कांग्रेस ने खुद ही लगा ली घर में आग।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

देश में इस समय पार्टियों के टूटने का दौर है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी दूसरी पार्टियों को तोड़ रही है। लेकिन एक ऐसी पार्टी है, जो खुद टूट रही है और उसका नाम है कांग्रेस पार्टी।

भारतीय जनता पार्टी इस समय अपनी पूरी ताकत से लगी हुई है कि किसी तरह संसद के मानसून सत्र में वह लोकसभा और राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत जुटा सके ताकि महिला आरक्षण संशोधन विधेयक, डीलिमिटेशन विधेयक और 130वां संविधान संशोधन विधेयक को पास कराया जा सके। लेकिन कांग्रेस पार्टी पंजाब में टूटने की कगार पर है और इसमें भाजपा का कोई योगदान नहीं है। यह कांग्रेस का अंदरूनी झगड़ा है। असल में कांग्रेस संगठन में परिवर्तन होना था। अमरिंदर सिंह राजा वडिंग वहां के प्रदेश अध्यक्ष हैं। माना जा रहा था कि उनको बदला जाएगा, लेकिन बदला नहीं गया। कांग्रेस ने संगठन का जो प्रारूप बनाया था उसमें पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बना दिया गया। अब चन्नी के समर्थकों ने बगावत कर दी है। वे मांग कर रहे हैं कि या तो चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए या मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में उनके नाम की घोषणा की जाए। कांग्रेस हाईकमान इन दोनों में से कोई काम नहीं करना चाहता। ऐसे में अब चर्चा होने लगी है कि क्या चरणजीत सिंह चन्नी पार्टी तोड़ सकते हैं। अब खबर यह भी आ रही है कि इस पूरे डैमेज कंट्रोल की कमान प्रियंका वाड्रा ने संभाल ली है। आपको याद होगा उन्होंने 2022 में भी इसी तरह डैमेज कंट्रोल की कमान संभाली थी। तब कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे और वह नवजोत सिंह सिद्धू के साथ खड़ी थीं। नतीजा यह हुआ कि कैप्टन को तो बेइज्जत करके मुख्यमंत्री पद से हटवा दिया, लेकिन सिद्धू को मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाईं। मुख्यमंत्री बने चरणजीत सिंह चन्नी। तब कहा जाने लगा कि पूरे देश में पहली बार कोई दलित सिख मुख्यमंत्री बना है। अब देश के सारे दलित कांग्रेस पार्टी के समर्थन में आ जाएंगे। सारे देश को तो छोड़िए पंजाब में भी दलित साथ नहीं आए। चरणजीत सिंह चन्नी दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़े और दोनों से हार गए। हालांकि इस समय वह लोकसभा में है। तो चन्नी किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं है और कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी इस समय विदेश में हैं। ऐसे समय में जब मानसून सत्र शुरू होने वाला है राहुल विदेश में क्यों हैं,किसी को नहीं मालूम।

