तीरंदाजी या निशानेबाजी में सही लक्ष्य पर निशाना बहुत दक्ष लोग ही लगा सकते हैं। बात अगर राजनीति की हो तो निशाना लगाना और मुश्किल होता है। मेरा मानना है कि पिछले ढाई साल में पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्ष्य को सही भेदा है। 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से जब उन्होंने दिमागी नक्सल शब्द बोला तो उसका असर पूरे देश खासतौर से पूरे राजनीतिक परिदृश्य पर दिखाई दे रहा है।
प्रधानमंत्री के भाषण के बाद उन राजनीतिक दलों और नेताओं में बिलबिलाहट है जो इस रास्ते पर चल रहे थे। अब वे सामने आकर कह रहे हैं कि हम दिमागी नक्सल हैं। सबसे पहले पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम आगे आए। उन्होंने कहा कि मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। अब आप बताइए जिसके गृह मंत्री रहते हुए नक्सलियों ने 5000 से ज्यादा लोगों को मारा। जो कह रहा था कि आप हथियार मत छोड़िए फिर भी हम आपसे बातचीत के लिए तैयार हैं। और इस सरकार ने क्या किया? जब तक गोली चलेगी कोई बातचीत नहीं होगी। दो ही रास्ते हैं, या तो सरेंडर करो या मारे जाओ और 31 मार्च को देश से माओवाद का सफाया हो गया। यह होती है राजनीतिक इच्छाशक्ति। दिमागी नक्सल का तीर चलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि शत्रु बोध उनके अंदर है। हालांकि पहले भी था लेकिन वह सार्वजनिक रूप से इसको स्वीकार नहीं करते थे। शायद उनके मन में दुविधा थी कि यह पॉलिटिकली करेक्ट होगा कि नहीं। इसका राजनीतिक नुकसान तो नहीं हो जाएगा। पहली बार उन्होंने देश विरोधी और संस्कृति विरोधी तत्वों की नाभि पर उसी तरह हमला किया जैसे भगवान राम ने रावण की नाभि पर किया था। मोदी 2014 में जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे तब उनके पास नैरेटिव था। उनके विरोधी उसको फॉलो कर रहे थे। 2019 में भी यही था। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पहली बार बीजेपी के हाथ में नैरेटिव नहीं था। नैरेटिव उनके विरोधियों के हाथ में चला गया। 400 पार के नारे के कारण संविधान बदल देंगे,आरक्षण खत्म कर देंगे का जो नैरेटिव चला, उसका जवाब भाजपा नहीं दे पाई। इसका उसे खासा नुकसान हुआ। 303 लोकसभा सीटों वाली पार्टी 240 पर आ गई।
प्रधानमंत्री ने अर्बन नक्सल का मुद्दा उस समय उठाया है जब देश एक तरह से कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़ा है। भारत के विरोधी अलग-अलग तरीकों,अलग-अलग जगहों और अलग-अलग माध्यमों से लगातार भारत पर हमला कर रहे हैं। भारत को कमजोर करने की लगातार कोशिश हो रही है। यह वैसा ही समय है जब महाभारत में अर्जुन दुविधा में थे कि गांडीव उठाएं या नहीं उठाएं। सामने तो अपने लोग हैं। तब भगवान कृष्ण ने उनसे कहा था कि युद्ध के मैदान में जो धर्म के साथ नहीं है, उसके विरुद्ध युद्ध लड़ने में कोई हर्ज नहीं है। तो इस समय भी देश को धर्म के रास्ते पर चलाने के लिए जरूरी है कि जो अधर्मी हैं उनके खिलाफ खुलकर युद्ध की घोषणा की जाए। इसीलिए प्रधानमंत्री ने दिमागी नक्सल की बात कहकर भेड़ की खाल ओढ़े हुए जो भेड़िए थे, उनकी खाल उतार दी है। अब देश के लोगों को फैसला करना है कि उन्हें देश विरोधियों का साथ देना है या उनके विरोध में खड़े होना है। विदेशी ताकतें इतनी ताकत से भारत के खिलाफ पहले कभी नहीं लगी थीं। आपको इंदिरा गांधी का एक विदेशी पत्रकार को दिया गया इंटरव्यू याद करना चाहिए। उनसे पूछा गया कि आपने मोरारजी देसाई जैसे लोगों को जेल भेज दिया जो बाद में प्रधानमंत्री बने, तो उनका कहना था कि विदेशी शक्तियां भारत को अस्थिर करने पर लगी थीं। अगर हम ऐसा नहीं करते तो भारत में अराजकता फैल जाती। अब उनकी बात से आप सहमत हों या नहीं हों, लेकिन एक बात तो है कि विदेशी शक्तियां कोई आज सक्रिय हुई हैं ऐसा नहीं है। विदेशी शक्तियां तब-तब सक्रिय होती हैं जब-जब भारत में उनको मजबूत नेतृत्व दिखता है। इंदिरा गांधी के मामले में भी था और आज नरेंद्र मोदी के मामले में और ज्यादा है। आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया के बहुत सारे बड़े देशों के लिए चुनौती बन रहा है। वह दुनिया के छोटे, कमजोर और आर्थिक रूप से पिछड़े देशों के लिए आदर्श बन रहा है। ये देश भारत