लव जिहादियों को गरबा आयोजनों में आने देने की वकालत आखिर क्यों?
एक शेर है- हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था, हमारी किश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था। यह बात उन पर पूरी तरह से लागू होती है जो सनातनी होने का दिखावा करते हैं, जबकि सनातन का सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस भी ऐसे ही लोगों में हैं।
उन्होंने कहा है कि गरबा हमारा त्योहार है। अगर मुस्लिम पुरुष इसमें आकर इसका आनंद लेना चाहते हैं तो उन्हें क्यों रोका जाना चाहिए? अब पहली बात तो ये है कि गरबा क्या है,इसके बारे में अमृता फडणवीस को कोई जानकारी नहीं है। गरबा एक धार्मिक अनुष्ठान है। ये हजारों साल पुरानी परंपरा है,जिसमें देवी की पूजा की जाती है। जो बीच में घड़ा रखा जाता है, वह देवी का प्रतीक है। उसके चारों तरफ जो नृत्य होता है तो हम देवी की आराधना करते हैं। वहां कोई डिस्को डांस या मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं चल रहा होता है। तो सवाल यह है कि क्या मुसलमानों को देवी पर आस्था है? उनका धर्म इसकी इजाजत नहीं देता। उनका धर्म मानता है कि अल्लाह के अलावा कोई और पूजा के योग्य नहीं है। वे सनातन या किसी अन्य धर्म-मजहब के अस्तित्व को ही नहीं मानते। उनका तो मानना है कि मूर्ति पूजक को जीने का भी हक नहीं है। उन्हीं लोगों को अमृता फडणवीस कह रही हैं कि गरबा में आने दीजिए, क्या हर्ज है? अमृता फडणवीस की वास्तविकता यह है कि वे सांस्कृतिक जड़ों से कटी हुई हैं। उनको मालूम ही नहीं कि भारतीय और सनातन संस्कृति क्या है? उसका महत्व क्या है? गरबा का महत्व उनके लिए नाच गाना से ज्यादा कुछ नहीं। पूरे देश में अलग-अलग नामों से गरबा का आयोजन होता है और यह तब से है जब इस्लाम मजहब आया भी नहीं था। लेकिन मैं एक दूसरा प्रश्न पूछता हूं। अमृता फडणवीस से पूछा जाना चाहिए कि गरबा में आने के लिए मुस्लिम पुरुष इतने उत्सुक क्यों हैं? मुस्लिम महिलाएं क्यों नहीं आना चाहतीं? क्योंकि मुस्लिम पुरुषों को गरबा के आयोजनस्थल लव जिहाद की सबसे बड़ी शिकारगाह नजर आते हैं। वे सिर्फ हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में फंसाने के लिए आना चाहते हैं,उनका और कोई उद्देश्य नहीं है। आप बताइए कि जिस आयोजन में आपकी आस्था नहीं है और वह आपके मजहब के खिलाफ भी है फिर भी आप उसमें क्यों आते हैं? कोई तो कारण होगा। यह साधारण सी बात अमृता फडणवीस और उनके साथियों को समझ में नहीं आती है और कभी आएगी भी नहीं।

अमृता फडणवीस सार्वजनिक रूप से यह बताते नहीं थकतीं कि उनका सबसे पसंदीदा गाना ‘दमादम मस्त कलंदर, अली दा पहला नंबर’ है। इस गाने को वह अपने पति मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का भी पसंदीदा बताती हैं। अली का पहला नंबर, यह सनातन के मानने वालों का गीत है क्या? अरे, अली का पहला नंबर मानने में इस्लाम के ही दो फिरकों शिया और सुन्नी में विवाद है। लेकिन अमृता फडणवीस को ये गाना बहुत प्रिय है। इससे आप अंदाजा लगाइए कि सनातन के नाम पर लोगों से अपील करने वाले जो राजनीतिक लोग हैं, उनके अंदर कितना सनातन है। अगर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अपनी पत्नी को सनातन के बारे में नहीं बता और समझा सकते तो उनको दूसरे लोगों को बताने और समझाने का क्या अधिकार है? लेकिन उनसे कोई जवाब नहीं मांगेगा। विश्व हिंदू परिषद अमृता फडणवीस के बयान का विरोध कर रही है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के कितने नेता इसके खिलाफ बोले। 