नारों की राजनीति में भाजपा ले आई नया पीडीए ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
राजनीति में नारों का और नारों का राजनीति पर बड़ा प्रभाव होता है। नारा अगर चल जाए तो आप समझिए कि आपकी बात लोगों तक पहुंच गई है और नारा नहीं चला या उसके खिलाफ जो नारा था,वह चल गया तो फिर आपका नुकसान हो गया।
मुझे कांग्रेस पार्टी का एक नारा याद आ रहा है,जो जनसंघ के खिलाफ था- इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं। उस समय जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक हुआ करता था। उसके बाद डॉक्टर लोहिया का एक चर्चित नारा था-संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ। पिछड़ों के अधिकार की लड़ाई की शुरुआत डॉक्टर लोहिया ने की थी। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने तक बड़ा संघर्ष चला। उसके बाद पिछड़ों को अधिकार और सत्ता दोनों मिलना शुरू हुई। इसके अलावा इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया और कहा कि मैं कहती हूं गरीबी हटाओ और ये कहते हैं- इंदिरा हटाओ। यह बात लोगों के दिल में उतर गई है और 1971 का चुनाव उन्होंने किस तरह से जीता,यह इतिहास का विषय है। 1988 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस से निकलकर जनता दल बनाया तो एक नया नारा सामने आया-राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है। पार्टी जब नारा बनाए और लोग उसको स्वीकार कर लें तो समझिए संदेश पहुंच गया, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि आम जनता नारा बनाती है और उससे चुनाव का नैरेटिव तय हो जाता है। एक दूसरी चीज भी होती है फार्मूला बनाना। लेकिन फार्मूले के इर्द-गिर्द अगर नारा न बने तो वह बात पहुंचती नहीं है। गुजरात के मुख्यमंत्री थे माधव सिंह सोलंकी। उन्होंने खाम का एक फार्मूला बनाया। यानी क्षत्रिय,हरिजन,आदिवासी और मुस्लिम। लेकिन सफलता नहीं मिली। नतीजा यह हुआ कि उसके बाद से गुजरात में कांग्रेस धीरे-धीरे खत्म ही हो गई। अब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पीडीए का एक फार्मूला बनाया है। पीडीए की जब उन्होंने शुरुआत की तो कहा पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। लेकिन उनकी पीडीए की परिभाषा हर दो चार महीने पर बदलती रहती है। उसमें किसी अल्फाबेट का अर्थ कभी कुछ हो जाता है तो कभी कुछ और हो जाता है। वह खुद ही भ्रम में हैं कि पीडीए में किसको-किसको होना चाहिए,किसको नहीं होना चाहिए। वह सबको शामिल कर लेना चाहते हैं, लेकिन उनकी मजबूरी है कि इससे ज्यादा अल्फाबेट जोड़ नहीं पा रहे हैं और इसके इर्दगिर्द नारा नहीं बना पा रहे हैं। यह समाजवादी पार्टी की बहुत बड़ी कमजोरी है। समाजवादी पार्टी के खिलाफ नारे बनते हैं और चलते हैं। अब ताजा जानकारी है कि यूपी में पीडीए को लेकर ही एक नारा बीजेपी ने बनाया और चलवाया है- पीडीए यानी फिर डराएगा अहीर। अब यह नारा ऐसा है कि गांव में तुरंत लोगों तक पहुंच जाएगा। यूपी में जब-जब समाजवादी पार्टी सत्ता में आती है या उसके सत्ता में आने की संभावना बनती है जो सपा के कोर वोट यादव का एक वर्ग जिस तरह से सड़क पर उतरता है, लाठी भांजता है, जिस तरह की भाषा बोलने लगता है, वह बाकी मतदाता वर्ग को डराता है। ऐसे में मेरा मानना है कि पीडीए यानी फिर डराएगा अहीर,बहुत ही प्रभावी नारा है और इसका विशेषकर गांवों में खासा असर होगा।
