राहुल को ड्रामे का मौका किसने दिया।
भारत सरकार ने बीते शुक्रवार को दिल्ली में 5 घंटे से ज्यादा समय तक राहुल गांधी को पब्लिसिटी का पूरा मौका दिया। जिस व्यक्ति को पैलट गन के छर्रे लगे थे वह उसके साथ पार्लियामेंट्री स्ट्रीट थाने में उसकी एफआईआर दर्ज कराने गए थे। पुलिस ने कहा कि एफआईआर नहीं लिखी जा सकती। उसके बाद राहुल गांधी और उनके साथी वहीं पर धरने पर बैठ गए। अब सवाल यह है कि 5 घंटे बाद एफआईआर कैसे लिखी गई? या तो वह लिखी जा सकती थी या नहीं लिखी जा सकती थी।
ललिता कुमारी वर्सेज स्टेट के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि कोई घटना होने पर उसकी छह हफ्ते तक जांच हो सकती है। उसके बाद भी वरिष्ठ अधिकारियों को एक हफ्ते का समय मिलता है। वे विचार करते हैं कि मामला आपराधिक बनता है या नहीं। अगर बनता है तो एफआईआर दर्ज होती है। यानी पुलिस के पास सात हफ्ते का समय होता है। सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले ही पूरे मामले की जांच के लिए एक हाई लेवल कमेटी बनाई थी। उसके बाद इस एफआईआर का कोई तुक नहीं बनता था,लेकिन राहुल गांधी को लगा कि यह पब्लिसिटी का मौका है। वैसे भी उनका आजकल अभिजीत दीपके से कंपटीशन चल रहा है कि अराजकता में कौन आगे निकल सकता है? सड़क के जरिए सरकार से बात कौन मनवा सकता है? तो यह राहुल गांधी के लिए ईगो का इशू बन गया था और उनको मौका दे दिया दिल्ली पुलिस ने। अगर पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी ही थी तो तुरंत दर्ज कर लेते। आधे घंटे में सब खत्म हो जाता। लेकिन आपने 5-6 घंटे तक ड्रामा चलने दिया और उस दौरान सारे नेशनल मीडिया पर सिर्फ राहुल गांधी चल रहे थे। सवाल यह है कि सरकार को इससे हासिल क्या हुआ? यह बताता है कि पूरी सरकार अनिर्णय की स्थिति में है। जब जंतरमंतर का धरना चल रहा था उस बीच में सरकार ने पुलिस कमिश्नर बदल दिया। इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक आईपीएस को पुलिस कमिश्नर बना दिया। उसके बाद 20 जुलाई को क्या हुआ पूरे देश ने देखा। नए पुलिस कमिश्नर उस स्थिति को कंट्रोल नहीं कर पाए। उसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली पुलिस किसके कहने पर काम कर रही है। कोई उसको बताने-कहने वाला भी है और अगर है तो कौन है जो निर्णय नहीं ले पाता कि एक छोटे से मामले में एफआईआर दर्ज करनी है या नहीं करनी है। राहुल गांधी को सफल होने का मौका सरकार ने क्यों दिया।
अब कुछ समझदार लोग कह सकते हैं कि यह सरकार की बहुत बड़ी स्ट्रेटजी थी। राहुल गांधी को उन्होंने सफल करा दिया। उसके सामने दीपके अब छोटा पड़ जाएगा। मुझे लगता है कि इससे ज्यादा मूर्खतापूर्ण बात और कोई नहीं हो सकती है। यह सरासर सरकार की विफलता है। दिल्ली पुलिस रिपोर्ट करती है लेफ्टिनेंट गवर्नर को, लेफ्टिनेंट गवर्नर रिपोर्ट करते हैं होम सेक्रेटरी को और होम सेक्रेटरी केंद्रीय गृह मंत्री को। यह चेन ऑफ कमांड है। सवाल है कि फिर यह अनिर्णय 5-6 घंटे तक क्यों रहा? यही अनिर्णय की स्थिति सीजेपी के आंदोलन के दौरान भी दिखी। दीपके भारत पहुंचा नहीं कि एयरपोर्ट पर जाकर धरने की परमिशन दे आए। मुझे लगता है कि दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हुआ होगा कि धरने की अनुमति के लिए कोई एप्लीकेशन लेकर आया नहीं कि उससे पहले दिल्ली पुलिस पहुंच गई उसके पास कि हुजूर ये लीजिए परमिशन। उन्होंने एक दिन के धरने की परमिशन मांगी थी लेकिन सवा महीने बैठे रहे। पुलिस क्या कर रही थी? जिस दिन सोनम वांगचुक को उठाया था उसके बाद जंतरमंतर खाली हो जाता, लेकिन दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी को धरने का मौका फिर दे दिया। लगभग 2800 अपराधिक व्यक्तियों को भी उसमें शामिल होने का मौका दिया गया। हिंसक