तमिलनाडु की राजनीति में चल रहा बड़ा खेल, अब क्रिश्चियनिटी का प्रचार बढ़ेगा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
तमिलनाडु की राजनीति में एक बहुत बड़ा खेल चल रहा है। इस पूरे खेल की तीन सतहें हैं। पहली सतह आपको नजर आ रही है और पर्दे के पीछे का खेल भी आपको थोड़ा पता चल गया होगा।
काफी ऊहापोह के बाद जोसेफ विजय ने 10 मई को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। अब देखिए पर्दे के पीछे क्या खेल हो रहा था। सेंगोतियन का नाम आपने सुना होगा। वह एआईएडीएमके के बहुत वरिष्ठ और मंझे हुए नेता थे। पलनिस्वामी से उनकी बनी नहीं तो उन्होंने एआईएडीएमके छोड़ दी और विजय के साथ चले गए। इन चुनावों मे वह विजय के सबसे बड़े रणनीतिकार रहे। जमीन पर संगठन खड़ा करने में उनकी बड़ी भूमिका थी। विजय जब राज्यपाल से मिलने जा रहे थे तो सेंगोतियन ने उनसे कहा कि सिर्फ 107 सदस्यों की सूची लेकर जाइए और सिंगल लार्जेस्ट पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का दावा कीजिए। लेकिन विजय ने उनकी बात नहीं मानी। विजय 112 विधायकों की सूची लेकर राज्यपाल के पास गए,इनमें पांच विधायक कांग्रेस के थे। सेंगोतियन ने विजय से सिर्फ 107 सदस्यों की सूची लेकर जाने को इसलिए कहा था कि कांग्रेसियों की सूची लेकर जाने से राज्यपाल यह समझेंगे कि आप गठबंधन की सरकार बना रहे हैं। तब वे पूछेंगे कि गठबंधन में कौन-कौन लोग साथ हैं और यही हुआ। चार पार्टियां सीपीआई, सीपीएम, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और वीसीके डीएमके की पार्टनर हैं। इन सभी के पास दो-दो विधायक हैं। ये विजय के साथ जाना चाहते थे लेकिन इसके लिए ये डीएमके की मंजूरी भी चाहते थे। स्टालिन नहीं चाहते थे कि ये दल विजय को समर्थन दें लेकिन पीछे से यह नैरेटिव चलाया गया कि अगर हम समर्थन नहीं देते हैं तो विजय और अन्नाद्रमुक का गठबंधन हो जाएगा। वह स्थिति डीएमके के लिए और ज्यादा मुश्किल भरी हो जाएगी। इसके बाद डीएमके ने इन दलों के विजय के साथ जाने पर एतराज नहीं जताया। तो यह खेल बन गया। समर्थन में 120 सदस्यों के आने पर राज्यपाल ने विजय को शपथ के लिए बुला लिया।
इसीबीच पर्दे के पीछे एक और खेल चला कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों मिल जाएं और सरकार बना लें। द्रमुक इसके लिए तैयार नहीं हो रही थी जबकि अन्नाद्रमुक में इसे लेकर मतभेद था। हालांकि यह काम इतना आसान नहीं था। दोनों के साथ मिलने का मतलब है कि भाजपा के विरोधी ताकत के रूप में केवल विजय बचते। अन्नाद्रमुक बीजेपी के साथ अलायंस में थी। अगर दोनों द्रविड़ पार्टियां साथ आतीं तो जाहिर है कि एनडीए टूट जाता। यह जो स्पेस है, डीएमके और एमके स्टालिन उसे छोड़ना नहीं चाहते थे। वैसे द्रमुक और अन्नाद्रमुक को साथ लाने का यह पहला प्रयास नहीं था। 1979 में भी बीजू पटनायक ने ऐसी कोशिश की थी।  उन्होंने करुणानिधि और एमजीआर से बात की थी और दोनों नेता पार्टियों का विलय तक करने के लिए तैयार हो गए। विलय का फार्मूला तैयार किया गया था कि पार्टी का नाम द्रमुक रहेगा लेकिन पार्टी का झंडा अन्नाद्रमुक का रहेगा। करुणानिधि पार्टी के अध्यक्ष जबकि एमजीआर मुख्यमंत्री होंगे। लेकिन दोनों पार्टियों के दूसरी कतार के नेता इस विलय के लिए तैयार नहीं हुए। उनको लगा कि अगर यह दोनों मिल गए तो उनमें से बहुत से लोगों का करियर खत्म हो जाएगा। नतीजा यह हुआ कि विलय हो नहीं पाया। इसबार भी बात इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि एमके स्टालिन और ई. पलनिस्वामी के बीच कटुता इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है कि यह गठबंधन होना मुश्किल था। तो पर्दे के पीछे से यह कहानियां चलीं।
अब देखिए शपथ ग्रहण में विजय ने क्या किया? तमिलनाडु में अब तक जो भी सरकार बनी चाहे वह कांग्रेस की रही हो या डीएमके की या एआईएडीएमके की, कभी ऐसा दृश्य आपको देखने को नहीं मिला होगा कि शपथ ग्रहण समारोह की शुरुआत वंदे मातरम् से हो। तमिलनाडु छोड़िए दक्षिण के किसी राज्य में अब तक ऐसा नहीं हुआ।
