राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बने घुसपैठियों का हिसाब सबसे पहले किया।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
चुनाव प्रचार के दौरान जो भाषण दिए जाते हैं उनमें से ज्यादातर तात्कालिक प्रभाव के लिए होते हैं। प्रचार खत्म होने के साथ ही उन भाषणों में कही गई ज्यादातर बातें भी एक तरह से खत्म हो जाती हैं। लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका प्रभाव चुनाव के बाद असल में देखने को मिलता है। वह एक भावी कार्यक्रम की रूपरेखा की घोषणा होती है। ऐसे ही एक भाषण की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की एक चुनावी सभा में दिया था। उन्होंने कहा था-‘सबका साथ,सबका विकास और सबका हिसाब।’ पश्चिम बंगाल में सबका हिसाब शुरू हो गया है।
प्रधानमंत्री आमतौर पर इस तरह की भाषा बोलते नहीं हैं। यह सबका हिसाब वाली भाषा उनके मुंह से आपने शायद ही कभी सुनी हो। पहली बार पश्चिम बंगाल में अगर वह बोले तो इसका मतलब समझिए कि वो बहुत सोच विचार के बाद बोल रहे थे। इसका मतलब कि अगर भाजपा की सरकार बनी तो हिसाब होगा। तो सवाल है कि हिसाब किसका? आमतौर पर इसका अर्थ लगाया जाता है कि अपने राजनीतिक विरोधियों का। लेकिन अब जो हो रहा है उससे स्पष्ट है कि राजनीतिक विरोधियों के हिसाब की बात नहीं थी बल्कि वह देश की सुरक्षा की चिंता थी। सीमावर्ती राज्यों में जो डेमोग्राफी बदल रही है, उसकी चिंता थी। देश में जो आतंकवाद बढ़ रहा है, उसकी चिंता थी। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री ने यह बात ऐसे ही हवा में कह दी। यह बात संयुक्त मोर्चा की सरकार में तत्कालीन गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने भी कही थी। उस समय संसद में पहली बार घुसपैठियों का आंकड़ा आया था। उनकी संख्या एक करोड़ से ज्यादा पहुंच गई थी। तब से लगातार यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। पश्चिम बंगाल,असम और त्रिपुरा में जब कांग्रेस की सरकार थी तो घुसपैठ में तेजी आई। इसके बाद जब पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की सरकार आई तो उसने अपना वोट बैंक बनाने के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को और तेजी से बुलाया और बसाया। इसके बाद ममता बनर्जी घुसपैठ को एक नए स्तर पर ले गईं। उनकी सरकार ने घुसपैठियों को हर तरह की सुविधा दी और उनके पहचान पत्र बनवाए साथ ही उनके लिए पश्चिम बंगाल के जो मूल निवासी हैं, उनसे भी लड़ने को तैयार हो गईं और उनसे ही नहीं, वह भगवान राम से भी लड़ने को तैयार हो गईं। आप कल्पना कीजिए कि एक प्रदेश की निर्वाचित मुख्यमंत्री, जिनको कानून व्यवस्था की स्थिति को सुधारने और विकास के लिए जनादेश मिला है,वह उन बांग्लादेशी घुसपैठियों को सुरक्षा दे रही थीं,जो इस देश को तोड़ना चाहते हैं।
जब मैं संदर्भ की बात कर रहा हूं तो यहीं तक नहीं खत्म होती। बांग्लादेश और भारत की सीमा लगभग 4000 किलोमीटर लंबी है। केंद्र सरकार उस पर फेंसिंग कराना चाहती थी। बहुत सी जगहों पर यह काम हो गया था। 569 किलोमीटर का क्षेत्र बचा था। फेंसिंग के लिए जो लैंड एक्वायर की जानी थी, उसका पैसा केंद्र सरकार दे रही थी। ऐसा भी नहीं था कि राज्य सरकार पर इसका आर्थिक बोझ पड़ने वाला हो। राज्य सरकार को केवल लैंड एक्वायर करनी थी, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार ने वह करने से मना कर दिया। मामला हाईकोर्ट में गया। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि 31 मार्च 2026 तक लैंड एक्वायर करके बीएसएफ को हैंडओवर कर दी जाए, लेकिन ममता बनर्जी ने हाईकोर्ट की भी परवाह नहीं की। इसके बाद हाईकोर्ट को ममता बनर्जी की सरकार पर जुर्माना लगाना पड़ा लेकिन उसका भी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। अब वह सरकार जा चुकी है। तो जो हिसाब की बात थी, अब आप देखिए कैसे शुरू हुई है। पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अध्यक्षता में हुई पहली ही कैबिनेट बैठक में तय किया है कि फेंसिंग के लिए लैंड एक्वायर करके 45 दिनों में बीएसएफ को सौंप दी जाएगी। उसके बाद जैसे ही बाड़बंदी होगी भारत-बांग्लादेश सीमा सील हो जाएगी और घुसपैठ पर रोक लग जाएगी। अब आप समझिए कि देश की सुरक्षा की दृष्टि से कितना बड़ा परिवर्तन आने जा रहा है। सीमा पर केवल फेंसिंग ही नहीं होगी बल्कि हर 30 किलोमीटर पर बीएसएफ का बटालियन हेड क्वार्टर खुलेगा, जहां 1000 जवान तैनात होंगे। उसके अलावा सब सेक्टर बनेंगे।
तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जो खतरा हैं, उनका हिसाब सबसे पहले शुरू हुआ है। असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकारें बनने के कारण अब पुलिस एजेंसी, इंटेलिजेंस एजेंसी और केंद्रीय इंटेलिजेंस एजेंसियों के बीच बेहतर कोऑर्डिनेशन होगा। इसके कारण घुसपैठ रोकने व उनकी पहचान का काम पहले की तुलना में आसान हो जाएगा। देश के अलग-अलग राज्यों में भी इन घुसपैठियों की पहचान की जाने वाली है और इनको निकाला जाएगा। इसका सबसे ज्यादा असर बांग्लादेश पर पड़ेगा, जो भारत की डेमोग्राफी बिगाड़ कर चिकन नेक को काटने का सपना देख रहा था। यूनुस की सरकार तो पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश को मिलाकर ग्रेटर बांग्लादेश बनाने का सपना देख रही थी। कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी इस योजना से सहमत थीं और वह चाहती थीं कि उन्हें इस नए देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए। इससे समझिए कि इरादा कितना खतरनाक था। इसके अलावा एक दूसरा काम भी हुआ है। भाइपो यानी ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी, जिसे पावर बिहाइंड द थ्रोन कहा जाता है, से भी हिसाब शुरू हुआ है और ये हिसाब 4 मई को चुनाव का नतीजा आने के बाद से जनता ले रही है। उनके घर के बाहर लोग इकट्ठा होते हैं और जय श्री राम का नारा लगाते हैं। कोई हिंसा नहीं,कोई गाली गलौज नहीं। इसके साथ सिर्फ गाना बजता है एकता ममता चोर, फाइल चोर, भाइपो चोर, इस पार्टी के सब चोर। यह गीत पूरे पश्चिम बंगाल में बज रहा है।
पश्चिम बंगाल में हिसाब शुरू होने से अब डर का आलम देखिए कि चुनाव के दौरान आईपीएस अजयपाल शर्मा को घसीटकर पश्चिम बंगाल लाने की धमकी देने वाले टीएमसी के प्रवक्ता रिजू दत्ता अब उनसे माफी मांग रहे हैं। वीडियो जारी करके कह रहे हैं कि हमारा आपका कोई विरोध तो है नहीं। मैंने चुनाव के समय ऐसे ही बोल दिया था। वह शुभेंदु अधिकारी से भी माफी मांग रहे हैं। सवाल यह है कि जब बोल रहे थे तब क्यों नहीं समझ में आ रहा था? तब तो सत्ता का नशा बोल रहा था। और अगर 4 मई को ममता बनर्जी जीत गई होतीं तो क्या यह बात रिजु दत्ता बोलते? कभी नहीं बोलते। माफी गलती की मिलती है। अपराध की सजा मिलती है और रिजु दत्ता ने अपराध किया है। इसके साथ ही शुभेंदु अधिकारी ने एक और बड़ा काम किया है। पूर्व में हुए चुनावों के दौरान राज्य में भाजपा के जो 231 कार्यकर्ता मारे गए, उन सबके परिवारों की देखभाल और मदद की घोषणा सरकार ने की है। चुनाव के दौरान और उसके बाद ममता बनर्जी जितना नाटक कर सकती थीं,उन्होंने किया। एसआईआर के विरोध से उन्होंने शुरू किया और आखिर में कहा कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगी क्योंकि मैं हारी नहीं हूं। आखिर में उनको बर्खास्त करना पड़ा। अब वह मुख्यमंत्री नहीं हैं। विधायक भी नहीं हैं। उनके पिछले 15 सालों के शासन में टीएमसी के गुंडों ने हिंदुओं के मंदिरों पर कब्जा कर वहां अपनी पार्टी का दफ्तर खोल लिया था। अब वह सारे मंदिर मुक्त कराए जा रहे हैं और वहां फिर से पूजा अर्चना शुरू हो गई है। यह है नया पश्चिम बंगाल, जो 4 मई को नतीजे आने के बाद से बदलना शुरू हुआ है और अभी तक जितना काम हुआ है उसमें सरकार की भूमिका कम और आम लोगों की ज्यादा है। आम लोगों को लग रहा है कि उनको पहली बार स्वतंत्रता मिली है। इतना सब होने के बावजूद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को कोई अफसोस नहीं है। उनका एक बयान नहीं आया कि हमारे शासन में हमसे कुछ गलतियां हो गईं। उसके लिए हम लोगों से क्षमा चाहते हैं। यह होता है अहंकार। अहंकार के शिखर पर जब आदमी बैठा होता है तो उसे जमीन दिखाई नहीं देती है। ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को भी जमीन दिखाई नहीं दे रही है। पश्चिम बंगाल में सनातन सभ्यता की लौ फिर से जलने लगी है और आंच इतनी है कि केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। अब अखिलेश यादव और अशोक गहलोत तक को कहना पड़ रहा है कि मैं भी हिंदू हूं। भाई, किसने कहा कि आप नहीं है? लेकिन यह बात आपको पहले क्यों नहीं याद आई? हिंदुओं के जागने से इनके मन में भय समा गया है। अब इनको भागने या छिपने की जगह नहीं मिलने वाली है और यह सिलसिला आगे बढ़ने वाला है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)