वंदे मातरम् पर सेल्फ गोल।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कभी-कभी ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। मेरी नजर में मुद्दों के मामले में भारतीय जनता पार्टी की यही स्थिति है।
भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीन लोकसभा चुनाव लड़े हैं। पहली बार 2014 में जब नरेंद्र मोदी उम्मीद की तरह आए थे। उस समय ‘अच्छे दिन आएंगे’ नैरेटिव था, जो जन-जन तक पहुंचा था। दूसरी बार 2019 में जब बालाकोट स्ट्राइक हुई थी। उस समय मजबूत सरकार, मजबूत नेतृत्व और राष्ट्रवाद की भावना बड़ा मुद्दा था, जो लोगों के मन में घर कर गया। इसी कारण भाजपा को अब तक की अधिकतम सीटें 303 हासिल हुईं। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पास कोई नैरेटिव नहीं था। कोई ऐसा मुद्दा नहीं था जिस पर वह प्रो एक्टिव होकर अपने विरोधियों को घेर सके। हो इसका ठीक उल्टा रहा था कि उसके विरोधी उसे कटघरे में खड़ा कर रहे थे। यही कारण रहा कि उन्होंने भाजपा को पूर्ण बहुमत पाने से रोक दिया। इस लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने तुरंत कोर्स करेक्शन किया और इसका उसे कई विधानसभा चुनावों में लाभ मिला। भाजपा को राज्यों में तो सफलता मिल रही थी लेकिन उसका कारण राज्यों के मुद्दे थे। राष्ट्रीय स्तर पर तब भी उसके पास कोई नैरेटिव नहीं था और विपक्ष लगातार हमलावर था। लेकिन अब अचानक छप्पर फाड़ कर दो मुद्दे उसके पास आ गए हैं। इनमें से पहला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ढूंढा, जब उन्होंने लालकिले से संबोधन में दिमागी नक्सल शब्द का जिक्र किया और इसके खतरे के बारे में बताया। यह अवसर उन्हें कॉकरोच जनता पार्टी ने दिया। सीजेपी के आंदोलन के बाद लग रहा था कि भाजपा बहुत ज्यादा डर गई या डिफेंसिव हो गई। लेकिन उसी में से प्रधानमंत्री ने नेशनल नैरेटिव निकाल लिया। दिमागी नक्सल शब्द का जिक्र कर उन्होंने जितने राष्ट्र विरोधी तत्व हैं सबको एक छतरी के नीचे खड़ा कर दिया। अब इसको सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ने की जरूरत थी तो उसके लिए मुद्दे की तलाश थी। भाजपा को वह मुद्दा कांग्रेस पार्टी ने दे दिया है।
मानसून सत्र में संसद से प्रस्ताव पास हुआ कि वंदे मातरम् के सभी छह पद गाए जाएंगे। 1937 से पहले ये सभी छह पद कांग्रेस के अधिवेशनों में गाए जाते थे, लेकिन मुस्लिम लीग और जिन्ना के विरोध के सामने कांग्रेस झुक गई और उसने मान लिया कि इसके दो ही पद का गायन होगा। तभी से ऐसा चल रहा था। देश आजाद हो गया तब भी किसी का ध्यान नहीं गया कि मुस्लिम लीग की मांग को हम क्यों ढो रहे हैं। इसका कारण यह था कि कांग्रेस पार्टी खासतौर से जवाहरलाल नेहरू की सोच वही थी जो मुस्लिम लीग की थी। वे भी ऐसा ही चाहते थे। सनातन धर्म से उनको कोई प्रेम नहीं था जबकि इस्लाम के प्रति उनका प्रेम बार-बार झलकता था। नेहरू जब हिंदू कोड बिल लाए तो उनसे पूछा गया कि मुसलमानों के लिए क्यों नहीं लाए। इस पर उनका जवाब था कि जब तक मुसलमान तैयार नहीं होता तब तक उनको इसमें शामिल नहीं करेंगे। सवाल है कि आपको किसने कहा कि हिंदू कोड बिल के लिए हिंदू तैयार है। कौन सा सर्वे कराया गया? और उस वक्त तक तो नेहरू चुने हुए प्रधानमंत्री तक नहीं थे। उस समय डॉ. राजेंद्र प्रसाद कहते रह गए कि 1952 के पहले लोकसभा चुनाव के बाद इस पर फैसला कीजिए,लेकिन नेहरू ने एक नहीं सुनी। शायद उनके मन में कहीं आशंका रही होगी कि पता नहीं चुनाव के बाद क्या परिस्थिति बनेगी। तब वह अपना एजेंडा चला पाएंगे कि नहीं। तो जैसी मुस्लिम परस्त कांग्रेस तब थी वैसी ही आज भी है। 