मोटे तौर पर शिक्षक और गुरु दोनों ही ‘रोल मॉडल्स’ का काम करते हैं। परंतु आम तौर से उनमें एक खास भिन्नता यह है कि शिक्षक होना एक तरह की रोजी-रोटी है, जबकि गुरु पूर्णतः निःस्वार्थ होता है। लोग अक्सर शिक्षक को गुरु मान लेते हैं जोकि मेरी समझ में पूर्णतः उचित नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि सही गुरु मिलना बड़े भाग्य की बात होती है।
हमलोग किसी व्यक्ति को गुरु मान लेते हैं। फिर बाद में यह पता चलता है कि वह गुरु तो अपने ही किसी स्वार्थ में लगा हुआ था। इस पर मन दुःखी हो जाता है। फिर हम हर गुरु पर शक करने लगते हैं।
तो फिर किसको गुरु माना जाय?
सूर्य को गुरु माना जाए। वायु को गुरु माना जाए। गंगा को गुरु माना जाए। आदि-आदि। पृथ्वी सिखाती है सहनशीलता। चाहे उस पर कितनी भी चोट करो। वह सहन करती है और फिर भी हमको आजीवन सहारा देती है।
सूर्य हमको रोशनी देता है। बदले में हमसे कुछ मांगता नहीं है। अगर सूर्य दो दिन दर्शन न दे तो हम उसका बेताबी से इंतजार करते हैं।
इसी प्रकार चंद्रमा हमें शीतलता देता है।
वायु तो दिखाई भी नहीं पड़ती है, परंतु उसके बगैर हम जी भी नहीं सकते हैं। वह किसी तरह का कोई दिखावा नहीं करती।
गंगा बहती है तो हम उसकी ओर ध्यान नहीं देते। उसमें सारा कचड़ा फेंकते हैं। पर एक दिन वह बहना बंद कर दे, तो त्राहि-त्राहि मच जाए।
ये सब चीजें वे हैं जो कि हमको ईश्वर की कृपा से निःशुल्क मिली हुई हैं। इसलिए आम तौर से हमलोग इन पर ध्यान नहीं देते हैं। जबकि मुझे लगता है कि वास्तविक गुरु यही हैं। इनको गुरु मानकर हम कभी धोखा नहीं खाएंगे।
भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरु
भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरु थे। उनके गुरुओं में कीट, पक्षी, जानवर, पृथ्वी, सूर्य, वायु, आदि थे। दत्तात्रेय भगवान थे, तो भी उन्हें गुरु की जरूरत हुई। वह ब्रह्माजी के मानसपुत्र ऋषि अत्रि के बेटे थे। अनुसूया उनकी मां थीं। दत्तात्रेय को भगवान विष्णु का अवतार भी माना जाता है। दत्तात्रेय का एक गुरु समुद्र भी था।
रामचरितमानस के बालकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदासजी समुद्र के बारे में कहते हैं-
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई।
देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥
गोस्वामीजी कहते हैं कि (आम तौर पर लोग अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं) परंतु समुद्र सा तो कोई बिरला ही सज्जन होता है जो चंद्रमा को पूर्ण देखकर (दूसरों का उत्कर्ष देखकर) प्रसन्नता से उमड़ पड़ता है।
बहुत से प्रण न करो
एक शिक्षक होने के नाते मैं आम तौर से छात्रों को यह राय देता रहा हूं कि जीवन में बहुत से प्रण न करो। सिर्फ एक प्रण करो और अगर वही पूरा हो जाए, तो आपको आनंद आ जाएगा। जैसे कि मैंने प्रण किया कि न मैं किसी को घूस दूंगा और न लूंगा। परंतु एक बार तो ऐसा हुआ कि रेलवे में टीसी मुझसे घूस ले गया। लेकिन जब मैंने टीसी को बुलाकर ये कहा कि मेरे जीवन का प्रण है कि न घूस दो और न लो और आपके इस व्यवहार से मेरा प्रण टूटता है। ऐसा कहने पर टीसी ने मुझसे ली हुई घूस वापस कर दी और कहा कि आप अपना प्रण संभाल कर रखें। ऐसे अन्य कई अनुभव भी मेरे जीवन में हुए हैं।
एक अच्छा प्रण यह किया जा सकता है कि हम हर दिन कोई न कोई अच्छा काम जरूर करेंगे। साधु वासवानी जी कहते हैं- ‘वन गुड वर्क ए डे।’ चाहे हम हर दिन गाय को रोटी खिलाएं, चिड़ियों को दाना डालें या चींटियों को कुछ खाने को दें। इस सबसे कोई फायदा हो या न हो, पर जीवन में यह संतोष हमेशा रहेगा कि आप प्रतिदिन कोई न कोई अच्छा कार्य अवश्य करते हैं। इस फार्मूले को भी मैंने अपने जीवन में आजमाया है।
ऐसे ही एक प्रण यह भी हो सकता है कि हम ऑफिस समय से पहुंचेंगे। इसका कोई प्रचार करने की जरूरत नहीं है। परंतु इससे आपको आत्मसंतोष मिलेगा।
ऐसे ही एक प्रण यह भी हो सकता है कि हम एक हफ्ते या एक महीने किसी पर हृदय से भी क्रोध नहीं करेंगे, इसके भी आपको सुखद नतीजे मिलेंगे। ऐसा प्रयोग करके देख लें। फिर हो सकता है कि आप इस प्रयोग को आजीवन करें।
इस जीवन में छोटे-छोटे कामों को करने से ही प्रसन्नता मिलती है।
