बांग्लादेश में चिन्मय कृष्णदास को मिली हिंदू होने की सजा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
डेमोग्राफिक चेंज कितनी भयावह तस्वीरें पेश करता है, लेखक और पत्रकार उत्पल कुमार ने एक लेख में इसका जिक्र किया है। आप यह बात हमेशा याद रखिए कि डेमोग्राफी बदलेगी तो आपकी जीवन शैली, आपका जीवन, आपका देश और आपका समाज सब कुछ बदलेगा और जिसने भी इसको अनदेखा किया उसने इसकी भारी कीमत चुकाई है।
उत्पल कुमार ने अपने लेख की शुरुआत में दो पुराने फोटोग्राफ्स का जिक्र किया है। एक चित्र वियतनाम का है,जब वहां अमेरिकी सेना बम गिरा रही थी और एक गांव में छोटी सी बच्ची बचने के लिए निर्वस्त्र अवस्था में दौड़ रही थी। उस फोटोग्राफ को पुलित्जर पुरस्कार मिला था। दूसरा उन्होंने सूडान के चित्र का जिक्र किया,जब वहां भयंकर अकाल से बच्चे मर रहे थे। एक बच्ची रेंगती हुई आगे बढ़ रही थी और देखकर लग रहा था कि उसकी किसी भी समय मौत हो सकती है। उसके ऊपर एक गिद्ध मंडरा रहा था। उस चित्र को भी पुलित्जर पुरस्कार मिला था। हालांकि उस चित्र की बड़ी आलोचना भी हुई और लोगों ने लिखा कि उस दिन केवल एक गिद्ध नहीं था, दो गिद्ध थे। एक जो बच्ची के ऊपर मंडरा रहा था और दूसरा कैमरे के पीछे था। लेकिन ये बातें अतीत की हो गईं। इस बात का संदर्भ यह है कि एक चित्र पूरी दास्तान बयां कर देता है। तो उत्पल कुमार ने ऐसे ही एक और चित्र की बात की है। यह चित्र है चिन्मय कृष्णदास का। चिन्मय कृष्णदास बांग्लादेश में रहने वाले एक हिंदू संत हैं और दो साल से जेल में हैं। उनका अपराध सिर्फ इतना है कि वह अपने धर्म का रीति रिवाजों के अनुसार पालन कर रहे थे। बांग्लादेश की इस्लामी ताकतों को यह पसंद नहीं आया और उनको गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। उनकी मां बहुत बीमार थीं। मां की अंतिम इच्छा थी कि बेटे को एक बार देख लें, लेकिन बांग्लादेश की सरकार और अदालत ने इसकी इजाजत नहीं दी। आखिरकार उनकी मां का निधन हो गया। अपनी मां के अंतिम संस्कार के लिए चिन्मय कृष्णदास को सिर्फ पांच घंटे का समय मिला। वह अपनी मां के पार्थिव शरीर के बगल में बैठकर जिस तरह से फूट-फूट कर रो रहे थे, वह तस्वीर पूरी दुनिया ने देखी होगी और मुझे उम्मीद है कि भारत में सारे हिंदुओं ने देखी होगी। पता नहीं कितने लोग उससे विचलित हुए।
उत्पल कुमार ने लिखा है कि यह चित्र केवल एक व्यक्ति चिन्मय कृष्ण दास का नहीं है, यह चित्र इस बात को दर्शाता है कि बांग्लादेश में हिंदू होने का मतलब क्या है। इसके विपरीत हमारे देश भारत में क्या होता है? यहां हिंदू विरोधी दंगों के आरोपी को अपने भाई की शादी तय कराने के लिए दो से तीन हफ्ते की जमानत मिल जाती है, लेकिन कहा जाता है कि भारत में मुसलमानों का बड़ा दमन हो रहा है। बांग्लादेश में चिन्मय कृष्ण दास को सजा सिर्फ इस बात की मिली कि वह हिंदू हैं। अगर वह हिंदू नहीं होते तो उनके साथ ऐसा नहीं होता। ऐसा नहीं है कि शेख हसीना के रहते हुए हिंदुओं पर अत्याचार नहीं हो रहा था। 