राजस्थान निकाय चुनाव: सवर्ण छिटक गया और दलित जुड़ा नहीं ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने खुशी मनाई और इसे अपनी जीत बताया। मेरा मानना है कि अगर केवल पॉलिटिकल नैरेटिव बनाने के लिए भाजपा ने ऐसा किया तो उसमें कोई हर्ज नहीं है,लेकिन अगर सचमुच भाजपा मानती है कि वह चुनाव जीत गई है तो वह बहुत बड़ी गलतफहमी में है। ये चुनाव नतीजे भाजपा के लिए बहुत बड़ी हार हैं।
राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा को करीब 35%, कांग्रेस को 34% और निर्दलीयों को 27% वोट मिला है। इस जनादेश का मतलब है कि भाजपा से बहुत बड़ी संख्या में लोग नाराज हैं, जिनमें से ज्यादातर सवर्ण हैं। इस जनादेश का यह भी मतलब है कि सवर्णों की नाराजगी मोल लेकर भाजपा जिस एससी-एसटी वर्ग को खुश करना चाहती है, वह उसके साथ आने को तैयार नहीं। मतलब जो साथ थे, उनको नाराज कर लिया और जिनको खुश करना चाहते थे, वह खुश नहीं हुए। दूसरी बात यह कि अगर भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि यूजीसी गाइडलाइंस और दलित उत्पीड़न विरोधी कानून का मुद्दा दब जाएगा या एक आध चुनाव में सवर्णों का गुस्सा निकल जाएगा तो ऐसा होने वाला नहीं है। सवर्णों में यह बहुत गहरे बैठ गया है। लोगों को अब यह नहीं लग रहा है कि सरकार की नीति गलत है, उन्हें लग रहा है कि सरकार की नीयत गलत है। इस पूरे मुद्दे को लेकर ये धारणा बनाने की कोशिश हो रही है कि सवर्ण समाज दलितों का विरोधी है। इससे बड़ा झूठ कोई हो नहीं सकता है। सवर्ण समाज दलित उत्पीड़न विरोधी कानून को जो अन्यायपूर्ण बना दिया गया है और उसका जो दुरुपयोग हो रहा है,उसका विरोध कर रहा है। इस देश में यह कैसे हो सकता है कि आप समान नागरिक संहिता की बात करें और जाति के आधार पर अपराध संहिता तय करें। यानी जाति के आधार पर तय होगा कि आपका अपराध कितना बड़ा या छोटा है, सजा कितनी मिलनी चाहिए या नहीं मिलनी चाहिए और उस अपराध की जांच भी होनी चाहिए कि नहीं? ये दोनों बातें एक साथ कैसे चल सकती हैं?
शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि यूजीसी गाइडलाइंस मामले में सरकार से अनजाने में गलती हो गई,लेकिन अब लग रहा है कि सब कुछ सुनियोजित ढंग से किया गया। पहले भी दलित उत्पीड़न विरोधी कानून का दुरुपयोग हो रहा था। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि इस कानून का दुरुपयोग न हो और पीड़ित को न्याय मिले। लेकिन सरकार ने कहा कि जो पीड़ित है तो उसकी बात ही प्रमाण मान ली जाए और कोई प्रमाण देने की जरूरत ही नहीं है। वरना आप बताइये कि ऐसा कौन सा कानून है जहां एफआईआर लिखाते ही आपको 25% मुआवजा मिल जाए, चार्जशीट बनते ही 50% मिल जाए और अदालत का फैसला आने के बाद बाकी मिल जाए। अगर अदालत का फैसला खिलाफ आया तो मुआवजे का बाकी पैसा नहीं मिलेगा लेकिन शिकायत्तकर्ता को जो 50% दिया गया है, उसकी वसूली कौन करेगा? जब अटेंडेंस पर सवाल उठाने पर प्रिंसिपल या अधिकारी को धमकी दी जाए कि तुम्हारे खिलाफ एससी-एसटी एक्ट लगा देंगे तो यह पैसे की वसूली करने कौन जाएगा? कानून में ही यह प्रावधान होना चाहिए था कि जैसे ही फैसला खिलाफ आएगा आपको इतने दिन के अंदर दी गई मुआवजे की धनराशि लौटानी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इतना ही तो कहा था कि पहले प्राथमिक जांच हो जाए कि जो आरोप लगाया गया है वह दरअसल एफआईआर दर्ज करने योग्य है या नहीं, लेकिन सरकार ने उसको भी निरस्त कर दिया। तो ये जो राजस्थान स्थानीय निकाय चुनाव का नतीजा आया है, ये पूरी तरह से भाजपा के खिलाफ है, लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है। राजस्थान में मुख्य रूप से दो ही पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस हैं। राजस्थान में कांग्रेस का संगठन भी अच्छा खासा मजबूत है और उनके पास नेतृत्व भी है। इसके बावजूद भाजपा से नाराज लोग कांग्रेस की ओर नहीं गए। उसका सबसे बड़ा कारण है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस का स्टैंड क्या है? यूजीसी गाइडलाइंस और दलित उत्पीड़न विरोधी कानून पर आपने राहुल गांधी या कांग्रेस के किसी नेता का कोई बयान सुना कि इन मुद्दों पर वे कहां खड़े हैं? तो सवर्ण मतदाता भाजपा से नाराज हैं और कांग्रेस से निराश हैं। इसीलिए इन चुनावों में निर्दलीयों को इतने वोट मिले। लेकिन यह मामला यहीं रुकने वाला नहीं है। कोटा में कांग्रेस का सफाया होना बताता है कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी