प्रदीप सिंह।भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी खेमे में आजकल एक बात की बड़ी चर्चा हो रही है कि पार्टी में बाहरी लोगों की भरमार हो रही है। कोई बता रहा है कि 50% बाहरी हैं तो कोई 70% बता रहा है। ऐसे लोगों का कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों पर बाहरियों को वरीयता दी जा रही है।
अगर आप देखें तो पार्टी का विस्तार 2014 से 2026 तक इन 12 सालों में जितना हुआ है, 1951 से 2014 के बीच में उतना नहीं हुआ। मुझे दिख रहा है कि भाजपा इस समय कॉर्पोरेट कल्चर के हिसाब से काम कर रही है। इसमें तीन स्टेप होते हैं- एक्विजिशन, मर्जर और उसके बाद टेकओवर। पहले दो स्टेप तो भाजपा ने पार कर लिए हैं या कहें कि वहां पहुंच गई है। कॉर्पोरेट जगत में टेकओवर कई बार होस्टाइल टेकओवर भी होता है यानी जो कंपनी अपने को बेचना नहीं चाहती या नहीं चाहती कि दूसरी कंपनी के साथ उसका संबंध हो, उसको बाजार में आक्रामक तरीके से खरीदने की कोशिश होती है। दुनिया भर में कॉर्पोरेट्स में आपको यह कल्चर देखने को मिलेगा। भाजपा उसी रास्ते पर चल रही है। इस समय राज्यसभा में भाजपा का पूर्ण बहुमत हो चुका है और एनडीए दो तिहाई बहुमत के करीब पहुंच गया है। लोकसभा में भाजपा की केवल 240 सीटें हैं, लेकिन वहां भी एनडीए की संख्या या समर्थक सांसदों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
अब चर्चा इस बात की कि क्या भाजपा का बाहरीकरण हो रहा है या कॉरपोरेटाइजेशन हो रहा है। कॉर्पोरेट जगत की बात करें तो एक्विजिशन या मर्जर कंपनी को बढ़ाने के लिए होता है। राजनीति में मेरा मानना है कि यह नया प्रयोग है। उसका कारण है कि कांग्रेस पार्टी आजादी के पहले से ही वर्चस्व वाली पार्टी थी। आजादी के बाद भी सबसे बड़ी पार्टी रही। उसको इस तरह के एक्विजिशन या मर्जर की जरूरत नहीं पड़ी। फिर भी उसने छोटे पैमाने पर किया क्योंकि उसकी पैन इंडिया पहुंच थी। भाजपा को वहां पहुंचना है। तो उसके दो तरीके हैं। पहला तरीका है ऑर्गेनिक तरीका कि आप कार्यकर्ता एवं संगठन तैयार करें और धीरे-धीरे बढ़ते रहें। दूसरा तरीका होता है इनऑर्गेनिक। इसमें एक्विजिशन और मर्जर आता है। टेकओवर आखिरी स्टेज है। भाजपा अभी वहां नहीं पहुंची है। तो एक्विजिशन और मर्जर पार्टियों में लगातार चलता रहता है। चूंकि भाजपा इस समय देश की सबसे बड़ी पार्टी हो गई है इसलिए वह जो भी करती है, वह ज्यादा दिखाई देता है। खासतौर से 2014 के बाद जो हो रहा है, वह बहुत ज्यादा दिखाई देता है लेकिन जो लोग आज इसकी शिकायत करते हैं उनका ध्यान कुछ तथ्यों की ओर दिलाना चाहता हूं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई। जबकि भारतीय जनसंघ की स्थापना इसके 26 साल बाद 21 अक्टूबर 1951 को हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जब अपना राजनीतिक दल बना रहा था तो उसके संस्थापक अध्यक्ष के लिए उसने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को चुना जो स्वयंसेवक नहीं थे। यानी 26 साल में संघ ऐसा कोई व्यक्ति नहीं तैयार कर पाया जो उसके राजनीतिक दल का संस्थापक अध्यक्ष बने। उसके बाद पहली बार 1977 में तीन राज्यों में राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी। चूंकि जनता पार्टी में
जनसंघ का विलय हुआ था और यह राज्य उसके कोटे में आए थे तो एक तरह से मुख्यमंत्री जनसंघ के ही थे। इनमें राजस्थान के मुख्यमंत्री बनाए गए भैरों सिंह शेखावत कभी स्वयंसेवक नहीं रहे। उसके बाद राजस्थान में भाजपा की दूसरी मुख्यमंत्री बनीं वसुंधरा राजे सिंधिया। वह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी हुई नहीं थीं। यह अलग बात है कि उनकी मां राजमाता विजय राजे सिंधिया जनसंघ से जुड़ी हुई थीं। उसके बाद अटल जी की सरकार के समय तीन नए राज्य झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ बने। छत्तीसगढ़ में पहला मुख्यमंत्री कांग्रेस का बना। उसके बाद रमन सिंह