2013 से 2021 के बीच बांग्लादेश में हिंदुओं पर 3600 हमले हुए। सबसे भयानक हमला 2021 में हुआ था, जब दुर्गा पूजा पंडाल में कुरान की प्रति पाई गई और उसके बाद 1700 मंदिरों, पूजा पंडालों, दुकानों, घरों और लोगों पर हमला किया गया। बाद में पता चला कि कुरान की वह प्रति किसी मुस्लिम युवक ने रखी थी। तो हिंदुओं को उस बात की सजा दी गई, जो अपराध उन्होंने किया ही नहीं था, लेकिन उनका सबसे बड़ा अपराध तो हिंदू होना ही है। पिछले 50 साल में बांग्लादेश की आबादी दुगनी हो गई है जबकि हिंदुओं की आबादी 75 लाख कम हो गई है। ये आंकड़े बताते हैं कि हिंदुओं के साथ वहां क्या हो रहा है, जहां वे अल्पमत में हैं। ढाका विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर है अब्दुल बरकत। वह पिछले 30 साल से इस बात पर रिसर्च कर रहे हैं कि आखिर हिंदुओं का पलायन क्यों हो रहा है? उनके रिसर्च का निष्कर्ष है कि अगर पलायन की यह दर जारी रही तो अगले 30 साल में बांग्लादेश में एक भी हिंदू नहीं बचेगा। 2024 में जब बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार का तख्ता पलट हुआ उससे पहले भी हिंदुओं पर अत्याचार होता था,लेकिन तब तक जमात की ताकत इतनी नहीं बढ़ी थी।
उत्पल कुमार कहते हैं कि अमेरिकी लेखक रिचर्ड एल बेनकिन की एक किताब है-अ क्वाइट केस ऑफ एथेनिक क्लीजिंग : द मर्डर ऑफ बांग्लादेशीज हिंदूज। इसमें बताया गया है कि बांग्लादेश में किस तरह चुपचाप हिंदुओं की एथेनिक क्लीज़िंग हो रही थी। उन्हें मारा जा रहा था और पलायन पर मजबूर किया जा रहा था। 2024 के बाद जमात की ताकत बढ़ने से हिंदुओं पर अत्याचार और ज्यादा बढ़ गया। इसमें दो चीजें और जुड़ गईं। एक तो उन्हें हिंदू होने का दंड मिल रहा था, दूसरा यह माना जाने लगा कि हिंदू शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के समर्थक हैं। इसलिए उन पर अत्याचार और बढ़ गया। तो चिन्मय कृष्णदास जो ये फूट-फूट कर रो रहे थे वह इसीलिए कि उनका दर्द था कि मां की आखिरी समय में सेवा नहीं कर पाए और अंतिम समय में मां से मिल नहीं पाए। ये सब सिर्फ इसलिए हुआ कि वह हिंदू हैं। इतिहास की बात कुछ देर के लिए भूल जाइए। अभी वर्तमान में जो कुछ बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हो रहा है सिर्फ उस पर ध्यान दीजिए। देखिए डेमोग्राफी बदल जाने से क्या होता है? आप तभी तक सुरक्षित हैं जब तक आप आबादी में ज्यादा हैं। अलग-अलग तरीकों से आपकी आबादी घटाने की कोशिश हो रही है। घुसपैठ और धर्म परिवर्तन उनमें सबसे ऊपर हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि हिंदुओं पर जो अलग-अलग कोण से हमले हो रहे हैं, इसका समर्थन करने वालों में एक बड़ा वर्ग हिंदुओं का ही है। इसलिए मैं बार-बार कहता हूं कि खतरा बाहर के बजाय अंदर से ज्यादा है। जो हिंदू ही हिंदू विरोधी हैं, जो इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का समर्थन करते हैं, जो सनातन धर्म के अस्तित्व को ही अस्वीकार करते हैं, वे हिंदुओं के सबसे बड़े दुश्मन हैं। तो बांग्लादेश का उदाहरण सामने है। हम आप तय कर लें कि हमको कहां जाना है? क्या बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में जो हिंदुओं के साथ हुआ, उस गति को प्राप्त होना है या अपने को बचाना है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)