जब महिलाओं के कपड़े उतरवाए गए तब कोई आवाज क्यों नहीं उठी।
प्रदीप सिंह।
हाल ही में कोलकाता में एक घटना हुई। अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि इसको दुर्घटना कहें,अपराध कहें या किस श्रेणी में रखें। तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सदस्य हैं महुआ मोइत्रा। वह ममता बनर्जी की बड़ी खास हैं। उनके दफ्तर पर सैकड़ों लोग जुट गए और उन्होंने अंडे फेंकने शुरू कर दिए। बंगाल में बरसात को वृष्टि बोलते हैं। तो बंगाल में आजकल अंडावृष्टि हो रही है। तृणमूल कांग्रेस का कोई भी नेता जाता है तो जनता उसका इसी तरह से स्वागत कर रही है। वहां के लोगों में जो गुस्सा है, उसका अंदाजा पश्चिम बंगाल के बाहर लोग नहीं लगा सकते। जिन्होंने 15 साल लगातार आतंक और अत्याचार झेला हो, उनके मन में कितना गुस्सा होगा इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। वह गुस्सा कहीं तो निकलेगा। किसी रूप में तो निकलेगा। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि किसी पर अंडा फेंकना बड़ी अच्छी बात है लेकिन जो लोग उसको बुरा कह रहे हैं और इसकी आलोचना कर रहे हैं,उन्हें जरा समाज के मनोविज्ञान की दृष्टि से देखकर फैसला करना चाहिए कि यह सही है या गलत है या कहां तक सही है और कहां तक गलत है।
पश्चिम बंगाल के लोगों खासतौर से महिलाओं ने जितना अत्याचार सहा है, मैं मानता हूं दुनिया में किसी देश में महिलाओं ने नहीं सहा होगा। सबसे पहले कांग्रेस के राज में,उसके बाद सीपीएम के राज में और पिछले 15 साल में तृणमूल के राज में तो यह अपने चरम पर पहुंच गया था। दो घटनाएं आपको बताता हूं। फिर आप सोचिएगा कि महुआ मोइत्रा पर अंडे फेंके जाने की घटना से आपके दिल में जो सहानुभूति उपज रही है वह कितनी न्यायोचित है। एक घटना है कि एक परिवार में दो भाई-बहन भारतीय जनता पार्टी के लिए काम करते थे। ममता बनर्जी के राज में पश्चिम बंगाल में भाजपा का कार्यकर्ता होना अपराध माना जाता था। ऐसे लोगों को तृणमूल कांग्रेस के गुंडे सजा देते थे। तो एक दिन तृणमूल के लोग उनके घर में घुस गए। दोनों को पहले मना किया गया कि भाजपा के लिए काम मत करो। दोनों ने कहा कि हम भाजपा की आइडियोलॉजी में विश्वास करते हैं इसलिए काम करते हैं। यह सुनते ही बहन पर एसिड फेंका गया। उसने बचने की कोशिश की लेकिन कमर से नीचे के हिस्से पर एसिड गिर गया। लड़की के पैर की हड्डियां टेढ़ी हो गईं। एक हिंदू संगठन उसे जयपुर ले गया और वहां इलाज कराया। उसके पैरों में कई रॉड पड़ीं। उसका हाथ भी टेढ़ा हो गया। इसके बाद उसे इलाज के लिए गुड़गांव लाया गया। इसके बाद भोपाल ले जाया गया। भोपाल में उसका इलाज चल रहा था कि इसी बीच भाजपा के एक मंत्री को इस घटना के बारे में पता चला तो उन्होंने सोशल मीडिया पर पूरी कहानी डाली। शुभेंदु अधिकारी को यह खबर मिली तो उन्होंने उस लड़की को बुलवाया और अब जाकर मुकदमा दर्ज हुआ है। लेकिन अभी बात पूरी नहीं हुई