अगर रामायण में गुरु को ढूंढा जाए, तो मैं हनुमानजी को गुरु मानूंगा। वह संजीवनी बूटी लाने के लिए पूरा पर्वत ही उठाकर ले आए। परंतु उन्होंने जरा भी अहंकार न किया। हनुमानजी के कुल बारह नाम हैं। उनमें से एक है पवनपुत्र अर्थात वायुपुत्र। उनमें वायु की तरह बड़े-बड़े पेड़ों और पर्वतों को उखाड़ने की क्षमता रही है और सामान्य परिस्थितियों में वायु की तरह लोगों को ऑक्सीजन प्रदान करने का विनीत भाव भी रहा है।
मेरा एक और अनुभव रहा है कि ज्यादातर लोग इसलिए दुःखी रहते हैं कि वे यह समझते हैं कि वे अच्छे हैं और बाकी लोग खराब हैं। जिस दिन ये ख्याल आ जाए कि आप अच्छे हैं और बाकी लोग खराब हैं, बस जानिए कि उसी दिन आप दुःख के कुएं में गिरने जा रहे हैं।
इन सभी बातों को जीवन में मैंने स्वयं अनुभव किया है। इसलिए मेरा अनुरोध यही रहा है कि ज्यादा प्रण न करें। सिर्फ एक प्रण करें और वही अगर पूरा कर लेंगे तो आत्मसंतुष्टि होगी। और जब तक कि कोई सही गुरु न मिले, तो पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, वायु, आदि को ही गुरु मानें। इससे जीवन सरलता से कट जाएगा। होता यह है कि लोग उसको गुरु समझ लेते हैं जिससे कोई आर्थिक या व्यक्तिगत लाभ हो। परंतु ऐसे गुरु जीवन में कोई सही राह नहीं दिखा पाते।
देश के कई शहरों में बड़े-बड़े प्रबंधन संस्थान खुल गए हैं। ये गर्व से प्रचार करते हैं कि इनके यहां के छात्रों को लाखों रुपए के पैकेज वाली नौकरी मिली। यह व्यवसायपरक शिक्षा है।
आजकल कई शिक्षक राजनेता भी हो गए हैं। कुछ शिक्षक पेपर लीक काण्ड में भी पकड़े गए हैं। इन सबको हम उस गुरु की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं, जिसके बारे में कहा गया है कि-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदासजी के कहते हैं-
चौपाई
श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू।
बड़े भाग उर आवइ जासू॥
गोस्वामीजी के अनुसार श्री गुरु महाराज के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। यह प्रकाश अज्ञानरुपी अंधकार का नाश करने वाला है। यह जिसके जीवन में आ जाता है वह बड़ा भाग्यशाली है।
गुरु वह है जो आपको छल-कपट से दूर रखे। आपके मन, हृदय और व्यवहार को सरल और निर्मल करे।
यहां यह बात भी स्पष्ट कर देनी जरूरी है कि गुरु का महत्व सिर्फ गुरु पूर्णिमा पर ही नहीं होता। उनको तो प्रतिदिन प्रतिक्षण हमें अंतरात्मा से नमन करना होता है।
ऐसा जरूरी नहीं है कि गुरु हमेशा सशरीर हमारे सामने आए। महाभारत में नीच जाति के एकलव्य ने तो अपनी इच्छाशक्ति के जरिए गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति से वर्चुअल वार्तालाप करके धनुर्विद्या सीखी थी।
महाभारत में ही आरुणि अपने गुरु धौम्य ऋषि के वास्ते जाड़े की सारी रात बाढ़ का पानी रोकने के लिए खेत की मेड़ पर लेटे रहे थे।
सच्चे गुरु को सच्चे शिष्य भी मुश्किल से मिलते हैं
एकलव्य और आरुणि जैसे सच्चे शिष्य भी मुश्किल से मिलते हैं। इतिहास में ऐसा संयोग बहुत कम होता है जब सच्चे गुरु को सच्चा शिष्य मिल जाए। जैसा कि रामकृष्ण परमहंस को नरेन अर्थात् विवेकानन्द मिल गए। ऐसा संयोग पूरे विश्व को प्रभावित करता है।
महात्मा गांधी हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक ‘वाल्डेन’ से बहुत प्रभावित थे। थोरो ने सादा जीवन जिया। विश्व में ‘वाल्डेन’ को सादा जीवन जीने की कला में एक मील का पत्थर यानी ‘लैण्डमार्क’ माना जाता है। थोरो महात्मा गांधी के लिए एक ‘रोल मॉडल’ की तरह थे।
मैंने विश्व के सारे ग्रंथ नहीं पढ़े हैं, परन्तु जो थोड़ा-बहुत पढ़ा है, उनमें से तीन-चार अच्छी पुस्तकों का संदर्भ इस लेख में देने का प्रयास किया है।
हमारा शरीर रोज गंदा होता है, इसलिए हम रोज नहाते हैं। कभी-कभी तो दो बार नहाते हैं। इसी प्रकार से हमारा मस्तिष्क रोज राग द्वेष जैसी वासनाओं से गंदा होता है। मस्तिष्क की सफाई के लिए हमें गुरुतुल्य पुस्तकें रोज पढ़नी होंगी।
दो शब्दों में बात की जाए, तो सारे गुरु-ज्ञान का निचोड़ यह है कि बस राग-द्वेष छोड़ दें। ऐसा प्रयास नित्य निरंतर करने से काम, क्रोध, मोह, लोभ सब धीर-धीरे कम होने लगते हैं। ऐसा आप स्वयं भी अनुभव करके देख सकते हैं। ऐसा ही अष्टावक्र गीता और श्रीकृष्ण गीता में भी लिखा है। और ऐसा ही गीता प्रेस की हिन्दी मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ के संपादक स्वामी रामसुखदासजी (1904-2005) भी बताते थे। स्वामीजी कहते थे कि भगवान को देखने में राग-द्वेष ही बाधक हैं।
(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)










