भारत विरोधी तत्वों के जमावड़े पर समय रहते अंकुश न लगाया गया तो पछताना पड़ेगा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के बाहर मंगलवार को राहुल गांधी ने जो किया, वह सिर्फ और सिर्फ उनका अहंकार था। राहुल गांधी इस देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे हैं, लेकिन उसके साथ-साथ सरकार के खुफिया तंत्र की नाकामी भी देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन रही है।
राहुल गांधी प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना देने की योजना बना रहे हैं, ये बात खुफिया तंत्र को कैसे पता नहीं चली? जबकि पूरे मीडिया सर्कल में यह खबर थी कि राहुल गांधी कुछ बड़ा करने वाले हैं। प्रधानमंत्री आवास के बाहर बैरिकेड क्यों नहीं लगाए गए? अगर उस प्रदर्शन में कोई ऐसा व्यक्ति घुस आता,जो हिंसात्मक गतिविधि करता फिर क्या होता? राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं। उनके परिवार में तीन-तीन लोग प्रधानमंत्री रह चुके हैं। पीएम सिक्योरिटी का क्या मतलब होता है, यह सब उन्हें पता है। वह खुद, उनकी बहन, उनकी मां और पिता एसपीजी प्रोटेक्टिव रह चुके हैं। ऐसे में राहुल गांधी ने जो किया, वह किसी भी जिम्मेदार राजनेता के लिए शर्मनाक कदम था। वह धरने पर बैठने और विरोध-प्रदर्शन के लिए कोई और जगह चुन सकते थे, लेकिन वह हाई सिक्योरिटी जोन प्रधानमंत्री आवास के बाहर इतने लोगों को लेकर तीन घंटे बैठे रहे। पुलिस और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह उन्हें मनाने गए,लेकिन उन्होंने कहा-मेरी मर्जी चाहे जहां बैठूं। आपकी मर्जी से तो सिस्टम नहीं चलेगा। अगर यह गलतफहमी है कि आपकी मर्जी से चलेगा तो इसे जल्दी दूर कर लीजिए। धरने पर बैठते ही उन्होंने सोशल मीडिया पर आह्वान किया कि देश भर में जितने राष्ट्रभक्त हैं, वे यहां पर पहुंचें लेकिन कोई नहीं पहुंचा। राहुल पूरी तरह एक्सपोज हो गए। उसके बाद पुलिस उन्हें उठाकर ले गई।
देखिए नीट का पेपर जिस तरह से पेपर लीक हुआ और उसकी हताशा में कई छात्रों ने आत्महत्या की, इससे बुरी बात किसी देश के लिए नहीं हो सकती। लेकिन ये जो लोग आंदोलन करने का दावा कर रहे हैं, इनको छात्रों या उनके परिजनों की तकलीफ से कोई लेना देना नहीं है। नीट की परीक्षा एनटीए कराता है। एनटीए के चेयरमैन के इस्तीफे की मांग आज तक किसी ने क्यों नहीं की? जब यूजीसी गाइडलाइंस आईं थीं, उस समय भी धर्मेंद्र प्रधान को लेकर बहुत गुस्सा था, लेकिन उस समय किसी ने उनका इस्तीफा नहीं मांगा। आज क्यों मांग रहे हैं? दरअसल नीट परीक्षा का पेपर लीक होना और उसके कारण कई छात्रों का आत्महत्या करना इनका मुद्दा नहीं है। इस समय धर्मेंद्र प्रधान को निशाना इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि शिक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव हो रहा है। राष्ट्रवादी और सच्ची घटनाएं शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल की जा रही हैं। 79 साल तक जो झूठ परोसा गया उसको हटाया जा रहा है। उसकी नाराजगी है। अब सीधे तो कह नहीं सकते कि आप सही इतिहास क्यों बता रहे हैं। उनको लगता है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो जाए तो सरकार पर आगे शिक्षा पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं करने का दबाव पड़ेगा। इस प्रदर्शन को लेकर कई तरह के खेल चल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ताकतें सरकार को अस्थिर करना चाहती हैं। भारत की जो आर्थिक तरक्की है और रक्षा क्षेत्र में जो प्रगति हो रही है, उसको रोकना चाहती हैं। आप बताइए यह जो दिपके है, इसका छात्रों की समस्याओं से क्या लेना देना है? इस आंदोलन का सिर्फ एक मकसद है कि जिस तरह नेपाल और बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन कराया गया, उसी तरह यहां भी कराने के लिए लोगों को सड़क पर उतारा जाए। राहुल गांधी 12 साल से ऐसी कोशिश करके हार चुके हैं। उनके अपने गठबंधन में समस्याएं हैं। बुधवार को लोकसभा की कार्यवाही केवल पांच-सात