आंदोलन में 200 पुलिस वाले घायल हुए। इसके लिए जवाबदेह कौन है? अगर आप इस तरह से एफआईआर लिखेंगे तो अगली बार ऐसा मौका आने पर पुलिस वाले हाथ जोड़कर खड़े रहेंगे कि हमको कुछ करना ही नहीं है। हम कुछ एक्शन लेंगे तो हमारे ऊपर वाले जिम्मेदार हमें ही फंसा देंगे। किसी भी आंदोलन को कंट्रोल करने के लिए भले ही मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारी फैसले लेते हों, लेकिन अल्टीमेट रिस्पांसिबिलिटी सरकार की होती है। कमिश्नर, एलजी, होम सेक्रेटरी और होम मिनिस्टर अपनी जवाबदेही से कैसे बच सकते हैं? और अगर ये लोग जवाबदेही से बचेंगे तो पुलिस का जवान क्या सिर्फ पत्थर खाने और पिटने के लिए है। आगे से वे भी कुछ नहीं करेंगे। अगर उस दिन दिल्ली पुलिस के जवान हिंसक भीड़ को संसद भवन जाने से नहीं रोकते तो क्या होता इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है। तो पुलिस को धैर्य रखने और कम से कम फोर्स का इस्तेमाल करने की सजा मिल रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने फोर्स का बेजा इस्तेमाल हुआ कि नहीं,यह जांच करने के लिए तो कमेटी बना दी, लेकिन पुलिस पर हुए हमलों की जांच कौन करेगा। जो पुलिस वाले पिटे आखिर उनकी गलती क्या थी? ड्यूटी निभाने की अगर सजा मिलनी है तो मुझे नहीं लगता कि कोई पुलिस वाला ड्यूटी निभाना चाहेगा। स्थिति यह है कि कानून के रखवाले कटघरे में खड़े हैं और कानून तोड़ने वालों के खिलाफ मुकदमे वापस लिए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि अगर कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है तो आंदोलन में शामिल व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर रद्द कर दीजिए। अब ये कौन सा तर्क है? संविधान में कहां लिखा है कि जिसका क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है अगर वह अपराध करता है तो उसके खिलाफ मुकदमा नहीं होगा। इस सबका निष्कर्ष यही निकलता है कि सरकार सड़क से चल रही है और सड़क की भाषा सुन रही है। अब यह दीपके और उसके साथी स्कूलों का मुआयना करने जा रहे हैं। क्या ये इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल हैं। किस हैसियत से जा रहे हैं? अगर कोई विधायक या सांसद इस तरह से चला जाए तो हल्ला मचेगा कि कैसे गए? लेकिन इनमें से किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। किसी पर एक्शन नहीं हुआ है। इसका मतलब इनको प्रोत्साहित किया जा रहा है। कल से ये थाने पहुंचने लगेंगे कि थाने की व्यवस्था ठीक नहीं है। एसओ, एसीपी, डीसीपी को तलब करेंगे। उनको गाली देंगे। ये दीपके के लोग एक हेड मास्टर को गाली दे रहे थे,लेकिन उनको यह छूट है। वे स्कूल में जाकर छात्रों की निजता का हनन करें, उनसे उल्टे सीधे सवाल पूछे लेकिन उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं होगा। वे टीचर को कहें कि तुम्हें नौकरी से निकलवा देंगे पर उनके खिलाफ एक्शन नहीं होगा। यह अराजकता नहीं तो और क्या है? सवाल है कि इन मामलों में सरकार मूकदर्शक क्यों बनी हुई है। महाराष्ट्र, जयपुर, दिल्ली हर जगह ये लोग राजनीतिक उद्देश्य से अराजकता फैला रहे हैं। गैर भाजपाशासित राज्यों पंजाब, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु में ये नहीं जा रहे क्योंकि यह इनका राजनीतिक एजेंडा है।
तो सरकार और दिल्ली पुलिस को बताना चाहिए कि उसने 5-6 घंटे तक एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की और उसके बाद क्यों दर्ज कर ली। इन 5-6 घंटों में क्या बदल गया? कौन सी कानून की धाराएं बदल गईं? क्या किसी अदालत का फैसला आ गया? क्या हो गया? उसका कोई तो आधार होना चाहिए। लोग जानना चाहते हैं कि सरकार ने ये कदम क्यों उठाया?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