बने, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से थे। लेकिन उत्तराखंड में मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को बनाया गया जो बाहर से आए हुए थे और उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई नाता नहीं था। झारखंड में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बनाए गए बाबूलाल मरांडी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से थे, लेकिन उसके बाद दो और मुख्यमंत्री भाजपा के बने। पहले अर्जुन मुंडा और उसके बाद रघुवर दास। अर्जुन मुंडा झारखंड मुक्ति मोर्चा से आए थे। उनका न तो जनसंघ और न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई लेना देना था। जबकि रघुवर दास ट्रेड यूनियन से भारतीय जनता पार्टी में आए थे। उनका भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था। इसी तरह मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनीं उमा भारती हिंदुत्व का चेहरा जरूर थीं, लेकिन वह औपचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी हुई नहीं थीं। अटल जी जब प्रधानमंत्री थे तो उनकी सरकार दो खंडों में मिलाकर कुल छह साल चली। केंद्रीय सरकार में जो सबसे महत्वपूर्ण कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी होती है उसमें दो लोग यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह ऐसे थे,जो स्वयंसेवक नहीं थे। यशवंत सिन्हा तो वित्त मंत्री के रूप में इसमें शामिल रहे। वह पूरे छह साल इस कमेटी में रहे। 1992 में जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा था तब यशवंत सिन्हा चंद्रशेखर जी की पार्टी में थे और राज्यसभा के सदस्य थे। तब उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा तीनों के खिलाफ जो कुछ जहर उगल सकते थे, सब किया था। लेकिन भाजपा ने उन्हीं यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया। तब किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया। 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई तो उसके पहले राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष शांति भूषण बने। वह जनता पार्टी से आए थे और मशहूर वकील थे। उनका भी आरएसएस से कभी कोई लेना देना नहीं रहा।
ये बातें मैं उस समय की बता रहा हूं जब भाजपा संगठन और सरकार हर दृष्टि से बहुत छोटी थी। तब भी उसे एक्विजिशन की जरूरत पड़ रही थी। तब भी वह मर्जर की कोशिश कर रही थी। कई राज्यों में छोटे-छोटे दलों का मर्जर हुआ भी। तब वह टेकओवर की स्थिति में नहीं थी। लेकिन मौजूदा दौर की भाजपा बेहद मजबूत है। आप देखते रहिए उसका अगला कदम छोटे दलों के टेकओवर का होगा। ये जो एक, दो और तीन सांसदों वाली पार्टियां हैं, उनको अंततः भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना पड़ेगा। भाजपा को अगर 2024 में 300 से ज्यादा सीटें मिल गई होती तो शायद यह सिलसिला शुरू भी हो गया होता लेकिन फिलहाल मुझे लगता है कि यह कार्यक्रम टल गया है। इसलिए यह कहना कि स्वयंसेवकों की उपेक्षा हो रही है, मुझे लगता है कि यह वास्तविकता को स्वीकार करने से मना करने जैसा है। चुनाव इस बात में है कि पार्टी को ऑर्गेनिक तरीके से बढ़ाना है या इनऑर्गेनिक तरीकों का भी इस्तेमाल करना है। ऑर्गेनिक तरीके से बढ़ाना है तो आपको कई दशक इंतजार करना पड़ेगा। इनऑर्गेनिक तरीके से यह काम जल्दी होगा। इसीलिए जो लोग बाहर से आए हैं अगर वे पार्टी की विचारधारा के प्रति अनुकूलता दिखाते हैं तो उनको लेने में पार्टी कोई संकोच नहीं कर रही है। आप बताइए कि इतने राज्यों में भाजपा की सरकार पहले कब थी? लगातार तीन बार केंद्र में भाजपा ने सरकार इससे पहले कब बनाई थी? तब उसे बाहरियों को लेने की जरूरत ही नहीं थी। आज भी अगर भाजपा की सरकार दो या तीन राज्यों में होती तो शायद ये जो बाहर से आए लोग मुख्यमंत्री बने हैं,ये न होते। लेकिन आज तीन मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, हिमंत बिस्वासरमा और सम्राट चौधरी बाहरी हैं। अगर पंजाब में भाजपा की सरकार बनी तो इस बात की संभावना बहुत ज्यादा है कि कोई गैर भाजपाई या कम से कम गैर संघी ही मुख्यमंत्री बनेगा। जब पार्टी का विस्तार हो रहा है उस समय ऐसे सवाल उठाना दरअसल यह कुछ लोगों का फ्रस्ट्रेशन है, जिन्हें लग रहा है कि पार्टी की शुद्धता में कमी आ रही है। 