कश्मीरी स्कूली बच्चों के दिमाग में घोल रहे भारत विरोधी जहर ।
कश्मीर में एक घटना हुई है। एक किताब स्कूलों के लिए खरीदी और बांटी गई। इसके लेखक हैं हिलाल अहमद और संतोष मीणा। हिलाल अहमद सीएसडीएस से जुड़े रहे हैं। सीएसडीएस पिछले दिनों विदेशी फंडिंग को लेकर काफी चर्चा में रहा है। इस किताब में आतंकवादियों और अलगाववादियों का महिमा मंडन किया गया है।
/rising-kashmir/media/media_files/2026/07/04/image-2026-07-04-23-41-27.png)
इस किताब में मकबूल भट्ट जैसे आतंकी को शहीद बताया गया है। उसे इंस्पेक्टर अमीर चंद को अगवा करके उनकी हत्या करवाने के मामले में अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। मकबूल भट्ट को छुड़ाने के लिए लंदन में एक भारतीय राजनयिक रविंद्र महात्रे को अगवा किया गया, लेकिन भारत सरकार ने भट्ट को छोड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद रविंद्र महात्रे की हत्या कर दी गई। किताब में ऐसे मकबूल भट्ट का महिमा मंडन किया गया है। बच्चों से कहा जा रहा है कि इनके बारे में पढ़ो। किताब में इसी तरह से आतंकी हाफिज सईद की भी प्रशंसा की गई है। किताब को लेकर विवाद बढ़ने पर जम्मू कश्मीर सरकार ने आठ लोगों को सस्पेंड कर दिया है। उस किताब का प्रकाशन करने वालों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। लेकिन इससे क्या होगा? कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। यह केवल लीपापोती है। कश्मीर की शिक्षा व्यवस्था में जमात-ए-इस्लामी गहरे तक बैठी हुई है। यह जो हिलाल अहमद जैसे लोग हैं और जिन लोगों ने इस किताब को खरीदा व जिस कमेटी ने इसे अप्रूव किया, मानकर चलिए कि ये सब आतंकवादियों के साथ हैं। जब तक इनके खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जाएगी, यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है। ये देश को तोड़ना चाहते हैं। इस किताब में लिखा गया है कि जम्मू कश्मीर पर भारत ने कब्जा कर रखा है। इनकी हिम्मत देखिए कि जब भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार है,जम्मू-कश्मीर का लेफ्टिनेंट गवर्नर भाजपा का नियुक्त किया हुआ है तब इस तरह की किताब न केवल लिखी व छापी जा रही है बल्कि उसको जम्मू कश्मीर सरकार जनता के पैसे से खरीद कर स्कूलों में बंटवा रही है।

ये जो किताब लिखने, खरीदने और स्कूलों में बंटवाने वाले लोग हैं, ये दरअसल सिविल सोसाइटी,एजुकेशन सिस्टम व पॉलिटिकल सिस्टम का हिस्सा बनकर आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले लोग हैं। अब आप अंदाजा लगाइए कि पहलगाम की घटना के बाद जम्मू कश्मीर विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित हुआ था कि यह घटना हिंदू-मुसलमानों की एकता को तोड़ने के लिए की गई। जबकि यह शुद्ध रूप से हिंदुओं के नरसंहार का मामला था, लेकिन उसको दबा दिया गया। अरे कौन सी हिंदू मुस्लिम एकता, लाखों हिंदू इसी कश्मीर से निकाल दिए गए, मार दिए गए, उनके घर जला दिए गए, कब्जा कर लिए गए, हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ, वह सब क्या हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। लेकिन अब भी किसी की नींद नहीं खुल रही है। कश्मीर में आतंकवादियों ने अब अपनी स्ट्रेटजी बदल दी है। अब वे ज्यादा संख्या में लोगों को मारने की बजाय लंबे समय तक सिक्योरिटी फोर्सेस को इंगेज रखने का काम कर रहे हैं। यही कारण है कि एनकाउंटर शुरू हो रहा है तो दो-दो महीने चल रहा है। प्रदेश का मुख्यमंत्री कहता है कि खामोशी है, लेकिन सब कुछ शांत नहीं है। दरअसल नेशनल कांफ्रेंस हो या पीडीपी, इनका होना ही आतंकवाद को बढ़ावा देने जैसा है। ये पॉलिटिकल सिस्टम का इस्तेमाल आतंकवादियों को संरक्षण देने के लिए करते हैं। कश्मीर में जो आतंकवाद हो रहा है, उसमें सबसे बड़ी फंडिंग ईरान से आती है। जम्मू कश्मीर का मुद्दा जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठता है तो ईरान हमेशा पाकिस्तान के साथ खड़ा होता है। ईरान में खामेनेई के फ्यूनरल में भारत सरकार ने महबूबा मुफ्ती को भेजा है। मतलब उनको लेजिटिमेसी दी जा रही है। कश्मीर के आतंकवादियों को बताया जा रहा है कि हम महबूबा मुफ्ती को अलगाववादी या आतंकवादियों का साथी नहीं मानते जबकि महबूबा और उनकी पार्टी पीडीपी हमेशा से आतंकवाद परस्त रही है।