इसके अलावा मुख्यमंत्री की पद की शपथ लेने वाले की पोशाक तय रहती थी। सफेद शर्ट या कुर्ता और वेष्टि यानी लुंगी। विजय इसकी जगह पैंट, शर्ट और ब्लेजर में शपथ लेने के लिए आए। सवाल है कि क्यों? तमिलनाडु की सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर दोनों द्रविड़ पार्टियां कई आंदोलन कर चुकी हैं। फिर भी विजय ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह अपने को द्रविड़ राजनीति से अलग दिखाना चाहते हैं। अब बहुत से सनातनी इस चक्कर में पिघल जाएंगे कि शपथ ग्रहण के मौके पर वंदे मातरम् गाया गया। उसके बाद जन गण मन भी गाया गया। यह बहुत बड़ा परिवर्तन है। सवाल है कि क्या विजय सनातन की ओर जा रहे हैं? इसका जवाब है कि आप बिल्कुल गलतफहमी में न रहिए। विजय इंटरनेशनल क्रिश्चियन सोसाइटी का एक प्रोजेक्ट हैं। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर की ताकतें लगी हुई थीं। आप मानकर चलिए कि तमिलनाडु में एक क्रिश्चियन सरकार बनी है। विजय को अपने को द्रविड़ राजनीति के प्रतीकों से अलग दिखाने की जरूरत थी। उसके लिए उनके पास एक ही तरीका था वंदे मातरम्। द्रविड़ राजनीति करने वाली दोनों पार्टियों द्रमुक और अन्नाद्रमुक के लिए इससे ज्यादा चिढ़ने वाली बात और कोई नहीं हो सकती थी। तो विजय ने अपनी आइडेंटिटी शपथ ग्रहण समारोह से ही इस्टैब्लिश कर दी कि वह एंटी द्रविड़ राजनीति के प्रतीक के रूप में राजनीति में आए हैं।
विजय ने अपने चुनाव अभियान के दौरान जीसस क्राइस्ट का चित्र लगाकर प्रचार किया था। हालांकि उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह के समय कहा कि मैं गॉड का मैसेंजर नहीं हूं। तो विजय एक साथ कई खेल खेल रहे हैं। द्रविड़ राजनीति के प्रतीकों से अपने को अलग दिखा रहे हैं। हालांकि याद कीजिए जब उन्होंने कहा था कि डीएमके मेरी राजनीतिक शत्रु है और बीजेपी वैचारिक शत्रु। लेकिन अभी वह जो खेल खेल रहे हैं उसमें डीएमके यानी द्रविड़ राजनीति को अपना वैचारिक शत्रु बता रहे हैं। चूंकि तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी कोई पॉलिटिकल फोर्स नहीं है, जिसके खिलाफ लड़कर वह अपने को स्थापित कर सकें इसलिए उनको अगर अपनी पार्टी को स्थापित करना है तो द्रविड़ विचारधारा के खिलाफ स्थापित करना होगा। इसीलिए उन्होंने यह रास्ता चुना। उन्होंने साफ संदेश दिया कि द्रविड़ राजनीति की तमिलनाडु से विदाई हो रही है और उस विदाई का नेतृत्व वह खुद कर रहे हैं। वह सनातन के करीब जा रहे हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है और यह आने वाले समय में आपको दिखाई देगा। तो विजय की जो राजनीति है उसको समझने की कोशिश कीजिए। वो लंबा खेल खेल रहे हैं। दुर्भाग्य से उनको बहुमत नहीं मिला तो वह इन छोटी पार्टियों पर निर्भर हैं। इन पार्टियों का कोई भरोसा नहीं है। तमिलनाडु की राजनीति में इन छोटी पार्टियों का अस्तित्व ही डीएमके के कारण है। लेकिन मौका मिलते ही इन्होंने डीएमके को धोखा दिया। सत्ता को चुना। सीपीआई और सीपीएम ने बहाना क्या बनाया कि बीजेपी को रोकने के लिए ऐसा कर रहे हैं। अरे,बीजेपी कहां सत्ता में आ रही थी। इन दलों को लगता है कि इनका सर्वाइवल तभी है जब सत्ता से जुड़े रहेंगे। इन पार्टियों के लिए ये खेल पूरी तरह से सिर्फ सत्ता का है जबकि विजय के लिए यह लॉन्ग टर्म प्लानिंग है। तमिलनाडु में क्रिश्चियनिटी का प्रचार प्रसार करने की कोशिशें लंबे समय से चल रही हैं। इसको बढ़ाने की कोशिश पिछले 5 साल में एमके स्टालिन के मुख्यमंत्री बनने के बाद बहुत तेज हुई। विजय अब दूसरे तरीके से उसी प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाना चाहते हैं। तमिलनाडु में यह जो राजनीतिक परिवर्तन हुआ है इसके बड़े दूरगामी असर होने वाले हैं। लंबे समय में इसमें एक बड़ा फायदा भारतीय जनता पार्टी को भी होने वाला है। लेकिन अब द्रविड़ पार्टियों का फिर से सत्ता में लौटना बहुत कठिन दिखाई दे रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)