#pradepsinghप्रदीप सिंह।
किसी के घर में जश्न की तैयारी हो रही हो और उसके पड़ोसी के यहां मातम छाया हो, ऐसा दृश्य बिरले ही देखने को मिलता है। राजनीति में तो खास तौर से ऐसा नहीं होता। कोई दल,कोई नेता आखिरी क्षण तक हार नहीं मानता। चाहे जितने चुनाव हार जाएं, जितने मार्जिन से हार जाएं, लेकिन उन्हें जब तक उम्मीद बनी रहती है कि हम लड़ सकते हैं और जीत सकते हैं तब तक सब ठीक चलता है। इस समय देश में जो राजनीतिक माहौल है उसमें भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए,जिसकी केंद्र में सरकार है, संसद के मानसून सत्र के लिए युद्धस्तर पर तैयारी कर रहा है। वह किसी भी कीमत पर नारी वंदन संशोधन विधेयक और डीलिमिटेशन विधेयक को पास कराना चाहता है। हालांकि उसके पास न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत है। दूसरी ओर विपक्ष फिर से इन विधेयकों का विरोध करने को तैयार है, लेकिन 17 अप्रैल को विपक्ष की जो लामबंदी थी और इस समय जो है, उसमें जमीन आसमान का अंतर आ चुका है। तो चुनौती भाजपा के सामने है कि कैसे दो तिहाई बहुमत दोनों सदनों में जुटाया जाए,लेकिन मायूसी और मातम विपक्षी खेमे में छाया हुआ है।
सोनिया गांधी के घर पर गुरुवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की एक बड़ी बैठक हुई। क्या स्ट्रेटजी बनी यह तो पता नहीं, लेकिन कांग्रेस के सामने इस बार मुश्किल दूसरी है। लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी की अकेले 240 सीटें हैं जबकि विपक्ष के पास 234 सीटें हैं। विपक्ष के पास इतने सांसद हैं कि भाजपा को दो तिहाई बहुमत जुटाने से आसानी से रोक दे। ऐसे में विपक्ष को खुश होना चाहिए कि हम इन बिलों को फिर से गिरा देंगे जबकि भाजपा में चिंता होनी चाहिए कि एक बार जो विधेयक गिर चुका है कहीं दूसरी बार भी ऐसा न होने पाए। इसलिए सरकार इस बार हर तरह का प्रबंध कर रही है। संसदीय जनतंत्र में अगर आपको संख्या जुटानी है तो करना यह होता है कि आपकी जो संख्या है उसमें कोई फूट न पड़ने पाए। दूसरा विपक्षी खेमे से आप कितने लोगों को अपनी तरफ ला सकते हैं। इसमें तीन तरह की कैटेगरी होती है। एक कि विपक्षी सदस्य आपके गठबंधन में शामिल हो जाए, दूसरा कि आपको बाहर से समर्थन दे दे और तीसरा कि वह मतदान में भाग न लेकर जो टू थर्ड का रिक्वायर्ड नंबर है उसको कम कर दे ताकि सत्तारूढ़ दल को वह संख्या हासिल करने में दिक्कत न हो। भाजपा इन तीनों मोर्चों पर काम कर रही है। ममता बनर्जी की टीएमसी के 20 सांसदों ने नेशनल सिटीजंस पार्टी में विलय कर लिया है। उन्होंने कहा है कि हम एनडीए के साथ हैं। उद्धव ठाकरे की पार्टी के नौ लोकसभा सदस्यों में से छह टूटकर एकनाथ शिंदे के साथ चले गए। यानी एनडीए की ताकत और बढ़ गई। अब चर्चा है कि डीएमके, जिसने 17 अप्रैल को इन बिलों का सबसे पुरजोर विरोध किया था, या तो समर्थन में आएगी या फिर एब्सटेन कर सकती है। डीएमके और भाजपा की बातचीत चल रही है। शरद पवार हमेशा की तरह सौदागर हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह इन विधेयकों का विरोध नहीं करेंगे। तो एकतरफ एनडीए की ताकत लगातार बढ़ रही है,दूसरी तरफ विपक्षी इंडी अलायंस की ताकत घट रही है। लेकिन कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल है। ये संविधान संशोधन विधेयक हैं। इसमें डिवीजन होता है। पक्ष में वोट देना होता है या विरोध में वोट देना होता है या एब्सटेन करना होता है। तो जब डिवीजन होगा और दोनों सदनों में वोट पड़ेगा तो मालूम पड़ेगा कि इस विधेयक के समर्थन में कितने सांसद थे और विरोध में कितने सांसद थे। कुछ पार्टियां जैसे तेलंगाना में बीआरएस, उड़ीसा में बीजू जनता दल और आंध्र प्रदेश में वाईएसआरसीपी विपक्षी इंडी अलायंस का हिस्सा नहीं हैं। ये भाजपा का समर्थन दो स्वरूपों में कर सकती हैं। या तो सीधे मतदान में समर्थन करके या एब्सटेन करके। ऐसे में लोकसभा और राज्यसभा में मतदान का जब नतीजा आएगा तो विपक्ष की असली ताकत का पता चलेगा। यह भी पता चलेगा कि विपक्षी गठबंधन के कितने सदस्य कांग्रेस के साथ खड़े होने को तैयार हैं।