मिनट चली। लोकसभा अध्यक्ष ने केसी वेणुगोपाल को बोलने दिया तो अखिलेश यादव हत्थे से उखड़ गए। उन्होंने स्पीकर से कहा कि यह क्या तरीका है आपने कांग्रेस को बुलवा दिया, सरकार को बुलवा दिया। इसका मतलब इन दोनों ने हाथ मिला लिया है,क्या यह हमारा मुद्दा नहीं है? उनको लगा कि कांग्रेस सारी लाइम लाइट ले जा रही है। मैं कहां हूं? अखिलेश यादव हों या दूसरे लोग, सबको लग रहा है कि इस मुद्दे का श्रेय हमको मिलना चाहिए। आप आम आदमी पार्टी का बयान सुनिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जानबूझकर राहुल गांधी को अपने निवास के बाहर बिठा दिया ताकि सीजेपी का आंदोलन कमजोर हो। सवाल है कि आम आदमी पार्टी को सीजेपी का आंदोलन कमजोर होने से क्या समस्या है? दरअसल सीजेपी और आम आदमी पार्टी में कोई फर्क नहीं। दिपके पहले आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल के लिए काम करता था। अरविंद केजरीवाल का यह नया पैंतरा था।
सरकार की ढिलाई और खुफिया तंत्र की अक्षमता के कारण आज ये स्थिति बनी है। ये ऐसा आंदोलन है, जिनके नाम पर हो रहा है उनका इससे कोई नाता नहीं है। इस आंदोलन के समर्थन या सरकार के विरोध में देश में कहीं कोई जेन्युइन छात्र निकल कर सड़क पर नहीं आया। यह बात सही है कि परीक्षा की जो व्यवस्था है,जो सिस्टम है,जो बार-बार पेपर लीक हो जाता है, उसे लेकर छात्रों के मन में नाराजगी और असंतोष है। लेकिन धरने और विरोध के नाम पर जो हो रहा है,उसका इस वास्तविक समस्या से कोई लेना देना नहीं है। इनका लक्ष्य दूसरा है। राहुल गांधी ने मंगलवार को देख लिया। उनके हिसाब से तो देश में कोई देशभक्त है ही नहीं क्योंकि उनकी पार्टी के सांसदों और नेताओं के अलावा धरने में कोई नहीं आया। दिल्ली में जहां इतने लंबे समय तक कांग्रेस सत्ता में रही, वहां राहुल के धरने में हजार आदमी इकट्ठा नहीं हुए। राहुल गांधी को दिखा कि मुझसे ज्यादा भीड़ तो दिपके ने जुटा ली। तो उनको समझ में आ गया कि मैं कोई आंदोलन नहीं चला सकता। ये मेरी क्षमता के बाहर है। तो दूसरा जो कर रहा है, उसको ज्वाइन कर लो। कुछ तो श्रेय मिलेगा। लेकिन सवाल है कि सरकार ने किसके आगे सरेंडर किया है? चर्चा चल रही है कि सरकार की स्ट्रेटजी है कि जितना आक्रोश निकलना है, निकलने दिया जाए। ऐसे ही चीजें हाथ से निकल जाती है। जब रिसाव होता है पानी को तभी रोकना पड़ता है। बांध टूटने के बाद दुनिया में कोई पानी को रोक नहीं पाया है। यह छात्रों का ही आंदोलन था, जिसने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ दिया था, आम लोगों का आंदोलन था जिसने राजीव गांधी की सरकार को उखाड़ कर फेंक दिया। अन्ना हजारे का आंदोलन भी आम लोगों का आंदोलन था। कांग्रेस के भ्रष्टाचार से तंग आ चुके लोगों ने अन्ना का साथ दिया था। लेकिन आज जो आंदोलन हो रहा है इससे कोई नहीं जुड़ा है। इस आंदोलन के साथ ऐसे लोगों को जोड़ा गया है जो भारतीय संस्कृति, भारत की सुरक्षा और भारत की तरक्की के खिलाफ हैं। इसीलिए आप जंतरमंतर पर जुटे लोगों के चेहरे देखिए। ये वही चेहरे हैं, जो इस तरह के हर आंदोलन में आते हैं। योगेंद्र यादव नाम का आंदोलनजीवी इसमें भी पहुंच गया। वह ऐसे खुश हो रहा था जैसे लोकसभा का चुनाव जीत गया हो क्योंकि उसकी सबसे बड़ी तमन्ना यही है कि जीवन में एक बार लोकसभा या कम से कम विधानसभा पहुंच जाए। दरअसल यह भारत विरोधी तत्वों का जमावड़ा है, जिससे केंद्र सरकार मजबूती से निपट नहीं पा रही है। उसकी रणनीति क्या है, यही स्पष्ट नहीं हो रहा है। वह आंदोलन को चलने देना चाहती है या रोकना चाहती है। यह कन्फ्यूजन सरकार और देश दोनों के लिए बुरा है। उसे एक स्पष्ट स्टैंड जल्द ही लेना होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी को लेजिटिमेसी देनी है या नहीं देनी है। जो इस पूरे मुद्दे का स्टेक होल्डर ही नहीं है, उसको आप सबसे बड़ा प्लेयर बना रहे हैं। तो ये आप अपने लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो आपको पछताना पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)