से जुड़ना चाहते हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी ने भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह दुविधा खत्म कर दी कि इन दिमागी नक्सलियों के खिलाफ खुलकर युद्ध लड़ा जाए या चुपचाप बर्दाश्त किया जाए। सरकार ने तय कर लिया है कि अब इनका जवाब देने का समय आ गया है। हमारे पूर्व सीडीएस जनरल विपिन रावत एक बात बार-बार कहते थे कि भारत को भविष्य में ढाई फ्रंट वॉर लड़ना पड़ेगा। पाकिस्तान, चीन और आधा फ्रंट जो घर के अंदर छिपे गद्दार हैं। वह आधा फ्रंट अब फुल फ्रंट बन चुका है। भारत के लोगों को बरगला कर उन्हीं के देश और भारतीय संस्कृति के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश हो रही है। उनको अपने ही देश का दुश्मन बनाने की कोशिश हो रही है। चूंकि अब ये अर्बन नक्सल बिलबिलाकर बिल से बाहर निकल रहे हैं तो इनके खिलाफ कार्रवाई करना सरकार के लिए आसान हो जाएगा। अभी तक ये मुखौटा लगाकर जनतांत्रिक मूल्यों, संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बातें कर रहे थे। तब तक इनके ऊपर हमला करना आसान नहीं था। अब इन्होंने अपना मुखौटा उतार दिया है या कहें कि इनका मुखौटा उतर गया है। अब इनके खिलाफ लड़ाई न लड़ना कमजोरी का लक्षण होगा। इनको बताया जाना चाहिए कि इंडियन स्टेट की पावर क्या होती है? पिछली कुछ सदियों में दुनिया की तमाम सभ्यताएं नष्ट हो गईं। 1000 साल की गुलामी के बाद भी भारत की संस्कृति और सभ्यता अक्षुण्य बनी हुई है। इसकी जो अंतर्निहित ताकत है वही इसे चलाती है। जिनको उसकी इस अंतर्निहित ताकत पर विश्वास है, वे इसके साथ खड़े होते हैं। अगर आप अपनी सभ्यता और संस्कृति की विशेषता और ताकत को समझेंगे तो आपको समझ में आएगा कि षड्यंत्र कितना बड़ा है। ये षड्यंत्र अब खुल गया है। अब खुलकर लड़ाई हो रही है। देश विरोधियों की सेना पहले से ही आक्रमण कर रही है। आज की जो जिओपॉलिटिक्स है,उसका हथियार कोई सेना नहीं है। उसका हथियार टेक्नोलॉजी है। टेक्नोलॉजी के जरिए ये आपके दिमाग और घर में घुसते हैं और वार करते हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में आपने देखा कि किस तरह से उनके झूठ को लगातार ये प्लेटफार्म एंपलीफाई कर रहे थे और जो सच बोलने वाले थे उनकी आवाज को दबाया जा रहा था। भारत विरोधियों को बढ़ावा दिया जा रहा था। अब उनका खेल भी खुल गया है। जिस तरह से मेटा के अधिकारियों को बुलाकर भारत सरकार ने चेतावनी दी और उनको माफी मांगनी पड़ी है, वह उनके लिए सबक होना चाहिए। उनको मालूम नहीं है कि उनके जितने सोशल मीडिया के प्लेटफार्म हैं, वे भारत के युवाओं की शक्ति और पैसे से चल रहे हैं। उनका सौभाग्य इतना है कि भारत में डेमोक्रेसी है। चीन की तरह ऑटोक्रेसी नहीं है। चीन ने तो इन सोशल मीडिया कंपनियों को अपने देश से बाहर निकाल दिया है। ये कंपनियां भारत में डेमोक्रेसी का नाजायज फायदा उठा रही हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं चलने वाला। उसका कारण यह है कि इस सरकार में जो लोग शीर्ष पर बैठे हैं, उनके अंदर का शत्रु बोध सार्वजनिक रूप से प्रकट हो चुका है। सारी दुविधा खत्म हो गई है।
लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का दिमागी नक्सल पर हमला करना कोई सामान्य बात नहीं है। करीब ढाई साल बाद नैरेटिव भाजपा के हाथ में आया है और आप देखिए विपक्ष पर कैसा रिएक्शन हुआ है। किस तरह के बयान आ रहे हैं। 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में जिस तरह से वंदे मातरम को रुकवाने को कोशिश हुई, वह दिमागी नक्सल का सबसे बड़ा उदाहरण है। इससे आप समझ लीजिए कि ये देश की संस्कृति के विरोध में कहां तक जा सकते हैं? लेकिन अब सरकार ने भी तय कर लिया है कि ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाएगा। अब इन दिमागी नक्सलियों को भागने के लिए जगह तलाशनी होगी। याद रखिए किसी भी व्यवस्था में, चाहे वह डेमोक्रेटिक हो या अधिनायकवादी, स्टेट पावर के सामने देश विरोधी शक्तियां ज्यादा समय तक टिक नहीं सकती हैं। 15 अगस्त से बाजी पलटने की शुरुआत हो चुकी है। देश को अगर सुरक्षित रखना है और खुशहाल बनाना है तो दिमागी नक्सलियों का सफाया जरूरी है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