अब जम्मू को कश्मीर घाटी बनाने की कोशिश हो रही है। पिछले कुछ सालों से जो एनकाउंटर हो रहे हैं, वह जम्मू के जंगलों में ज्यादा हो रहे हैं। अब पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों की संख्या कम हो रही है जबकि स्थानीय स्तर के आतंकवादियों की संख्या बढ़ती जा रही है। खुद मुख्यमंत्री कहते हैं कि जम्मू कश्मीर देश के उन पांच-छह टॉप स्टेट्स में है जो सबसे ज्यादा तरक्की कर रहे हैं। हमारे यहां रोजगार की कोई कमी नहीं है। तो कोई उनसे पूछे कि फिर आपके यहां आतंकवाद क्यों है? जो राज्य सबसे निचले पायदान पर हैं, वहां आतंकवाद क्यों नहीं होता? वहां लोग बंदूक क्यों नहीं उठाते? अगर आप पिछले कुछ सालों की घटना देखें तो पाएंगे कि पढ़े-लिखे मुसलमान आतंकवाद के रास्ते पर सबसे ज्यादा हैं। अभी हाल की लाल किले की घटना देख लीजिए। उसमें सारे डॉक्टर और उनके साथी शामिल थे। अल्फला यूनिवर्सिटी मेडिकल कॉलेज आतंकवाद का अड्डा बना हुआ था। कश्मीर में आतंकियों के महिमा मंडन वाली किबात को बांटने, लिखवाने और सिलेक्ट करने पर आठ लोगों को सस्पेंड तो कर दिया गया, लेकिन जवाबदेही किसकी है? यह किताब क्यों छपने दी गई? यह किताब क्यों खरीदी गई? इस किताब को किसने क्लीयरेंस दी? सस्पेंड किए गए लोग केवल मोहरे हैं। जिन्होंने यह काम किया है और उसकी रणनीति बनाने वाले ऊपर तक हैं। उनकी पहचान करके जब तक उन पर एक्शन नहीं होगा, यह सिलसिला चलता रहेगा। एक रिसर्च इंस्टिट्यूट से जुड़ा हुआ व्यक्ति यह लिखने की हिम्मत कर रहा है कि भारत ने कश्मीर पर जबरन कब्जा कर रखा है। अगर वह आतंकवादी नहीं है तो फिर आतंकवादी कौन है? क्या जिसके हाथ में बंदूक है सिर्फ वही आतंकवादी है? बंदूक वाला आतंकवादी ऐसे आतंकवादियों से कम खतरनाक है। यह किताब वाला आतंकवादी तो लोगों के बीच में जाता है, उनसे मिलता-जुलता है और वहां आतंकवाद का जहर फैलाता है। अगर ये आतंकवादी खुला घूम रहा है तो यह भारत सरकार की कमजोरी है। मैं फिर कह रहा हूं कि यह ओवर ग्राउंड वर्कर जैसी कोई चीज नहीं होती। ये सब आतंकवादी हैं। यह उम्मीद करना कि आप वहां सड़क बनवा देंगे,स्कूल बनवा देंगे, अस्पताल बनवा देंगे,विकास कर देंगे, दूसरी सुविधाएं जुटा देंगे तो उनका मन बदल जाएगा, वह कभी नहीं होने वाला। बल्कि उसके बाद उनके मन में आतंकवाद और ज्यादा गहरा बैठेगा। उनको रोजी रोटी की चिंता करने की जरूरत नहीं है। तो कश्मीर में जो विकास हो रहा है, वह दरअसल भारत के लिए सबसे ज्यादा घातक साबित हो रहा है क्योंकि उस विकास का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए हो रहा है। केवल आठ छोटे कर्मचारियों को बर्खास्त करने से कुछ हासिल नहीं होगा। भारत सरकार को कश्मीर को लेकर अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। इस मामले को राजनीतिक दृष्टि से देखने की बजाय स्ट्रेटेजिक नजरिए से देखना पड़ेगा। कश्मीर की जो डेमोग्राफी है वह कभी आपके साथ नहीं होगी। आपको यह मानकर अपनी रणनीति बनानी होगी कि वे आपके विरोध में हैं और आतंकवादियों से मिले हुए हैं। ये भारत सरकार का दिया हुआ खा रहे हैं लेकिन इनकी वफादारी पाकिस्तान और आतंकवादियों के साथ है। जब तक हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करेंगे, कश्मीर में कोई बदलाव आने वाला नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