है। यह जो भाई-बहन थे इनके पिता ममता बनर्जी के राज में घटना की रिपोर्ट लिखवाने थाने गए थे लेकिन पुलिस ने कहा कि आप रिपोर्ट मत लिखवाइए क्योंकि हम कुछ कर नहीं पाएंगे और हमने रिपोर्ट अगर लिख ली तो आप और ज्यादा मुश्किल में पड़ जाएंगे। इसी बीच टीएमसी के गुंडों को पता चल गया कि एक बुजुर्ग रिपोर्ट लिखवाने थाने आए हैं तो वे थाने पहुंच गए और वहां बुजुर्ग व्यक्ति की खूब पिटाई की। मुझे आगे की खबर नहीं मालूम कि वह जीवित बचे या नहीं। दूसरी घटना सुनिए। आपके लिए तय करना शायद मुश्किल हो जाएगा कि कौन सी ज्यादा हृदयविदारक है। एक व्यक्ति भाजपा का इलेक्शन एजेंट बन गया था। टीएमसी के गुंडे उसे उसके घर से उठाकर ले गए। कुछ गुंडे उसके घर में ही रुक गए। उस समय उसके घर में उसकी पत्नी और छह महीने की बच्ची थी। बच्ची की कनपटी पर रिवाल्वर लगा दिया और महिला से कहा कि कपड़े उतारो। उसके बाद कहा कि चाय बनाकर लाओ। बच्चे की जान बचाने के लिए मां किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गई। महिला चाय बनाकर लाई तो कहा कि बिस्किट लाओ। वह बिस्किट लाई तो कहा यह वाला नहीं दूसरा वाला लाओ। महिला ने कहा कि वह बिस्किट घर पर नहीं है तो गुंडे बोले जाओ दुकान से ले आओ। उस महिला को उसी नग्न हालत में बाहर दुकान पर बिस्किट लाने के लिए भेजा गया। अब आप बताइए कि ऐसी अत्याचारी पार्टी और ऐसे अत्याचारी नेताओं के साथ क्या कोई सहानुभूति दिखाई जा सकती है या दिखाई जानी चाहिए?

ये लोग तो सिर्फ अंडे फेंक रहे हैं। अंडे भी महुआ मोइत्रा पर नहीं गिरे। उनके दफ्तर की दीवारों पर पड़े। टीएमसी के नेता आजकल जहां भी जाते हैं तो चोर-चोर का नारा लगता है। आपको जनरलाइज करना हो तो आप कह सकते हैं कि यह भाजपा करा रही है। सवाल यह है कि भाजपा करा रही है तो ये लोग कर क्यों रहे हैं? दूसरी बात टीएमसी जिसका पश्चिम बंगाल में 15 साल तक राज रहा, जिसका अपना संगठन है,कैडर है,नेता और कार्यकर्ता हैं, उनका कोई एक भी कार्यकर्ता इसके विरोध में क्यों नहीं सड़क पर आ रहा है? तो जिन पर अंडे चल रहे हैं उनके प्रति सहानुभूति दिखाने वाले जरा सोच कर देखें कि पश्चिम बंगाल के लोगों और उसमें भी खासतौर से महिलाओं ने क्या भुगता है? संदेश खाली की घटना बहुत पुरानी नहीं है। जब घरों में बम फेंके जा रहे थे तो किसी को एतराज नहीं हो रहा था। तृणमूल कांग्रेस का कोई एक नेता बताइए जिसने यह बयान दिया हो कि घरों में बम नहीं फेंका जाना चाहिए। अभी चुनाव से ठीक पहले का एक वीडियो सामने आया है,जिसमें तृणमूल कांग्रेस की एक महिला नेता कह रही है कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं को मारो, उनको वोट मत देने दो। तुम्हारे खिलाफ कुछ नहीं होगा। सरकार तुम्हारे साथ है। ऐसी पार्टी और ऐसी पार्टी के नेता व कार्यकर्ता क्या सहानुभूति डिजर्व करते हैं? आपके मन में यह सवाल जरूर आना चाहिए। अगर आप न्यायोचित समाज बनाना चाहते हैं तो अपराध को भूल जाना भी