मई का है। चुनाव आयोग ने 13 अप्रैल को सभी पार्टियों को एक सर्कुलर भेजा था कि काउंटिंग के समय काउंटिंग सेंटर पर राज्य के साथ केंद्रीय कर्मचारियों की भी नियुक्ति होगी। इस मुद्दे को लेकर तृणमूल कांग्रेस 2 मई को सुप्रीम कोर्ट पहुंची। उसने कहा कि यह एक तरह से राज्य के कर्मचारियों पर अविश्वास जताने जैसा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ शब्दों में कह दिया कि चुनाव आयोग वही कर रहा है जो उसका संवैधानिक अधिकार है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के कर्मचारियों को इस तरह से अलग-अलग करके देखना गलत है। यह तृणमूल कांग्रेस और उसके समर्थकों के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा था। तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्ष की तमाम आलोचनाओं के बाद भी डट कर खड़े रहे क्योंकि वह सच पर खड़े थे। उन्होंने पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के मन से डर निकाल दिया। मतदाताओं को यह भरोसा दिला दिया कि अपना वोट आप खुद डाल सकते हैं। इसलिए आप पोलिंग परसेंटेज देख लीजिए। तो बड़ा परिवर्तन लाने के लिए एक ही बंदा काफी होता है। जेपी से लेकर ज्ञानेश कुमार तक यह ऐसे बंदे थे, जिनके चरित्र पर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता। ऐसे ही लोग परिवर्तन लाते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



