अमेरिका को पहले से पता था-दिल्ली में कहां-कहां हिंसा होगी  ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
दिल्ली में जो तमाशा चल रहा है उसके पीछे विदेशी हाथ ही नहीं,उसका पूरा चेहरा सामने आ गया है। भारत में अमेरिकी दूतावास को एक हफ्ते पहले से इस बारे में पता था और उसने अपने डिप्लोमेट्स और नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी कर दी थी कि कहां-कहां और कब खतरा हो सकता है। उसने सारे वह स्पॉट बताए हैं,जहां कॉकरोच जनता पार्टी ने हिंसा की। सवाल है कि हमारा इंटेलिजेंस क्या कर रहा था? खालिस्तानी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने गुरुवार को एक्स पर एक बयान जारी किया है,जिसमें उसने कहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी को 9 करोड़ 60 लाख रुपये भेज रहा हूं। साथ ही उसने कहा कि इस समस्या का एक ही हल है-भारत के छोटे-छोटे टुकड़े कर दो।
इस आंदोलन में शामिल लोग नारा लगा रहे हैं कि भारत को नेपाल और बांग्लादेश बनाना है। इन मूर्खों से कोई पूछे कि नेपाल और बांग्लादेश में जो हुआ उससे उस देश को हासिल क्या हुआ? देश के युवकों को क्या मिला? उसके बाद कौन सी सरकार आई? उसने देश के भले के लिए क्या किया? आपने सरकारी संपत्ति जला दी,जो आपही के पैसे से बनी हुई थी। अभिजीत दिपके का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह भीड़ को इशारा कर रहा है। इसके बाद भीड़ आरएफ के एक जवान को घेर लेती है और उसे मार-मार कर अधमरा कर दिया जाता है। इस तरह की एक नहीं कई घटनाएं हुई हैं। ऐसे हमलों के बाद पुलिस वालों के पास गोली चलाने का पर्याप्त कारण था। फिर भी उसने संयम बरता। जानते हैं अभिजीत दिपके के आदर्श कौन हैं? दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड उमर खालिद और चिकन नेक को काटने की धमकी देने वाला शरजील इमाम। ये हमेशा से टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थक रहा है। कांग्रेस के शासन में रामलीला मैदान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे बाबा रामदेव और अन्य लोगों पर आधी रात को लाठीचार्ज किया गया था। जिसमें एक महिला शैलबाला की मौत हो गई थी जब 71 लोग अस्पताल ले जाए गए थे। इसी तरह 7 नवंबर 1966 को संसद भवन के सामने संतों पर गोली चलाई गई थी। 20 जुलाई को जिस तरह से संसद में घुसने की कोशिश हुई, उस समय अगर पुलिस गोली चलाती तो वह भी पूरी तरह से जस्टिफाइड होता। उसके बाद राहुल गांधी ने अराजकता की। वह प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। कायदे से तो इस मामले में राहुल गांधी की गिरफ्तारी होनी चाहिए थी। उन्होंने प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरे में डाला। यह गंभीर अपराध है।

कहते हैं कि मौसम देखकर मेंढ़की को भी जुकाम हो जाता है। एक अभिनेता हैं सलमान खान। ऐसा कोई कुकर्म नहीं है, जो उन्होंने नहीं किया है। फुटपाथ पर सोते लोगों पर गाड़ी चढ़ा देना, काले हिरण का शिकार करना जैसे कई आरोप उन पर हैं। उनको सजा हो चुकी है। जमानत पर रिहा हैं। किस तरह पूरे सिस्टम ने उन्हें बचाया यह देश जानता है। वह भी इस अराजक आंदोलन के समर्थन में बोल रहे हैं। दरअसल हमारी सबसे बड़ी समस्या शत्रु बोध का अभाव है। हम जानते ही नहीं कि हमारा शत्रु कौन है। तो हम लड़ेंगे क्या? लड़ने का मतलब गोली-बंदूक या लाठी-डंडा नहीं बल्कि विचारों की लड़ाई है। ऐसी शक्तियां जो सनातन के अस्तित्व को स्वीकार करने से मना कर देती हैं,उनका वैचारिक स्तर पर विरोध है। आप समझिए यह जो कुछ भी जंतरमंतर पर हो रहा है,यह देश या छात्रों के हित में तो बिल्कुल नहीं है। दुनिया में ऐसे देशों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो भारत की तरक्की को देखकर परेशान हैं। उनमें अमेरिका और चीन जैसे देश भी शामिल हैं। वे चाहते हैं कि भारत में अराजकता पैदा हो। इसके लिए तीन ऐसी बड़ी कंपनियां लगी हुई हैं,जो इनफ्लुएंसर्स के लिए मार्केटिंग का काम करती हैं। अनुमान है कि दिपके और कॉकरोच