हिंदू होने की नई परिभाषा देकर भागवत किसे खुश करना चाह रहे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू होने की एक नई परिभाषा बता दी है। उन्होंने अपने अमेरिका दौरे पर एक कार्यक्रम में कहा कि जो यह कहते हैं कि भारत में मुसलमानों को नहीं रहना चाहिए वे हिंदू नहीं हैं। अब मोहन भागवत जी एक ऐसे संगठन के मुखिया हैं, जो अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। उनकी बड़ी प्रतिष्ठा है। उनके इस कथन को सही और गलत के तराजू पर तौलने की क्षमता मुझमें नहीं है, लेकिन हिंदू धर्म का एक मूल है कि जो जिज्ञासु है वह हिंदू है। तो एक हिंदू होने के नाते इस कथन से मेरे मन में कई प्रश्न उठे हैं।
मेरा मानना है कि अब ये सवाल ही अप्रासंगिक हो गया है कि भारत में मुसलमान रहें या न रहें। मुझे नहीं मालूम कि भागवत जी को कौन से हिंदू मिले जो कह रहे हैं कि भारत में मुसलमानों को नहीं रहना चाहिए। यह प्रश्न विभाजन के समय था और इसलिए था क्योंकि मुसलमानों ने कहा कि हम हिंदुओं के साथ रह ही नहीं सकते। हमको अलग देश चाहिए और उनको पाकिस्तान मिल गया। उस समय दो बड़े व्यक्तित्व सरदार पटेल और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ऐसे थे जिन्होंने कहा कि जब धर्म के आधार पर बंटवारा हुआ है और मुसलमानों को अलग देश मिल गया है तो आबादी का भी आदान-प्रदान होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत में सांप्रदायिकता की समस्या कभी खत्म नहीं होगी। और वही होते हम देख रहे हैं। विभाजन के समय दो और विभूतियां गांधी जी और जवाहरलाल नेहरू गांधी ऐसी थीं जिन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे भारत छोड़कर न जाएं। नेहरू ने तो मुस्लिम समाज के कई प्रमुख बुद्धिजीवियों को वापस बुलाने के लिए बहुत से लोगों को विदेश भेजा। उनमें से कुछ लोग लौटे भी। गांधी जी मत था कि जो मुसलमान बंटवारे के बाद पाकिस्तान गए हैं उनको वापस लौट आना चाहिए और जो हिंदू पाकिस्तान से जान बचाकर भारत आए हैं उनको पाकिस्तान लौट जाना चाहिए। इस सिलसिले में अपील करने के लिए वह 1948 में पाकिस्तान भी जाने वाले थे। इस पृष्ठभूमि में इस बात को देखा जाना चाहिए।
अब एक दूसरी बात। डॉक्टर रामधारी सिंह दिनकर की एक किताब है संस्कृति के चार अध्याय। उसमें उन्होंने अलबरूनी को कोट किया है। अलबरूनी ने लिखा है कि जब मुगलों ने हिंदुओं के मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ना शुरू किया तो हिंदुओं का हृदय फट गया। उनके मन में मुसलमानों के प्रति जो घृणा पैदा हुई वह कभी नहीं गई। हिंदुओं को यह कल्पना भी नहीं थी कि कोई ऐसा धर्म या मजहब हो सकता है जो दूसरे धर्म के मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ने में सुख महसूस करे। डॉक्टर दिनकर लिखते हैं कि इस्लाम राजा का मजहब था। प्रजा का नहीं था। जबकि सनातन आम जनता का धर्म था। इस्लाम का मानना था कि मूर्ति पूजा करने वालों का जो धर्म है,उसे नेस्तनाबूद करना ही धर्म का काम है। इस फर्क को अगर आप समझेंगे तो आपको समझ में आएगा कि समस्या की जड़ कहां पर है। तो समस्या मुसलमान नहीं है। जब तक आप मुसलमान को समस्या मानते रहेंगे और यह सोचेंगे कि हिंदू के मन में मुसलमान के प्रति कोई विद्वेष भाव है,तब तक समस्या का हल नहीं निकलने वाला है। समस्या है इस्लाम की विचारधारा। वह विचारधारा जो किसी दूसरे धर्म के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करती। जो कहती है कि अल्लाह के अलावा और कोई पूजा एवं सम्मान के योग्य नहीं है। जो मूर्ति पूजा करने वालों को काफिर समझती है और काफिरों को खत्म करना जिनके मजहब का उद्देश्य है। समस्या यहां से शुरू होती है। अगर हिंदू मुसलमान का मामला होता तो केवल भारत में होता। पूरी दुनिया में मुसलमानों से समस्या क्यों है? मुसलमानों की नजर में केवल इस्लाम की शिक्षा ही सच्चाई है और इस्लाम की शिक्षा है कि काफिरों को जीने का कोई अधिकार नहीं है। तो दिनकर जी लिखते हैं कि इस्लाम का सिद्धांत था कि हिंदुओं से दोस्ती मत करो। उनको अपने में आत्मसात कर