पर लोगों को कोई भरोसा नहीं है। इसी तरह मुख्यमंत्री के जिले भरतपुर में भाजपा का सफाया और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के जिले झालावाड़ में भाजपा की बुरी हार बताती है कि ये चेतावनी है। अगर भाजपा को लगता है कि स्थानीय निकाय और आगामी पंचायत चुनाव में लोगों का गुस्सा निकल जाएगा और उसके बाद लोग सब कुछ भूल जाएंगे तो ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला है। सत्ताधारियों को हमेशा यह बात याद रखनी चाहिए कि जनता गलत नीतियों के बाद भी एक और अवसर देने के लिए तैयार रहती है, लेकिन जब एक बार नीयत पर शक हो जाए तो बहुत मुश्किल हो जाता है।
अगर सरकार को लग रहा है कि यूजीसी गाइडलाइंस के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे आ गया है और मामला खत्म हो गया तो मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। स्टे कोई फैसला नहीं है। सरकार के पास पहले दिन से ये विकल्प था कि वह इन गाइडलाइंस को वापस ले लेती और ये अब भी है। यह जो दुष्प्रचार किया जा रहा है कि यूजीसी एक स्वतंत्र बॉडी है,ऐसा नहीं है। यूजीसी शिक्षा मंत्रालय के अधीन आती है और उसके निर्देशों का पालन करने के लिए वह बाध्य है। तो इस मामले में अब लोगों ने मान लिया है कि आपने सुनियोजित ढंग से यह काम किया। इसके बाद एससी-एसटी उत्पीड़न विरोधी कानून पर जिस तरह से आपने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला, उससे आपने अपनी नीयत और साफ कर दी। यह जो धारणा बनाई जा रही है कि सवर्ण दलितों के विरोध में है, उसे बनाकर दरअसल आप हिंदू एकता को तोड़ रहे हैं। अगर आप हिंदुत्व की बात करते हैं तो फिर जातीय अस्मिता की बात को छोड़ना होगा। दोनों एक साथ नहीं चल सकतीं। या तो धार्मिक अस्मिता चलेगी या जातीय अस्मिता चलेगी। सवाल यह है कि वरीयता किसको देंगे? भाजपा अगर यह दोहरा खेल खेलना चाहेगी कि हम जातीय अस्मिता को भी लेकर चलेंगे और धार्मिक अस्मिता को भी लेकर चलेंगे तो यह चलने वाला नहीं है। क्योंकि दोनों परस्पर विरोधी हैं। एक का प्रभाव बढ़ेगा तो दूसरे का घटेगा। दोनों एक साथ नहीं बढ़ सकते। भाजपा नेताओं को मालूम था कि जातीय अस्मिता खत्म नहीं होने वाली है इसीलिए उनकी कोशिश थी कि धार्मिक अस्मिता यानी हिंदुत्व के जरिए इसकी जो आक्रामकता है, उसको कम कर दे। भाजपा इसमें पिछले 12 साल से सफल भी हो रही थी। फिर पता नहीं क्या सोचकर वह यूजीसी गाइडलाइंस ले आई और फिर एससी-एसटी एट्रोसिटीज एक्ट में बदलाव कर उसको इतना कड़ा बना दिया। आखिर आप कौन सा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं? राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव बता रहे हैं कि दलितों का समर्थन भाजपा को नहीं मिला। भाजपा से ज्यादा वह कांग्रेस को मिला। मैं मानता हूं कि यह मतदाताओं की ओर से भाजपा को चेतावनी है कि सुधर जाइए। अगर नहीं सुधरेंगे तो वे फैसला लेने के लिए मजबूर होंगे और फैसला लेने के लिए मजबूर होंगे तो यह जो नतीजा दिखाई दे रहा है कि भाजपा और कांग्रेस लगभग बराबर-बराबर और 27% वोट निर्दलीयों को चला गया, यह 27% वोट विधानसभा और लोकसभा चुनाव में निर्दलीयों के पास नहीं रहने वाला है। अल्टीमेटली उसको कांग्रेस या उस दल की ओर जाना ही पड़ेगा जो भाजपा के खिलाफ मजबूत होगा। सवर्ण मतदाता के पास एक दूसरा विकल्प है कि वह घर बैठ जाए, लेकिन गुस्सा इतना ज्यादा है कि घर बैठने को लोग तैयार नहीं हैं और बार-बार भाजपा को चेता रहे हैं कि ये स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजे तो बस झांकी हैं, अभी विधानसभा और लोकसभा चुनाव बाकी हैं।
अब ये भारतीय जनता पार्टी पर है कि वह अपनी गलती मानेगी और उसमें सुधार करेगी या उसी रास्ते पर और तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश करेगी, जिस पर चल रही है। उसे लोगों का गुस्सा कम करना है या उसको बढ़ाकर अपने विरोधी की ओर धकेल देना है। मैं बहुत विश्वास के साथ कह रहा हूं कि भाजपा से नाराज कोई भी मतदाता कांग्रेस या दूसरी भाजपा विरोधी पार्टियों के साथ नहीं जाना चाहता, लेकिन भाजपा का रवैया उन्हें मजबूर कर रहा है कि वे उस तरफ जाएं। क्योंकि अगर वह उस तरफ नहीं जाएंगे तो भाजपा को सबक नहीं सिखा पाएंगे। अब सवाल यह है कि भाजपा क्या चाहती है? वह अपने कोर वोट को अपने साथ बनाए रखना चाहती है या अपने पास से भगा देना चाहती है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)