कॉकरोच फिर दिल्ली आ रहे हैं। किसी गलतफहमी में न रहिए। इस बार बड़ा लक्ष्य लेकर आ रहे हैं। पहले सीजन में छात्रों का बहाना गया। वह मुखौटा उतर गया है। अब एक तरह से घोषणा कर दी गई है कि हम राजनीतिक दल बनाएंगे और वह राजनीतिक दल अराजकता की नींव पर खड़ा करेंगे। देश में अराजकता फैले, दुनिया भर में भारत की छवि गिरे और सरकार कमजोर हो, यही उनका लक्ष्य है।
ये कॉकरोच कब क्या करने वाले हैं,इसे भी समझना जरूरी है। 15 अगस्त को जब लाल किले से प्रधानमंत्री का ऐतिहासिक भाषण हुआ तभी कॉकरोच जनता पार्टी ने स्कूल ठीक करो अभियान शुरू कर दिया। यह बहुत सोची समझी रणनीति के तहत हुआ ताकि मीडिया खासतौर से सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री के भाषण से ज्यादा चर्चा उनके इस अभियान की हो। अब स्कूल ठीक करो ऐसा मुद्दा है जिससे कोई असहमत नहीं हो सकता। मैंने पहले भी कहा था अब फिर कह रहा हूं कि जितने रिजीम चेंज के ऑपरेशन हुए हैं, सबमें पहले असली उठाए गए और उनकी आड़ में अपना खेल खेला गया। यह भी वही हो रहा है, लेकिन बात यहीं तक नहीं रुकने वाली। आगे की तारीखों पर ध्यान दीजिए। 10 सितंबर से क्या बोलती पब्लिक अभियान शुरू होगा। अब आप कहेंगे कि 10 सितंबर की ही तारीख क्यों चुनी गई? क्योंकि 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन हो रहा है। उसमें दो अहम मामलों पर फैसला होने की उम्मीद है। पहला, फास्ट पेमेंट सिस्टम को इंटीग्रेट करना और ब्रिक्स के सभी देशों को उससे जोड़ना। भारत का यूपीआई उसमे सबसे आगे है। दूसरा, स्विफ्ट का विकल्प खोजना यानी अमेरिका के कंट्रोल में जो इंटरनेशनल फाइनेंशियल सिस्टम है उसे बाहर निकलना। इसे डीडॉलराइजेशन की ओर कदम बढ़ाना भी कह सकते हैं। अब आप इससे समझ सकते हैं कि कॉकरोचों ने 10 सितंबर की तारीख क्यों चुनी और उनकी नीयत क्या है? साथ ही जिन लोगों ने इनको भेजा है उनका उद्देश्य क्या है? सितंबर में ही सुप्रीम कोर्ट में उस रिट पर भी सुनवाई होनी है,जिसमे कहा गया है कि सीजेआई ने कॉकरोच का शब्द इस्तेमाल करके जो टिप्पणी की थी उसका कमर्शियल उपयोग हो रहा है और इसको रोका जाए। अब इस मामले में कोर्ट जो फैसला देगा उसकी चर्चा नहीं होगी। जजेस की टिप्पणी और वकीलों की बहस में जो मुद्दे उठाए जाएंगे और जो तर्क दिए जाएंगे, वे मुख्य खबर बनेंगे। उससे सोशल मीडिया पर एक माहौल बनाने की कोशिश होगी और जाहिर है कि वह माहौल सुप्रीम कोर्ट यानी भारत की न्याय प्रणाली और भारत सरकार के खिलाफ होगा।
ब्रिक्स के सदस्य देश अगर पेमेंट सिस्टम को जोड़ लेते हैं तो यह बहुत बड़ी ताकत बनेगा, जिससे अमेरिका और यूरोप को डर है। चीन को इससे डर नहीं है क्योंकि इसमें उसको अपना फायदा दिखता है और दूसरा चीन ब्रिक्स का सदस्य भी है। अब आप समझ जाइये कि ये दीपके और उसके साथियों को भेजने वाले कौन हैं? अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इनसे कैसे निपटती है। पहली बार तो वह इनके सामने झुक गई। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करवा दिया और उनको जीतने का अहसास करा दिया। अब इन कॉकरोचों को लग रहा है कि पहली बार जीत गए तो दूसरी बार भी जीत जाएंगे। इस बार उनका लक्ष्य किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं भारत सरकार है। आप सोशल मीडिया पर देख ही रहे होंगे कि इन कॉकरोचों के खिलाफ कितने प्रमाण आ रहे हैं। तो क्या सरकार और खुफिया एजेंसियों के पास नहीं होंगे? सरकार को चाहिए कि देश को बताए कि इनको पैसा कहां से मिल रहा है और इनको पैसा कौन