2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव को लग रहा था कि वह सत्ता में आ रहे हैं और बस शपथ लेने की देर है,लेकिन जब नतीजा आया तो पता चला वह बहुत पीछे रह गए। भारतीय जनता पार्टी को जितनी सीटें मिलीं, अखिलेश यादव के गठबंधन को उसकी आधी भी नहीं मिलीं। इससे आप समझ लीजिए कि सपा का जो कोर वोटर है और उसका जो स्वभाव है, वह उसके लिए प्लस पॉइंट भी हो सकता है और नेगेटिव भी हो सकता है। दो पार्टियों समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल का कोर वोटर यादव और मुस्लिम हैं। यह बाकी मतदाता वर्ग को डराता है। सत्ता की गंध अगर इसको आने लगे यह काबू से बाहर हो जाता है और जिस नेता के लिए ये दबंगई दिखा रहे होते हैं अल्टीमेटली नुकसान उसी का होता है। मुझे लगता है कि ‘फिर डराएगा अहीर’ 2027 के विधानसभा चुनाव का केंद्रीय नारा बनने वाला है। अब अखिलेश यादव इसकी काट कैसे करेंगे? उनका यह जो कोर वोटर है, वह उनके बस में नहीं है। अगर अखिलेश यादव उसको नियंत्रण में रखना भी चाहें तो वह उनके नियंत्रण में रहने वाला नहीं है। उसको लगता है कि इसी से नेता और पार्टी की ताकत बनती है। उसका नतीजा यह होता है कि बाकी मतदाताओं का वर्ग अगर मन बदलने की सोच भी रहा हो वह डर जाता है कि इस पार्टी को तो सत्ता में नहीं आने देना है। यही कारण है कि मुलायम सिंह यादव के परिवार को चार बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला है। पहली बार जनता दल के कारण। हालांकि जनता दल ने उनको 1989 में मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया था। 1989 में मुलायम सिंह यादव कांशीराम के समर्थन के कारण मुख्यमंत्री बन पाए क्योंकि कांशीराम ने जनता दल के दलित विधायकों को मुलायम सिंह यादव का समर्थन करने के लिए कह दिया था। इसके बाद वह बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन के कारण मुख्यमंत्री बने। फिर 2003 में वह मुख्यमंत्री बने तो बहुजन समाज पार्टी को तोड़कर। केवल 2012 का चुनाव ऐसा था जिसमें समाजवादी पार्टी को बहुजन समाज पार्टी के खिलाफ एक पॉजिटिव मैंडेट मिला। उस समय भारतीय जनता पार्टी बहुत पीछे थी।
तो ‘फिर डराएगा अहीर’ का जो नारा गांव से उठा है भाजपा अगर उसको पूरे प्रदेश के स्तर पर ले जाने और लोगों तक पहुंचाने में सफल होती है तो उसके चुनाव प्रचार की इससे बढ़िया थीम हो ही नहीं सकती है। इस नारे के साथ ही पूरी समाजवादी पार्टी का चरित्र सामने आ जाता है। उसकी सरकारों की कारगुजारी सामने आ जाती है। अखिलेश यादव को अगर लग रहा है कि उन्होंने जो पीडीए का फार्मूला बनाया है वह 2024 के लोकसभा चुनाव में चला और इस बार फिर चलेगा तो मेरा मानना है कि 2024 में वह फार्मूला नहीं चला था। सिर्फ एक मुद्दा चला था कि बीजेपी 400 पार होगी तो आरक्षण खत्म कर देगी। बीजेपी ने 2024 में अबकी बार 400 पार का एक गलत नारा दिया था। उसका लाभ भाजपा के विरोधियों ने उठाया। इसलिए मैं बार-बार कहता हूं कि 2024 के चुनाव को आप उदाहरण मत मानिए। वह एक अपवाद है। उसके आधार पर किसी और चुनाव के नतीजे का आकलन करने की कोशिश करेंगे तो गलत नतीजे पर पहुंचेंगे। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का जो प्रकरण हुआ उसके बावजूद मैं कह रहा हूं कि 2027 का चुनाव समाजवादी पार्टी के हाथ से निकल चुका है। जो विश्लेषण होना है वह सिर्फ इतना कि भाजपा को सीटें कितनी मिलेंगी? बहुमत का जो 203 का आंकड़ा है, वह भाजपा पार कर पाएगी या नहीं यह तो प्रश्न ही नहीं है। आप समाजवादी पार्टी के नेताओं से भी बात कर लीजिए, वे भी यह नहीं कहेंगे कि इस मामले पर कोई भ्रम है कि भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलेगा। सवाल यह है कि समाजवादी पार्टी को सीटें कितनी मिलेंगी। 2017 में उसको 47 सीटें मिली थीं और 2022 में 115 सीटें। समाजवादी पार्टी के लिए भी प्रश्न वही है कि वह 47 और 115 के बीच में कहां रुकेगी। 115 सीटें तो मुझे लगता है कि अब समाजवादी पार्टी के लिए सपना हो गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल का दसवां साल शुरू हो गया है। उनको डिफेंसिव होना चाहिए था। हो ठीक उल्टा रहा है। अखिलेश यादव डिफेंसिव हैं और योगी ऑफेंसिव हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज देखिए। उनके भाषण सुनिए। उनके दौरे देखिए। अखिलेश को लग रहा है कि सोशल मीडिया के भरोसे वह मैदान मार लेंगे। उनकी यह गलतफहमी 2027 में दूर हो जाएगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)