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन के दौरान जिस तरह का रवैया सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का दिखा वह बिल्कुल वैसा ही था जैसा आजादी से पहले मुस्लिम लीग के नेताओं का रहता था। बाद में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी ने कह भी दिया कि हम हमारा वर्जन ही चलाएंगे यानी दो पद ही गाएंगे। सवाल है कि हमारा वर्जन कौन सा होता है? वंदे मातरम् क्या कांग्रेस पार्टी का लिखवाया हुआ है? उसे बंकिम चंद्र ने देश की आजादी के आंदोलन के लिए लिखा था। यह गीत भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह कोई भाजपा का छिपा हुआ एजेंडा नहीं है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भाजपा के सिद्धांत का कोर है। इसीलिए मोदी सरकार ने कानून बना दिया कि जितने राजकीय, सरकारी समारोह हैं उनमें पूरे छह पद गाए जाएंगे। कानून में साफ कर दिया गया है कि निजी समारोहों में अगर वंदे मातरम् का गायन होगा तो सारे छह पदों का होगा वरना आपके पास विकल्प है कि उसको न गाएं। लेकिन यह विकल्प नहीं है कि केवल दो पद गाएंगे, जिस पर कांग्रेस अड़ी हुई है।
कांग्रेस कार्यसमिति में कहा गया कि हम वंदे मातरम् के दो ही पद गाएंगे क्योंकि 90 साल से यही गा रहे हैं। सवाल है कि 90 साल पहले तो आप जिन्ना की मुस्लिम लीग की मांग के सामने झुक गए। आज कौन सी मुस्लिम लीग है? आज तो कांग्रेस पार्टी ही मुस्लिम लीग बन गई है। तो दिमागी नक्सल को जो और परिष्कृत करने की जरूरत थी, उसमें कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले ने मदद कर दी। कांग्रेस का कहना है कि संविधान मंजूरी देता रहे, लेकिन हम कानून के विरुद्ध जाएंगे। कानून को न मानने का विकल्प किसी भारतीय नागरिक के पास नहीं है। अगर कानून से आपको समस्या है तो आपके पास सिर्फ और सिर्फ अदालत का दरवाजा है। लेकिन आप स्वघोषित राहत नहीं ले सकते। कल को आप कहेंगे कि हम तिरंगे को नहीं मानते। राष्ट्रगान को नहीं मानते। यह कैसे चलेगा? तो कांग्रेस ने तय किया है कि मुस्लिम लीग ने इस तरह का स्टैंड लेकर एक नया देश बना लिया, क्या हम ये स्टैंड लेकर देश में चुनाव नहीं जीत सकते? लेकिन वर्तमान परिस्थितियां क्या हैं? मुस्लिम वोट का वीटो 2014 के बाद खत्म हो गया। कांग्रेस और उसके साथी दलों को मुस्लिम वोट एकमुश्त मिलता है फिर भी वे जीत नहीं पा रहे। बीजेपी को बिल्कुल नहीं मिलता है फिर भी वह जीत रही है। असम में 40% और पश्चिम बंगाल में 30% मुसलमान हैं लेकिन दोनों जगह भाजपा की प्रचंड जीत हुई। इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी का वंदे मातरम् को लेकर इस तरह का फैसला लेना आत्महत्या जैसा कदम नहीं तो और क्या है। कांग्रेस को मुसलमानों का वोट पहले से मिलता रहा है। तो इस स्टैंड से ऐसा नहीं है कि नए मुस्लिम मतदाता जुड़ जाएंगे। कांग्रेस को दूसरी उम्मीद उन हिंदू वोटरों से रहती है, जो मुसलमानों से ज्यादा हिंदू धर्म से नफरत करते हैं। कांग्रेस के इस स्टैंड ने ऐसे हिंदू वोटरों के मन में एक शंका पैदा कर दी है कि कांग्रेस आखिर जिन्ना के रास्ते पर क्यों जा रही है? कांग्रेस पार्टी का यह स्टैंड बता रहा है कि जिन्ना और मुस्लिम लीग ने जो फैसला लिया वह बिल्कुल सही था। दरअसल कांग्रेस का बस चले तो वह वंदे मातरम् का गायन होने ही न दे। नेहरू ने तो मुस्लिम लीग के नेताओं से कहा भी था कि धीरे-धीरे वंदे मातरम् इर्रेलेवेंट हो जाएगा। लेकिन 90 साल बाद भी वंदे मातरम् उसी मजबूती से खड़ा है क्योंकि उसकी जड़ें इस देश की संस्कृति और आत्मा में हैं।
वंदे मातरम् पर कांग्रेस के फैसले से अब भाजपा के पास एक ऐसा नैरेटिव है, जो इस देश की सभ्यता,संस्कृति और आत्मा से जुड़ता है। वंदे मातरम् के इन छह पदों में पूरी भारतीय संस्कृति परिलक्षित होती है। जो भी भारत माता में विश्वास करता है,वह वंदे मातरम् के पूरे छह पदों का विरोध कर ही नहीं सकता। और जो करता है,उसका सीधा मतलब है कि वह भारत माता का विरोध करता है। राहुल गांधी तो सार्वजनिक रूप से बोल ही चुके हैं कि ये भारत माता है कौन? इसका नतीजा अभी सात राज्यों में जो चुनाव होने वाले हैं, उसमें परिलक्षित होगा। उसके बाद 2029 के लोकसभा चुनाव में दिखाई देगा। 2029 तक के लिए बीजेपी का नैरेटिव उसके विरोधियों ने ही सेट कर दिया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)