भेज रहा है? कश्मीर मॉडल याद कीजिए। अनुच्छेद 370 और 35ए हटने के बाद क्या हुआ? सरकारी तंत्र से बीन-बीनकर आतंकवादियों के समर्थकों और उनके एजेंटों को निकाला गया। नौकरी से बर्खास्त किया गया। हजारों की संख्या में ये लोग तनख्वाह तो सरकार से लेते थे और काम आतंकवादियों का करते थे। अब समय आ गया कि उसी मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाए। दिल्ली और केंद्र सरकार में बैठे इन कॉकरोचों के जो हिमायती हैं, उनकी पहचान हो। ये दरअसल हाफ फ्रंट की लड़ाई को फुल फ्रंट में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। पूर्व सीडीएस जनरल विपिन रावत की बात याद रखिए कि भविष्य में भारत को ढाई फ्रंट वॉर लड़ना पड़ेगा। एक चीन, एक पाकिस्तान और आधा अंदर से। अब अंदर वाली वॉर फुल फ्रंट की हो गई है और वह चीन और पाकिस्तान से ज्यादा खतरनाक है।
घर के अंदर बैठे दुश्मन की पहचान हमें करनी ही होगी। ये देश खिलाफ काम कर रहे हैं। ये चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने और देश में अराजकता फैलाने का काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ एक्शन होना ही चाहिए। जंतरमंतर के प्रदर्शन के बाद सरकार को जो मिनिमम एक्शन करना चाहिए था, वह भी उसने नहीं किया। कोई भी धरना प्रदर्शन की अनुमति जब मांगने जाता है तो पुलिस अनुमति से पहले एक अंडरटेकिंग लेती है। उसमें 16-17 पॉइंट होते हैं कि आपकी क्या जिम्मेदारी होगी। अगर आप इसको नहीं फॉलो करेंगे तो आपके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में उस अंडरटेकिंग का पूरी तरह उल्लंघन हुआ। शांतिपूर्ण प्रदर्शन की जगह हिंसक प्रदर्शन हुआ और पुलिस पर हमला किया गया। क्या भारत सरकार, दिल्ली पुलिस या गृह मंत्रालय ने इन लोगों को इस बारे में कोई नोटिस भी दिया। अभी तक इन लोगों के खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं हुआ? इसी का नतीजा है कि ये दीपके बड़े जोश से बोल रहा था कि सेकंड सीजन बहुत जल्दी शुरू होने जा रहा है। इस कायर की हिम्मत नहीं हुई कि रांची जाए। बहाना किया कि मुझे टाइफाइड हो गया है और महाराष्ट्र में पार्क में बैठक कर रहा है। इसका इरादा बिल्कुल स्पष्ट है। कहीं कोई कन्फ्यूजन नहीं है। कन्फ्यूजन सरकार के स्तर पर है। सत्तारूढ़ दल के स्तर पर है कि इनसे निपटना कैसे है? निपटना भी है कि नहीं? नहीं निपटना है तो फिर अराजकता होने दीजिए और अगर निपटना है तो कानून और संविधान के मुताबिक कदम उठाइए। हमारे देश में कानून व्यवस्था को लागू करने वाली एजेंसियां हर स्थिति से निपटने में सक्षम हैं। जरूरत है उनको फ्री हैंड देने की। कॉकरोच जनता पार्टी का सीजन टू अगर शुरू होता है तो कानून से उनको कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए। इस देश में लोग हमेशा ताकतवर के साथ खड़े होते हैं। आज जिओपॉलिटिक्स का सबसे बड़ा हथियार नैरेटिव है,जो सोशल मीडिया के जरिए बनाया जाता है और जिस पर कंट्रोल ऐसे तत्वों का है जिन्होंने इन कॉकरोचों को भेजा है। अगर प्रधानमंत्री का वीडियो पांच घंटे तक रोका जा सकता है तो आप समझ लीजिए बाकी सामान्य लोगों के साथ, जो सरकार के समर्थक हैं, क्या होता होगा। मेटा ने माना कि हमने पैसा लेकर इन कॉकरोचों के नैरेटिव को बढ़ाया। यह मामला केवल माफी मांगने से खत्म नहीं होना चाहिए। माफी गलती की मिलती है। अपराध की सजा होती है। अपराध करने की छूट इन कॉकरोचों को नहीं मिलनी चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं आपका अखबार के संपादक हैं)