24 कैरेट सोने के गहने नहीं बनते। गहना बनाने के लिए उसमें कुछ मिलावट करनी ही पड़ती है। राजनीतिक दलों और संगठनों के साथ भी ऐसा होता है। अगर विस्तार करना है तो पारिवारिक दायरे से बाहर जाकर जो लोग आपके साथ चलने को तैयार हों, उन्हें लेना ही पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
अब चर्चा इस बात की कि क्या भाजपा का बाहरीकरण हो रहा है या कॉरपोरेटाइजेशन हो रहा है। कॉर्पोरेट जगत की बात करें तो एक्विजिशन या मर्जर कंपनी को बढ़ाने के लिए होता है। राजनीति में मेरा मानना है कि यह नया प्रयोग है। उसका कारण है कि कांग्रेस पार्टी आजादी के पहले से ही वर्चस्व वाली पार्टी थी। आजादी के बाद भी सबसे बड़ी पार्टी रही। उसको इस तरह के एक्विजिशन या मर्जर की जरूरत नहीं पड़ी। फिर भी उसने छोटे पैमाने पर किया क्योंकि उसकी पैन इंडिया पहुंच थी। भाजपा को वहां पहुंचना है। तो उसके दो तरीके हैं। पहला तरीका है ऑर्गेनिक तरीका कि आप कार्यकर्ता एवं संगठन तैयार करें और धीरे-धीरे बढ़ते रहें। दूसरा तरीका होता है इनऑर्गेनिक। इसमें एक्विजिशन और मर्जर आता है। टेकओवर आखिरी स्टेज है। भाजपा अभी वहां नहीं पहुंची है। तो एक्विजिशन और मर्जर पार्टियों में लगातार चलता रहता है। चूंकि भाजपा इस समय देश की सबसे बड़ी पार्टी हो गई है इसलिए वह जो भी करती है, वह ज्यादा दिखाई देता है। खासतौर से 2014 के बाद जो हो रहा है, वह बहुत ज्यादा दिखाई देता है लेकिन जो लोग आज इसकी शिकायत करते हैं उनका ध्यान कुछ तथ्यों की ओर दिलाना चाहता हूं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई। जबकि भारतीय जनसंघ की स्थापना इसके 26 साल बाद 21 अक्टूबर 1951 को हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जब अपना राजनीतिक दल बना रहा था तो उसके संस्थापक अध्यक्ष के लिए उसने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को चुना जो स्वयंसेवक नहीं थे। यानी 26 साल में संघ ऐसा कोई व्यक्ति नहीं तैयार कर पाया जो उसके राजनीतिक दल का संस्थापक अध्यक्ष बने। उसके बाद पहली बार 1977 में तीन राज्यों में राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी। चूंकि जनता पार्टी में
जनसंघ का विलय हुआ था और यह राज्य उसके कोटे में आए थे तो एक तरह से मुख्यमंत्री जनसंघ के ही थे। इनमें राजस्थान के मुख्यमंत्री बनाए गए भैरों सिंह शेखावत कभी स्वयंसेवक नहीं रहे। उसके बाद राजस्थान में भाजपा की दूसरी मुख्यमंत्री बनीं वसुंधरा राजे सिंधिया। वह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी हुई नहीं थीं। यह अलग बात है कि उनकी मां राजमाता विजय राजे सिंधिया जनसंघ से जुड़ी हुई थीं। उसके बाद अटल जी की सरकार के समय तीन नए राज्य झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ बने। छत्तीसगढ़ में पहला मुख्यमंत्री कांग्रेस का बना। उसके बाद रमन सिंह बने, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से थे। लेकिन उत्तराखंड में मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को बनाया गया जो बाहर से आए हुए थे और उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई नाता नहीं था। झारखंड में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बनाए गए बाबूलाल मरांडी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से थे, लेकिन उसके बाद दो और मुख्यमंत्री भाजपा के बने। पहले अर्जुन मुंडा और उसके बाद रघुवर दास। अर्जुन मुंडा झारखंड मुक्ति मोर्चा से आए थे। उनका न तो जनसंघ और न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई लेना देना था। जबकि रघुवर