लो। मतलब इनका धर्म परिवर्तन करा लो। तो हिंदुत्व और इस्लाम की विचारधारा परस्पर विरोधी हैं और यही टकराव का कारण है। हिंदुत्व की विचारधारा कहती है कि किसी धर्म-मजहब का अनादर मत करो। सबको साथ लेकर चलो। इसीलिए दुनिया में भारत एकमात्र देश है,जहां सबसे ज्यादा धर्म-मजहब हैं। हिदुओं ने किसी की हत्या नहीं की। किसी का धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश नहीं की। लेकिन इसके ठीक उल्टी है इस्लाम की विचारधारा कि सब हमारे जैसे होने चाहिए। जो अपने आप मान जाए तो ठीक है नहीं तो तलवार के जोर पर अपने में मिला लो। तो इन दो विचारधाराओं का मिलन कैसे हो सकता है। किसी मुसलमान को कोई हिंदू नहीं कह रहा है कि वह भारत छोड़कर चला जाए, लेकिन जो मुसलमान इस देश को अपना नहीं मानता और जो हिंदू धर्म को नष्ट करना अपना मजहबी कर्तव्य मानता है, उसके बारे में क्या? यहीं पर आता है शत्रु बोध।
भागवत जी की बातों से लगता है कि उन्होंने शत्रु बोध के बारे में सोचना बंद कर दिया है। संघ ने अपनी सोच बदल ली है। ये सब बातें कहकर अपने को समावेशी बनाने की कोशिश हो रही है। मेरी नजर में सनातन धर्म का इससे बड़ा अपमान हो ही नहीं सकता। सनातन धर्म का तो मूल ही समावेशी है। वह हर मनुष्य को एक नजर से देखता है। सनातन धर्म के किसी ग्रंथ या किसी किताब में नहीं लिखा है कि जो हमारे धर्म को नहीं मानते हैं, उनको नष्ट कर देना चाहिए या उनको अपने धर्म में लाने की कोशिश करनी चाहिए। तो सनातन को किस तरह का समावेशी बनाने की कोशिश हो रही है? जो समावेशी नहीं है उसे बनाने की कोशिश होनी चाहिए, लेकिन वे मानने को तैयार नहीं हैं। इस बात को न तो गांधी जी समझ पाए न नेहरू। आखिर जो बात सरदार पटेल और डॉक्टर अंबेडकर को समझ में आ गई वह कांग्रेस के बाकी नेताओं को समझ में क्यों नहीं आई? देश भाषा या भौगोलिक आधार पर नहीं बंटा था। बंटवारा धर्म और मजहब के आधार पर हुआ था। मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों का कहना था कि हम हिंदुओं के साथ रह ही नहीं सकते। हम दोनों की सोच अलग है, रहन-सहन अलग है, हमारे नायक अलग हैं। और बंटवारा हुआ भी तो बड़ा बेईमानी वाला हुआ। कम आबादी को ज्यादा भूभाग दे दिया गया। हिंदुओं ने उसे भी बर्दाश्त किया। बंटवारे के बाद भी कई मुसलमान यहीं रह गए। हिंदुओं ने वह भी बर्दाश्त कर लिया। आप देख लीजिए, भारत में कब हिंदुओं ने आंदोलन किया कि मुसलमान यहां से चले जाएं, लेकिन इस देश में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक दंगे मुसलमानों ने कराए। ऐसा क्यों है कि देश में जो मुस्लिम बहुल इलाके हैं, उन्हें ही संवेदनशील माना जाता है। जो इलाके हिंदू बहुल हैं उनमें से एक भी संवेदनशील क्यों नहीं माना जाता? तो भागवत जी ने हिंदू होने की जो नई परिभाषा बता दी है कि अगर आप कहते हैं कि मुसलमानों को भारत से चले जाना चाहिए तो आप हिंदू ही नहीं हैं, अब मुझे मालूम नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जो स्वयंसेवक हैं उनकी इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी।
इस्लाम और कम्युनिज्म दोनों विचारधाराएं राष्ट्र की अवधारणा पर विश्वास ही नहीं करती हैं। इस्लाम को मानने वाला एक स्थिति में राष्ट्रवादी हो जाता है, जब उस देश में शरिया का राज हो। और हिंदुत्व को देखिए,वह पूरे विश्व को अपना मानता है। हमारी हर पूजा में अपने कल्याण, समाज के कल्याण, राष्ट्र के कल्याण और वातावरण के परिष्कार की कामना की जाती है। दुनिया में कौन सा ऐसा धर्म है जो इस तरह से सोचता हो। कोई हिंदू इस देश में नहीं कहता कि मुसलमानों को नहीं रहना चाहिए। लेकिन देश विरोधियों को क्यों रहना चाहिए,चाहे वह किसी धर्म-मजहब का हो। ऐसे लोगों को क्यों रहना चाहिए जो जबरन मतांतरण करा रहे हों। केवल कानून बन जाने से यह सब नहीं रुकने वाला है। भारत देश,भारतीय समाज और हिंदुत्व के खिलाफ बड़ा षड्यंत्र चल रहा है। आंख मूंद लेने से यह संकट दूर नहीं होने वाला है। इसके खिलाफ खड़ा होना ही पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









