सपा के पास आइडिया तक अपना नहीं ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
उत्तर प्रदेश में 9 साल से ज्यादा की एंटी इनकंबेंसी, राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का साथ और लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी सफलता, इन सबके बावजूद समाजवादी पार्टी इस समय आइडिया के अकाल से जूझ रही है। उसे समझ नहीं आ रहा है कि किस मुद्दे पर वह यूपी विधानसभा का चुनाव लड़े। इसलिए हारकर उसने योगी सरकार के मुद्दे की नकल का फैसला किया है।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार का एक बहुत ही सफल कार्यक्रम है- वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट प्रोग्राम यानी ओडीओपी। इसके कारण यूपी करोड़ों का एक्सपोर्ट कर रहा है। दूसरे राज्य भी इसको अपनाने पर विचार कर रहे हैं। अब चुनाव से पहले योगी सरकार को अपने इस कार्यक्रम के प्रचार की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि इसका प्रचार अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी करेंगे। समाजवादी पार्टी ने फैसला किया है कि वह एक मेनिफेस्टो नहीं लाएगी बल्कि हर जिले के लिए अलग मेनिफेस्टो यानी वन डिस्ट्रिक्ट वन मेनिफेस्टो (ओडीओएम) लाएगी। कोई भी पार्टी अगर कोई नीतिगत निर्णय लेती है तो पहले अपनी ताकत देखती है। क्या कोई भी यह कह सकता है कि चुनाव घोषणा पत्र समाजवादी पार्टी की ताकत है। 1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई थी। तब से अब तक 34 साल हो गए। मुझे कोई बता सकता है कि इस बीच में जितने चुनाव हुए उनमें समाजवादी पार्टी के मेनिफेस्टो की कौन सी एक बात उनको याद है? सपाई जब सत्ता में आते हैं और जब सत्ता से बाहर होते हैं तो लोगों को एक ही बात याद रह जाती है कि उनके सत्ता में रहने के दौरान क्या-क्या हुआ था। तो सपा चाहे एक मेनिफेस्टो लाए या 75 जिलों का अलग-अलग बनाए,उससे कुछ होने वाला नहीं है। नकल करने से आप ओरिजिनल नहीं हो जाते हैं और यह तो बहुत ही फूहड़ नकल है। सवाल है कि इन जिलों में आप किस विषय पर क्या बोलेंगे? समाजवादी पार्टी को ध्यान में रखकर शिक्षा की बात करें तो आपको नकल माफिया याद आएगा। कल्याण सिंह की सरकार में नकल विरोधी कानून बनाया गया था। मुलायम सिंह यादव ने सत्ता में आते ही उसको हटा दिया। नकल की छूट हो गई। नौकरी की बात करेंगे तो लोगों को यादव सेवा आयोग याद आएगा। बिजली की बात करेंगे तो लोगों को याद आएगा कि चार-पांच वीआईपी डिस्ट्रिक्ट में ही बिजली आती थी। उद्योगों की बात करेंगे तो लोगों को रंगदारी याद आएगी। ये ऐसी बातें हैं, जिनको लोग भूलते नहीं हैं। गुजरात में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर हुए 36 साल हो गए हैं, लेकिन कांग्रेस सरकार के दौरान जो गुंडागर्दी और वसूली होती थी,वह गुजरात के लोगों को आज भी याद है और डराती है। यही हाल समाजवादी पार्टी का है। समाजवादी पार्टी की बात करते ही आपके मन में एक भय पैदा होता है। माफिया अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे लोगों का चेहरा आपके सामने आ जाता है और इन डराने वाले चेहरों से अखिलेश यादव ने पिछले 9 सालों में एक बार भी खुद को अलग करने की कोशिश नहीं की बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इनके समर्थन में ही खड़े नजर आए। माफिया के बारे में उनकी नीति बदल गई है, ऐसा कोई संकेत बीते सालों में अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी ने नहीं दिया है।