दास ट्रेड यूनियन से भारतीय जनता पार्टी में आए थे। उनका भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था। इसी तरह मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनीं उमा भारती हिंदुत्व का चेहरा जरूर थीं, लेकिन वह औपचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी हुई नहीं थीं। अटल जी जब प्रधानमंत्री थे तो उनकी सरकार दो खंडों में मिलाकर कुल छह साल चली। केंद्रीय सरकार में जो सबसे महत्वपूर्ण कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी होती है उसमें दो लोग यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह ऐसे थे,जो स्वयंसेवक नहीं थे। यशवंत सिन्हा तो वित्त मंत्री के रूप में इसमें शामिल रहे। वह पूरे छह साल इस कमेटी में रहे। 1992 में जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा था तब यशवंत सिन्हा चंद्रशेखर जी की पार्टी में थे और राज्यसभा के सदस्य थे। तब उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा तीनों के खिलाफ जो कुछ जहर उगल सकते थे, सब किया था। लेकिन भाजपा ने उन्हीं यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया। तब किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया। 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई तो उसके पहले राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष शांति भूषण बने। वह जनता पार्टी से आए थे और मशहूर वकील थे। उनका भी आरएसएस से कभी कोई लेना देना नहीं रहा।
ये बातें मैं उस समय की बता रहा हूं जब भाजपा संगठन और सरकार हर दृष्टि से बहुत छोटी थी। तब भी उसे एक्विजिशन की जरूरत पड़ रही थी। तब भी वह मर्जर की कोशिश कर रही थी। कई राज्यों में छोटे-छोटे दलों का मर्जर हुआ भी। तब वह टेकओवर की स्थिति में नहीं थी। लेकिन मौजूदा दौर की भाजपा बेहद मजबूत है। आप देखते रहिए उसका अगला कदम छोटे दलों के टेकओवर का होगा। ये जो एक, दो और तीन सांसदों वाली पार्टियां हैं, उनको अंततः भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना पड़ेगा। भाजपा को अगर 2024 में 300 से ज्यादा सीटें मिल गई होती तो शायद यह सिलसिला शुरू भी हो गया होता लेकिन फिलहाल मुझे लगता है कि यह कार्यक्रम टल गया है। इसलिए यह कहना कि स्वयंसेवकों की उपेक्षा हो रही है, मुझे लगता है कि यह वास्तविकता को स्वीकार करने से मना करने जैसा है। चुनाव इस बात में है कि पार्टी को ऑर्गेनिक तरीके से बढ़ाना है या इनऑर्गेनिक तरीकों का भी इस्तेमाल करना है। ऑर्गेनिक तरीके से बढ़ाना है तो आपको कई दशक इंतजार करना पड़ेगा। इनऑर्गेनिक तरीके से यह काम जल्दी होगा। इसीलिए जो लोग बाहर से आए हैं अगर वे पार्टी की विचारधारा के प्रति अनुकूलता दिखाते हैं तो उनको लेने में पार्टी कोई संकोच नहीं कर रही है। आप बताइए कि इतने राज्यों में भाजपा की सरकार पहले कब थी? लगातार तीन बार केंद्र में भाजपा ने सरकार इससे पहले कब बनाई थी? तब उसे बाहरियों को लेने की जरूरत ही नहीं थी। आज भी अगर भाजपा की सरकार दो या तीन राज्यों में होती तो शायद ये जो बाहर से आए लोग मुख्यमंत्री बने हैं,ये न होते। लेकिन आज तीन मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, हिमंत बिस्वासरमा और सम्राट चौधरी बाहरी हैं। अगर पंजाब में भाजपा की सरकार बनी तो इस बात की संभावना बहुत ज्यादा है कि कोई गैर भाजपाई या कम से कम गैर संघी ही मुख्यमंत्री बनेगा। जब पार्टी का विस्तार हो रहा है उस समय ऐसे सवाल उठाना दरअसल यह कुछ लोगों का फ्रस्ट्रेशन है, जिन्हें लग रहा है कि पार्टी की शुद्धता में कमी आ रही है। 24 कैरेट सोने के गहने नहीं बनते। गहना बनाने के लिए उसमें कुछ मिलावट करनी ही पड़ती है। राजनीतिक दलों और संगठनों के साथ भी ऐसा होता है। अगर विस्तार करना है तो पारिवारिक दायरे से बाहर जाकर जो लोग आपके साथ चलने को तैयार हों, उन्हें लेना ही पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