मेरी नजर में बहुत बड़ा अपराध है। इन लोगों को कानून के हिसाब से सजा दिलाने के लिए शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने कानून में बदलाव किया है, लेकिन आपको भी मालूम है कि कानूनी प्रक्रिया बड़ी लंबी चलती है। कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत में हर अपराध को साबित करना मुश्किल होता है। हर सच का प्रमाण नहीं होता। लेकिन मैं यह नहीं कह रहा हूं कि फ्री फॉर ऑल हो जाना चाहिए और जनता के ऊपर छोड़ देना चाहिए कि जैसे चाहे फैसला करे। मैं सिर्फ उन लोगों को संबोधित कर रहा हूं जिनको तृणमूल कांग्रेस के इन नेताओं से सहानुभूति हो रही है। उनसे सहानुभूति जताने के लिए आपके पास पत्थर का हृदय होना चाहिए। आपको शर्म आनी चाहिए। जो लोग अंडे फेंक रहे हैं,गाली दे रहे हैं,उनके खिलाफ कानूनी कारवाई करना एक पक्ष है। वह होना चाहिए। लेकिन टीएमसी के गुंडों और अत्याचारियों से सहानुभूति और इन लोगों के समर्थन में खड़े होना, इससे बड़ा अपराध भला क्या होगा? हत्यारे और बलात्कारी के समर्थन में खड़ा होना उस किए गए अपराध से भी बड़ा अपराध है।
तृणमूल कांग्रेस के गुंडों और उनके जनप्रतिनिधियों में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है क्योंकि इनके जनप्रतिनिधि कभी उन गुंडों के खिलाफ खड़े नहीं हुए। हमेशा उन गुंडों को बचाने की कोशिश करते रहे। ऐसा नहीं है कि इन जनप्रतिनिधियों को मालूम न हो कि क्या हो रहा है। घर-घर में बम बन रहे थे, राजनीतिक विरोधियों पर बम फेंके जा रहे थे लेकिन तब तक जनतंत्र बचा हुआ था। तब तक सब कुछ ठीक चल रहा था। अब जब बम बनना बंद हो गया, बम फेंका जाना बंद हो गया, कट मनी बंद हो गई,पूरे प्रदेश में सैकड़ों की संख्या में बने अवैध टोल नाके बंद हो गए तो परेशानी हो रही है। जिनको भी आज टीएमसी के लोगों से सहानुभूति हो रही है मेरा सवाल सिर्फ उन लोगों से है कि जरा कल्पना करके देखिए कि आपके परिवार के किसी व्यक्ति के साथ ऐसा हुआ होता तब भी आपके मन में ऐसी सहानुभूति का सैलाब उमड़ता। पिछले 15 सालों में तृणमूल कांग्रेस ने जो किया है, उसकी तुलना में आज जो हो रहा है, मैं मानता हूं कि वह लेश मात्र है। यह गुस्सा नहीं निकलेगा तो किसी और रूप में इसका विस्फोट होगा। इस गुस्से को पूरी तरह से दबाने के बजाय इसको नियंत्रित करने की जरूरत है और यह अपराधियों को सजा दिलाने से नियंत्रित होगा। उसका इंतजाम सरकार करती हुई दिखाई दे रही है, लेकिन उसमें समय लगता है। तो यह जो बीच का समय है,इसमें आपको इस तरह की घटनाएं होती हुई दिखाई देंगी। जो अंडे फेंक रहे हैं या गाली दे रहे हैं आप उनके खिलाफ बोलिए, मुझे कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन जिन पर अंडे फेंके जा रहे हैं या जिनको गाली दी जा रही है, उनसे अगर आपकी सहानुभूति है तो सोचिए कि उनके समर्थन में खड़े होने का मतलब क्या है?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









