नीलम संजीव रेड्डी बनना चाहते थे सरकार का मुखिया, हवा दे रहे थे चेन्ना रेड्डी।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
राजा रजवाड़ों के महलों में षड्यंत्र रचे जाने और तख्ता पलट की योजनाएं बनाए जाने के बारे में हमने बहुत पढ़ा-सुना है, लेकिन जनतंत्र में भी क्या ऐसा होता है? राष्ट्रपति भवन अगर षड्यंत्रों का केंद्र बन जाए तो क्या होगा? एक बार पद ग्रहण करने के बाद राष्ट्रपति का किसी पार्टी से कोई नाता नहीं रहता है। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति सर्वोच्च भले है, लेकिन शासनाध्यक्ष नहीं है। अभी तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री बन जाए या सत्ता उसके हाथ में चली जाए। अब मैं एक कहानी सुनाने जा रहा हूं, जो आईबी के पूर्व निदेशक टीवी राजेश्वर ने बयां की है।
टीवी राजेश्वर की किताब द क्रूशियल इयर्स में बयां की गई यह कहानी 1979 से शुरू होती है। चौधरी चरण सिंह की सरकार गिर गई थी। उनको कांग्रेस ने समर्थन देकर प्रधानमंत्री तो बनाया लेकिन लोकसभा में उनका समर्थन करने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अब उसके बाद क्या-क्या हुआ यह राजेश्वर राव बताते हैं। उन्होंने अपने बारे में भी बताया कि इस दौरान वह इंदिरा गांधी को खबरें दे रहे थे। उस समय वह आईबी के डायरेक्टर नहीं थे। आईबी डायरेक्टर थे मिस्टर माथुर। टीवी राजेश्वर कहते हैं कि एक नए राजनीतिक ध्रुवीकरण की तैयारी हो रही थी और इसका केंद्र राष्ट्रपति भवन ही नहीं खुद राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी थे। नीलम संजीव रेड्डी के बारे में कुछ प्रकरण हैं जिन्हें बहुत से लोग नहीं जानते। उन्हीं के नाम पर कांग्रेस का बंटवारा हुआ था। 1969 में कांग्रेस पार्लियामेंट्री बोर्ड ने राष्ट्रपति चुनाव में उनको उम्मीदवार बनाने का फैसला किया था,लेकिन इंदिरा गांधी को यह मंजूर नहीं था। वह सीधे तो पार्लियामेंट्री बोर्ड में विरोध कर नहीं सकती थी इसलिए उन्होंने दूसरा तरीका निकाला। उन्होंने उपराष्ट्रपति  वीवी गिरी से इस्तीफा दिलवाकर उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति चुनाव में उतार दिया। इंदिरा गांधी ने सभी से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने की अपील की। नतीजा यह हुआ कि वीवी गिरी चुनाव जीत गए और नीलम संजीव रेड्डी हार गए। उसके बाद कांग्रेस का विभाजन हो गया। उसके बाद नीलम संजीव रेड्डी राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो गए और आंध्र प्रदेश स्थित अपने गांव चले गए। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसने नीलम संजीव रेड्डी को याद किया और उन्हें अपना राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया। इस बार चुनाव जीतकर नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति बन गए।
तो टीवी राजेश्वर के अनुसार 1979 में चौधरी चरण सिंह के इस्तीफे के साथ शुरू हुए नए राजनीतिक ध्रुवीकरण के केंद्र में थे राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी और सबसे सक्रिय भूमिका निभा रहे थे आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ.चेन्ना रेड्डी। उस समय पूरे देश में आंध्र प्रदेश एकमात्र राज्य था, जहां कांग्रेस पार्टी का मुख्यमंत्री था। चेन्ना रेड्डी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी के करीबी थे। उनका सुझाव था कि चौधरी चरण सिंह की बजाए राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी अंतरिम प्रधानमंत्री बनें और सलाहकारों की टीम के साथ सरकार चलाएं। लेकिन भारतीय संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री का पद ले सकता है या शासन चला सकता है। इसलिए मजबूरी में चौधरी चरण सिंह को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया। चेन्ना रेड्डी चौधरी चरण सिंह के भी संपर्क में थे। टीवी राजेश्वर कहते हैं कि कई बार चेन्ना रेड्डी और चौधरी चरण सिंह की मुलाकात उनके घर पर हुई। चेन्ना रेड्डी के बहुत करीबी कांग्रेसी नेता थे बुद्धिप्रिय मौर्य। चेन्ना रेड्डी ने ही उनको आंध्र प्रदेश से राज्यसभा भेजा था। बुद्धिप्रिय मौर्य इंदिरा गांधी के कट्टर विरोधी थे। मौर्य को लग रहा था कि 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सिंगल लार्जेस्ट पार्टी तो बनेगी लेकिन बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसे में डॉक्टर चेन्ना रेड्डी की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाएगी। उस