शैतान वेदवाक्य बोलने लगे तो विश्वास कौन करेगा? 

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
आदमी भूखा हो,खाना सामने रखा हो और फिर भी न खा पाए तो उस व्यक्ति की बेबसी को आप समझिए। यही हाल इस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का है। नौ साल में पहली बार उन्हें इतना बड़ा मुद्दा मिला है। यह अलग बात है कि इसमें योगी सरकार के खिलाफ कुछ नहीं है, लेकिन यह एक पब्लिक सेंटीमेंट से जुड़ा मुद्दा है। तो अब सवाल यह है कि उस मुद्दे को वह उठा क्यों नहीं पा रहे हैं? जब से यह मुद्दा उठा है तब से उनके मुंह से आपने पीडीए शब्द सुना नहीं होगा। राम मंदिर से चंदा चोरी के सैलाब में अखिलेश यादव का पीडीए बह गया है और हिंदुत्व का झंडा उठाने की उनमें शक्ति नहीं है।
अब एक नया वीडियो सामने आया है। उनके चाचा रामगोपाल यादव राज्यसभा में पार्टी के सीनियर लीडर हैं। उनका यह वीडियो तब का है जब तक अयोध्या में राम मंदिर नहीं बना था। वीडियो में राम गोपाल कह रहे हैं कि ये जबरन कब्जा किए हुए हैं। ये इनकी जगह ही नहीं है। आप लोग इसको क्यों राम जन्म स्थान लिखते और बोलते हैं। अब आप देखिए कि जिस बात को कहने की हिम्मत अंग्रेज नहीं कर पाए। अंग्रेजों के समय भी वहां जो पुलिस स्टेशन था, उसका नाम थाना जन्म स्थान था। इसके बारे में किसी को गलतफहमी नहीं थी। 500 साल तक हिंदुओं ने उसके लिए संघर्ष किया। अदालतों में सालों मुकदमा चला। 2010 में हाईकोर्ट का फैसला आया। उसके बाद 2019 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। एएसआई की खुदाई में कई ऐतिहासिक तथ्य निकले, लेकिन फिर भी समाजवादी पार्टी इसे जन्मस्थान मानने को तैयार नहीं थी। समाजवादी पार्टी बांग्लादेशी घुसपैठियों को घुसपैठिया नहीं कहती है, लेकिन वह रामलला को घुसपैठिया बता रही है। अब उस पार्टी पर कौन भरोसा करेगा? यह सच है कि चंदे के मामले में जो कुछ हुआ है उससे ज्यादा शर्मनाक बात कोई नहीं हो सकती, लेकिन इसकी वजह से अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी या जितने राम विरोधी हैं,उनको लेजिटिमेसी मिल जाएगी, यह उनकी कल्पना में भी कैसे आ सकता है? लेकिन उनको लग रहा है कि ऐसा हो सकता है।
तो पहली बात तो यह हुई है कि वह अपनी जाति अस्मिता की राजनीति को छोड़कर सनातन धर्म की पिच पर आ गए हैं। अब उनको भगवान राम के मंदिर की प्रतिष्ठा की चिंता हो रही है। लोगों की आस्था की चिंता हो रही है। लेकिन आपकी आस्था तो अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करने आए आतंकवादियों में थी। आपके पिता ने तो कार सेवकों पर गोली चलवाई थी। अब नया बहाना खोज कर लाए हैं। एक अधिकारी का नाम ले रहे हैं कि उन्होंने चलवाई। तो भाई मुख्यमंत्री कौन था? अगर अधिकारी गोली चलवा सकता है तो फिर मुख्यमंत्री क्या कर रहे थे? और सबसे बड़ा सवाल कि उसके बाद मुलायम सिंह यादव को यह कहने के लिए किसने मजबूर किया कि फिर ऐसी स्थिति आई तो फिर गोली चलवाएंगे। जब मंदिर बना तो उसकी प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हुआ। उसमें बाकायदा अखिलेश यादव को निमंत्रित किया गया, लेकिन वह नहीं गए। अब वह चाहते हैं कि अयोध्या के आंदोलन और राम मंदिर के निर्माण का सारा श्रेय उनको मिल जाए। किसलिए? क्योंकि वहां कुछ लोगों ने चंदा चोरी की है। चंदा चोरी जिन्होंने की वे जेल जाएंगे। तो अब अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी पिच पर खेलने का मौका दे दिया है और वे रोज चौका लगा रहे हैं। अखिलेश यादव से जवाब नहीं देते बन रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर आपको इतनी चिंता है तो आइए मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि को मुक्त करवाने में सहयोग कीजिए। लेकिन अखिलेश यादव के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। तो अखिलेश यादव हों,राहुल गांधी हों या उनके दूसरे साथी, जो लोग सनातन को समूल नाश करने की बात करने वालों के साथ खड़े हों, उनकी बात राम भक्त या सनातन को मानने वाला क्यों सुनेगा? अगले साल उत्तर प्रदेश में  विधानसभा का चुनाव है। अखिलेश यादव को लग रहा है कि उनको मौका मिल गया,लेकिन उनको समझ में नहीं आ रहा है कि वह गड्ढे में गिर गए हैं। उनका पीडीए हवा में उड़ चुका है। उनके पास दूसरा कोई फार्मूला है नहीं। जिस हिंदुत्व की पिच पर वह जाना चाहते हैं, वहां उनको कोई पूछने वाला नहीं है। आपने अखिलेश यादव को ईद बकरीद पर समारोहों में शामिल होते, मस्जिद में जाते हुए देखा होगा, लेकिन होली-दिवाली या हिंदुओं के किसी त्योहार पर कब उनको मंदिर जाते हुए देखा। कब किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होते हुए देखा? ऐसे में आप भगवान राम की आस्था की बात कैसे कर सकते हैं? आपकी राम में आस्था कब से हो गई? जिस दिन आपके पिता ने कारसेवकों पर गोली चलवाई थी उस दिन या उसके बाद आपके मुंह से इस फैसले के खिलाफ एक शब्द भी निकला क्या? आपने कभी कहा कि मेरे पिता ने गलत किया,उसके लिए मैं हिंदू समाज से क्षमा मांगता हूं। अगर इतना भी किया होता तो लोग आपकी बात सुनने को तैयार होते। आप तो मुख्यमंत्री बनने के बाद आतंकवाद के आरोपियों का मुकदमा वापस ले रहे थे। वह तो हाईकोर्ट ने मना कर दिया। बाद में उन पर मुकदमा चला और 2019 में उन्हें आजीवन कारावास हुआ। ऐसे लोगों को आप छुड़ाना चाहते थे। अब अचानक आपको भगवान राम की प्रतिष्ठा की चिंता होने लगी है। इसी को कहते हैं कि शैतान वेद वाक्य बोल रहा है। उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। पहले उसकी पड़ताल कीजिए। फिर विश्वास करने का प्रयास कीजिए।
तो अखिलेश यादव और उनकी पार्टी का जो स्वभाव है,वह कैसे बदलेगा? दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकती कि आप हर मुद्दे पर हिंदुओं के विरोध में खड़े हों और फिर हिंदुओं का समर्थन भी चाहें। आप अपने पूरे जीवन में कोई एक दिन बताइए जब आपने अयोध्या आंदोलन का समर्थन किया हो। अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने इसकी बात कही हो। संसद में, विधानसभा में, सड़क पर कहीं भी किसी कार्यक्रम में आपने राम सेवकों और अयोध्या के आंदोलन का सिर्फ मजाक उड़ाया है। कांग्रेस के उस नारे के साथ आप हमेशा खड़े रहे कि रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, लेकिन तारीख नहीं बताएंगे। अब भाजपा ने तारीख भी बता दी और मंदिर भी बनवा दिया। प्राण प्रतिष्ठा भी कर दी। उसकी भी तारीख बता दी। उसमें आपको न्योता भी दे दिया। फिर भी आप आए नहीं। तो अखिलेश यादव को जो लगता है कि चढ़ावा चोरी प्रकरण से उनको कोई राजनीतिक लाभ मिल जाएगा तो ऐसा होने वाला नहीं है। बल्कि मेरा मानना है कि इससे उनका बहुत बड़ा नुकसान हो गया है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव का पूरा नैरेटिव ही बदल गया है। अब कोई जाति की बात नहीं करेगा। अब बात होगी तो हिंदुत्व की होगी। रामलला की बात होगी, चढ़ावा चोरी करने वालों की आलोचना की बात होगी, उनके खिलाफ कार्रवाई और उनको जेल भेजने की बात होगी। तो इससे उनको कुछ मिलने वाला नहीं है। उनके पास जो बची खुची पूंजी थी, वह भी चली गई है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)