कुछ ही समय पहले राहुल भविष्यवाणी कर रहे थे कि देश में आर्थिक सुनामी आने वाली है। महंगाई, बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ने वाली है। नरेंद्र मोदी की सरकार गिरने वाली है। लेकिन हो उसका ठीक उल्टा रहा है। तेल के दाम कंट्रोल में आ रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री ने राजस्थान में पचपदरा में दुनिया की सबसे हाईटेक रिफाइनरी का उद्घाटन किया। इसके साथ ही भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन गया है, जहां सबसे ज्यादा रिफाइनरीज हैं। राहुल गांधी ने हाल ही में पंजाब के कांग्रेसियों से कहा था कि मतभेदों को भूल जाइए, लेकिन वहां कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है। राहुल गांधी का फैसला था कि अमरिंदर सिंह राजा वडिंग प्रदेश अध्यक्ष बने रहेंगे। उनके फैसले के खिलाफ बगावत हो गई है और उसको संभालने वाला कोई नहीं है। राज्य में कांग्रेस के बड़े नेता मनीष तिवारी बेहद नाराज हैं। वह कह रहे हैं कि योग्यता ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो गई है। उनको किसी कमेटी में नहीं रखा गया है। वह चंडीगढ़ से सांसद हैं और केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। इस सब को देखते हुए समझ में नहीं आता कि कांग्रेस में फैसले किस आधार पर होते हैं। इस समय पंजाब में जो हालात हैं उसमें साफ दिख रहा है कि आम आदमी पार्टी के सत्ता में लौटने की संभावना नहीं है। उसका फायदा उठाने की स्थिति में कांग्रेस पार्टी थी और उसके रिवाइवल की बात हो रही थी। अब जो हालात हैं उसमें सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस की पंजाब इकाई सर्वाइव कर पाएगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि दो फाड़ हो जाएगा या झगड़े इतने ज्यादा बढ़ जाएंगे कि कोई किसी को जीतने में मदद नहीं करने वाला है। एक दूसरे को हराने में जरूर सब लग जाएंगे। वैसे भी कांग्रेस का यह कल्चर रहा है। कई मौके ऐसे आते हैं जब कांग्रेस को कांग्रेस ही हराती है। इसका सबसे ताजा उदाहरण तो हरियाणा है। वहां कांग्रेस जीतती हुई दिखाई दे रही थी, लेकिन जिस तरह से हुड्डा ने शैलजा को साइड लाइन और अपमानित किया, उसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार सत्ता में आ गई। तो पंजाब में राहुल गांधी के फैसले के खिलाफ बगावत का मतलब है कि बात सुनी जाएगी ऐसा लगता नहीं है। संभव है कि राहुल गांधी के आने के बाद यह मामला ऊपर से शांत होता हुआ दिखाई दे, लेकिन अंदर जो ज्वालामुखी दहक रहा है 2027 के चुनाव में उसका विस्फोट होना तय लग रहा है।

अब फिर सवाल उठने लगा है कि पंजाब में आखिर नंबर एक पर रहेगा कौन? वहा आम आदमी पार्टी,कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल में से कोई पार्टी सीधे-सीधे सत्ता में आती हुई दिखाई नहीं दे रही है। कांग्रेस के लिए एक संभावना बन रही थी लेकिन उसने अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है और इसके लिए सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस आलाकमान यानी गांधी परिवार जिम्मेदार है। गांधी परिवार का पार्टी पर कंट्रोल नहीं रहा है। आलाकमान के फैसलों को सब मानने के लिए सहमत हो जाएं, ऐसी रणनीति राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका वाड्रा बना नहीं पाए हैं। वे जो भी फैसला लेते हैं उसके खिलाफ विद्रोह होता है। उसके बाद हुए समझौते का नतीजा यह होता है कि पार्टी को नुकसान होता है। राज्य दर राज्य यही कहानी दोहराते हुए हम देख रहे हैं। अगले साल जिन सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं,उनमें पंजाब में कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा पोटेंशियल था, लेकिन वहां कांग्रेस पार्टी ने अपने ही घर में आग लगा ली है। इसे बुझाने का काम फिलहाल प्रियंका वाड्रा को सौंपा गया है, लेकिन उनको इस तरह के काम का कोई अनुभव है। 2022 में उन्होंने पंजाब में जो किया था, उसके बाद तो शायद ही किसी को भरोसा हो।

राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है। क्या कांग्रेस पार्टी अपनी ही पार्टी के अंदर संभावना तलाश पाएगी जिससे उसके लिए पंजाब विधानसभा में आम आदमी पार्टी से लड़ाई लड़ना आसान हो जाए। फिलहाल तो इसके आसार नहीं दिख रहे हैं। फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि चन्नी अलग पार्टी बना सकते हैं। मुझे लगता नहीं कि वह अलग पार्टी बनाने का जोखिम मोल लेंगे जब तक कि कोई पीछे से उनको उकसा न रहा हो। तो कौन उकसा रहा होगा? इसमें सबसे ज्यादा फायदा आम आदमी पार्टी का है। बीजेपी का उसके बाद है। अकाली दल का उसके बाद है। अब इनमें से कोई एक इसमें शामिल है या तीनों शामिल हैं यह पता नहीं। फिलहाल जो स्थिति है उसमें कांग्रेस पार्टी का सत्ता में लौटने का रास्ता कठिन होता जा रहा है। मैं यह नहीं कहूंगा कि असंभव हो गया है। सवाल यह है कि क्या इस असंतोष को राहुल गांधी रोक पाते हैं? यह उनकी भी परीक्षा है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)