2024 के लोकसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में अखिलेश ने कहा था कि उनका गठबंधन अगर सत्ता में आया तो ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करेंगे। जिस कांग्रेस के साथ वह गठबंधन में हैं,उसने छत्तीसगढ़, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में चुनाव जीतने के बाद इन तीनों प्रदेशों में ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने की कोशिश की,लेकिन सफल नहीं हो पाए। इसके बाद भी अखिलेश यादव ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में इसे शामिल किया। अखिलेश यादव दलितों का वोट चाहते हैं,लेकिन दलित कैसे भूल जाएंगे कि जब 2012 में सपा की सरकार बनी थी तो प्रमोशन में आरक्षण को खत्म कर दिया गया था। तो अखिलेश यादव जो हर जिले के मेनिफेस्टो का आइडिया लेकर आए हैं उसमें कहेंगे क्या? जो भी वादा करेंगे लोग उसको उनके व उनके परिवार के 13 साल के शासन से परखेंगे और तब जो तस्वीर उभरेगी उसके बाद जो समाजवादी पार्टी को वोट देने का मन बना भी रहा होगा,वह भी बिदक जाएगा। यह वन डिस्ट्रिक्ट वन मेनिफेस्टो का आइडिया उनके ऊपर उल्टा पड़ने वाला है क्योंकि इसमें समाधान कम सवाल ज्यादा उठेंगे। किसी का कर्म उसका पीछा छोड़ता नहीं है। समाजवादी पार्टी के साथ यही है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के साथ भी यही हो रहा है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का सौभाग्य इतना है कि बहुजन समाज पार्टी बहुत नीचे जा चुकी है। अगर वह अपने पुराने रूप में होती तो आप मानकर चलिए कि 2027 की लड़ाई भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच में हो रही होती। समाजवादी पार्टी पुअर थर्ड होती। लेकिन बसपा पहले ही सरेंडर कर चुकी है। वह चुनाव मैदान में तो रहेगी, लेकिन लड़ाई में नहीं होगी। इसलिए सीधा संघर्ष भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच में होगा।
समाजवादी पार्टी के पास 13 साल की सरकारों की उपलब्धि के नाम पर एक मुद्दा नहीं है। अखिलेश यादव खुद लगातार 5 साल मुख्यमंत्री रहे और उसके बाद जब चुनाव हुआ तो समाजवादी पार्टी की सबसे खराब परफॉर्मेंस आई। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि समाजवादी पार्टी की सरकार की तथाकथित उपलब्धियों से लोग कितने प्रभावित होते हैं। अखिलेश यादव अभी उसी तंद्रा में हैं। 2012 से 2017 के कार्यकाल का सुंदर सपना वह आज भी देखते हैं। सपना देखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उसके लिए जमीन पर उतर कर जो मेहनत करनी होती है वह अखिलेश यादव के बस की बात नहीं है। पिछले साढ़े नौ साल में उन्होंने या उनकी पार्टी ने बीजेपी की सरकार के खिलाफ कोई एक आंदोलन नहीं चलाया। वह सरकार के खिलाफ कभी सड़क पर नहीं उतरे। तो आप नंबर दो पर हैं इसलिए नंबर एक हो जाएंगे, यह गणित चुनाव में काम नहीं करता है। चुनाव में जनसमर्थन, जनसपर्क और जनविश्वास काम आता है। तो सपा चाहे हर जिले के लिए मेनिफेस्टो बना ले या हर तहसील व ब्लॉक के लिए, उससे चुनाव के नतीजे पर असर नहीं पड़ने वाला है। केवल मीडिया में कुछ दिन उसकी चर्चा रहेगी। मतदाता को वास्तविकता पता होती है क्योंकि उसने भुगता है। किसने अच्छा किया और किसने बुरा,यह बात किसी को समझाने की जरूरत नहीं है। अखिलेश यादव के लिए सबसे अच्छी बात यह होती कि वह अपने व अपने परिवार के शासनकाल की यादों को भुलाने की कोशिश करते। तब शायद एक नई शुरुआत हो सकती थी, लेकिन ऐसा कोई प्रयास उन्होंने नहीं किया। सपा के शासन की याद से ही लोग सहम जाते हैं। समाजवादी पार्टी की पहचान कानून व्यवस्था को स्थापित करने वाली या इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करने वाली पार्टी के रूप में नहीं है। इसलिए पिछले कई महीनों से मैं बार-बार कह रहा हूं कि 2027 की लड़ाई दिख तो दो पार्टियों के बीच रही है और बहुत से लोग इसे कांटे का बता रहे हैं, लेकिन मुझे न तो कांटा दिख रहा है और न लड़ाई दिख रही है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)