800 साल का अत्याचार और गुलामी सहने के बाद भी अगर हमें समझ नहीं आता कि हम क्या कह रहे हैं तो समझ लीजिए कि हमारा क्या भविष्य है। हमें खतरा बाहर वालों से नहीं,अंदर वालों से है। इस्लाम और क्रिश्चियनिटी के खतरे का मुकाबला करने के लिए हम तैयार हैं। हमने 1000 साल तक उस खतरे को झेला है। लेकिन जो अंदर से हमला हो रहा है,उसको कैसे रोका जाए? मेरी नजर में तो एक ही बात समझ में आती है कि जो सनातन धर्म में रहकर सनातन धर्म के विरुद्ध काम करते हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। हिंदू धर्म के रीति रिवाज एवं आयोजनो में घुसो और वहां से अपना लव जिहाद का धंधा शुरू करो,इस्लाम के मानने वालों की यह रणनीति तो समझ में आती है। लेकिन कोई हिंदू इसमें सहायक बने तो उसकी क्या रणनीति हो सकती है? अमृता फडणवीस जो बोल रही हैं उसका मतलब इसके अलावा और कुछ नहीं है कि वे हिंदू युवतियों को मुस्लिम लव जिहादियों का चारा बनने देना चाहती हैं। और जो रोक रहे हैं उनको सांप्रदायिक बताया जा रहा है। लेकिन फिर मैं लौट कर उसी बात पर आता हूं कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी को कुछ देर के लिए भूल जाइए। अपना ध्यान ऐसे हिंदुओं पर केंद्रित कीजिए जो सनातन के लिए खतरा बन गए हैं क्योंकि घर के अंदर का दुश्मन सबसे खतरनाक होता है। भाई अगर गरबा से मुसलमानों को इतना ही प्रेम है तो अपनी मस्जिदों-दरगाहों पर क्यों नहीं गरबा का आयोजन कराते? वहां मुस्लिम युवक-युवतियां आएं और हिंदू युवक-युवतियों को भी न्योता दें। लेकिन क्या कोई मुसलमान ऐसा करेगा? क्या कोई मुस्लिम मौलवी इसकी इजाजत देगा? क्या इस्लाम इसकी इजाजत देता है? इस्लाम तो संगीत की भी इजाजत नहीं देता। तो ये इस्लाम के मानने वाले गरबा आयोजनों में क्यों आना चाहते हैं। यह देवी की आराधना का समारोह है और देवी की आराधना वही कर सकता है, जिसकी देवी में आस्था हो। जिसकी आस्था नहीं है उसके आने के पीछे बदनियती नहीं तो और क्या है? अगर हम खुली आंखों से यह मक्की निगलने को तैयार हैं तो अंदाजा लगा लीजिए कि हमारा भविष्य क्या होने वाला है। तो पहले घर की सफाई जरूरी है।
समस्या यह है कि हिंदू सच बोलने से भी डरता है। यह 1000 साल की गुलामी का असर है। हालांकि वह धीरे-धीरे कम तो हो रहा है, लेकिन इतनी तेजी से कम नहीं हो रहा है कि उसका बहुत व्यापक प्रभाव आपको दिखाई दे। हाल ही में असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों, जहां 40 और 30% मुस्लिम आबादी है, के हिंदुओं ने पहचाना कि हमारा धर्म खतरे में है और इसकी रक्षा कोई बाहर से आकर नहीं करेगा। हमें ही करना होगा और उन्होंने भारी बहुमत से भाजपा को सत्ता में पहुंचाया। उन्होंने अपनी एकता से मुस्लिम वोट के वीटो को खत्म कर दिया। फिर बात वहीं पर आ जाती है कि बंटेंगे तो कटेंगे। तो तय कर लीजिए। अगर कटना है तो बंटिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