जनता पार्टी के पक्ष में एक वीडियो बनाने के लिए 65 हजार रुपये मिल रहे हैं। इस समय ऐसे करीब  10,000 वीडियो चल रहे हैं। आखिर इतना पैसा आ कहां से रहा है? कौन दे रहा है? यह जो सोनम वांगचुक है,यह लद्दाख में आग लगा चुका है क्योंकि इसका एफसीआरए लाइसेंस कैंसिल हो गया था। विदेशों से जो पैसा मिलता था, वह मिलना बंद हो गया था। लद्दाख की हिंसा में चार लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे। यह उस समय भी बात करता था कि भारत में अरब स्प्रिंग जैसी क्रांति लानी है और यह कॉकरोच जनता पार्टी तो बार-बार बोलती ही है कि भारत को नेपाल और बांग्लादेश जैसा बनाना है। मेरा तो इस देश के छात्रों-युवकों के अलावा उनके अभिभावकों से कहना है कि अपने बच्चों को ऐसे आंदोलन में क्यों भेज रहे हैं जो सिर्फ हिंसा और देश के विरोध में काम करने के लिए है। जिसे देश विरोधी ताकतें चला रही हैं। इस आंदोलन में कई ऐसे लोग आए हैं जो हाईस्कूल पास हैं या कहीं छोटी मोटी नौकरी कर रहे हैं। उनको नीट या छात्रों के कॉम्पिटिटिव एग्जाम से कोई मतलब नहीं है। छात्रों की आत्महत्या का सबसे बड़ा केंद्र कोटा है। कोटा में आंदोलन करते हुए आपने किसी को देखा है? इसलिए जो लोग इस आंदोलन के नाम पर अराजकता कर रहे हैं सोचिए कि इनकी नीयत और उद्देश्य क्या है? इस देश की बर्बादी हो,यही इनका एकमात्र लक्ष्य है और जो इनका समर्थन कर रहे हैं वे देश की बर्बादी में हिस्सेदार बन रहे हैं। अगर दिल्ली यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपने स्टूडेंट से कहें कि चलो संसद मार्च और आंदोलन में शामिल हो जाओ तो आप समझिए कि ये साजिश कितनी बड़ी है।

अमेरिका को ये बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि भारत ट्रेड डील से आनाकानी करे। ट्रेड डील में भारत एक इंच भी समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। चीन को भी मालूम है कि भारत ऐसे ही बढ़ता रहा तो सबसे बड़ा खतरा उसी के लिए बनेगा। ऐसा वह बिल्कुल नहीं चाहता है। अब आप ही बताइए कि सीआईए को कैसे पता चल गया कि ये आंदोलनकारी कहां-कहां पर इकट्ठा होने वाले हैं? कहां-कहां पर ब्लाइंड स्पॉट है और कहां पर हिंसा होने वाली है। एफसीआरए में जो संशोधन हो रहा है,इससे बहुत से देश और लोग परेशान हैं। जितनी धर्मांतरण वाली संस्थाएं हैं,जिनको विदेशों से पैसा मिलता था,उस पर अंकुश लग रहा है। ये देश भारत की तरक्की से परेशान हैं। इनको बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि दुनिया में इतना बड़ा आर्थिक संकट चल रहा है, उसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था क्यों बना हुआ है? जिस तरह से दुनिया के दूसरे देश भारत में बने हथियार खरीद रहे हैं,उससे भी बेचैनी है। इसे लेकर चीन सबसे ज्यादा परेशान है क्योंकि उसका मिलिट्री हार्डवेयर बेकार साबित हो चुका है जबकि भारत के हथियारों और सैन्य साजोसामान की गुणवत्ता उससे कहीं बेहतर है। उनकी मांग बढ़ती जा रही है। भारत जो नेट इंपोर्टर था वह आने वाले कुछ सालों में नेट एक्सपोर्टर बनने जा रहा है। मेक इन इंडिया ने पूरे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर खासतौर से डिफेंस सेक्टर को क्रांतिकारी ढंग से बदल दिया है।
अब कोई इस दिपके से पूछ रहा है कि यह अमेरिका में क्या कर रहा था? पढ़ रहा था या नौकरी कर रहा था? एक दिन वह अमेरिका से चलता है और यहां आकर आंदोलन का नेता बन जाता है। कौन लोग हैं जो इसके पीछे हैं? कौन लोग हैं जो पैसा दे रहे हैं? इससे इसके आर्थिक स्रोत का हिसाब मांगा जाना चाहिए। इसको कायदे से जेल में होना चाहिए। मुझे समझ में नहीं आता कि जिस सरकार ने कुछ ही समय पहले सोनम वांगचुक को यूएपीए में जेल भेजा था, वही उनसे बात कर रही है। ऐसे देश विरोधी लोगों से क्यों बात करनी चाहिए? अगर आप बात कर रहे हैं तो यह आपकी कमजोरी को बताता है। दुनिया सिर्फ ताकत की भाषा समझती है। ताकतवर ही शांति की बात कर सकता है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)