कांग्रेस हर हाल में इन दोनों विधेयकों का विरोध करेगी, ऐसे में अगर उसके सहयोगी दल उसका साथ नहीं देते हैं तो यह कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के नेतृत्व के खिलाफ 2024 के बाद सबसे बड़ा नो कॉन्फिडेंस होगा। कांग्रेस को यह डर बहुत सता रहा है। लेकिन उसके पास विकल्प क्या है? उसे अगर अपनी इज्जत बचानी है तो उसका तरीका यह है कि वह किसी और बात पर विरोध करें और सदन से बहिर्गमन कर जाएं। विधेयक तब भी पास हो जाएगा। अब इतना तो तय हो गया है कि कांग्रेस पार्टी इन विधेयकों को पास होने से रोक नहीं सकती। कांग्रेस पार्टी को नारी वंदन संशोधन विधेयक से डर नहीं है। उनको लगता है कि ठीक है बीजेपी को ज्यादा फायदा होगा, हमको कम होगा। उनको असल डर डीलिमिटेशन से है। क्योंकि वह जानते हैं कि डीलिमिटेशन से क्या बदल सकता है और उसका क्या असर हो सकता है। इससे पहले डीलिमिटेशन 2008 में हुआ था। उसमें सीटों की संख्या नहीं बढ़ी थी। केवल सीटों का भूगोल बदला था। इस बार जो डीलिमिटेशन होगा, उसमें सीटों की संख्या भी बढ़ने जा रही है और भूगोल भी बदलेगा। अभी लोकसभा की 543 सीटें हैं, जो डीलिमिटेशन के बाद 850 हो जाएंगी। केंद्र सरकार बिल में यह लिखकर लाने को तैयार हो गई है कि हर राज्य की लोकसभा सीटों की संख्या में 50 फीसदी की वृद्धि होगी। मतलब किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा। अब इसका विरोध करने का कोई आधार नहीं बचा है। लेकिन कांग्रेस पार्टी भाजपा के लाए किसी प्रस्ताव का समर्थन करें,यह कैसे हो सकता है? वह 17 अप्रैल 2026 को एक बार तो भाजपा का खेल बिगाड़ चुकी है, जब विपक्षी दलों की एकजुटता ने इन विधेयकों को गिरा दिया था। अब उसी विपक्षी एकता में भाजपा ने फूट पैदा कर दी है। विपक्षी पार्टियां टूट और बिखर रही हैं और इसमें फायदा सिर्फ और सिर्फ एनडीए को हो रहा है जबकि नुकसान सिर्फ और सिर्फ इंडी अलायंस या कहें कांग्रेस को हो रहा है।
कांग्रेस की चिंता यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उसका जो उत्साह बढ़ा था,उसे लग रहा था कि बस अब हमारी सत्ता आने ही वाली है, अब जो परिस्थिति बन रही हैं उसमें कांग्रेस के लोगों को लगने लगा है कि निकट भविष्य में वे सत्ता में आने वाले नहीं हैं। अभी बीजेपी की सिर्फ 240 सीटें हैं। लोकसभा में उसके पास अकेले दम पर पूर्ण बहुमत नहीं है, तब भी वह ऐसे व्यवहार कर रही है जैसे 400 पार सीट का उसका जो नारा था,वह पूरा हो गया हो। एनडीए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो तिहाई बहुमत की ओर बढ़ता दिख रहा है और कांग्रेस चाहकर भी इसे रोक नहीं पा रही है। तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस को धीरे-धीरे यह अहसास हो गया है कि वह सदन में इस बार बीजेपी को हरा नहीं सकती। मेरा मानना है कि भाजपा दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत जुटाने में कामयाब हो चुकी है। अगर उसे जरा भी शंका होगी कि दो तिहाई सांसदों का समर्थन नहीं मिलेगा तो यह विधेयक मानसून सत्र में नहीं आएगा। फिर भाजपा शीतकालीन सत्र का इंतजार करेगी।
सवाल यह है कि अगर ये विधेयक पास हो गए तो उसके बाद कांग्रेस क्या करेगी? 2027 में सात राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। वहां मतदाता के सामने वह क्या बोलेगी? क्या यह बोलेगी कि हमने पूरी कोशिश की कि आपके राज्य की लोकसभा सीटें न बढ़ने पाएं। या यह बोलेगी कि हमने पूरी कोशिश की कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण न मिलने पाए। कांग्रेस पार्टी और उसके जो बचे-खुचे साथी दल हैं,उनके लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई है। विरोध करेंगे तो मुश्किल है। और कम से कम कांग्रेस पार्टी तो समर्थन कर नहीं सकती। यह तय हो चुका है कि नुकसान कांग्रेस का ही होना है। सिर्फ यह तय होना बाकी है कि इसी मानसून सत्र में हो जाएगा या शीतकालीन सत्र में होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)