समय आंध्र प्रदेश की 42 लोकसभा सीटें थीं। चेन्ना रेड्डी को भरोसा था कि वह 42 की 42 सीटें जीत जाएंगे। ऐसे में वह इंदिरा गांधी से डिप्टी प्राइम मिनिस्टर पद के लिए बारगेन कर सकते हैं। चेन्ना रेड्डी इसी के साथ आईबी के डायरेक्टर माथुर के जरिए चौधरी चरण सिंह के पास भी ये संदेश भिजवा रहे थे कि 1980 के चुनाव के बाद अगर परिस्थितियां अनुकूल हुईं तो वह अपने संभावित 42 लोकसभा सांसदों के साथ उनका साथ देने के लिए तैयार हैं। तो चौधरी चरण सिंह को भी उम्मीद थी कि वह फिर से प्रधानमंत्री बन सकते हैं। उधर,नीलम संजीव रेड्डी के मन में महत्वाकांक्षा जागी थी कि वह कम से कम कार्यवाहक प्रधानमंत्री बन सकते हैं, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा इतने से ही शांत नहीं हुई थी।

टीवी राजेश्वर लिखते हैं कि दिसंबर में वह राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी से मिले और उन्होंने उनसे कहा कि उनके आकलन के हिसाब से कांग्रेस को 1980 के लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत मिलने जा रही है। यह सुनते ही राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने फिर से आईबी डायरेक्टर को बुलाया और कहा कि चुनाव का नए सिरे से आकलन कीजिए। नए आकलन के बाद माथुर ने राष्ट्रपति को बताया कि कांग्रेस को काम चलाऊ बहुमत मिल सकता है जबकि पहले कहा था कि बहुमत नहीं मिलेगा। इसके बाद नीलम संजीव रेड्डी और चेन्ना रेड्डी की फिर मंत्रणा हुई,जिसमें तय हुआ कि चुनाव के बाद दलबदल कराया जा सकता है। चेन्ना रेड्डी का सुझाव था कि ऐसे में राष्ट्रपति पद से नीलम संजीव रेड्डी इस्तीफा देंगे और दूसरे सहयोगी दलों के समर्थन और कांग्रेस में दलबदल कराकर प्रधानमंत्री बन जाएंगे। उन्होंने राष्ट्रपति को फिर यह भरोसा दिलाया कि आंध्र प्रदेश की सभी 42 सीटें कांग्रेस ही जातेगी और वे सभी नीलम संजीव रेड्डी का समर्थन करेंगे। चेन्ना रेड्डी को लग रहा था कि दोनों स्थितियों में उनका फायदा है। अगर नीलम संजीव रेड्डी प्रधानमंत्री बनते हैं तब भी और अगर इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनती हैं तब भी क्योंकि पूर्ण बहुमत न मिलने से वह कमजोर होंगी। उनको लग रहा था कि इंदिरा गांधी अगर प्रधानमंत्री बनीं तो डिप्टी पीएम का पद उनके लिए पक्का है। जब यह सब चल रहा था इसी बीच नीलम संजीव रेड्डी ने एक और काम किया। चौधरी चरण सिंह का इस्तीफा हो गया तो फिर एक नई सरकार बनने की गुंजाइश थी। चौधरी चरण सिंह का धड़ा निकलने के बाद जो जनता पार्टी बची थी उसने कुछ और क्षेत्रीय दलों से बातचीत की और वे समर्थन देने को तैयार हो गए। इन लोगों ने अपना नेता बाबू जगजीवन राम को चुना। राष्ट्रपति भवन भेजने के लिए समर्थकों की सूची टाइप हो रही थी। उसमें आग्रह किया गया था कि बाबू जगजीवन राम को सरकार बनाने का न्योता दीजिए। वह लोकसभा में अपना बहुमत साबित कर देंगे। लेकिन वह चिट्ठी राष्ट्रपति भवन पहुंचती उससे पहले ही नीलम संजीव रेड्डी ने इंदिरा गांधी की सलाह पर लोकसभा भंग कर दी। देश को पहला दलित प्रधानमंत्री नहीं मिल पाया तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका नीलम संजीव रेड्डी और इंदिरा गांधी की है। इससे पता चलता है कि देश में किस तरह के षड्यंत्र चलते हैं?
इसी तरह की कोशिश तब भी हुई थी जब वेंकटरमण राष्ट्रपति थे और चंद्रशेखर की सरकार से कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया था। तब भी यह प्रश्न आया था कि चंद्रशेखर को केयर टेकर प्राइम मिनिस्टर बनाया जाए या नहीं। उस समय अखबारों में खबर छप गई कि राष्ट्रपति खुद राष्ट्रीय सरकार बनाकर उसका मुखिया बनना चाहते हैं। उससे वेंकटरमण डर गए और उन्होंने सफाई दी कि मैं ऐसी कोई कोशिश नहीं कर रहा हूं। तो राष्ट्रपति भवन भी षड्यंत्रों का केंद्र बनता रहा है और भविष्य में नहीं बनेगा, इसके बारे में कुछ नहीं कह सकते। इसीलिए जो भी सरकार बनती है वह इस बात का ध्यान रखती है कि ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाया जाए जो संकट आने पर कम से कम प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ दल के खिलाफ न जाए। क्या इसीलिए 2017 में लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा ने राष्ट्रपति नहीं बनाया, यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब कभी नहीं मिलेगा। तो हर सरकार को ऐसा राष्ट्रपति चाहिए जो हमेशा उसके अनुकूल रहे।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)